Is modernity in conflict with our traditions?

अब और ज्यादा लिखूंगा तो मेरा दिमाग चल जाएगा...हा...हा...हा...
मतबल अभी कयामत बाकी है ???

रहम प्रभु रहम. जाटलैंड के इन तुच्छ प्राणियों पर कुछ रहम करो... दे स्टिल हैव टू एंजौय देअर लाइफ.

वैसे साइंस और मौडरनिटी कि जो आपने व्याख्या कि है वो वाकई सराहनीय है... प्रभु, आप ऐसे ही लिखते रहिये, मुझे पूरा यकीन है आपका दिमाग हरगिज़ नहीं चलेगा... न चला है और न चलेगा.

Make as much illicit relations as you can, enjoy life as much as you can
 
Bhai Upender ek sawal hai..maine suna hai ki swarg aur nark issi dharti par hain..uske baaree mei aapka kya kehna hai..

ये नरक की अवधारणा लोगों को बुरे कामों से बचाने के लिए बनाई गई थी...लेकिन जब लोगों को कहा गया कि बुरे काम करोगे तो नरक में जाओगे तो उन्होंने ये कहना शुरू कर दिया कि स्वर्ग-नरक सब यहीं हैं. लोगों का कहना है कि जब आप हर तरह से खुश होते हो तो आपको स्वर्ग का अहसास होता है और जब बहुत ज्यादा दुखी होते हो तो नरक का...इसलिए स्वर्ग-नरक सब यहीं हैं. हकीकत इससे बिलकुल अलग है. जब कोई दुखी होता है तो यहां नरक का अहसास तो होता है, लेकिन खुश होने पर स्वर्ग का अहसास होता है, इस बात में कोई दम नहीं है. मेरे को दिखाओ कौन-सा इंसान स्वर्ग में है यहां.
कोई इंसान पैदा होता है, बच्चे से जवान होता है, यहां तक तो ठीक है, लेकिन जब जवान से बूढ़ा होता है तो किसी को भी ख़ुशी नहीं होती. सभी लोग बूढ़े होकर मरते हैं, अब ऐसे में यहां कैसे स्वर्ग है, ऐसा मानने वाले ही जाने. अब जिंदगी है, उसमें कुछ तो खुशियां भी होंगी ही, बिलकुल दुःख ही दुःख होते तो फिर तो यहां हा-हाकार मच जाता. यह इस दुनिया को रचने वाले की दरियादिली है कि इस ट्रेनिंग सेंटर को भी उसने इतना सुंदर बनाया है कि यहां लोगों को स्वर्ग का अहसास होता है. जो असली स्वर्ग है वहां ना बुढ़ापा है, ना बीमारी है...वहां सब बस अपनी इस धरती पर की गई मेहनत का आनंद लेते हैं. बुरे कर्मों की सजा यहीं दे दी जाती है और इंसान स्वर्ग में बस अपनी मेहनत, अपनी अच्छी करनी लेकर जाता है. ये जो यहां दुःख हैं, ये एक तरह से इंसान का शुद्धिकरण है. इन तमाम बातों का अहसास इस दुनिया को भी है. तभी तो किसी के मरने के बाद उसके नाम से पहले स्वर्गीय तो लगाया जाता है, नरकीय नहीं लगाया जाता...अगर नरक होता तो किसी ना किसी काल में किसी ना किसी नाम से पहले तो नरकीय लगता. इस दुनिया को सब पता है.
 
मतबल अभी कयामत बाकी है ???

रहम प्रभु रहम. जाटलैंड के इन तुच्छ प्राणियों पर कुछ रहम करो... दे स्टिल हैव टू एंजौय देअर लाइफ.

वैसे साइंस और मौडरनिटी कि जो आपने व्याख्या कि है वो वाकई सराहनीय है... प्रभु, आप ऐसे ही लिखते रहिये, मुझे पूरा यकीन है आपका दिमाग हरगिज़ नहीं चलेगा... न चला है और न चलेगा.


ठीक है जी सर जी, आपने इतना उत्साह बढ़ा दिया तो लिखता रहूंगा. धन्यवाद.
 
ठीक है जी सर जी, आपने इतना उत्साह बढ़ा दिया तो लिखता रहूंगा. धन्यवाद.

Waise ye Honur Killing hogi ya Susat?

Jhatka is better then HALAL
Katti ghisda ghisda ke marega
 
Last edited:
in fact sir, villages are more morally corrupt than cities. it has been so since ages. i feel more unsafe in a village than in a city.
 
ये नरक की अवधारणा लोगों को बुरे कामों से बचाने के लिए बनाई गई थी...लेकिन जब लोगों को कहा गया कि बुरे काम करोगे तो नरक में जाओगे तो उन्होंने ये कहना शुरू कर दिया कि स्वर्ग-नरक सब यहीं हैं. लोगों का कहना है कि जब आप हर तरह से खुश होते हो तो आपको स्वर्ग का अहसास होता है और जब बहुत ज्यादा दुखी होते हो तो नरक का...इसलिए स्वर्ग-नरक सब यहीं हैं. हकीकत इससे बिलकुल अलग है. जब कोई दुखी होता है तो यहां नरक का अहसास तो होता है, लेकिन खुश होने पर स्वर्ग का अहसास होता है, इस बात में कोई दम नहीं है. मेरे को दिखाओ कौन-सा इंसान स्वर्ग में है यहां.
कोई इंसान पैदा होता है, बच्चे से जवान होता है, यहां तक तो ठीक है, लेकिन जब जवान से बूढ़ा होता है तो किसी को भी ख़ुशी नहीं होती. सभी लोग बूढ़े होकर मरते हैं, अब ऐसे में यहां कैसे स्वर्ग है, ऐसा मानने वाले ही जाने. अब जिंदगी है, उसमें कुछ तो खुशियां भी होंगी ही, बिलकुल दुःख ही दुःख होते तो फिर तो यहां हा-हाकार मच जाता. यह इस दुनिया को रचने वाले की दरियादिली है कि इस ट्रेनिंग सेंटर को भी उसने इतना सुंदर बनाया है कि यहां लोगों को स्वर्ग का अहसास होता है. जो असली स्वर्ग है वहां ना बुढ़ापा है, ना बीमारी है...वहां सब बस अपनी इस धरती पर की गई मेहनत का आनंद लेते हैं. बुरे कर्मों की सजा यहीं दे दी जाती है और इंसान स्वर्ग में बस अपनी मेहनत, अपनी अच्छी करनी लेकर जाता है. ये जो यहां दुःख हैं, ये एक तरह से इंसान का शुद्धिकरण है. इन तमाम बातों का अहसास इस दुनिया को भी है. तभी तो किसी के मरने के बाद उसके नाम से पहले स्वर्गीय तो लगाया जाता है, नरकीय नहीं लगाया जाता...अगर नरक होता तो किसी ना किसी काल में किसी ना किसी नाम से पहले तो नरकीय लगता. इस दुनिया को सब पता है.

thanks upender for ur response.
 
Paradoxically enough, many of us spare no opportunity to criticize modernity in pursuit of being called as saviours of ‘traditions’, but, at the same time seem to be vying with each other to have everything that symbolizes modernity viz. sending our kids to English medium schools, wearing trendy clothes, having latest gizmos and luxury cars.
Yes you can find those hypocrites here and there.
 
"There is nothing that will cure the senses but the soul, and nothing will cure the soul but the senses”. First of all let us understand what is meant by being modern. Modernity refers loosely to the general period that had its roots in the renaissance, blossomed with the enlightenment, and continues in many ways to this day. Modernity was characterized by what Max Weber called the differentiation of art, morals and science. This differentiation is the essence of the dignity of modernity. Because art-aesthetics, empirical -science, and religion-morals were not clearly differentiated in premodern societies, therefore what happened in one sphere could dominate and control what happened in the others. Thus a scientist like Galileo could be prevented from pursuing the sphere of science because it clashed with the prevailing sphere of religion-morals.
 
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