ये नरक की अवधारणा लोगों को बुरे कामों से बचाने के लिए बनाई गई थी...लेकिन जब लोगों को कहा गया कि बुरे काम करोगे तो नरक में जाओगे तो उन्होंने ये कहना शुरू कर दिया कि स्वर्ग-नरक सब यहीं हैं. लोगों का कहना है कि जब आप हर तरह से खुश होते हो तो आपको स्वर्ग का अहसास होता है और जब बहुत ज्यादा दुखी होते हो तो नरक का...इसलिए स्वर्ग-नरक सब यहीं हैं. हकीकत इससे बिलकुल अलग है. जब कोई दुखी होता है तो यहां नरक का अहसास तो होता है, लेकिन खुश होने पर स्वर्ग का अहसास होता है, इस बात में कोई दम नहीं है. मेरे को दिखाओ कौन-सा इंसान स्वर्ग में है यहां.
कोई इंसान पैदा होता है, बच्चे से जवान होता है, यहां तक तो ठीक है, लेकिन जब जवान से बूढ़ा होता है तो किसी को भी ख़ुशी नहीं होती. सभी लोग बूढ़े होकर मरते हैं, अब ऐसे में यहां कैसे स्वर्ग है, ऐसा मानने वाले ही जाने. अब जिंदगी है, उसमें कुछ तो खुशियां भी होंगी ही, बिलकुल दुःख ही दुःख होते तो फिर तो यहां हा-हाकार मच जाता. यह इस दुनिया को रचने वाले की दरियादिली है कि इस ट्रेनिंग सेंटर को भी उसने इतना सुंदर बनाया है कि यहां लोगों को स्वर्ग का अहसास होता है. जो असली स्वर्ग है वहां ना बुढ़ापा है, ना बीमारी है...वहां सब बस अपनी इस धरती पर की गई मेहनत का आनंद लेते हैं. बुरे कर्मों की सजा यहीं दे दी जाती है और इंसान स्वर्ग में बस अपनी मेहनत, अपनी अच्छी करनी लेकर जाता है. ये जो यहां दुःख हैं, ये एक तरह से इंसान का शुद्धिकरण है. इन तमाम बातों का अहसास इस दुनिया को भी है. तभी तो किसी के मरने के बाद उसके नाम से पहले स्वर्गीय तो लगाया जाता है, नरकीय नहीं लगाया जाता...अगर नरक होता तो किसी ना किसी काल में किसी ना किसी नाम से पहले तो नरकीय लगता. इस दुनिया को सब पता है.