Aise hote hain pita

This is something I was searching from long time. Aajkal log half understanding leke baat karte rahte hain.....jise dekho wo ye bolta paayega ki maa ka darja sabse ooncha. Where is father then? Maa-pita dono ka darja barabar ka hota hai aur yahi tareeka main apni prayers mein lagati hun. Like, ek baar saawan ke mahine mein mujhe ek aunty ne Shivji bhagwan ki puja karte dekh liya. She asked mummy and mummy replied "jaise iska mann karta hai, ye waise puja karti hai....hum nahin sikhate ise". Fir bhi aunty se chup nahin raha gaya aur mujhe bol padin ki beta ladkiyon ko to Gauri maa ki puja karni chahiye. I then replied "jab papa khush to mummy apne aap khush, issliye main kam time mein dono ko saath mana leti hun" :D .....and this stopped her to put another ques....so here it says ki pita kya hote hain........... :)
Jo dukhon ki baarish mein chhatri ban tante hon,
Ghar mein darwaze par nazar battu ban tante hon,
Sameit lete hon sabka andhera bheetar,
Khud aangan mein Deepak ban jalte hon.

Beshaq, pita lori nahin sunate,
Maa ki tarah aansu nahin bahate,
Par dinbhar ki thakaan ke baawjood,
Raat ko pahra ban jaate hain.

Aur pita jab nikalte hain subah,
Tinko ki khoj mein,
Kisi ke khilone, kisi ki kitabein,
Kisi ki mithai, kisi ki dawai,
Parwaan par hote hain ghar ke sapne
Pita kab hote hain khud ke apne?

Jab saanjh dhale lautte hain ghar ko,
Maa ki chudiyan khanakti hain,
Nanhi gudiya chahekti hai,
Sab sapne sakaar hote hain,
Uss samay pita avatar hote hain.

Jawaan betiyan badnaam hone se darti hain,
Har galti par aankhon ki maar padti hai,
Darasal, bhye aur sanskaar ka bolbala hai pita,
Mohalle bhar ki jabaan ka tala hai pita.

Sach hai, maa samvedna hai, pita katha,
Maa dulaar hai, pita vyawahaar,
Maa pyaar hai, pita sanskaar,
Darasal pita vo hai jo maa nahin hai,
Maa zameen hai, pita aasmaan.

Pita bacchon ki tutli jabaan mein bhi ek
Surakshit sunehra bhavishye hai,
Jinke kandhon par bachhon ka bachpan hota hai,
Jinke paison se himmat jut-ti hai,
Jinki baajuon se taakat milti hai,
Jinki paramparaon se vansh chalta hai,
Agar pita na hote kya bacchon ko,
Sahajta se naam milta hai?

Haan, pita wo himalaya hai
Jo ghar ki suraksha ke liye sar utha,
Sina taan ke khada hota hai
Aise pita ko meri talab sheesh nawati hai.

:)
 
चलो कोइ तो है यहा जिसने बेचारे निरीह प्राणियो की सुध ली वरना हर कोइ मा पूजन की परन्परा से हट के सोचता ही नही.

It is really very good, Neelam ji.
 
This is something I was searching from long time. Aajkal log half understanding leke baat karte rahte hain.....jise dekho wo ye bolta paayega ki maa ka darja sabse ooncha. Where is father then? Maa-pita dono ka darja barabar ka hota hai aur yahi tareeka main apni prayers mein lagati hun. Like, ek baar saawan ke mahine mein mujhe ek aunty ne Shivji bhagwan ki puja karte dekh liya. She asked mummy and mummy replied "jaise iska mann karta hai, ye waise puja karti hai....hum nahin sikhate ise". Fir bhi aunty se chup nahin raha gaya aur mujhe bol padin ki beta ladkiyon ko to Gauri maa ki puja karni chahiye. I then replied "jab papa khush to mummy apne aap khush, issliye main kam time mein dono ko saath mana leti hun" :D .....and this stopped her to put another ques....so here it says ki pita kya hote hain........... :)
Jo dukhon ki baarish mein chhatri ban tante hon,
Ghar mein darwaze par nazar battu ban tante hon,
Sameit lete hon sabka andhera bheetar,
Khud aangan mein Deepak ban jalte hon.

Beshaq, pita lori nahin sunate,
Maa ki tarah aansu nahin bahate,
Par dinbhar ki thakaan ke baawjood,
Raat ko pahra ban jaate hain.

Aur pita jab nikalte hain subah,
Tinko ki khoj mein,
Kisi ke khilone, kisi ki kitabein,
Kisi ki mithai, kisi ki dawai,
Parwaan par hote hain ghar ke sapne
Pita kab hote hain khud ke apne?

Jab saanjh dhale lautte hain ghar ko,
Maa ki chudiyan khanakti hain,
Nanhi gudiya chahekti hai,
Sab sapne sakaar hote hain,
Uss samay pita avatar hote hain.

Jawaan betiyan badnaam hone se darti hain,
Har galti par aankhon ki maar padti hai,
Darasal, bhye aur sanskaar ka bolbala hai pita,
Mohalle bhar ki jabaan ka tala hai pita.

Sach hai, maa samvedna hai, pita katha,
Maa dulaar hai, pita vyawahaar,
Maa pyaar hai, pita sanskaar,
Darasal pita vo hai jo maa nahin hai,
Maa zameen hai, pita aasmaan.

Pita bacchon ki tutli jabaan mein bhi ek
Surakshit sunehra bhavishye hai,
Jinke kandhon par bachhon ka bachpan hota hai,
Jinke paison se himmat jut-ti hai,
Jinki baajuon se taakat milti hai,
Jinki paramparaon se vansh chalta hai,
Agar pita na hote kya bacchon ko,
Sahajta se naam milta hai?

Haan, pita wo himalaya hai
Jo ghar ki suraksha ke liye sar utha,
Sina taan ke khada hota hai
Aise pita ko meri talab sheesh nawati hai.

:)

Great Neelam ji, execellent.
 
great jat kaviyatri ji ka khitab to neelam ji ke sir pe hi rahega
bus dil se ek hi aawaj nikal rahi hain
wah wah wah
 
thanks for it...

dear neelam a lot of thanks.........u r right......father and mother are two wheels of a cart which used by their children to go ahead in there life...if one of them is weak then cart does not go many miles.so both are same respectable.if u can serve your parents it means u are greater then most of others........me bahut khus hua kyonki aapne un logo ki charcha ki jinhone hume ye dunia dikhai....,a lot of thanks again nee...lam
 
वि.पी. सिंह जी

यक्ष के एक प्रशन, आकाश से ऊँचा कोंन है के उत्तर में, युधिष्ठर कहता है, पिता !
यानी कि पिता का आचरण, आकाश कि ऊंचाई से भी ऊँचा होना चाहिए!
और यह भी सत्य है कि, पिता ही पुत्र का सबसे पहला और प्रिय अनुकर्णीय पात्र (रोल मॉडल ) होता है ! शायद इसीलिए भी महाराज युधिष्ठर एक अन्य प्रशन , मनुष्य कि आत्मा क्या है के उत्तर में कहता है कि मनुष्य कि आत्मा पुत्र है ! चूँकि पुत्र के मानसिक और बोधिक विकाश में पिता का माता से ज्यादा असर होता है ' इसीलिए ऐसा लिखा गया होगा ! उसी तरह पुत्री के लिए भी, पिता उसका और परिवार का रक्षक है और पुत्री का सबे पहला और बड़ा हीरो पिता ही होता ! इसी तरह के भाव प्रिय नीलम ने भी अपने लेखन और कविता में प्रकट किये हैं!
उस्सी तरह पुत्री अपनी माता का इस हद तक अनुकरण करती है कि पुती को माता कि छाया कि उपमा भी देते हैं !
संतान के लिए माता व् पिता का दर्जा एक सामान होता है या होना चाहिए, के संधर्भ में हमारी राय जुदा हो सकती हैं, लेकिन धर्म शाश्त्र एक मत हैं कि माता का दर्जा पिता से कही ऊँचा है !
क्रमश:
 
मनुष्य को इंसान बनाती है मां- एक लेख मैंने पढ़ा था, यहाँ आप सब के लिए
ये लेख, इस थ्रेड कि मूल भावना से अलग हो सकता है, फिर भी मुझे लगा कि मुझे यहाँ देना चाहिए !




मनुष्य को मानव बनाती है माता
2 Nov 2009, 2359 hrs IST,नवभारत टाइम्स
युधिष्ठर लाल कक्कड़
वेदों में मां को पूज्य, स्तुति योग्य और आह्वान करने योग्य कहा गया है। महाभारत में जब यक्ष ने युधिष्ठिर से सवाल किया
कि भूमि से भी भारी कौन है? तो युधिष्ठिर ने जवाब दिया- माता गुरुतरा भूमे:। अर्थात् मां इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी होती है। महर्षि मनु कहते हैं, 'दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्य होता है, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता और हजार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण एक माता होती है।'

वेदों में प्रार्थना की गई है- 'मां रसमयी, स्नेहमयी और संतानों के हितार्थ समर्पण करने वाली होती है। वह त्यागमयी, दयामयी, क्षमामयी, सत्यमयी और धर्ममयी हो।' ऋग्वेद की एक ऋचा में प्रार्थना की गई है- 'जल के समान शुद्ध करने वाली माताएं हमारे अंत:करणों को शुद्ध करें।'

आदि शंकराचार्य कहते हैं, 'कुपुत्रो जायेत यद्यपि कुमाता न भवति।' अर्थात पुत्र तो कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं हो सकती। तैत्तिरीयोपनिषद् में कहा गया है, 'मातृ देवो भव:।' मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम लंका जीतने के बाद राज्य सुख भोगने के प्रसंग में अनुज लक्ष्मण के प्रस्ताव को ठुकराकर कहते हैं- 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।' अर्थात् जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होते हैं।

शतपथ ब्राह्मण के वचन 'मातृमान पितृमानाचार्यवान् पुरुषो वेद' का अभिप्राय है कि इस संसार में तीन उत्तम शिक्षक अर्थात् माता, पिता और गुरु हों, तभी मनुष्य सही अर्थ में मानव बनता है। महर्षि दयानंद लिखते हैं, 'वह संतान अति सौभाग्यशालिनी है, जिसके माता-पिता धार्मिक और विद्वान हैं। जितना माता से संतानों को उपदेश और उपकार पहुंचता है, उतना किसी अन्य से नहीं। इसलिए मातृमान वह होता है, जिसकी माता गर्भाधान से लेकर जब तक गर्भ के शेष विधान पूरे न हो जाएं, तब तक संयत और सुशील व्यवहार करे।' मातृ गर्भ में संस्कारित होने का सबसे बड़ा उदाहरण महाभारत में अभिमन्यु का मिलता है, जिसने अपनी मां से गर्भ में ही चक्रव्यूह तोड़ने की विधि सीख ली थी।

कुरान में सूरह अहकाफ आयत-15 में अल्लाह फरमाता है, 'हमने इंसान को आदेश दिया है कि अपने मां-बाप के साथ नेक बर्ताव करे, उसकी मां ने बहुत कष्ट उठाकर उसे अपने पेट में रखा और बहुत तकलीफ उठाकर ही उसे जन्म दिया और उसके (यानी इंसान के) गर्भ में पलने और दूध छुड़ाने में तीस महीने लग गए।'

एक व्यक्ति हजरत मुहम्मद साहब के पास आया और पूछा, 'इंसानों में मेरे अच्छे बर्ताव का सबसे ज्यादा हकदार कौन है?' हजरत मुहम्मद साहब ने जवाब दिया, 'तेरी मां।' उस व्यक्ति ने फिर पूछा कि मां के बाद फिर कौन? उन्होंने फरमाया 'तेरी मां।' तीसरी बार पूछने पर भी उन्होंने फरमाया- 'तेरी मां', चौथी बार पूछने पर हजरत मुहम्मद साहब ने फरमाया 'तेरा पिता।' मतलब साफ है कि हदीस की रोशनी में मां का स्थान पिता के मुकाबले में तीन गुना ऊंचा है।

हजरत मुहम्मद साहब ने एक और हदीस में फरमाया, 'मैं वसीयत करता हूं इंसान को मां के बारे में कि वह उससे नेक बर्ताव करे।' अपने मां-बाप का हक पहचानना, उनके साथ अच्छा बर्ताव करना, उनकी सेवा करना अल्लाह की निगाह में इतना महत्वपूर्ण है कि उसने अपनी इबादत का आदेश देने के साथ ही मां के बारे में स्पष्ट हिदायत दी। मां का अनादर या उनकी बात न मानना और उन्हें कष्ट पहुंचाना बहुत बड़ा गुनाह है। यह इतना बड़ा गुनाह है कि अल्लाह की इबादत करने के बावजूद भी ऐसे व्यक्ति का जन्नत में जाना बहुत मुश्किल होगा। हजरत मुहम्मद साहब ने एक हदीस में फरमाया, 'जन्नत मां के कदमों के नीचे है।' इस्लाम ने जन्म देने वाली मां के साथ-साथ उस औरत को भी बहुत ऊंचा स्थान दिया है जिसने जन्म तो नहीं दिया पर उसे अपना दूध पिलाया हो। इस्लाम ने उसे 'रिजाई मां' कहा है। उसे भी उतना ही आदर, सम्मान और सेवा पाने का हक है।
 
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Everyone have his/her own importance in family
 
"Beautifully imperfect"

Thanks Rakesh for sharing this touching clip!
You are absolutely right, every relationship, may be imperfect but it can be blissfully beautiful !
In our own lives, there would be lows and highs in every relationship.Also there would be moments that would raise the intensity of mutual love and trust to the highest level. Those moments become the milestones and cherished by the affected ones.
The moments witnessed by the kids throgh their mother while delivering and emmiting the heavenly love and respect for their father, would have touched them greatly to the extent that they would treasure it throughout their lives. These are the moments that form the bases of our emotional rlationships.

Sateypal
 
वि.पी. सिंह जी

यक्ष के एक प्रशन, आकाश से ऊँचा कोंन है के उत्तर में, युधिष्ठर कहता है, पिता !
यानी कि पिता का आचरण, आकाश कि ऊंचाई से भी ऊँचा होना चाहिए!
और यह भी सत्य है कि, पिता ही पुत्र का सबसे पहला और प्रिय अनुकर्णीय पात्र (रोल मॉडल ) होता है ! शायद इसीलिए भी महाराज युधिष्ठर एक अन्य प्रशन , मनुष्य कि आत्मा क्या है के उत्तर में कहता है कि मनुष्य कि आत्मा पुत्र है ! चूँकि पुत्र के मानसिक और बोधिक विकाश में पिता का माता से ज्यादा असर होता है ' इसीलिए ऐसा लिखा गया होगा ! उसी तरह पुत्री के लिए भी, पिता उसका और परिवार का रक्षक है और पुत्री का सबे पहला और बड़ा हीरो पिता ही होता ! इसी तरह के भाव प्रिय नीलम ने भी अपने लेखन और कविता में प्रकट किये हैं!
उस्सी तरह पुत्री अपनी माता का इस हद तक अनुकरण करती है कि पुती को माता कि छाया कि उपमा भी देते हैं !
संतान के लिए माता व् पिता का दर्जा एक सामान होता है या होना चाहिए, के संधर्भ में हमारी राय जुदा हो सकती हैं, लेकिन धर्म शाश्त्र एक मत हैं कि माता का दर्जा पिता से कही ऊँचा है !
क्रमश:

देशवाल जी,

आप के विचार हमेशा के तरह काफ़ी सारयुक्त एवं सराहनीय है. परन्तु मै अभी भी इस बारे मे भिन्न राय रखता हू कि मा का स्थान पिता से ऊचा होता है जैसा कि आपके अनुसार शास्त्रो मे लिखा है. पिता का बलिदान माता से किसी मायने मे कम नही होता. मेरे विचार मे दोनो का दर्जा बराबर का होना चाहिये. बाकी निर्भर करता है दोनो की कर्त्तव्यपरायणता पर, यानि हम सब एक मा और बाप की हैसियत मे अपनी सन्तान के प्रति कितने समर्पित है. आज के युग मे हमारे शास्त्रो की प्रासन्गिता पर भी कई प्रश्नचिन्ह लगे है जिनका विश्लेषण वर्तमान परिस्थितियो की परश्ठभूमि मे करना होगा. बदले हुए परिवेश मे शास्त्रो मे आवश्य्क सन्शोधन की नितान्त आवश्यकता है. नीलम जी के विचार काफ़ी प्रशन्सनीय है इस विषये मे.
 
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मनुष्य को इंसान बनाती है मां- एक लेख मैंने पढ़ा था, यहाँ आप सब के लिए
ये लेख, इस थ्रेड कि मूल भावना से अलग हो सकता है, फिर भी मुझे लगा कि मुझे यहाँ देना चाहिए !




मनुष्य को मानव बनाती है माता
2 Nov 2009, 2359 hrs IST,नवभारत टाइम्स
युधिष्ठर लाल कक्कड़
वेदों में मां को पूज्य, स्तुति योग्य और आह्वान करने योग्य कहा गया है। महाभारत में जब यक्ष ने युधिष्ठिर से सवाल किया
कि भूमि से भी भारी कौन है? तो युधिष्ठिर ने जवाब दिया- माता गुरुतरा भूमे:। अर्थात् मां इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी होती है। महर्षि मनु कहते हैं, 'दस उपाध्यायों के बराबर एक आचार्य होता है, सौ आचार्यों के बराबर एक पिता और हजार पिताओं से अधिक गौरवपूर्ण एक माता होती है।'

वेदों में प्रार्थना की गई है- 'मां रसमयी, स्नेहमयी और संतानों के हितार्थ समर्पण करने वाली होती है। वह त्यागमयी, दयामयी, क्षमामयी, सत्यमयी और धर्ममयी हो।' ऋग्वेद की एक ऋचा में प्रार्थना की गई है- 'जल के समान शुद्ध करने वाली माताएं हमारे अंत:करणों को शुद्ध करें।'

आदि शंकराचार्य कहते हैं, 'कुपुत्रो जायेत यद्यपि कुमाता न भवति।' अर्थात पुत्र तो कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं हो सकती। तैत्तिरीयोपनिषद् में कहा गया है, 'मातृ देवो भव:।' मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम लंका जीतने के बाद राज्य सुख भोगने के प्रसंग में अनुज लक्ष्मण के प्रस्ताव को ठुकराकर कहते हैं- 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।' अर्थात् जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होते हैं।

शतपथ ब्राह्मण के वचन 'मातृमान पितृमानाचार्यवान् पुरुषो वेद' का अभिप्राय है कि इस संसार में तीन उत्तम शिक्षक अर्थात् माता, पिता और गुरु हों, तभी मनुष्य सही अर्थ में मानव बनता है। महर्षि दयानंद लिखते हैं, 'वह संतान अति सौभाग्यशालिनी है, जिसके माता-पिता धार्मिक और विद्वान हैं। जितना माता से संतानों को उपदेश और उपकार पहुंचता है, उतना किसी अन्य से नहीं। इसलिए मातृमान वह होता है, जिसकी माता गर्भाधान से लेकर जब तक गर्भ के शेष विधान पूरे न हो जाएं, तब तक संयत और सुशील व्यवहार करे।' मातृ गर्भ में संस्कारित होने का सबसे बड़ा उदाहरण महाभारत में अभिमन्यु का मिलता है, जिसने अपनी मां से गर्भ में ही चक्रव्यूह तोड़ने की विधि सीख ली थी।

कुरान में सूरह अहकाफ आयत-15 में अल्लाह फरमाता है, 'हमने इंसान को आदेश दिया है कि अपने मां-बाप के साथ नेक बर्ताव करे, उसकी मां ने बहुत कष्ट उठाकर उसे अपने पेट में रखा और बहुत तकलीफ उठाकर ही उसे जन्म दिया और उसके (यानी इंसान के) गर्भ में पलने और दूध छुड़ाने में तीस महीने लग गए।'

एक व्यक्ति हजरत मुहम्मद साहब के पास आया और पूछा, 'इंसानों में मेरे अच्छे बर्ताव का सबसे ज्यादा हकदार कौन है?' हजरत मुहम्मद साहब ने जवाब दिया, 'तेरी मां।' उस व्यक्ति ने फिर पूछा कि मां के बाद फिर कौन? उन्होंने फरमाया 'तेरी मां।' तीसरी बार पूछने पर भी उन्होंने फरमाया- 'तेरी मां', चौथी बार पूछने पर हजरत मुहम्मद साहब ने फरमाया 'तेरा पिता।' मतलब साफ है कि हदीस की रोशनी में मां का स्थान पिता के मुकाबले में तीन गुना ऊंचा है।

हजरत मुहम्मद साहब ने एक और हदीस में फरमाया, 'मैं वसीयत करता हूं इंसान को मां के बारे में कि वह उससे नेक बर्ताव करे।' अपने मां-बाप का हक पहचानना, उनके साथ अच्छा बर्ताव करना, उनकी सेवा करना अल्लाह की निगाह में इतना महत्वपूर्ण है कि उसने अपनी इबादत का आदेश देने के साथ ही मां के बारे में स्पष्ट हिदायत दी। मां का अनादर या उनकी बात न मानना और उन्हें कष्ट पहुंचाना बहुत बड़ा गुनाह है। यह इतना बड़ा गुनाह है कि अल्लाह की इबादत करने के बावजूद भी ऐसे व्यक्ति का जन्नत में जाना बहुत मुश्किल होगा। हजरत मुहम्मद साहब ने एक हदीस में फरमाया, 'जन्नत मां के कदमों के नीचे है।' इस्लाम ने जन्म देने वाली मां के साथ-साथ उस औरत को भी बहुत ऊंचा स्थान दिया है जिसने जन्म तो नहीं दिया पर उसे अपना दूध पिलाया हो। इस्लाम ने उसे 'रिजाई मां' कहा है। उसे भी उतना ही आदर, सम्मान और सेवा पाने का हक है।

देशवाल जी,

आप के विचार हमेशा के तरह काफ़ी सारयुक्त एवं सराहनीय है. परन्तु मै अभी भी इस बारे मे भिन्न राय रखता हू कि मा का स्थान पिता से ऊचा होता है जैसा कि आपके अनुसार शास्त्रो मे लिखा है. पिता का बलिदान माता से किसी मायने मे कम नही होता. मेरे विचार मे दोनो का दर्जा बराबर का होना चाहिये. बाकी निर्भर करता है दोनो की कर्त्तव्यपरायणता पर, यानि हम सब एक मा और बाप की हैसियत मे अपनी सन्तान के प्रति कितने समर्पित है. आज के युग मे हमारे शास्त्रो की प्रासन्गिता पर भी कई प्रश्नचिन्ह लगे है जिनका विश्लेषण वर्तमान परिस्थितियो की परश्ठभूमि मे करना होगा. बदले हुए परिवेश मे शास्त्रो मे आवश्य्क सन्शोधन की नितान्त आवश्यकता है. नीलम जी के विचार काफ़ी प्रशन्सनीय है इस विषये मे.

Katti Sahi Kaho ho Singh Sahab Kheench ke lyo Deswal ji ne baaki inki dhala kime shashtra ya naye purano udharno se apni baat ko SUPPORT bhi to do
 
Katti Sahi Kaho ho Singh Sahab Kheench ke lyo Deswal ji ne baaki inki dhala kime shashtra ya naye purano udharno se apni baat ko SUPPORT bhi to do

Rakesh, the biggest example for me was my father, who passed away on 11th August at the age of 88. For me he was an epitome of sacrifice. Even though my mother always loved me from the core of her heart and did a lot for me, my father's affection and sacrifice for me was not less than hers by any yardstick and I can never forget that. He was my first teacher, guide an philosopher. Therefore, my opinion is based on my own experience as well.
 
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fark maa aur baap & bhai aur behen me

अंकल जी माँ और बाप दोनों रिश्ते में समान हैं न कोई बड़ा न कोई छोटा लेकिन मेरे ख्याल से माँ ज्यादा नजदीक हैं.
एक किस्सा हैं एक अपने बाप का इकलोता लड़का सुबह अपने पित्ता की अनुपस्थिति में दुकान पर जाता हैं तो वो जैसे ही उसने दुकान खोलता हैं तो एक औरत एक लकड़े की बनी तस्वीर बेच रही थी उसने वो तस्वीर सवा लाख रुपीये देकर खरीदी जिसके ऊपर लिखा था.
१. लोभी पित्ता
२. ममता सु माता
३. हनुत का भाई
४. अनुत की बहेन
५. पीठ फोर के पराई हुई नार
६. हिसाब करता मरे उनका कुन के करे.

१. लोभी पित्ता :- जैसे ही उसके पिता दुकान पर उन्होंने तस्वीर देखते ही पूछा यह कितने में ली तो बेटा बोला यह मैंने सवा लाख रुपीये में ली तो पिता उसे पीटना शुरू किया और दुकान से बहार निकालते हुए घर से चले जाने को कहा. यानी की पैसे के लालच में पिता ने अपने बेटे को भी नहीं बक्शा.
२. ममता सु माता जैसे ही उसके माता को यह मालूम हुआ तो उसने अपने पति से माफ़ी मांगते हुए बेटे को वापस घर में रखने के लिए कहा तो उस कलयुगी पिता ने उसे भी पीटने लगा. तो भी वो माता अपने बेटे को घर में वापस लेन की विनती करती रही.
३. हनुत का भाई लड़का जब घर से निकल कर रस्ते पर जा रहा था तो उसके कजिन भाइयों ने हम कुछ रुपिया पैसा देते हैं और तुमको यहाँ दुकान करा देते हैं लेकिन लड़के ने मना करते हुए कहा नहीं मेरे पित्ता के साथ आपके समबन्ध ख़राब हो जायंगे मैं जाता हूँ. यानी भाई भाई था जिसने मदद देने की कोशिश की.
४. अनुत की बहेन वहां से लड़का अपनी बहन के घर की ओर चल पड़ता हैं जैसे ही वो बहन के गाँव पहुंचता हैं तो उसकी बहन अन्य पनिहारियों के साथ पानी भरने के लिए कुए पर दिखती हैं और वो लड़का उस कुए की ओर चल पड़ता हैं उस लड़के को अपनी ओर आते देख उस बहन की एक सहेली बोलती हैं देख तेरा भाई आ रहा हैं लेकिन यह आज फटे हुए कपड़ों में क्यों आ रहा हैं? उसकी बहन बोलती हैं यह मेरा भाई नहीं हो सकता मेरा भाई तो इनोवा, स्कॉर्पियो में आता था. जैसे ही वो नजदीक आता हैं उसकी बहन उसे पहचानती हैं और उसे पूछती हैं यह क्या हाल बना रखा हैं?
तो उसका भाई अपनी आपबीती बताता हैं. तो बहन कहती हैं घर पर कुछ मेहमान आये हैं तेरी भांजी को देखने के लिए तू एक काम कर उधर भेंस का ओला हैं उसमे जाके ठहर में तेरे लिए कुछ कपडे लेकर आती हूँ. बहन घर पर जाकर काम में vyasat हो गयी और भूल गयी की मेरा भाई भेंस के bade में हैं इस तरह वह बहन अपने भाई को भूल गई.
 
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@ Deshwal ji, Rakesh and Salluram

Read about a modern mother's heinous act. We should not be blindly following our Vedas & Upnishads written by the Pundits thousands of years ago. We need to revisit our social ethos and rewrite social prescriptions.

http://toi.in/ZitKWb
 
Ham risto ka vajan kyon tolte hain?
Every relation is very very important who knows you are next to leave this world.

Yes, that is what I am trying to say. All relations are important and we must live upto them. As far as leaving this world is concerned, we all are in the queue.
 
In the crap of humanity motherhood is an overblown virtue and propagated as such for centuaries with the help of mythological sermons and would be. A mother is *exclusively*caring and possesive for HER own children, not of neighbours or relatives and this trait it primarily exhibited by most of the female species of Kingdom Animalia at planet earth. While fatherhood is about caring for His own as well as relative's children or in some cases of others.
 
Being exclusively*caring and possessive for HER own children, not of neighbors or relatives is not a true motherhood… Especially not acceptable and understandable feature in human species at least for me….I wonder how a mother can be partial with other children in the same family… If any mother shows and feels love and care exclusively for own children and not concern for other children those r living together in joint families must introspect herself and understand she is lacking somewhere, its part of lower mentality and one day she will loose respect in eyes of her own children ...provided her children would be able to think out of box and have clear vision to understand and have unconditional love for his/her cousin.
 
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