Jan Aakrosh Se Ek Samajik aur Rajnitik Kranti Tak ?

samarkadian

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विगत 3-4 महीने भारतीय जनमानस एवं राजनीती के इतिहास में अभूतपूर्व रहे हैं ! भारतीय मध्यमवर्ग अपनी कई दशको की मानसिक एवं भावनात्मक आलस्य और कायरता को त्याग कर सडको पर था ! भ्रष्ट व्यस्था एवं तंत्र के विरुद्ध जन आक्रोश का सैलाब उमड़ रहा था ! इस मुहीम की बागडोर दो अलग अलग व्यक्तियों ने संभाली जिनका व्क्यक्तितत्व एक दुसे से एक दम भिन्न है ! हमने यहाँ इन दोनों की चर्चा विस्तार से की ! राजनीती करने वालो को लगा की भारतीय जनमानस जाग गया है और विपक्षी पार्टी के एक वरिस्थ नेता को कहना पड़ा कि - भारतीय राजनीतिज्ञों ने जनता को निराश ही किया है !

इन्टरनेट का इस मुहीम में उलेखनीय योगदान रहा ! युवाओ ने इस माध्यम से परसार- परचार में कोई कसर नहीं छोड़ी ! विश्व के अनेक देशो में जनता ने तानाशाह शाशको को उनकी गद्दी से उखाड़ फेंका ! यही भय भारतीय सरकार को भी है ! भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन आक्रोश अपनी चरम सीमा पर है !

कुछ प्रश्न चर्चा में छोड़ रहा हूँ -

1.क्या भारत में यह जन आक्रोश एक सामाजिक एवं राजनितिक क्रांति में बदलेगा?

1.1 यदि हाँ तो क्यों ?

1.2 यदि नहीं तो क्यों ?

2. क्या वर्तमान जन आक्रोश में क्रांति के सभी घटक मौजूद हैं?

2.1 क्या भारत में कभी क्रांति हो भी सकती है ?

3. आप क्या स्वयम सडको पर उतरना चाहेंगे ?

3.1 यदि हाँ तो क्यों?


3.2 यदि नहीं तो क्या आपको रोक रहा है ?




आखिर देश हमारा है !!

 
1.क्या भारत में यह जन आक्रोश एक सामाजिक एवं राजनितिक क्रांति में बदलेगा?
-----------नहीं बदलेगा
1.1 यदि हाँ तो क्यों ?
--------
1.2 यदि नहीं तो क्यों ?
--- क्योंकि १) इस आन्दोलन का कोई एक नेता नहीं हे |

२) राजनितिक दल अपना-अपना फायदा देख रहे हैं | और उनका समर्थन पूर्णतया नहीं हे |
३) समाज के अधिकतर लोग आज भी निष्क्रिय हैं | उनका कहना हे की जो सब का होगा वो हमारा हो जाएगा | टेंसन काहे का |
४) सरकारी मशीनरी ,चाहे किसी की भी सरकार हो इसका दमन करेगी |
५)इन् आन्दोलनों में अधिकतर पढ़ा लिखा समुदाय ही अधिक हे ,जब की असली ताकत सर्वहारा में हे| अमीर -गरीब ,सरकारी -गेर सरकारी और पूरा समाज जब तक इसमें पूरी तरह से शामिल नहीं होगा क्रान्ति नही होगी |
2. क्या वर्तमान जन आक्रोश में क्रांति के सभी घटक मौजूद हैं?

-----------हाँ ! क्रान्ति के सभी घटक लगभग मौजूद हैं

2.1 क्या भारत में कभी क्रांति हो भी सकती है ?
---------- हाँ हो सकती हे | एक बहुत हो योग्य नेता की आवश्यकता हे | जो पुरे भारत में सर्वमान्य हो |
3. आप क्या स्वयम सडको पर उतरना चाहेंगे ?
---------- जी हाँ |
3.1 यदि हाँ तो क्यों?

---------- भ्रष्टाचार सब को नुकसान कर रहा हे और इसमें हमारा और तुमाहारा भी नुक्सान हो रहा हे | आर्थिक विकास को गति तभी बढ़ सकेगी जब भर्ष्टाचार ख़तम हो गा और सब का आर्थिक विकास होगा | और हमारी अगली पीढ़ी का भविष्य अपने आप सुधर जाएगा |
3.2 यदि नहीं तो क्या आपको रोक रहा है ?

----------------
 
Samar bro u have started a very nice post .

First thing is there was down fall of the goverment in the countries where there was dictatorship & they r mostly islamic countries like sarbia etc.

Corruption is every where ......in all countried whether they r developed like USA ,UK or developing like india etc .

In the past,the citizens of all countries except india people were very much aware about govt policies & regulations .Now same thing is coming in our country with the improvement in education level & social development

For example ,what lalu prasad yadav had done with Bihar ......every one know .LALU JI PURE BIHAR KI BAISO KA CHARA KHA GAYE AUR DAKHAR BHI NAHI LE .
Now everyone knows what happened in this time Bihar election .Nitish kumar scored massive victory in Bihar because he had done a lot of improvement there .

So it's time to through such corrupt politicians out of the politics by bringing awareness among the common man ......

Two socialist ,Baba ramdev & Anna Hazare are doing a good work .We all should support them .
 
1.क्या भारत में यह जन आक्रोश एक सामाजिक एवं राजनितिक क्रांति में बदलेगा?
नहीं.


1.1 यदि हाँ तो क्यों ?
-------------------------


1.2 यदि नहीं तो क्यों ?


क्यूंकि पिछले तीन चार महीने घटनापूर्ण बेशक रहे हों, पर अभूतपूर्व कहीं से नहीं थे. आज के समय में, मीडिया के चलते, हर घटना का विवरण दस गुणा करके होता है. अन्ना का आन्दोलन इन्टरनेट और टीवी पे अधिक और सड़कों पे कम था. बाबा के आन्दोलन में जनता थोड़ी और थी, पर अधिकतर लोग बाबा के अनुयायी हैं न की आन्दोलनकारी. इससे कहीं अधिक बवाल किसी भी जाति के आरक्षण के आन्दोलन में होता है, पर वोह दिल्ली के जंतर मंतर पे नहीं होता और मीडिया को उसमें ख़ास दिलचस्पी नहीं होती.


2. क्या वर्तमान जन आक्रोश में क्रांति के सभी घटक मौजूद हैं?
मुझे नहीं लगता. लोग क्रांति पे तब उतरते हैं जब वोह परिस्तिथियों से एक लाचारी महसूस करते हैं. और उनके पास खोने को कुछ ज्यादा नहीं होता. आज का मध्य वर्ग अपनी ज़िन्दगी की दौड़ में व्यस्त है. दूसरा, आक्रोष अपनी चरम सीमा पे तब पहुचता है, जब उसे कोई निकास नहीं मिलता. प्रजातंत्र को चाहे जितनी भी गाली दे दो, पर लोग सरकार के खिलाफ जम के बोल सकते है. जिससे आक्रोष अपने आप कम हो जाता है.


2.1 क्या भारत में कभी क्रांति हो भी सकती है ?
पता नहीं. क्रांति वैसे ही बहुत कठिन होती है. भारत जैसे देश में जहां इतनी विविधताएं हैं, वहाँ लोगों को क्रांति के लिए जोड़ना और भी कठिन है. प्रजातंत्र के चलते यह और भी कठिन हो जाता है, चूँकि लोग अपनी भड़ास निकाल सकते हैं. दिल्ली में जहां क्रांति को लेके सबसे ज्यादा हल्ला मचता है, वहाँ चुनाव के समय ४५ फीसदी मतदान होता है. जो लोग कतार में खड़े होके एक वोट डालने में आलस करते हैं, वोह क्रांति के लिए सड़कों पे उतरेंगे? दूसरी और तमिलनाडु की जनता ने ८० फीसदी से अधिक मतदान देके एक भ्रष्ट सरकार को बदला, हालांकि वहाँ इस क्रांति कि कोई लहर नहीं थी.

3. आप क्या स्वयम सडको पर उतरना चाहेंगे ?
नहीं.


3.1 यदि हाँ तो क्यों?
-----------------------------------------------------------

3.2 यदि नहीं तो क्या आपको रोक रहा है ?

अव्वल तो आन्दोलन में मेरी आस्था कम ही है. अधिकतर आन्दोलन या तो hijack हो जाते हैं या गुमराह. पर अगर कोई आन्दोलन जिसकी मांग से मैं मेल खाता हूँ और जो प्रजातंत्र में रहते हुए राजनीती में भाग लेता है, तो मैं उसका पूरा समर्थन करूंगा.

बाबा और अन्ना कि मांगों से मेरी सहमती नहीं है. मेरे विचार से भ्रष्टाचार का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है कि सरकार के अनेक और पेचीदे कायदे कानून. भारत में हर काम के लिए पचास अनुमतियाँ और सौ सरकारी लोगों के हस्ताक्षर लेने पड़ते हैं. जहां ऐसी कार्य प्रणाली होगी, वहाँ भ्रष्टाचार स्वाभाविक है. जिस खेल में नियम स्पष्ट और सरल नहीं होंगे, वहाँ बेईमानी तो होगी ही. अन्ना और बाबा की मांगों का इस बात से लेना देना नहीं है. प्रणाली मैं सुधार के बजाय (जो कि शायद सुनने मैं और बोलने मैं बोरिंग है) उनकी मांगें थोड़ी फिल्मों जैसी हैं जहां एक ईमानदार हीरो सब बेईमानों को नष्ट कर देता है. .नेताओं से क्रोधित जनता को "भ्रष्टाचार मिटाओ" का नारा बहुत लुभाता है, पर यह उतना ही प्रभावी है जितना कि इंदिरा का "गरीबी हटाओ" नारा था.

 
बाबा और अन्ना कि मांगों से मेरी सहमती नहीं है. मेरे विचार से भ्रष्टाचार का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है कि सरकार के अनेक और पेचीदे कायदे कानून. भारत में हर काम के लिए पचास अनुमतियाँ और सौ सरकारी लोगों के हस्ताक्षर लेने पड़ते हैं. जहां ऐसी कार्य प्रणाली होगी, वहाँ भ्रष्टाचार स्वाभाविक है. जिस खेल में नियम स्पष्ट और सरल नहीं होंगे, वहाँ बेईमानी तो होगी ही. अन्ना और बाबा की मांगों का इस बात से लेना देना नहीं है. प्रणाली मैं सुधार के बजाय (जो कि शायद सुनने मैं और बोलने मैं बोरिंग है) उनकी मांगें थोड़ी फिल्मों जैसी हैं जहां एक ईमानदार हीरो सब बेईमानों को नष्ट कर देता है. .नेताओं से क्रोधित जनता को "भ्रष्टाचार मिटाओ" का नारा बहुत लुभाता है, पर यह उतना ही प्रभावी है जितना कि इंदिरा का "गरीबी हटाओ" नारा था.

Very apt reply..specially last point..No one focus on reforms required to remove Red tape(Root cause of corruption).
 
Samar bhai, badlav to jarur ayega lekin abhi lamba safar tai karna hai, sayad ek Anna se yah mission pura bhi na ho. lekin suruaat bahut badhiya hai.

AKHEER DESH HAMARA HAI, ISE BACHANA JARUR HAI...........
 
जो भी क्रांति आजतक हुई हैं sabhi mein मध्यम वर्ग का महत्वपूर्ण योगदान हुआ है, चाहे कांग्रेस mein भ्रष्टाचार की वृद्धि हुई हो lekin मध्यम वर्ग का भी standard badha है. As Kapil rightly suggested, people crib a lot about corruption but when time come to vote then they can not stand in queues for one hour and vote. When the overall voting percentage will increase the accountability of govt will increase.
 
1.क्या भारत में यह जन आक्रोश एक सामाजिक एवं राजनितिक क्रांति में बदलेगा?
-----------नहीं बदलेगा 1.1 यदि हाँ तो क्यों ?
--------
1.2 यदि नहीं तो क्यों ?
--- क्योंकि १) इस आन्दोलन का कोई एक नेता नहीं हे |

२) राजनितिक दल अपना-अपना फायदा देख रहे हैं | और उनका समर्थन पूर्णतया नहीं हे |
३) समाज के अधिकतर लोग आज भी निष्क्रिय हैं | उनका कहना हे की जो सब का होगा वो हमारा हो जाएगा | टेंसन काहे का |
४) सरकारी मशीनरी ,चाहे किसी की भी सरकार हो इसका दमन करेगी |
५)इन् आन्दोलनों में अधिकतर पढ़ा लिखा समुदाय ही अधिक हे ,जब की असली ताकत सर्वहारा में हे| अमीर -गरीब ,सरकारी -गेर सरकारी और पूरा समाज जब तक इसमें पूरी तरह से शामिल नहीं होगा क्रान्ति नही होगी |
2. क्या वर्तमान जन आक्रोश में क्रांति के सभी घटक मौजूद हैं?

-----------हाँ ! क्रान्ति के सभी घटक लगभग मौजूद हैं

2.1 क्या भारत में कभी क्रांति हो भी सकती है ?
---------- हाँ हो सकती हे | एक बहुत हो योग्य नेता की आवश्यकता हे | जो पुरे भारत में सर्वमान्य हो |
3. आप क्या स्वयम सडको पर उतरना चाहेंगे ?
---------- जी हाँ |
3.1 यदि हाँ तो क्यों?

---------- भ्रष्टाचार सब को नुकसान कर रहा हे और इसमें हमारा और तुमाहारा भी नुक्सान हो रहा हे | आर्थिक विकास को गति तभी बढ़ सकेगी जब भर्ष्टाचार ख़तम हो गा और सब का आर्थिक विकास होगा | और हमारी अगली पीढ़ी का भविष्य अपने आप सुधर जाएगा |
3.2 यदि नहीं तो क्या आपको रोक रहा है ?

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रविंदर जीत भाई ,

आप के उपरलिखित कुछ विचार विचार विरोधाभासी हैं :-


जब आप ये स्वीकार कर रहे हैं की मौजदा मुहीम में क्रांति की सभी घटक मौजद हैं तो ये आन्दोलन कैसे क्रांति में तब्दील नहीं हो पायेगा ?

रामदेव न सही किन्तु वर्तमान में अन्ना हजारे एक गैर राजीनीतिक एवं सामाजिक नेता हैं ! सरकार अन्ना समूह को अभी तक दबाने में सफल नहीं हो पायी है !

आप के विचार से अन्ना के नेत्रित्व में कहाँ कमी है ?


1.क्या भारत में यह जन आक्रोश एक सामाजिक एवं राजनितिक क्रांति में बदलेगा?
नहीं.


1.1 यदि हाँ तो क्यों ?
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1.2 यदि नहीं तो क्यों ?


क्यूंकि पिछले तीन चार महीने घटनापूर्ण बेशक रहे हों, पर अभूतपूर्व कहीं से नहीं थे. आज के समय में, मीडिया के चलते, हर घटना का विवरण दस गुणा करके होता है. अन्ना का आन्दोलन इन्टरनेट और टीवी पे अधिक और सड़कों पे कम था. बाबा के आन्दोलन में जनता थोड़ी और थी, पर अधिकतर लोग बाबा के अनुयायी हैं न की आन्दोलनकारी. इससे कहीं अधिक बवाल किसी भी जाति के आरक्षण के आन्दोलन में होता है, पर वोह दिल्ली के जंतर मंतर पे नहीं होता और मीडिया को उसमें ख़ास दिलचस्पी नहीं होती.


2. क्या वर्तमान जन आक्रोश में क्रांति के सभी घटक मौजूद हैं?
मुझे नहीं लगता. लोग क्रांति पे तब उतरते हैं जब वोह परिस्तिथियों से एक लाचारी महसूस करते हैं. और उनके पास खोने को कुछ ज्यादा नहीं होता. आज का मध्य वर्ग अपनी ज़िन्दगी की दौड़ में व्यस्त है. दूसरा, आक्रोष अपनी चरम सीमा पे तब पहुचता है, जब उसे कोई निकास नहीं मिलता. प्रजातंत्र को चाहे जितनी भी गाली दे दो, पर लोग सरकार के खिलाफ जम के बोल सकते है. जिससे आक्रोष अपने आप कम हो जाता है.


2.1 क्या भारत में कभी क्रांति हो भी सकती है ?
पता नहीं. क्रांति वैसे ही बहुत कठिन होती है. भारत जैसे देश में जहां इतनी विविधताएं हैं, वहाँ लोगों को क्रांति के लिए जोड़ना और भी कठिन है. प्रजातंत्र के चलते यह और भी कठिन हो जाता है, चूँकि लोग अपनी भड़ास निकाल सकते हैं. दिल्ली में जहां क्रांति को लेके सबसे ज्यादा हल्ला मचता है, वहाँ चुनाव के समय ४५ फीसदी मतदान होता है. जो लोग कतार में खड़े होके एक वोट डालने में आलस करते हैं, वोह क्रांति के लिए सड़कों पे उतरेंगे? दूसरी और तमिलनाडु की जनता ने ८० फीसदी से अधिक मतदान देके एक भ्रष्ट सरकार को बदला, हालांकि वहाँ इस क्रांति कि कोई लहर नहीं थी.

3. आप क्या स्वयम सडको पर उतरना चाहेंगे ?
नहीं.


3.1 यदि हाँ तो क्यों?
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3.2 यदि नहीं तो क्या आपको रोक रहा है ?

अव्वल तो आन्दोलन में मेरी आस्था कम ही है. अधिकतर आन्दोलन या तो hijack हो जाते हैं या गुमराह. पर अगर कोई आन्दोलन जिसकी मांग से मैं मेल खाता हूँ और जो प्रजातंत्र में रहते हुए राजनीती में भाग लेता है, तो मैं उसका पूरा समर्थन करूंगा.

बाबा और अन्ना कि मांगों से मेरी सहमती नहीं है. मेरे विचार से भ्रष्टाचार का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है कि सरकार के अनेक और पेचीदे कायदे कानून. भारत में हर काम के लिए पचास अनुमतियाँ और सौ सरकारी लोगों के हस्ताक्षर लेने पड़ते हैं. जहां ऐसी कार्य प्रणाली होगी, वहाँ भ्रष्टाचार स्वाभाविक है. जिस खेल में नियम स्पष्ट और सरल नहीं होंगे, वहाँ बेईमानी तो होगी ही. अन्ना और बाबा की मांगों का इस बात से लेना देना नहीं है. प्रणाली मैं सुधार के बजाय (जो कि शायद सुनने मैं और बोलने मैं बोरिंग है) उनकी मांगें थोड़ी फिल्मों जैसी हैं जहां एक ईमानदार हीरो सब बेईमानों को नष्ट कर देता है. .नेताओं से क्रोधित जनता को "भ्रष्टाचार मिटाओ" का नारा बहुत लुभाता है, पर यह उतना ही प्रभावी है जितना कि इंदिरा का "गरीबी हटाओ" नारा था.


कपिल भाई ,

जन लोकपाल बिल भी तो लोकतंत्र में चेक एंड बैलेंस को सुगठित करता है और अन्ना की मांग यही है !

रही बात मीडिया की तो ये बात ध्यान देने योग्य है की मीडिया निष्पक्ष नहीं है किन्तु ये दस गुना बड़ा या घटा कर बताया हुआ दर्शको के विचारो में बदलाव ला सकता है ! आजकल के खबर बाज़ार में मेरी और आपकी लड़ाई भी एक खबर है तो इसमें कवरेज़ का मुद्दा इतना नहीं लगता !

आपने कहा की भ्रष्टाचार पेचीदा कानूनों एवं प्रणाली के कारन है !सरकारी प्रणाली ले दे कर तक़रीबन पुरे विश्व में एक समान सी ही है ! हम यह कह सकते हैं की भारतीय मानसिकता ने इस पाश्चत्य दत्तक प्रणाली को भ्रष्ट कर दिया है ! दुसरे नजरिये से प्रणाली में कार्य करने वाली व्यक्तियों की वजह से भी है ! अब सुधर लोगो का करे [ और कैसे ? ] या प्रणाली का ?

आपने व्यक्त किया की ऐसा आन्दोलन जो प्रजातांत्रिक होते हुए राजनीती भी करे , उसका आप समर्थन करेंगे !

>> क्या एक गैर राजीनीतिक पहल ने इस बात को गौण नहीं साबित कर दिया है की आन्दोलन के लिए राजनीती करना आवश्यक नहीं है ?

>> और उपर से हम जब सभी राजनितिक दलों को इतना कोसते हैं तो उनसे कैसे सुधार या परिवर्तन की आशा की जा सकती है ? नेता लोग तो वहीँ लुभावने नारे देंगे वही घिसे पिटे वादे करेंगे और चुनाव जीत कर भूल जायेंगे !

आप के आन्दोलन की क्या मांग है, जरा विस्तार से बताइए !
 
!सरकारी प्रणाली ले दे कर तक़रीबन पुरे विश्व में एक समान सी ही है ! हम यह कह सकते हैं की भारतीय मानसिकता ने इस पाश्चत्य दत्तक प्रणाली को भ्रष्ट कर दिया है ! दुसरे नजरिये से प्रणाली में कार्य करने वाली व्यक्तियों की वजह से भी है ! अब सुधर लोगो का करे [ और कैसे ? ] या प्रणाली का ?
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Yadi Sarkari pranali sab jagah ek jaisi hai to bharat ka number bhi 1 hota Ease Of doing business list mei..Ye jo sarkari dhancha hai jisme khamkha ki duniya bitha rakhi hai utni hierarchy doosre developed countries mei nahi hai..Usme reform ki requirement bahut jaroori hai..Wo khatam karega main corruption ko!

Excerpt from WIKIPEDIA:

A nation's ranking on the index is based on the average of 10 subindices:
Starting a Business - Procedures, time, cost and minimum capital to open a new business
Dealing with construction permits - Procedures, time and cost to build a warehouse
Employing workers - Difficulty of hiring index, rigidity of hours of index, difficulty of redundancy index, rigidity of employment index, redundancy costs
Registering property - Procedures, time and cost to register commercial real estate
Getting credit - Strength of legal rights index, depth of credit information index
Protecting investors - Indices on the extent of disclosure, extent of director liability and ease of shareholder suits
Paying taxes - Number of taxes paid, hours per year spent preparing tax returns and total tax payable as share of gross profit
Trading across borders - Number of documents, cost and time necessary to export and import
Enforcing contracts - Procedures, time and cost to enforce a debt contract
Closing a business - Index of recovery rate which is a function of time, cost and other factors such as lending rate and the likelihood of the company continuing to operate



For example, according to the Doing Business 2010 report, Australia ranked third on the first subindex "Starting a business" behind only New Zealand and Canada. In Australia there are 2 procedures required to start a business which take on average 2 days to complete. The official cost is 0.8% of the Gross National Income per capita. There is no minimum capital requirement. By contrast, in Guinea-Bissau which ranked among the worst (183nd out of 183) on this same subindex, there are 16 procedures required to start a business taking 213 days to complete. The official cost is 323.0% of the gross national income per capita. A minimum capital investment of 1006.6% of the gross national income per capita is required.
 
Last edited:
कपिल भाई ,

जन लोकपाल बिल भी तो लोकतंत्र में चेक एंड बैलेंस को सुगठित करता है और अन्ना की मांग यही है !

रही बात मीडिया की तो ये बात ध्यान देने योग्य है की मीडिया निष्पक्ष नहीं है किन्तु ये दस गुना बड़ा या घटा कर बताया हुआ दर्शको के विचारो में बदलाव ला सकता है ! आजकल के खबर बाज़ार में मेरी और आपकी लड़ाई भी एक खबर है तो इसमें कवरेज़ का मुद्दा इतना नहीं लगता !

आपने कहा की भ्रष्टाचार पेचीदा कानूनों एवं प्रणाली के कारन है !सरकारी प्रणाली ले दे कर तक़रीबन पुरे विश्व में एक समान सी ही है ! हम यह कह सकते हैं की भारतीय मानसिकता ने इस पाश्चत्य दत्तक प्रणाली को भ्रष्ट कर दिया है ! दुसरे नजरिये से प्रणाली में कार्य करने वाली व्यक्तियों की वजह से भी है ! अब सुधर लोगो का करे [ और कैसे ? ] या प्रणाली का ?

आपने व्यक्त किया की ऐसा आन्दोलन जो प्रजातांत्रिक होते हुए राजनीती भी करे , उसका आप समर्थन करेंगे !

>> क्या एक गैर राजीनीतिक पहल ने इस बात को गौण नहीं साबित कर दिया है की आन्दोलन के लिए राजनीती करना आवश्यक नहीं है ?

>> और उपर से हम जब सभी राजनितिक दलों को इतना कोसते हैं तो उनसे कैसे सुधार या परिवर्तन की आशा की जा सकती है ? नेता लोग तो वहीँ लुभावने नारे देंगे वही घिसे पिटे वादे करेंगे और चुनाव जीत कर भूल जायेंगे !

आप के आन्दोलन की क्या मांग है, जरा विस्तार से बताइए !


समर भाई,

आतिश ने काफी खुलासे के साथ बताया है कि विभिन्न देशों के सरकारी ढांचों में कितना अंतर है. जिन देशों में भ्रष्टाचार कम है, वहाँ के मनुष्यों का DNA हमसे भिन्न नहीं है- हाँ उनकी प्रणाली हमसे सरल और सुचारू अवश्य है. एक जानकार का किस्सा बताता हूँ. उसने UK में अपना बिजनेस एक घंटे में ऑनलाइन बैठे रजिस्टर कर लिया. यही काम उसे भारत में करने के लिए एक महीने से ऊपर लगा जहां उसके सरकारी दफ्तरों के बहुत चक्कर लगे. अब आप क्या करना चाहेंगे? सरकारी दफ्तर के हर कर्मचारी का सुधार या फिर ऐसी प्रणाली जहां इतने चक्कर लगाने की आवशयकता ही न हो? ऐसा भी नहीं है की भारत ने प्रणाली में सुधार के फायदे नहीं देखे हों. आज से बीस पच्चीस साल पहले, फ़ोन लगवाने में सात साल की वेटिंग लिस्ट होती थी. फ़ोन मिलता था तो फिर हर अगले दिन dead हो जाता था. फिर lineman आता था और चाय-पानी की मांग करता था. आज फ़ोन का कनेक्शन फुर्ती से मिलता है. जब फ़ोन dead होता है, तो आप lineman की शकल भी नहीं देखते. इंसान तो वही हैं- परिवर्तन उनके व्यक्तित्व में हुआ की प्रणाली में?

प्रणाली में सुधार कि बात कोई नयी है. इस विषय पे अनेक सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्ट लिखी जा चुकी हैं. जैसे की ऐसा माना जाता है की अधिकतर सरकारी अनुमतियाँ "single window clearance system" से मिलनी चाहिए. चाहे पानी का कनेक्शन हो या बिजनेस की अनुमति, आवेदक बस एक अर्जी दे और निर्धारित समय पे उस पर फैसला हो. सरकारी व्यवस्था में सुधार के ऐसे कई सुझाव हैं. इन सुझावों में एक समानता ये है की ये सब सरकार, मंत्री और ब्युरोक्रैट की ताकतों को कम करते हैं. जितने फैसले पारदर्शी नियमों से हो जाएँ, उतने ही भ्रष्टाचार के अवसर कम होंगे. और जितने अलग अलग लोगों की मर्ज़ी पे होंगे, उतना ही ताकत के दुरूपयोग के अवसर बढ़ेंगे. सिद्धान्ती तौर पे मैं मानता हूँ कि एक अच्छा लोकपाल, संसद और सरकार पे चेक का काम कर सकता है. पर यह अनिवार्य है कि लोकपाल खुद अपने आप सुपर सरकार न बन जाए. अब भावनाओं को परे कर के अगर आप अन्ना टीम के लोक पाल बिल का विश्लेषण करें, तो वो इस कसौटी पे खरा नहीं उतरता.

हम भारतीयों कि आस्था महानायकों में अधिक होती है. हम सोचते हैं कि एक महानायक को बहुत ताकत दे दो, वोह सारा सिस्टम साफ़ कर देगा और सारे नेता रुपी खलनायकों को लाइन पे लगा देगा. असल में तो महानायक हो या खलनायक, हैं सब हाड-मांस के इंसान ही. ताकत कब किस के सर चढ़ जाए कहा नहीं जा सकता. और फिर महानायक से खलनायक का सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं है. इसलिए मेरी आस्था प्रणाली को बेहतर करने में है न की लोगों को.

​
 
कपिल भाई ,आप का नजरिया काफी हद तक सही | में मेरे साथ हुई कई साल पहले के घटना से बताना चाहूँगा | जब सरकार ने सर्विस टेक्स नया-नया ही शुरु किया था | और काफी कमाई इस से शुरु भी हो गई थी सरकार की | मेरा बिजनेस भी सर्विस टेक्स के केटेगरी में आता था | रजिस्ट्रेसन इतना सरल किया था की आप अप्लिकेसन दो और उस्सी दिन या अगले दिन रजिस्ट्रेसन सर्टिफिकेट ले जाओ | मेने भी अप्लिकेसन दी | अप्लिकेसन लेने और सर्टिफिकेट देने का काम एक खिड़की पर चपड़ासी के जिम्मे था और किस्सी को किस्सी से मिलने की जरुरत नहीं थी | जब अगले दिन मेने मेरे एक बन्दे को सर्टिफिकेट लेने के लिए भेजा तो चप्दासी ने बोला खर्चा पानी दे दो | मेरा बन्दा वापिस आ गया | दफ्तर नजदीक ही था थोड़ी देर में में गया औए मेने जब सार्टिफिकेट माँगा तो तो उसने वो ही बात दोहराई | मेने कहा की ठीक ह तुम्हे कितना पैसा चाहिए तुम सार्टिफिके दे दो | उसने २०० रुपये मांगे | जब उसने सर्टिफिकेट दे दिया तो मेने जोर -जोर से कहना शुरू किया ताकि दुसरे लोग भी सुन सकें | मेने कहा की एक तो आप लोगों को हम खुद टेक्स देना चाहते हैं औए खुद रजिस्ट्रेसन करवा रहे हैं उप्पर से तुम्हे ही हम रिस्वत किस बात की दें | उसके दफ्तर के सब कर्मचारी उसकी और देखने लग गए | मेने कहा क्या तुम मुझे २०० रुपये की रशीद दो गे | तो उस बन्दे ने हाथ जोड़ लिए और बोला भाई साब आप का काम हो गया आप जाइए मुझे कुछ नहीं चाहिए |अगर यही काम ऑनलाइन कर दिया जाए तो इस प्रकार की घटना भी नहीं होगी |
 
कपिल भाई ,आप का नजरिया काफी हद तक सही | में मेरे साथ हुई कई साल पहले के घटना से बताना चाहूँगा | जब सरकार ने सर्विस टेक्स नया-नया ही शुरु किया था | और काफी कमाई इस से शुरु भी हो गई थी सरकार की | मेरा बिजनेस भी सर्विस टेक्स के केटेगरी में आता था | रजिस्ट्रेसन इतना सरल किया था की आप अप्लिकेसन दो और उस्सी दिन या अगले दिन रजिस्ट्रेसन सर्टिफिकेट ले जाओ | मेने भी अप्लिकेसन दी | अप्लिकेसन लेने और सर्टिफिकेट देने का काम एक खिड़की पर चपड़ासी के जिम्मे था और किस्सी को किस्सी से मिलने की जरुरत नहीं थी | जब अगले दिन मेने मेरे एक बन्दे को सर्टिफिकेट लेने के लिए भेजा तो चप्दासी ने बोला खर्चा पानी दे दो | मेरा बन्दा वापिस आ गया | दफ्तर नजदीक ही था थोड़ी देर में में गया औए मेने जब सार्टिफिकेट माँगा तो तो उसने वो ही बात दोहराई | मेने कहा की ठीक ह तुम्हे कितना पैसा चाहिए तुम सार्टिफिके दे दो | उसने २०० रुपये मांगे | जब उसने सर्टिफिकेट दे दिया तो मेने जोर -जोर से कहना शुरू किया ताकि दुसरे लोग भी सुन सकें | मेने कहा की एक तो आप लोगों को हम खुद टेक्स देना चाहते हैं औए खुद रजिस्ट्रेसन करवा रहे हैं उप्पर से तुम्हे ही हम रिस्वत किस बात की दें | उसके दफ्तर के सब कर्मचारी उसकी और देखने लग गए | मेने कहा क्या तुम मुझे २०० रुपये की रशीद दो गे | तो उस बन्दे ने हाथ जोड़ लिए और बोला भाई साब आप का काम हो गया आप जाइए मुझे कुछ नहीं चाहिए |अगर यही काम ऑनलाइन कर दिया जाए तो इस प्रकार की घटना भी नहीं होगी |

बिलकुल! और चूँकि सब लोग ऑनलाइन नहीं जा सकते, तो ऐसी खिड़की पे कैमरा भी लगाया का सकता है जिसके रिकॉर्ड २-३ साल तक रखने का प्रावधान हो.
 
हिन्दुस्तान में जनाक्रोश को क्रांति में परिवर्तित करने के लिए वर्तमान परिस्थितियाँ अनुकूल हैं और अन्ना हजारे जैसे ईमानदार नेता और उनके सहयोगी इस दिशा में कार्यरत हैं i उनके ये प्रयास जन क्रान्ति की नैसर्गिक और निर्बाध प्रवाह को दिन प्रतिदिन तीव्र गति प्रदान कर रहे हैं और जन चेतना का तेजी से विकास हो रहा है i अगर रामदेव जैसे व्यक्ति अपनी खिचड़ी अलग हांडी में पकाने की बजाये इनका साथ देते तो शायद अभी तक सरकार सिविल सोसाइटी द्वारा प्रस्तावित लोकपाल बिल का मसौदा बिना किसी विलम्ब और परिवर्तन के स्वीकार कर लेती i लोगों में भ्रष्टाचार के विरूद्ध भारी रोष है और उम्मीद है अन्ना हजारे और किरण बेदी जैसे ईमानदार और निर्भीक लोग इस रोष को क्रांति में तब्दील करने में कामयाब होंगे i निश्चित रूप से यह एक क्रांतिकारी चेतना के नए युग का सूत्रपात है, और शीघ्र ही देश में क्रांतिकारी उथलपुथल की पूरी पूरी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता i
 
बिलकुल! और चूँकि सब लोग ऑनलाइन नहीं जा सकते, तो ऐसी खिड़की पे कैमरा भी लगाया का सकता है जिसके रिकॉर्ड २-३ साल तक रखने का प्रावधान हो.

Brother, a small affort on these lines has been done by Guj Govt, in five dists the programme has already started. A pvt agency has taken contract of getting work of public done at dist level from one window, rates have been approved by the Govt for each work like birth certificate, marriage certificate, land records certificate, SC/BC/OBC certificates etc, now individual requiring such certificates doesnot have to runround and meet many people but he deposites required fees and get his work done through this pvt agency from one window, the system seems to be good, I was one of the invitee on inogration at vadodara , the programme seems to me very useful, if public shows confidence and cooperates & Govt implements well, the system will reduce corruption as well as the problems of public. The whole programme will work on computer no personalcontect with any of the office staff.The compuer programming has been done by some US firm.
 
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प्रणाली में सुधार कि बात कोई नयी है. इस विषय पे अनेक सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्ट लिखी जा चुकी हैं. जैसे की ऐसा माना जाता है की अधिकतर सरकारी अनुमतियाँ "single window clearance system" से मिलनी चाहिए. चाहे पानी का कनेक्शन हो या बिजनेस की अनुमति, आवेदक बस एक अर्जी दे और निर्धारित समय पे उस पर फैसला हो. सरकारी व्यवस्था में सुधार के ऐसे कई सुझाव हैं. इन सुझावों में एक समानता ये है की ये सब सरकार, मंत्री और ब्युरोक्रैट की ताकतों को कम करते हैं. जितने फैसले पारदर्शी नियमों से हो जाएँ, उतने ही भ्रष्टाचार के अवसर कम होंगे. और जितने अलग अलग लोगों की मर्ज़ी पे होंगे, उतना ही ताकत के दुरूपयोग के अवसर बढ़ेंगे. सिद्धान्ती तौर पे मैं मानता हूँ कि एक अच्छा लोकपाल, संसद और सरकार पे चेक का काम कर सकता है. पर यह अनिवार्य है कि लोकपाल खुद अपने आप सुपर सरकार न बन जाए. अब भावनाओं को परे कर के अगर आप अन्ना टीम के लोक पाल बिल का विश्लेषण करें, तो वो इस कसौटी पे खरा नहीं उतरता.

हम भारतीयों कि आस्था महानायकों में अधिक होती है. हम सोचते हैं कि एक महानायक को बहुत ताकत दे दो, वोह सारा सिस्टम साफ़ कर देगा और सारे नेता रुपी खलनायकों को लाइन पे लगा देगा. असल में तो महानायक हो या खलनायक, हैं सब हाड-मांस के इंसान ही. ताकत कब किस के सर चढ़ जाए कहा नहीं जा सकता. और फिर महानायक से खलनायक का सफ़र ज्यादा लम्बा नहीं है. इसलिए मेरी आस्था प्रणाली को बेहतर करने में है न की लोगों को.

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लोकपाल, सुपर सरकार तो झोड़ो, कभी सरकार भी नहीं बन सकता! लोकपाल के पास सरकार चलाने का कोई प्रावधान नहीं है! यह सब बेतुक बातें कपिल सिबल लोकपाल से अपनी जान बचाने के लिए कह रहा है! असे लोगों को पता है की लोकपाल के आते ही इंनिहिकी गर्दन पर तलवार लटकनि है! इसलिए ये सब बातें जनता को भ्रमित करने के लिए की जा रहीं हैं!

आप ही बताएं की क्या लोकपाल के पास
सरकार चलने की ताकत है? क्या लोकपाल, Income Tax की रेट या इसके किसी भी प्रावधान मैं बदलाव कर सकता है? क्या लोकपाल यह निर्देश दे सकता है की सरकार कितना पैसा कहाँ खर्च करे? क्या लोकपाल यह निर्देश दे सकता है की क्या आयत करना है और क्या निर्यात? क्या लोकपाल यह निर्देश दे सकता है की कहाँ सड़क और कहाँ नहर बनानी है? लोकपाल बिल मैं ऐसा कुछ नहीं है जो एक सूक्षम सरकार चलाने मैं बाधा डाले!

लोकपाल विधायक सिर्फ निगरानी करने के लिए है, की सरकारी कुर्सी कानून का पालन कर रही है या नहीं! ये सब ताकतें सीबीआई और पुलीस जैसे विभागों के पास भी हैं, लेकिन क्यूंकि ये सब विभाग राजनेताओं के अधीन आतें हैं, इसलिए ये सब अपना काम करने की बजाये अपने मालिकों (राजनेताओं) का काम करतें हैं! सीबीआई और पुलीस जैसे विभाग एक उधारण हैं की 'लोकपाल' किसी भी राजनेता के अधीन मैं न हो, चाहे वो मुख्य मंत्री हो या प्रधान मंत्री!

मैं आपको एक और उधारण देता हूँ, टी. न. शेषण का! टी. न. शेषण ने एक समाये CEC की ताकत का उपयोग कर, चुनाव परक्रिया मैं काफी सुधर किया था! उन शुधारों मैं कुछ असे भी थे जो अमीर राजनेताओं को पसंद नहीं आये! इस लिए राजनेताओं ने तत्काल कानून मैं परिवर्तन कर CEC की ताकत कम कर दी! यही कारन है की टी. न. शेषण के बाद चुनाव परक्रिया मैं कोई खास सुधार नहीं हुए हैं! जो राजनेता आज लोकपाल का विरोध कर रहै हैं वोह वही हैं जिन्होंने कानून मैं संसोधन कर जनता की बजाये Union Carbide को बचाया था! ये वही राजनेता हैं जिन्होंने कानून मैं असे संसोधन किये हैं जिसके बाद जिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के
न्यायाधिसों सों से ये डरते थे, आज वही न्यायाधीस राजनेताओं की सामने अब धूम हिलातें हैं! असे राजनेताओं का जनता को लोकपाल विधायक पर भ्रमित करना संभाविक है!
 
1.क्या भारत में यह जन आक्रोश एक सामाजिक एवं राजनितिक क्रांति में बदलेगा?

उ. बदलने की पूरी सम्भावनाये है, बस हमें सही उम्मीदवार को वोट करने की जरुरत है !! और इसके होने की सम्भावनाये बहुत कम है, जो जनता जागरूक है वो वोट देने की बजाय बस बहस में हिस्सा लेती है.

1.1 यदि हाँ तो क्यों ?

उ. जंग वो छेड़ता है जो हर तरफ से ना उम्मीद हो जाता है, या उसे बहुत फायदा नज़र आता है क्रांति में, आज यूथ अपने भविष्य का फायदा देख रहा है, तो क्रांति हो सकती है !!

1.2 यदि नहीं तो क्यों ?

उ. जो लोग समझदार हो जाते है, वो अपना शहर बदल लेते है !! यदि प्रक्टिकल में बातें की जाये तो ये समझदार लोग जो money के पीछे भाग रहे है वो भी उतने ही जिम्मेदार है !!

2. क्या वर्तमान जन आक्रोश में क्रांति के सभी घटक मौजूद हैं?

उ. नहीं, मीडिया भी गुलाम है !! बुद्धिजीवी वर्ग अभी इससे पूरी तरह नहीं जुड़ पाया है ! जो वर्ग जुडा है उसे बहुत ही गूढ़ नेतृत्व की जरुरत है !!

2.1 क्या भारत में कभी क्रांति हो भी सकती है ?

उ. भारत में क्रान्तिया हुए है, लेकिन आजतक सारा वर्ग एकमत नहीं हुआ है !! क्रांति हो रही है, कुछ का प्रभाव तुरंत नज़र नहीं आता !!

3. आप क्या स्वयम सडको पर उतरना चाहेंगे ?

उ. बिलकुल, पुलिस के डंडे किसे नहीं पसंद है !! जबकी तुम्हारे अपने लोग पुलिसे में है और डंडे बरसा रहे हो !!

3.1 यदि हाँ तो क्यों?

उ. क्योकि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता !!

3.2 यदि नहीं तो क्या आपको रोक रहा है ?

उ. डर, कुछ खोने का डर, कुछ नहीं पाने का डर, परिवार का डर !! ऐशे बहुत से डर है जो रोकते है !!
 
रविंदर भाई समाज में दोनों तरह के लोग है, और मैंने दोनों की तरफ से लिखा है !! और क्रांति दोनों को साथ लेकर सफल हो सकती है, और यही वास्तविक सफलता होगी, एक भाग को हराकर या दूर रखकर नेओप्लियन या हिटलर जैसे ही लोग राज़ करेंगे !!
 
लोकपाल, सुपर सरकार तो झोड़ो, कभी सरकार भी नहीं बन सकता! लोकपाल के पास सरकार चलाने का कोई प्रावधान नहीं है! यह सब बेतुक बातें कपिल सिबल लोकपाल से अपनी जान बचाने के लिए कह रहा है! असे लोगों को पता है की लोकपाल के आते ही इंनिहिकी गर्दन पर तलवार लटकनि है! इसलिए ये सब बातें जनता को भ्रमित करने के लिए की जा रहीं हैं!

आप ही बताएं की क्या लोकपाल के पास सरकार चलने की ताकत है? क्या लोकपाल, Income Tax की रेट या इसके किसी भी प्रावधान मैं बदलाव कर सकता है? क्या लोकपाल यह निर्देश दे सकता है की सरकार कितना पैसा कहाँ खर्च करे? क्या लोकपाल यह निर्देश दे सकता है की क्या आयत करना है और क्या निर्यात? क्या लोकपाल यह निर्देश दे सकता है की कहाँ सड़क और कहाँ नहर बनानी है? लोकपाल बिल मैं ऐसा कुछ नहीं है जो एक सूक्षम सरकार चलाने मैं बाधा डाले!

लोकपाल विधायक सिर्फ निगरानी करने के लिए है, की सरकारी कुर्सी कानून का पालन कर रही है या नहीं! ये सब ताकतें सीबीआई और पुलीस जैसे विभागों के पास भी हैं, लेकिन क्यूंकि ये सब विभाग राजनेताओं के अधीन आतें हैं, इसलिए ये सब अपना काम करने की बजाये अपने मालिकों (राजनेताओं) का काम करतें हैं! सीबीआई और पुलीस जैसे विभाग एक उधारण हैं की 'लोकपाल' किसी भी राजनेता के अधीन मैं न हो, चाहे वो मुख्य मंत्री हो या प्रधान मंत्री!

मैं आपको एक और उधारण देता हूँ, टी. न. शेषण का! टी. न. शेषण ने एक समाये CEC की ताकत का उपयोग कर, चुनाव परक्रिया मैं काफी सुधर किया था! उन शुधारों मैं कुछ असे भी थे जो अमीर राजनेताओं को पसंद नहीं आये! इस लिए राजनेताओं ने तत्काल कानून मैं परिवर्तन कर CEC की ताकत कम कर दी! यही कारन है की टी. न. शेषण के बाद चुनाव परक्रिया मैं कोई खास सुधार नहीं हुए हैं! जो राजनेता आज लोकपाल का विरोध कर रहै हैं वोह वही हैं जिन्होंने कानून मैं संसोधन कर जनता की बजाये Union Carbide को बचाया था! ये वही राजनेता हैं जिन्होंने कानून मैं असे संसोधन किये हैं जिसके बाद जिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधिसों सों से ये डरते थे, आज वही न्यायाधीस राजनेताओं की सामने अब धूम हिलातें हैं! असे राजनेताओं का जनता को लोकपाल विधायक पर भ्रमित करना संभाविक है!

यह बात यहाँ मैंने कही है न की कपिल सिब्बल ने. अव्वल तो मुझे पता नहीं की कपिल सिब्बल ने ऐसी भी कोई बात की है की नहीं. पर कही भी है, तो उससे मुझे फर्क नहीं पड़ता. चूँकि मैं आज से २ महीने पहले भी यही बात कहता, जब कपिल सिब्बल इस विषय पे अंधाधुन्द बयानबाजी नहीं कह रहा था. आप के और सरकारी तरीके मैं क्या अंतर रह गया अगर आप बात को बेतुका सिर्फ इस कारण से बता रहे हैं की इसे एक विशेष आदमी ने कहा है? सरकार भी रामदेव की बात को यही कह के खारिज करती रहती है की वोह RSS का agent है. हम लोग कब किसी तर्क का उसके गुणों के आधार पे मूल्याँकन करेंगे, न की उसको कौन कह रहा उस आधार पर.

जैसा की मैंने पहले कहा की "मैं मानता हूँ कि एक अच्छा लोकपाल, संसद और सरकार पे चेक का काम कर सकता है." पर मेरी आस्था महानायकों से अधिक प्रणाली को बेहतर बनाने में है. आपका टी एन सेषण का उदहारण मेरे तर्क के लिए उपयुक्त है. पिछले पचास-साथ साल में न जाने कितने लोग इस पद पे बैठे हैं. और गिनाने के लिए है हमारे पास बस एक नाम. इस्सी गद्दी का दुरूपयोग सेषण से पहले भी होता था, और उसके बाद भी हुआ. सेषण के बाद भी इस्पे चावला जैसे सरकारी चमचे बैठे. CVC , Supreme Court , राष्ट्रपति, सीबीआई, - ऐसी कौनसी ही गद्दी रह गयी है जिसपे गलत लोग न बैठे हों. हम फिर भी गद्दियों की ताकतों को बढाने की मांग करते हैं! गौर फरमाइए की मैंने लोकपाल गठित करने की मांग की आलोचना नहीं की है. सिर्फ ये कहा है की यह अनिवार्य है की उसके पास निरंकुश ताकतें न हों.

अन्ना टीम के बिल और सदस्यों के दृष्टिकोण की आलोचना देश हित मैं बोने वाली कई आवाजों ने आज से नहीं, बल्कि बहुत समय से की है. ये लोग सरकार और राजनैतिक दलों के खिलाफ बोलने में सबसे आगे रहते हैं. तो ऐसे संदेह की गुंजाइश नहीं है की ये सरकारी प्रचार कर रहे हैं. अगर आप रचनात्मक आलोचना में विश्वास रखते हों, तो कुछ लिनक्स पे नज़र डाल सकते हैं:

http://tgs.nationalinterest.in/2011/04/30/exhausted-tear-ducts/

http://realitycheck.wordpress.com/2011/04/06/jan-lok-pal-caveat-emptor/

http://acorn.nationalinterest.in/2011/04/08/against-jan-lok-pal-and-the-politics-of-hunger-strikes/

http://www.indianexpress.com/news/of-the-few-by-the-few/772773/1
 
यह बात यहाँ मैंने कही है न की कपिल सिब्बल ने. अव्वल तो मुझे पता नहीं की कपिल सिब्बल ने ऐसी भी कोई बात की है की नहीं. पर कही भी है, तो उससे मुझे फर्क नहीं पड़ता. चूँकि मैं आज से २ महीने पहले भी यही बात कहता, जब कपिल सिब्बल इस विषय पे अंधाधुन्द बयानबाजी नहीं कह रहा था. आप के और सरकारी तरीके मैं क्या अंतर रह गया अगर आप बात को बेतुका सिर्फ इस कारण से बता रहे हैं की इसे एक विशेष आदमी ने कहा है? सरकार भी रामदेव की बात को यही कह के खारिज करती रहती है की वोह RSS का agent है. हम लोग कब किसी तर्क का उसके गुणों के आधार पे मूल्याँकन करेंगे, न की उसको कौन कह रहा उस आधार पर.

जैसा की मैंने पहले कहा की "मैं मानता हूँ कि एक अच्छा लोकपाल, संसद और सरकार पे चेक का काम कर सकता है." पर मेरी आस्था महानायकों से अधिक प्रणाली को बेहतर बनाने में है. आपका टी एन सेषण का उदहारण मेरे तर्क के लिए उपयुक्त है. पिछले पचास-साथ साल में न जाने कितने लोग इस पद पे बैठे हैं. और गिनाने के लिए है हमारे पास बस एक नाम. इस्सी गद्दी का दुरूपयोग सेषण से पहले भी होता था, और उसके बाद भी हुआ. सेषण के बाद भी इस्पे चावला जैसे सरकारी चमचे बैठे. CVC , Supreme Court , राष्ट्रपति, सीबीआई, - ऐसी कौनसी ही गद्दी रह गयी है जिसपे गलत लोग न बैठे हों. हम फिर भी गद्दियों की ताकतों को बढाने की मांग करते हैं! गौर फरमाइए की मैंने लोकपाल गठित करने की मांग की आलोचना नहीं की है. सिर्फ ये कहा है की यह अनिवार्य है की उसके पास निरंकुश ताकतें न हों.

अन्ना टीम के बिल और सदस्यों के दृष्टिकोण की आलोचना देश हित मैं बोने वाली कई आवाजों ने आज से नहीं, बल्कि बहुत समय से की है. ये लोग सरकार और राजनैतिक दलों के खिलाफ बोलने में सबसे आगे रहते हैं. तो ऐसे संदेह की गुंजाइश नहीं है की ये सरकारी प्रचार कर रहे हैं. अगर आप रचनात्मक आलोचना में विश्वास रखते हों, तो कुछ लिनक्स पे नज़र डाल सकते हैं:

http://tgs.nationalinterest.in/2011/04/30/exhausted-tear-ducts/

http://realitycheck.wordpress.com/2011/04/06/jan-lok-pal-caveat-emptor/

http://acorn.nationalinterest.in/2011/04/08/against-jan-lok-pal-and-the-politics-of-hunger-strikes/

http://www.indianexpress.com/news/of-the-few-by-the-few/772773/1

To get the Kapil Sibel thing right, have a look at the results: http://www.google.co.in/search?q=kapil+sibal+on+lokpal+parallel+government

On a lateral thought, I think KS is right. His statement have to be looked in the right context. And the context is parallel movement that ones was so famous of it's Mumbai headquarters. Yes, it's an easy guess now it. It was parallel government run by the don, the 'Dawood'. After Dawood, the role is taken by the S???? party. Their ways are different, however, the result and objectives are same. Just like Dawood silenced the opposition by guns and bombs, the S???? party silences the opposition by CBI, and Supreme courts. Just like the laws were framed by Dawwod himself instead of parliament, the S???? party frames the law at the CWC. Just like the money went to the Dawood pockets instead of state, the money nows goes to S???? party's pockets. In this context, KS is right. After Anna's Lokpal bill, there would be a parallel government, one looking at the welfare of the state and other at the welfare of S???? party.

And yes, I agree with you on the concentration of power. However, is it wise to let the 'today' spoil for a 'perfect tomorrow'?
 
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