मजबूत नहीं है लिव-इन, आ रही कई दिक्कतें..
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इंदौर।पारंपरिक सामाजिक रिश्तों को रूढ़िवादी मानने वाली नई पीढ़ी लिव-इन-रिलेशनशिप में इसलिए रह रही है कि इसमें न तो कोई बंधन रहता है और न ही कोई जिम्मेदारी। विवाह और तलाक के झंझट से मुक्त। जब मन चाहे कोई भी इस रिश्ते में आ या जा सकता है। लेकिन अब इन रिश्तों में व्यावहारिक दिक्कतें सामने आ रही हैं, ऐसे मामले तेजी से पुलिस स्टेशनों में पहुंचने लगे हैं।
जहां बिपाशा और जॉन अब्राहम के 10 साल पुराने लिव-इन-रिलेशन ने युवा पीढ़ी में क्रेज पैदा किया था वहीं हाल ही में भोपाल में हुई फ्लाइंग ऑफिसर अंजलि गुप्ता की आत्महत्या ने इसके खतरनाक पहलू को भी सबके सामने ला दिया। लिव-इन-रिलेशनशिप यानी बगैर शादी के पति-पत्नी की तरह साथ रहने का चलन अब सिर्फ मेट्रो यानी मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जैसे महानगरों के संभ्रांत समाजों का कल्चर नहीं रहा। देश के छोटे शहरों में भी इसका चलन तेजी से बढ़ा है। लेकिन नये जमाने के इस तरह के रिश्तों को वह मजबूती व स्थिरता मिलनी बाकी है कि जो को पारंपरिक वैवाहिक या काफी हद तक लंबी डेटिंग के बाद प्रेम-विवाहों से बने रिश्तों में देखने को मिलती रही है।
लिव-इन-रिलेशनशिप की शुरुआत जिस आजादखयाल और 21वीं सदी के युवा सोच को लेकर पैदा हुई, वह क्या रूप रंग ले रही है उसका एक नमूना शहर के महिला थाने में हर सप्ताह पहुंच रहे मामलों से समझा जा सकता है। यहां औसतन पांच से छह इस तरह के मामले पहुंच रहे हैं,जिसमें इन नये जमाने के जोड़ों के दिलों में एक दूसरे के प्रति पैदा हो रही खटास और गिले-शिकवे की ओर इशारा करता है। जो साफ बताता है कि इस तरह को जोड़ों के बीच सब कुछ अच्छा नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय जन-जीवन में लिव-इन-रिलेशन को बनाए रखने की बात तो छोड़ें, उसकी तरफ चंद कदम बढ़ाने का गुणसूत्र ही इनमें नहीं है। युवा जोश में या फिर अपनी आजादी का मानो जश्न मनाते हुए साथ रहने की शुरुआत तो करते हैं, लेकिन उनके रिश्तों का यह सुहाना सफर चार कदम चलते ही दम तोड़ देता है।
असुरक्षा और डिप्रेशन के शिकार
ऐसे रिश्तों में आरंभ से ही प्रॉब्लम आने लगती है। कई बार लोग दो से तीन रिलेशन में रहने लगते हैं जिसमें खुद को भी हैंडल करना मुश्किल होता है, जिससे बाहर नहीं निकाल पाते और मानसिक तनाव में आ जाते हैं। लिव इन रिलेशन में रहने वाले लोगों में असुरक्षा सबसे पहली समस्या देखी गई है। यह लोग पहले जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते वहीं जब इन्हें एहसास होता है कि इनपर रिस्पांसिबिलिटी आ रही है तो रिश्तों में खटास आती है। हर पल पार्टनर के छोड़ कर चले जाने की असुरक्षा बनी रहती है।
सुनीता गुप्ते, मनोरोग विशेषज्ञ
आखरी अवस्था है खतरनाक
सामाजिक परिवेश ऐसा नहीं है कि इन रिश्तों में लोग आसानी से रह सकें। सोसायटी और सरकार का ऐसे रिश्तों में आगे बढ़कर सपोर्ट विदेशों जैसे यहां नहीं मिलता, जिससे कई तरह की तकलीफों का सामना करना पड़ता है। लोग अवसाद के शिकार हो सकते हैं। डॉ. वी.एस.पाल, अधीक्षक, मनोरोग विभाग, एमवायएच
इसका कल्चर विदेशों में है
हमारी प्राचीन सभ्यता है, सभी धर्मो ने शादी को महत्व दिया है और संस्कृति को रिश्तों में बांधा है। उसके पीछे मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि व्यक्ति दायित्व को निभाता है। उसमें जिम्मेदारी आती है। इसके विपरीत बात लिव-इन-रिलेशनशीप की करें तो यह कल्चर विदेशों में है लेकिन भारत में इसको हमारा समाज कतई स्वीकार नहीं करेगा। यदि लिव-इन-रिलेशनशिप के दौरान उनके रिश्तों में दरार आती है तो बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी कौन लेगा? डॉ. संध्या वाजपेयी, प्रोफेसर, समाजशास्त्र
बच्चों के लिए कर सकते हैं दावा लिव इन रिलेशनंस के लिए भारतीय संविधान में ठोस कानून नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने एक जजमेंट के तहत ऐसे रिलेशन को सामाजिक पहचान देने की मंजूरी दी, जिसमें इस रिलेशन में रह रहे लोगों को उपेक्षित नहीं किया जाए। लेकिन ये लोग हिंदू मैरिज के तहत लागू होने वाले कानून का इस्तेमाल नहीं कर सकते। अगर उनके बच्चा होता है, तो दोनों (माता-पिता) को उस बच्चों की परवरिश मिलकर करनी होगी। इस बात के लिए महिला पुरुष पर दावा कर सकती है। अमित उपाध्याय, एडवोकेट (वर्तमान में लिव-इन- रिलेशनशिप के कई केस लड़ रहे हैं।)
अगर रिश्तों में खटास आती है तो>महिला घरेलू हिंसा प्रोटेक्शन एक्ट के तहत शिकायत तो कर सकती है लेकिन तलाक के लिए नहीं। >बच्चे की परवरिश के लिए दावा कर सकते हैं। >पारिवारिक मामले देख रहे वकीलों से संपर्क करें।
क्यों बढ़ रहा है यह कल्चर
>युवा बिना रोक-टोक के बैचलर लाइफ पसंद करते हैं।
>छोटे शहरों से बढ़े शहरो की ओर रुख कर रहे युवा खास तौर पर लड़कियां सिक्योरिटी के लिए साथ रहते हैं, जो आगे चल कर लिव-इन में तब्दील हो रहा है।
>समय की कमी होने की वजह से बिना कमिटमेंट के रहना पसंद करते हैं, जिसमें डिमांड-सप्लाई का फंडा चले।
>परिवार, बच्चे आदि की जिम्मेवारी लेने के डर से ऐसे रिलेशन में रहने लगते हैं।
>शुरुआती आकर्षण रहता है।
>परिवार का सपोर्ट नहीं मिलता है। इसलिए बिना शादी साथ रहने लगते हैं। >
अकेलेपन से बचने के लिए ऐसे रिश्तों की शुरुआत होती है।
>कुछ ऐसे लोग परनिर्भर किस्म के होते हैं, इन्हें किसी का साथ हर पल की जरूरत होती है। यह किसी के साथ रहते हैं, तो अच्छा परफॉर्म करते हैं, वहीं अलग होने पर इनकी स्थिति खराब होने लगती है। ऐसे लोगों का लिव-इन-रिलेशन में जाने की संभावना ज्यादा रहती है।