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amankadian
Guest
मेरे हिसाब से जाट समाज थोडा सा संकीर्ण ही रहा है ! शुरू से हमें अपने जज्बात दबाने की आदत है ! जाट का कोए छोरा कितना इ सुथरा क्यूँ ना रहया हो फ्लर्ट कम ए पावेगा !फ्लर्ट छोड़ो बहुत कम हैं जिनकी गर्लफ्रेंड रही होंगी ! कारण पहला तो वोहे थप्पड़ के बदले घुसंड आला, दूसरा लावा लुतरी/चापलूसी कम ए आवे है, तीसरा जे भूले भटके तें किसे छोरी तें बात करता किसे दोस्त ने देख लिया तो उड़े सीटी बाजन लग ज्या हैं ! यू ए हाल कम बत्ती छोरियां का है एब आ गया इन्टरनेट तो जाट छोरो के मन के दबे हुए जज्बात उभर कर सामने आने लगे ! इब पेकिंग ए बदली है भीतर आला सौदा तो वोहे है ! जाटनी सुने कोणी अर जाटराम सुनाये बिना मने कोनी ! इब छोरी इसे मौके पे माडी सी नीची खिंच जावे है वा कहावत समझ के " सूअर से लड़ो दोनों गंदे होवो पर सिर्फ वही उसे एन्जॉय करेगा" ! कई बार गुस्से में वो जाटलैंड छोड़ के चली जाती हैं ! वो लड़कियां जो शादीशुदा नहीं हैं उन्हें इन्टरनेट की सुविधा कम ही उपलब्ध है और जो शादीशुदा हैं उनके पास इन्टरनेट पर आने का टाइम नहीं! वैसे नारी अब इतनी अबला नहीं की आप कुछ भी कह दें और वो सह जाएगी पर सिर्फ वो अपने आप को गन्दगी से बचाने की कोशिश करती हैं !
कहन का जाट ने नहीं बेरा अर सुणन की आदत जाटनी ने नहीं
sahi kha bhai-shaab aapne ....................Hooda te khe ke Internet ki suvidha bhi uplad karwa do sabne bhai ji