माहरा हरयाणा ( हरयाणवी कविताये, रचनाये,गीत 

फैशन का जमाना छोरो

फैशन का जमाना छोरो, कर र्या कती हंगाई।
बेरा भी पाटै कोन्या
, माणस सै क लुगाई॥
छोरे-छोरी कट्ठे जाकै
, बदलमा कंटिग करावै सै,
लाण्डे कुड़ते पहरे
दोनूं, टाइट जिन्स फंसावै सै,
जमाने की इस चाल तै हामनै पाछै नै धिकावैं
सै,
रिफल-रिफल चालैं गाला म्हं
,लोगां नै हंसाव सै,
हेयर ड्रेसर बण भकावैं
सैं, आजकाल कै नाई।
बेरा भी पाटता कोना
, माणस सै के लुगाई॥
70
साल की बुढ़िया होरी, अन्टी कुवावण लागी,
बुढापे के म्हं भी
...वा , सुरखी,पोडर लावण लागी,
माथे उपर फैन्सी टीका
, रजकै सजावण लागी,
रलदू की मां भी छोरो
, ब्यूटी पार्लर जावन लागी,
द्यौली भी बणावण लागी
, वा ताई भरपाई।
बेरा भी पाटै
कोन्या, माणस सै कै लुगाई॥
रै फैशन तेरा बीज मरियो
, गोरा काला होरा सै,
पेट
उगाड़ा सुण्डी दिखै, मोटा चाला होरा सै,
60
साल का बूढे का, सिर काला होरा सै,
फोन पै बतलाव दादी
, जान का गाला होरा सै,
सबका राम रूखाला होरा सै
, आच्छी रौनक आई।ं
बेरा भी पाटता कोना
, माणस सै कलुगाई॥
टवेंटी-टवेंटीका खेल चालरा
, गिंडी चकरी काटगी,
छक्का मारा छोरै नै
, तलै तैपैंट पाटगी,
यू भूंडी सुंडी
छोरी भी कसूती रंग छाटगी,
सैन्टरफ्रैस टॉफी नै भी वा आंगलिया गैल चाटगी
,
सारा
जणै नैं आंटगी, या फैषन की करड़ाई।
बेरा भी पाटता कोना
, माणस सै कलुगाई॥
कूण
म्हं पड़ा बूढ़ा रोवै, देवैं पाणी का गलास नहीं,
अपणे बणे पराये लोगों इब किसे तै
आस नहीं,
टूटण लागी डोर प्यार की
, लागै कुछ भी खास नहीं,
रिसता पै कालख
पूतगी, रह्*या किते विस्वास नहीं,
बेटा बाप नै आंख दिखावै
, दुष्मन बणगी मां जाई।
बेरा भी पाटता कोना
, माणस सै कलुगाई॥
फैसन की इस आंधी म्हं
, भूलगे घूंघट गाती,
उंच नीच के काम करण म्हं सरम कती न आती

काण कायदा तोड़या सारा
, तोड़ेसारी रीतिरिवाज,
दिखावा की इस भीड़ म्हं लोगो
, संस्कृति की दबी आवाज,
लिली छत्री अल्ला, कहवै आज, छोड़ो या बुराई॥
बेरा भी पाटता कोना
, माणस सै कलुगाई॥
 
Last edited:
Jatland Ke Kware Bhaiya Khatir (Sunil Nain)

Aaj Ka Behya

आच्छा समय गया पर दिल मं असर उ
'की परछाइयाँ का
घणा नहीं पर ज़िकर करूँ दो चार रसम मनभाईयां का


पहल्यां देखैं
, फेर पक्की, फेर गोद भरण नै जावैं सै
देखैं बाट पडोसी कित वो खूग्या दौर सगाईयाँ का


बान बैठ बनवाड़े खाते मटना रगड़ न्हवाया करती

इब डेंट-पेंट कर नक्शा बदलैं
'पार्लर' ब्याहले भाईयाँ का

ब्याह तै पहल्यां बीस रोज
, ज्यब गीत लुगाई गाया करती
इब कार्ड पै छपता डीजे संग
'लेड़ीज संगीत' लुगाइयां का

ब्याह मं म्हिन्या पहल्यां आकै बुआ-बहाण रंग लाया करती

इब होटल म्हां तै मुड़ ज्यां पैर पडे ना घर माँ-जाईयाँ का


इब छोरे के ब्याह मं भी घलता कन्यादान
'रिशैपशन' पै
लाडडू ज्यब दिखण दें सै ज्यब आले नेग बधाईयाँ का


लोटा लेकै गरम दूध का बहू चौबारे जाया करती

इब अगले दिन जां शिमला सर पै क़र्ज़ खड्या हलवाईयां का


सात जनम के बंधन मं बंध धरम की डगर चल्या करते

इब कर कै शक लें जूत बजा फेर चालै दौर गव्हाईयां का


पैसा-मस्ती-मौज सोच या खागी सब संस्कारां नै

आछा-भला बखत था म्हारी दादी
, माँ और ताइयां का


A grt piece of writing .. hats off to Sunil Nain ... Keep pouring .. :star::star::star:
 
फैशन का जमाना छोरो

फैशन का जमाना छोरो, कर र्या कती हंगाई।
बेरा भी पाटै कोन्या
, माणस सै क लुगाई॥
छोरे-छोरी कट्ठे जाकै
, बदलमा कंटिग करावै सै,
लाण्डे कुड़ते पहरे
दोनूं, टाइट जिन्स फंसावै सै,
जमाने की इस चाल तै हामनै पाछै नै धिकावैं
सै,
रिफल-रिफल चालैं गाला म्हं
,लोगां नै हंसाव सै,
हेयर ड्रेसर बण भकावैं
सैं, आजकाल कै नाई।
बेरा भी पाटता कोना
, माणस सै के लुगाई॥
70
साल की बुढ़िया होरी, अन्टी कुवावण लागी,
बुढापे के म्हं भी
...वा , सुरखी,पोडर लावण लागी,
माथे उपर फैन्सी टीका
, रजकै सजावण लागी,
रलदू की मां भी छोरो
, ब्यूटी पार्लर जावन लागी,
द्यौली भी बणावण लागी
, वा ताई भरपाई।
बेरा भी पाटै
कोन्या, माणस सै कै लुगाई॥
रै फैशन तेरा बीज मरियो
, गोरा काला होरा सै,
पेट
उगाड़ा सुण्डी दिखै, मोटा चाला होरा सै,
60
साल का बूढे का, सिर काला होरा सै,
फोन पै बतलाव दादी
, जान का गाला होरा सै,
सबका राम रूखाला होरा सै
, आच्छी रौनक आई।ं
बेरा भी पाटता कोना
, माणस सै कलुगाई॥
टवेंटी-टवेंटीका खेल चालरा
, गिंडी चकरी काटगी,
छक्का मारा छोरै नै
, तलै तैपैंट पाटगी,
यू भूंडी सुंडी
छोरी भी कसूती रंग छाटगी,
सैन्टरफ्रैस टॉफी नै भी वा आंगलिया गैल चाटगी
,
सारा
जणै नैं आंटगी, या फैषन की करड़ाई।
बेरा भी पाटता कोना
, माणस सै कलुगाई॥
कूण
म्हं पड़ा बूढ़ा रोवै, देवैं पाणी का गलास नहीं,
अपणे बणे पराये लोगों इब किसे तै
आस नहीं,
टूटण लागी डोर प्यार की
, लागै कुछ भी खास नहीं,
रिसता पै कालख
पूतगी, रह्*या किते विस्वास नहीं,
बेटा बाप नै आंख दिखावै
, दुष्मन बणगी मां जाई।
बेरा भी पाटता कोना
, माणस सै कलुगाई॥
फैसन की इस आंधी म्हं
, भूलगे घूंघट गाती,
उंच नीच के काम करण म्हं सरम कती न आती

काण कायदा तोड़या सारा
, तोड़ेसारी रीतिरिवाज,
दिखावा की इस भीड़ म्हं लोगो
, संस्कृति की दबी आवाज,
लिली छत्री अल्ला, कहवै आज, छोड़ो या बुराई॥
बेरा भी पाटता कोना
, माणस सै कलुगाई॥

Once again .. u come up with grt work .... stupendous effort .. :):)
 
एक भाई स भगवान् सिंह सिरोही ,आपना सदस्य ,यु उसका लिखाहोड स | आज उह ताहीं हेप्पी बर्थडे कहन्दी हाण ,उह धोरे पाया था |




"जाट की ज़ुबानी:

मैं वो जाट हूँ जो किसी के चलाये ते चाले ना,
मिटाए ते मिटे ना,
हटाये ते हटे ना,
डराए ते डरे ना,

बस मैं भूखा हु प्यार का,
ना मन लालच पिस्से का,
ना मन घमंड म्हारे रुतबे का,
मन शौक से तो बस यारी का, भाईचारे का,

ठाट अपने देसी,
रुतबा अपना देसी,
स्टाइल अपना देसी,
फेर के चीज़ म्हारे आगे विदेशी...
 
Ek or meri ood te bhi ....................mane b kitte paya hai .......:triumphant:

होता गर मैं गलती तै दुधिया मेरी जान
तुझे किलो दूध फालतू मैं रोजाना देता

शुक्र सै कोन्या मेरी परचून की दूकान
नही सारा सौदा फ्री में तेरा दीवाना देता
...
न्यू भी लड्डू सा भुरभुरा स्वभाव सै मेरा
कितना ए फोड़ के खा ना उल्हाना देता

मैं बेशक तै बेचता एक्सपाइरी सामान
पर तैंने कदे भी नही माल पुराना देता

इसकी मौज सै इसके यार कै कारण
फेर तो पूरा गाम तैंने यो ताना देता

तेरे हिस्से की लामणी भी मैं कर देता
वक्त गर साथ काम करण का बहाना देता

बेचैन होकर करता मैं इतनी चाकरी
मिसाल मेरी मेरे बाद यो जमाना देता !!

 
Ek or meri ood te bhi ....................mane b kitte paya hai .......:triumphant:

होता गर मैं गलती तै दुधिया मेरी जान
तुझे किलो दूध फालतू मैं रोजाना देता

शुक्र सै कोन्या मेरी परचून की दूकान
नही सारा सौदा फ्री में तेरा दीवाना देता
...
न्यू भी लड्डू सा भुरभुरा स्वभाव सै मेरा
कितना ए फोड़ के खा ना उल्हाना देता

मैं बेशक तै बेचता एक्सपाइरी सामान
पर तैंने कदे भी नही माल पुराना देता

इसकी मौज सै इसके यार कै कारण
फेर तो पूरा गाम तैंने यो ताना देता

तेरे हिस्से की लामणी भी मैं कर देता
वक्त गर साथ काम करण का बहाना देता

बेचैन होकर करता मैं इतनी चाकरी
मिसाल मेरी मेरे बाद यो जमाना देता !!

तन्ने इस्से-ए बड़े पावें सें |बढ़िया स |
 
A grt piece of writing .. hats off to Sunil Nain ... Keep pouring .. :star::star::star:

खटकर साहब सायद गलत पढ़ा आपने...ये सुनील नैन न नहीं लिखी, सुनील नैन के लिए छापी गयी स लेखक तो सायद इसके नरेंदर अत्री जी ह
 
"म्हारी गजल "

सीधी साची बात करूँ सूं
मेहनत कर कै पेट भरूँ सूं


अखबारां का चेहरा पढ़ कै

जीते जी मैं रोज मरुँ सूं


हर माणस मं कहैं जानवर

किस मं के सै खोज करूँ सूं


चील सांप और शेर बघेरा

पर बगुल्याँ तै घणा डरूं सूं


जो देखूं वो मुहं पै कह कै

बिन माफ़ी की खता करूँ सूं


जिनके मन मं महक वतन की

उन
'पागलां' तै प्यार करूँ सूं

'
खोट' रोज दो शाम-सवेरै
भारत माँ नै नमन करूँ सूं

 
Last edited:
ओअली आई, सओली आई ,रंग-बिरंगी होली आई


रंग-बिरंगी होली आई

ओअली आई
, सओली आई
रंग-बिरंगी होली आई


कोय मारै रंग
, कोय मारै गुब्बारा
कोय मारै गोबर
, कोय मारै गॉरा

मेरे भी खेलण की उठी
खुमारी
मैं भी ठा लाया एक पुरानी पिचकारी


आच्छा-सा घोल त्यार
करया
पिचकारी मैं रंग भरया


दूर तैं चॉली आवै एक छोरी

लागै थी सुथरी
शक्ल की गोरी

लहरावैं थे लाम्बे बॉल

गज़ब की थीं उसकी चाल


मन्नै
पिचकारी दबाई
पर रंग की फुहार ना आई


मैं बोल्या
, पिचकारी, तेरे के सै बीमारी
चालती क्यूँ ना
, रंग डालती क्यूँ ना

पिचकारी बोली-कोन्या
चालूँ
तरे घी-सा कोन्या घालूँ


मैं बोल्या
, चॉल पड़, क्यूं होली का मौका ख़ोरी
फागण मैं ऐकली कित पावैगी इसी गोरी


पिचकारी बोली
, तूँ निपट सै कोरा
ध्यान तै देख
, छोरी कोन्या, यू सै छोरा

किसी चॉल्ली फ़ैशन की
बीमारी
साच कह री सै तूं पिचकारी


मन्नै सांस सब्र का घाल्या

पिचकारी
नैं ले कै आगै चाल्या

फेर देख्या एक जोड़ा चाल्या आवै

चूपचाप थे दोनूँ
, ना आपस में बतलावै

मै बोल्या
, इनके मारूँ, होली का खुमर तारूँ

पिचकारी बोली
, रहण दे
इन दोनुआ नै जाण दे


मैं बोल्या
, क्यूं, के फांसी आगी
पिचकारी नै हांसी आगी

न्यू बोली, इन्न पैं तू के रंग चढ़ावैगा
इनकी करणी सुण के दुखी हो जावैगा

ये आये सैं भविष्य के रंग मिटा कै,
रामू डॉक्टर धोरै दोनूँ जाकै

छोरा-छोरी का पता लगा कै
अजन्मी कन्या नै कोख़ तैं हटा है

ना सोची इनैं कुछ भी समाज़ की
किसी पीढ़ी से या आज की

कित तैं आवैंगी बहू, जै जन्मैंगी ना छोरी
बिना रंगा के रहैगी होली, फागण की या मस्ती कोरी

मैं बोल्या, पिचकारी, तू के घर घॉलैगी
बता तो दे, तू किते चालैगी, के ना चॉलैगी

पिचकारी बोली, मैं चालूँगी,
रंगा तैं घर भर डालूँगी

जिस दिन हर तरफ़ हो ज्यागी ईमानदारी
बेटा अर बेटी सबनैं लागैंगी एक-सी प्यारी

छोटे बड़े का मान होगा, ना होगी किते तब लाचारी
खुशियाँ के रंग बरसावैगी, म्हारे संस्काराँ की पिचकारी
 
माटी का चूल्हा

उसनै देख कै एक माँ का मन पसीज़ ग्या
जब मॉटी का चूल्हा मींह कै म्हाँ भीज़ ग्या

चूल्हा वो माटी-गार का
सारे कूणबे के प्यार का

सीली बॉल छणया करती
सारयाँ की रोटी बणया करती

धोरै धरया रहता एक पलॅवा
कदे पूरी अर कदे हलवा

गुलगुले, पूड़े, कदे राबड़ी
आग तै पकी मॉटी की पापड़ी

माँ ने एक सताया करता
जब लुक-लुक कै नै खाया करता

सारे भाइयों का कट्ठा परोसा
जब एक की टिण्डी दूसरे ने खोसया

राम की थाली, लछमण का टूक
पेट सबके न्यारे, साझली सबकी भूख़

माँ जब लाकड़ी सहलाया करती
चूल्हे की आग भी बतलावा करती

बाबू भी तो उड़ै खाया करता
दुःख-सुख की बतलाया करता

चाहे घर हो, चाहे हो गमीणे की तैयारी
उस चूल्हे की थी हर जगहाँ भागीदारी

चूल्हे की आग जब फड़फड़ाया करती
कोय करै सै चुगली थारी उननैं बताया करती

पर उसनै कदे कराई जग-हंसाई ना
घर का हो या बाहर का, काची रोटी खुवाई ना

भाईयाँ मैं तैं सारे-ए तो पढ़गे
कुछ नौकरी लागगे, कुछ जहाजाँ में चढ़गे

खुशियाँ मैं बंडवारा बंड़ग्या
घर का चूल्हा एकला पड़ग्या

चूल्हे की कायां झरण लाग गी
बस चार-ए रोटी बणन लाग गी
दो बूढ़े की, एक बूढ़िया की,
अर एक बारणै बैठी कुतिया की

फेर एक दिन घराँ छोरा आया
चूल्हे नै दुःख मोटा आया

बोल्या, माँ क्यूँ धूम्में मैं आँख फुड़ानै सै,
सारी दुनिया गैस पर रोटी बणावै सै

थारै ख़ातर यू लोह का चूल्हा ल्याया,
सिलैण्डर भी सै सिफारसां तै पाय्या

धूम्मैं तै पाण्डा छुटाओ
इसपै थाम रोटी बणाओ

माँ नै, ना था उसका बेरया
स्टील कै चूल्है पै हाथ फेरया

मेरे मन की बात छिपै कोन्या
तेरा यू चूल्हा तो गार तै लिपै कोन्या

इसनै ठाये-ठाये कित हांडूंगी
ना इसकै नयन, ना नक्श, कित मैं पलवा टांगूंगी

फूक देगा सुवाहली, अर कॉची राखैगा राबड़ी
इसके लोह के तन पै तै, कोन्या उतरै मॉटी की पापड़ी

छोरे, जै मेरा सुख चाहवै सै, तो बताइये
एक बै मेरे धोरै सारे भाईयाँ नै लाइये

साच कहूँ सूँ बेटा, मैं फूल्ली नही समाऊँगी
सारै जणया नै आपणै हाथ तैं पो कै खुआऊँगी

छोरा ना मान्या, जूल्म करग्या
मॉटी कै चूल्हे नै छत पै धरग्या

माँ के दुःखदे गोड्डे छत पै चढ़ते नही
छोरे भी आ कै माँ का दुःख आँख्यॉ कैं पढ़ते नही

बूढ़ी उम्मीद इब गोबर और गॉरा ल्यावै सै
आच्छा-सा घोल बणा कै छात काहनी लखावै सै

जब भी बरसै सै मींह, चूल्हा खुले मैं भीजै सै
अर एक माँ का दिल बार-बार पसीजै सै
अर एक माँ का दिल बार-बार पसीजै सै
 
होश में रह ल्यांगे....
देके हजार रपिये किराया जोश में रह ल्यांगे
उसके दिल में ना रहे तो पडोस में रह ल्यांगे

मिल्या करेगी नजर फेर रोजाना आपस में
वा बात नही करेगी तो हम रोष में रह ल्यांगे

जद तै सुणी बाप उसका थानेदार बणग्या सै
कदे भीतर करवा दे थोडा होश में रह ल्यांगे

वा पूरा डोसा खाग्गी तो के जी लिकडग्या माहरा
वा राज्जी रहियो हम तो सोस में रह ल्यांगे


होज्यागी रिश्तेदारी फेर गली के सब छोर्या तै
थारा जीजा लाग्गू सूँ इस धोंस में रह ल्यांगे


दे देगा अपणे सारे सोड-सोडिये बेचैन उसनै
जाड़े की भरी रात में भी ओंस में रह ल्यांगे
 
आंसू टप काके के होगा

मात पिता के मरें बाद आंसू टप काके के होगा
जिन्दे जी जूते मारे फेर फूल चढ़ा कै के होगा ||

कहना मान्या नहीं कदे फेर तिलक लगाना ठीक नहीं
छुए कोन्या पैर कदे फेर शीश झुकाना ठीक नहीं
राखे सदा अँधेरे मंह फेर दीप जलाना ठीक नहीं
नाक चढ़ा कै रोटी दी फेर पिंड भराना ठीक नहीं
जिन्दे जी जूते मारे फेर फूल चढ़ा कै के होगा ||

बिछुड़े बाद बडाई करते बेटे पोते देख लिए
कर कर याद लाड बचपन के पाछै रोते देख लिए
पितरं खातर गंगा जी महँ लेट गोते देख लिए
लगी हुयी कमरयों मैं फोटू मॉल मॉल धोते देख लिए
रहे तड़पते वस्त्र बिन फेर शाल उदा कै के होगा ||

काढ़े दोष सदा जिनके फेर पाछे तैं गुण गावैं सें
दुखी करे जिन्दगी भर फेर मंदिर मैं पत्थर लावें सें
घूर घूर देखनिये फेर फोटू पै ध्यान जमावैं सें
सदा उछाली पगड़ी फेर पगड़ी की रस्म निभावैं सें
दुःख मंह करी नहीं सेवा फेर पेहवे जाकै के होगा ||

करल्यो जिन्दे जी सेवा या अच्छी क़िस्मत थारी सै
आशीर्वाद मिले दिल तै जो बेटा आज्ञाकारी सै
खुद अपनी सन्तान भला ना लागे किसने प्यारी सै
कोए अमर ना रहया जगत मैं आखिर सब की बारी सै
ज्ञानी राम दो हर्फी कह दी ढोल बजा कै के होगा ||
​
 
Last edited:
great job rana saab so keep it !
lekin itnaa likhane se kya hoga sar

is geet ke ek ek bol me jo sacchai chipi hai vo main shabdon me bayan nahi kr pa raha hu
 
माटी का चूल्हा

उसनै देख कै एक माँ का मन पसीज़ ग्या
जब मॉटी का चूल्हा मींह कै म्हाँ भीज़ ग्या

चूल्हा वो माटी-गार का
सारे कूणबे के प्यार का

सीली बॉल छणया करती
सारयाँ की रोटी बणया करती

धोरै धरया रहता एक पलॅवा
कदे पूरी अर कदे हलवा

गुलगुले, पूड़े, कदे राबड़ी
आग तै पकी मॉटी की पापड़ी

माँ ने एक सताया करता
जब लुक-लुक कै नै खाया करता

सारे भाइयों का कट्ठा परोसा
जब एक की टिण्डी दूसरे ने खोसया

राम की थाली, लछमण का टूक
पेट सबके न्यारे, साझली सबकी भूख़

माँ जब लाकड़ी सहलाया करती
चूल्हे की आग भी बतलावा करती

बाबू भी तो उड़ै खाया करता
दुःख-सुख की बतलाया करता

चाहे घर हो, चाहे हो गमीणे की तैयारी
उस चूल्हे की थी हर जगहाँ भागीदारी

चूल्हे की आग जब फड़फड़ाया करती
कोय करै सै चुगली थारी उननैं बताया करती

पर उसनै कदे कराई जग-हंसाई ना
घर का हो या बाहर का, काची रोटी खुवाई ना

भाईयाँ मैं तैं सारे-ए तो पढ़गे
कुछ नौकरी लागगे, कुछ जहाजाँ में चढ़गे

खुशियाँ मैं बंडवारा बंड़ग्या
घर का चूल्हा एकला पड़ग्या

चूल्हे की कायां झरण लाग गी
बस चार-ए रोटी बणन लाग गी
दो बूढ़े की, एक बूढ़िया की,
अर एक बारणै बैठी कुतिया की

फेर एक दिन घराँ छोरा आया
चूल्हे नै दुःख मोटा आया

बोल्या, माँ क्यूँ धूम्में मैं आँख फुड़ानै सै,
सारी दुनिया गैस पर रोटी बणावै सै

थारै ख़ातर यू लोह का चूल्हा ल्याया,
सिलैण्डर भी सै सिफारसां तै पाय्या

धूम्मैं तै पाण्डा छुटाओ
इसपै थाम रोटी बणाओ

माँ नै, ना था उसका बेरया
स्टील कै चूल्है पै हाथ फेरया

मेरे मन की बात छिपै कोन्या
तेरा यू चूल्हा तो गार तै लिपै कोन्या

इसनै ठाये-ठाये कित हांडूंगी
ना इसकै नयन, ना नक्श, कित मैं पलवा टांगूंगी

फूक देगा सुवाहली, अर कॉची राखैगा राबड़ी
इसके लोह के तन पै तै, कोन्या उतरै मॉटी की पापड़ी

छोरे, जै मेरा सुख चाहवै सै, तो बताइये
एक बै मेरे धोरै सारे भाईयाँ नै लाइये

साच कहूँ सूँ बेटा, मैं फूल्ली नही समाऊँगी
सारै जणया नै आपणै हाथ तैं पो कै खुआऊँगी

छोरा ना मान्या, जूल्म करग्या
मॉटी कै चूल्हे नै छत पै धरग्या

माँ के दुःखदे गोड्डे छत पै चढ़ते नही
छोरे भी आ कै माँ का दुःख आँख्यॉ कैं पढ़ते नही

बूढ़ी उम्मीद इब गोबर और गॉरा ल्यावै सै
आच्छा-सा घोल बणा कै छात काहनी लखावै सै

जब भी बरसै सै मींह, चूल्हा खुले मैं भीजै सै
अर एक माँ का दिल बार-बार पसीजै सै
अर एक माँ का दिल बार-बार पसीजै सै
या जगबीर राठी की कविता स | में सब भाइयां तें निवेदन करूंगा , अक जा बेरा हो ते , उह लेखक या कवी का नाँ गेल्याँ छाप्प्या करो |
 
great job rana saab so keep it !
lekin itnaa likhane se kya hoga sar

is geet ke ek ek bol me jo sacchai chipi hai vo main shabdon me bayan nahi kr pa raha hu

धन्यवाद भाई सोमबीर और जैसा कि कवि ने लिखा है

"
कोए अमर ना रहया जगत मैं आखिर सब की बारी सै "​


बिलकुल सच है | बाकी बड़े बड़ेरे कहते आये के भाई "ब्याज समेत वापिस मिलना है" | इब यो त हम ने सोचना है के क्या चाहिए |
 
मात पिता के मरें बाद आंसू टप काके के होगा
जिन्दे जी जूते मारे फेर फूल चढ़ा कै के होगा ||
कहना मान्या नहीं कदे फेर तिलक लगाना ठीक नहीं
छुए कोन्या पैर कदे फेर शीश झुकाना ठीक नहीं
राखे सदा अँधेरे मंह फेर दीप जलाना ठीक नहीं
नाक चढ़ा कै रोटी दी फेर पिंड भराना ठीक नहीं
जिन्दे जी जूते मारे फेर फूल चढ़ा कै के होगा ||

बिछुड़े बाद बडाई करते बेटे पोते देख लिए
कर कर याद लाड बचपन के पाछै रोते देख लिए
पितरं खातर गंगा जी महँ लेट गोते देख लिए
लगी हुयी कमरयों मैं फोटू मॉल मॉल धोते देख लिए
रहे तड़पते वस्त्र बिन फेर शाल उदा कै के होगा ||

काढ़े दोष सदा जिनके फेर पाछे तैं गुण गावैं सें
दुखी करे जिन्दगी भर फेर मंदिर मैं पत्थर लावें सें
घूर घूर देखनिये फेर फोटू पै ध्यान जमावैं सें
सदा उछाली पगड़ी फेर पगड़ी की रस्म निभावैं सें
दुःख मंह करी नहीं सेवा फेर पेहवे जाकै के होगा ||

करल्यो जिन्दे जी सेवा या अच्छी क़िस्मत थारी सै
आशीर्वाद मिले दिल तै जो बेटा आज्ञाकारी सै
खुद अपनी सन्तान भला ना लागे किसने प्यारी सै
कोए अमर ना रहया जगत मैं आखिर सब की बारी सै
ज्ञानी राम दो हर्फी कह दी ढोल बजा कै के होगा ||

​

gajab ki rachna le ke aaye rana g......
 
मैं छोरा जाट (16x2=8) का

तू हूर
-परी स दिल्ली की मैं छोरा जाट का ,
तू मखमल के गदे पे सोवे मैं लू सुवाद खाट का
,

कार
,स्कूटी में तेरा आना जाना तो के होया,
मैं राखु सु मैडम बुलेट मोडल
2004 का,

तेरे पाछे घने आशिक स तो के होया
,
छोरी मने देख के कह स
.. हाय यो छोरा जाट का

बात सुन
-- तेरी तरिया मने घमंड करना नहीं आवे,
नहीं ते मैं बी मालिक सु किले नहरी
60 का
 
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