माहरा हरयाणा ( हरयाणवी कविताये, रचनाये,गीत 

Jatland Ke Kware Bhaiya Khatir (Sunil Nain)

Aaj Ka Behya

आच्छा समय गया पर दिल मं असर उ
'की परछाइयाँ का
घणा नहीं पर ज़िकर करूँ दो चार रसम मनभाईयां का


पहल्यां देखैं
, फेर पक्की, फेर गोद भरण नै जावैं सै
देखैं बाट पडोसी कित वो खूग्या दौर सगाईयाँ का


बान बैठ बनवाड़े खाते मटना रगड़ न्हवाया करती

इब डेंट-पेंट कर नक्शा बदलैं
'पार्लर' ब्याहले भाईयाँ का

ब्याह तै पहल्यां बीस रोज
, ज्यब गीत लुगाई गाया करती
इब कार्ड पै छपता डीजे संग
'लेड़ीज संगीत' लुगाइयां का

ब्याह मं म्हिन्या पहल्यां आकै बुआ-बहाण रंग लाया करती

इब होटल म्हां तै मुड़ ज्यां पैर पडे ना घर माँ-जाईयाँ का


इब छोरे के ब्याह मं भी घलता कन्यादान
'रिशैपशन' पै
लाडडू ज्यब दिखण दें सै ज्यब आले नेग बधाईयाँ का


लोटा लेकै गरम दूध का बहू चौबारे जाया करती

इब अगले दिन जां शिमला सर पै क़र्ज़ खड्या हलवाईयां का


सात जनम के बंधन मं बंध धरम की डगर चल्या करते

इब कर कै शक लें जूत बजा फेर चालै दौर गव्हाईयां का


पैसा-मस्ती-मौज सोच या खागी सब संस्कारां नै

आछा-भला बखत था म्हारी दादी
, माँ और ताइयां का

योए सोच कै तै मैं ब्याह ना करवाता
तू के सोचै सै मेरा रिश्ता ना आता ?

आजकाल छोरा तै फालतू छोरी मारै सुट्टे

इनका मोडरनपणा देख कै म्हारे दिदे फुट्टे

पहल्या छोरी आले ढूंढया करते काबिल छोरा

आज काल का काम तै उल्टा होरा

आज सुथरे छोरे खिण्डे खिण्डे हाण्डै सै

कित खूगी छोरियां की शरम योए बाण्डै सै
 
मैं अकेला क्यूकर कसूरवार होया

मैं अकेला बता क्यूकर कसूरवार होया
ऐसी तैसी दोनों की हुई तो प्यार होया

तेरे ना यकीन आवे तो के ज्यान दे दूं
तेरी जुदाई में मेरे कितणा बुखार होया

वो नींदा में भी कुछ कुछ बड़बड़ावे सै
चालू अर झूठा जिसका दिलदार होया

मैंने तो सपने में भी हवालात दिखे सै
तेरा बाप जिस दिन तै थानेदार होया

ब्याह के बाद भी हाथ पैर चलाणे पड़ेंगे
कोर्ट मैरिज होगी तो ना सोच पार होया

कोए देख ना ले मैंने आंख्या में बस्या
शायद तू आजकल न्यू चश्मेदार होया
 
ताल मिलाणा सीख

जै तूं सुख तै रहणा चाहवै, अपणे भीतर जाणा सीख
परम आत्मा के सुर गेल्यां, अपणी ताल मिलाणा सीख

माया-काया के मोह मं फंस, आगी ज्यान झमेले मं
निभा गृहस्थी-धरम करम से सन्यासी बन जाणा सीख

बिन सोचे समझे बक दे सै, जो तेरे मन मं आज्या
ओछी मंदी कह बैठै तै कह कै कुछ शरमाणा सीख

झूठी चुगली-चांटी कर कै, मगन रहे जा मन तेरा
... चला विषैले तीर जुबाँ के, कदे-कदे शर्माणा सीख

दो धेले के गीत कविता, लूटैन्गे वाहवाही खूब
सुथरे-सुथरे अक्षरा की तू माला बनानी सीख
 
ध्यान धरण दे

मन्नै थोडा ध्यान धरण दे
यो भवसागर पार करण दे

लोभ स्वार्थ छल बेइमाना
आज सभी नै साथ मरण दे

मेरी आत्मा की नजरां मं
ईब और ना घणा गिरण दे

सदा पाप के घिरते आये
... मेघ धरम के बी बरसण दे

तार बगा नफरत का चश्मा
प्रीत नजर नै बी निरखण दे
 
याद आगया म्हारा गाम -किसरेंटी (केसर गढ़) रोहतक

हाय रे शहर में रहना पानी में अडंगा बहना
भाग दोड़ में कटज्या जिंदगी मिलता ना आराम
बिस्तर के महा पड़े पड़े के याद आगया म्हारा गाम

म्हारे बचपन के दिन थे बड़े निराले

कच्छे पहरा थे हम नाडा आले

खावा थे जामन काले काले

पेड़ा के लरजे थे डाले

दोफारा में हांडा करते लागे था ना घाम

बिस्तर के महा पड़े पड़े के याद आगया म्हारा गाम

खेता के म्हा हम जाया करते

हूड खेल कबड्डी हम नहाया करते

कचरे तोड़ के लाया करते

फोड़ फोड़ के खाया करते

उलटे घरने आया करते होजाती जब शाम

बिस्तर के महा पड़े पड़े के याद आगया म्हारा गाम

रोटी खाके बतलाया करते

फेर कठे होके हम जाया करते

घडवे ठा ठा लाया करते

गाया और बजाया करते

अपना दिल बहलाया करते लागे था ना दाम

बिस्तर के महा पड़े पड़े के याद आगया म्हारा गाम

मेहनत करके जो भी खावेगा

सबके मन में वो बस जावेगा

देवरखाने में जावेगा

परमात्मा भी मिल जावेगा

भगति के म्हा रस पावेगा भला करे तेरा राम

बिस्तर के महा पड़े पड़े के याद आगया म्हारा गाम

 
बहुत ही बढ़िया भाई मनीष, गाम के बचपन याद दुआ दी |
 
मेरे दिल का हाल तू भी करकै फील देखले
पत्थर जै मारया सै
,त लरज़ती झील देखले

बेशक बनै ना हमराही जिंदगी के सफ़र में

मेरे साथ चल्कै नै तू कुछ मील देखले


आवै सै जब साल नया कलेंडर बदल ज्यां सै

गडी रहज्या जो भीत में वा कील देखले


मौसम सै पीण का और दारू भी धरी सै

किस बात की सै साक़ी इब ढील देखले


उलझ्या ना करता और कितै छोरा जाट का

मेरी करदी फ़ैल तनै सब दलील देखले


 
इस कविता के लेखक है "ज्ञानी राम शःत्री " जी है , इनका जनम जींद जिले के अलेवा गाव् में हुआ , इन्होने अनेक हरयाणवी रचनाये लिखी ...कहीं ये कविता पढ़ी थी अच्छी लगी तो यहाँ लिख रही हूँ ......

उथल पुथल मचगी दुनिया माह , निर्धन लोग तबाह होगये
कोए चीज़ न सस्ती मिलती, सबके उच्चे भा होगये
असली चीज़ न मिले टोही , सब मा नकलीपन आग्या
बिना मिलावट चेंण पड़े ना ,सब का पापी मन होगया
दिन धोली ले तार आबरु ,जिसके धोरे धनं होगया
निर्धन मरजा तड़प तड़प के, इतना घोर बिघन होगया
इज्ज़तदार मरें भूखे ,बदमाश लफंगे शाह होगे
बेरोजगारी की हद होगी, पढ़े लिखे बेकार फिरें
धर्म के ठेकेदार बी ,भुंडी ते भुंडी कार करें
कई जनया के कोठी बंगले ,लाइन लाग रही कारां की
सडरक पे पड़े कई ,लाठी बाज रही चौकिदारा की
खाली जून टल्ले भूख्या की ,निर्धन लोग बेचारायाँ की उथल पुथल मचगी दुनिया माह , निर्धन लोग तबाह होगये !!
 
माँ .............के नाम

थोड़े
से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने
नो महीने तू रहा कोख में मन्ने बोझा भी न ठाया था
सारा कुनबा ख़ुशी मनावे जब तू घरने आया था
तेरी दादी ने बजाई थाली सारा गाम जगाया था
गीत बाकली छटी पे तेरे कुवे पे ढोल बजाया था
बगाया था तेरी उम्र की खातिर उड़े मुट्ठी भर कै नाज मने
थोड़े से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने

सारी सारी रात जाग के मैं तन्ने सुवाया करती थी
जब तू भूखा होके रोया छाति के लाया करती थी
तेरी मीठी मीठी सुन के बोली मैं खुश हो जाया करती थी
दोनु हाथ पकड़ के तेरे मैं तने चलाया करती थी
तेरी गैला जाया करती थी लिया गोदी के महा भाज मने
थोड़े से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने

जब तू पढ़न जाया करता मन्ने नूहा धुहा कै तयार करा
तेरे काम का एक एक सोदा संघवा संघवा कै मन्ने धरा
हे माँ हे माँ कह रुक्के मारे ना मेरे बिना भी तन्ने सरा
तेरे दुःख मैं रोई और सुख मैं हसी जी ते ज्यादा प्यार करा
कोण सा वो अपराध करा जो भुंडी लागी आज तने
थोड़े से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने

पढ़ लिख कै तू लगा नौकरी प्रसाद बात कै आई थी
रिश्ते आले चक्कर काटे तेरी करदी ब्याह सगाई थी
सारा गाम जिमाया हमने जब नयी भोडिया आई थी
तेरे छोरे नै ले हांडा करती तेरी छोरी मन्ने खिलाई थी
एक एक बात बताई थी दिया सारा घर का राज मने
थोड़े से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने

आया बुढ़ापा सब करतब हारे इब चला भी न जावे सै

न्यारी खाट बिछादी मेरी कोई धोरे भी ना आवे सै
उलटे सीधे तेरे बालक बोले तेरी बहु मन्ने धमकावे सै
जब जब तू भी छो मै बोल्या मेरा लिकड़ कालजा जावे सै
मरी मरी भी बोल पडूँगी दिए इन्द्रजीत आवाज़ मने
थोड़े से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने
 
आया बुढ़ापा सब करतब हारे इब चला भी न जावे सै
न्यारी खाट बिछादी मेरी कोई धोरे भी ना आवे सै
उलटे सीधे तेरे बालक बोले तेरी बहु मन्ने धमकावे सै
जब जब तू भी छो मै बोल्या मेरा लिकड़ कालजा जावे सै
मरी मरी भी बोल पडूँगी दिए इन्द्रजीत आवाज़ मने
थोड़े से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने


वाह-वाह भोत खूब ,बधाई , इन्दर जीत जी को इस प्यारी और सुदर रचना के लिए जो इतने स्टिक ढंग से एक माँ के दिल का हाल बखान कर रही हे |
 
धरती माँ........

दुष्टां का बोझा ठारी सै
धरती माँ की लाचारी सै

वो माणस हो सै दुःख-देवा
जिसने शर्म लिहाज तारी सै

दुष्ट पूत की खातिर बी माँ
सीले पाणी की झारी सै

रोगां नै आ डेरा लाया
... जैसे काया सरकारी सै

धर्मकथा, सत्संग मं जा कै
देख्या,स्याहमी व्यापारी सै

जिसका नहीं इलाज किसे पै
वा पैसे की बीमारी सै

तन मन बुद्धि घिरे जाल मं
बस याहे दुनियादारी सै
 
एक खूबसूरत रचना.... लेखक "नरेंदर अत्री" दुवारा

हर सुर कै म्हां गीत प्यार का गाणा आवै सै
टेढ़े आंगण कै म्हां बी पाँ ठाणा आवै सै

पागल होज्याँ, आतमहत्या, करलें दुःख मं लोग
सबर जबर संग गम वो हमनै खाणा आवै सै

संस्कारां तै समझौता ना करती दुष्ट जमीर
ना हमनै बी साली का सूट सिमाणा आवै सै

ठगी, फरेबी के मौसम मं रहगे क्यूँ पाछै
... एक-आधा तै हमनै बी बहकाणा आवै सै

लाख सफाई दी पर उसका शक तै ना भाज्या
मिटग्या मेरा भ्रम कि जिगर दिखाणा आवै सै

दया-धरम की राही पै जो चाल्लैं सें, उननैं
धन तै न्यारा सब कुछ और कमाणा आवै सै

रूप खुदा का सै वो जिसनै, दुखी, दब्या, दुत्काऱ्या
आंसू पोंछ प्यार तै गल कै लाणा आवै सै
 
माँ .............के नाम

थोड़े
से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने
नो महीने तू रहा कोख में मन्ने बोझा भी न ठाया था
सारा कुनबा ख़ुशी मनावे जब तू घरने आया था
तेरी दादी ने बजाई थाली सारा गाम जगाया था
गीत बाकली छटी पे तेरे कुवे पे ढोल बजाया था
बगाया था तेरी उम्र की खातिर उड़े मुट्ठी भर कै नाज मने
थोड़े से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने

सारी सारी रात जाग के मैं तन्ने सुवाया करती थी
जब तू भूखा होके रोया छाति के लाया करती थी
तेरी मीठी मीठी सुन के बोली मैं खुश हो जाया करती थी
दोनु हाथ पकड़ के तेरे मैं तने चलाया करती थी
तेरी गैला जाया करती थी लिया गोदी के महा भाज मने
थोड़े से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने

जब तू पढ़न जाया करता मन्ने नूहा धुहा कै तयार करा
तेरे काम का एक एक सोदा संघवा संघवा कै मन्ने धरा
हे माँ हे माँ कह रुक्के मारे ना मेरे बिना भी तन्ने सरा
तेरे दुःख मैं रोई और सुख मैं हसी जी ते ज्यादा प्यार करा
कोण सा वो अपराध करा जो भुंडी लागी आज तने
थोड़े से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने

पढ़ लिख कै तू लगा नौकरी प्रसाद बात कै आई थी
रिश्ते आले चक्कर काटे तेरी करदी ब्याह सगाई थी
सारा गाम जिमाया हमने जब नयी भोडिया आई थी
तेरे छोरे नै ले हांडा करती तेरी छोरी मन्ने खिलाई थी
एक एक बात बताई थी दिया सारा घर का राज मने
थोड़े से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने

आया बुढ़ापा सब करतब हारे इब चला भी न जावे सै

न्यारी खाट बिछादी मेरी कोई धोरे भी ना आवे सै
उलटे सीधे तेरे बालक बोले तेरी बहु मन्ने धमकावे सै
जब जब तू भी छो मै बोल्या मेरा लिकड़ कालजा जावे सै
मरी मरी भी बोल पडूँगी दिए इन्द्रजीत आवाज़ मने
थोड़े से दिन बाकी रहगे मत बिसरावे आज मने
दो सब्द प्यार के बोल दिया कर न चाहिए घर का राज मने

बहुत ही यथार्थिक एवं मार्मिक कविता छापी है भाई मनीष | इंदरजीत जी को मेरा सलूट |
 
जरूरतhttp://inderjeetgulia-haryanvimasala.blogspot.in/2011/07/blog-post.html
हमने थारी थमने म्हारी

जरूरत पड़ती ए रह्वेगी

भैंसा ने झोड़ की

जाडा में सोड की

गाड़िया ने रोड की

और माड़े ने मरोड़ की

जरूरत पड़ती ए रह्वेगी


लुगाइया ने
बाता की
मास्टर
की लाता की
चुमासे में
छाता की
और
बानिये ने खाता की
जरूरत पड़ती ए रह्वेगी


छोरा
ने छोरी की
चोर
ने तिजोरी की
किसान
ने बोरी की
और
बालक ने माँ की लोरी की
जरूरत पड़ती ए रह्वेगी


बानिये ने
व्यापार की
बारिश की फुहार की

भैंसा ने न्यार की

और मन्ने थारे प्यार की

जरूरत पड़ती ए रह्वेगी
 
श्रृंगार-रस का एक गीत" (लेखक "नरेंदर अत्री")


रूप-चांदणा खिल्या भरया यूँ दिल मं उजियारा
पणवासी का चाँद उतर ज्यूँ धरती पै आरह्या

गौरी नै ज्यब घूंघट ठाया हांगा-सा कर कै
रूप गजब का लग्या झूमने मस्ती मं भरकै
घूंघट मं भटकै था बाहर लिकड़न का मारया
पणवासी का चाँद उतर ज्यूँ धरती पै आरह्या

... अपणे मन तै कहरया था मैं कर ले जरा समाई
पर यो बैरी हुस्नपरी की दूणी करै बड़ाई
देख मेरी हालत गौरी का चेहरा शरमा रह्या
पणवासी का चाँद उतर ज्यूँ धरती पै आरह्या

देखी दुनिया घूम, रूप यो हट कै दुनिया तै
सुन्दर खूब बणाई 'उसनै' दुनिया, पर याह तै
ठाली बैठ घडी सै लेकै जादू की गारया
पणवासी का चाँद उतर ज्यूँ धरती पै आरह्या

अर्जी हर के दर पै, जै मंजूरी मिलज्या तै
म्हारै आँगण चाँद सदा खातिर योह खिलज्या तै
रूप तेरा जग तै न्यारा, हो भाग मेरा न्यारा
पणवासी का चाँद उतर ज्यूँ धरती पै आरह्या

रूप, जवानी, जिंदगानी, सब दो दिन की हों सें
फिर भी बुद्धि समझै ना, य़ोह किसा गजब मोह सै
सारा ज्ञान 'नरेन्द्र' का सुन्दरता से हारया
पणवासी का चाँद उतर ज्यूँ धरती पै आरह्या
 
जेठ की दुपहरी

जेठ
की दुपहरी कसुता घाम था
पड़ा
चौबारे में कर रहा आराम थारेडिओ पे रागनी बजा रहा था
गेल
गेल खुद भी गा रहा था
बिजली चली गयी मेरा जी फुकग्या

छत
का पंखा लुढ़क लुढ़क के रुकग्या
फेर मेरे बीडी की याद आई
बण्डल
देखा तो वे भी टूटी हुयी पाई
दुखी
होगया था पड़ा पड़ा

फेर बीडी
लेन दुकान पे चाल पड़ा
गाल
कती सुनी पड़ी थी
किते ट्राली किते बुग्गी कड़ी थी

मैं अपनी मस्ती में जा रहा था


अर गुलाबो आली रागनी गा रहा था

पीछे ते किसे ने आवाज मारी

मन्ने देखा गोबर में हाथ सांधे
खड़ी थी दुलारी
मैं बोला हा बोल के काम से


नु
बोली हाडे आजा ने कितना कसुता घाम से
मैं
सर पे गेर रहा था तोलिया
व
अपने घेर में बडगी मैं भी पाछे पाछे हो लिया
मन्ने
कही इब तो बतादे

वा बोली मेरा
ओढना संघवा दे
मैं ओढना
संघवान लाग्या
अर
गलती ते मेरा हाथ उसके लाग्या
वा तो
रोण लाग्गी

इतने
में उसकी भाभी आगी
वे दोनु मेरे ते लड़न लाग्गी
मेरी
आंख आगे अँधेरी सी छागी

मैं बोला मन्ने
माफ़ कर दो
और
इस मामले ने हाडे ए साफ कर दो
वे बोली तेरा इलाज बंधवाना पड़ेगा
के तो
म्हारा काम कर ना तो तू पिटवाना पड़ेगा

मैं बोला
जो कहोगी वो करूँगा
कहो तो
थारा पानी भी भरूँगा
वे बोली ठीक से या बात किसे ते ना बताइए
और
यो गोबर पड़ा से सारे ने पाथ के जाइये

मैं
बाजु संघवा के लाग्या
दो
घंटे घाम में गोबर पाथा फेर लिकड़ के भाग्या
इब जब भी दुलारी दिखे से मैं रास्ता बदल जाऊ सु
कड़े
फेर वो हे काम बने पहला हे टल जाऊ सु

Wt an idea sir ji, kasuta ae se!!!
Hahahaha...
 
पहल्या आल्ले नाम...

ज्ञानी सूबे रामफल सवाई होया करते

पहल्या आल्ले नाम भी हाई होया करते

और हर नाम क पीछे एक कारण होया करता

गाम राम के खातर जो उदाहरन होया करता

धोरे जिसके धेला कोन्या
,, नाम किरोड़ी पाता
किताब सिंह भी उन दिना कदे स्कूल नहीं जाता

बड़े भाई क लट्ठ मरता..लछमन सिंह आवारा

शक्ल में जिसके बारा बजरे
, कहते उसने प्यारा

हाथी बरगी देई ले रह्य ,, नाम माडा राम
सही राम के पाया करते सदा ए गलत काम


जिंदगी भर दुःख पाए सुखिया अर खुसीराम

कुते त डर जावे था
, शेरा जिसका नाम

अर दोनु हाथा दान करे
, ताऊ मांगे राम
आये गये का मान करे
,, झगडू जिसका नाम
 
कड्यै गऐ बचपन के मित्र.
पाटी कच्छी टुटे लित्र.
मैस्सयां गेल्यां गऐ जोहड पै
काडी कच्छी बडगे भित्तर
माचिस के तांश बणाया करदे
नदी पै खेलण जाया करदे
घर तै लुकमा बेच कै दाणे
खा गे खुरमे खिल्ल मखाणे
मिस्री तै मिठे होया करदे
खिल्लां तै फ़िक्के होगे
वँ यार पुराणे रै
बेरा ना कित्त खोगे
बेरा ना कित्त खोगे

पकड लिये फेर स्कूल के रस्ते
हाथ मै तख्ती कांथ बस्ते
गरमी गई फेर आ गया पाला
एक दिन नहा लिऐ एक दिन टाला
पैंट ओर बुरसट मिलगी ताजी
एक दो दिन गए राजी राजी
हाथ जोड फेर रोवण लागे
आज आज घर पै रहण दैयो मां जी
आखयां मै आंसु आए ना
हाम्म थुक लगा कै रोगे
वँ यार पुराणे रै बेरा ना कित्त खो गे
बेरा ना कित्त खो गे

कालज मै फेर होग्या अडमिस्न
बाहर जाण की थी परमिस्न
रोडवेज मै जाया करदे
नकली पास कटाया करदे
बीस रपुली करकै कट्ठी
ले लिया करदे चा ओर मठी
स्पलैंडर पै मारे गेडे
सैट करली थी दो दो पट्ठी
मास्टर पाठ पठाया करदा
आंख मिच कै सोगे
वँ यार पुराणे रै बेरा ना कित्त खौ गे
बेरा ना कित्त खो गे

वक्त गेल गऐ बदल नजारे
बिखर गऐ सब न्यारे न्यारे
घरां पडया कोए करै नोकरी
घरक्यां नै करी पस्नद छोकरी
शादी करली बणगे पापा
कापी छोडी लिया लफाफा
रोऐ जा सै दिल मरज्याणा
भुल गऐ क्यु टैम पुराणा
"Karam Dhull" याद करै
क्यु बीज बिघन के बो गो
वँ यार पुराणे रै
बेरा ना कित्त खो गे
बेरा ना कित्त खौ गे
​
 
कड्यै गऐ बचपन के मित्र.
पाटी कच्छी टुटे लित्र.
मैस्सयां गेल्यां गऐ जोहड पै
काडी कच्छी बडगे भित्तर
माचिस के तांश बणाया करदे
नदी पै खेलण जाया करदे
घर तै लुकमा बेच कै दाणे
खा गे खुरमे खिल्ल मखाणे
मिस्री तै मिठे होया करदे
खिल्लां तै फ़िक्के होगे
वँ यार पुराणे रै
बेरा ना कित्त खोगे
बेरा ना कित्त खोगे

पकड लिये फेर स्कूल के रस्ते
हाथ मै तख्ती कांथ बस्ते
गरमी गई फेर आ गया पाला
एक दिन नहा लिऐ एक दिन टाला
पैंट ओर बुरसट मिलगी ताजी
एक दो दिन गए राजी राजी
हाथ जोड फेर रोवण लागे
आज आज घर पै रहण दैयो मां जी
आखयां मै आंसु आए ना
हाम्म थुक लगा कै रोगे
वँ यार पुराणे रै बेरा ना कित्त खो गे
बेरा ना कित्त खो गे

कालज मै फेर होग्या अडमिस्न
बाहर जाण की थी परमिस्न
रोडवेज मै जाया करदे
नकली पास कटाया करदे
बीस रपुली करकै कट्ठी
ले लिया करदे चा ओर मठी
स्पलैंडर पै मारे गेडे
सैट करली थी दो दो पट्ठी
मास्टर पाठ पठाया करदा
आंख मिच कै सोगे
वँ यार पुराणे रै बेरा ना कित्त खौ गे
बेरा ना कित्त खो गे

वक्त गेल गऐ बदल नजारे
बिखर गऐ सब न्यारे न्यारे
घरां पडया कोए करै नोकरी
घरक्यां नै करी पस्नद छोकरी
शादी करली बणगे पापा
कापी छोडी लिया लफाफा
रोऐ जा सै दिल मरज्याणा
भुल गऐ क्यु टैम पुराणा
"Karam Dhull" याद करै
क्यु बीज बिघन के बो गो
वँ यार पुराणे रै
बेरा ना कित्त खो गे
बेरा ना कित्त खौ गे
​


Bahut hee sunder, Maan ko chhulene wali kavit, Mubaark ho Dost AAp Ko.
 
[h=6]"मी बरसया"[/h][h=6]"काली घटा उमड़ती आवे ,
दिन मैं होगी रात जणू
रूसी सजनी , भी सजन तेन ,
सोचे कर्लयुं बात जणू
बूँद पड़ी सारा छो धू गया ,
आज कसूता मी बरस्य
गित्वाड़े मेंगोस्से भीजे ,
इंधन आल्ला न्यारा होगया
रोटी पौन , आग बले न ,
चूले ऊपर खड़ा होगया
पानी देख पर भूख भाज रही ,
आज कसूता मी बरसया
पसु पखेरू नाच उठे सब ,
पानी अमृत सा लाग्या
जोहड़ के मा तीरें बाचड़े,
महसा के भी जी -सा आगया
कुए भर गे , पनघट सज गया
आज कसूता मी बरसया"
[/h]
 
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