जवानी में नहीं तो फिर कब करेंगे:

phoolkumar

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जवानी में नहीं तो फिर कब करेंगे:

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अंधी आधुनिकता, आर्य-समाज की अनुपस्थिति से पैदा हुई आध्यात्म तप और चिन्तन की रिक्तता, दूसरों (पड़ोसियों, सहकर्मियों, सहपाठियों, सहविचरणियों ) से बड़ा दिखने या बराबर का बनने की अस्थाई चंचलता और समाज में किसी कालजयी प्रेरणादायक सामाजिक सभ्यता के स्तंभ की अनुपस्थिति का हरियाणा के ग्रामीण आंचल में ईतना दुष्प्रभाव हो चुका है कि अबोध युवा-पीढ़ी (12 से 18 साल तक खासकर) नें अपने अनैतिक कार्यों की वैधता के लिए एक नया तकिया-कलाम गढ़ लिया है कि "जवानी में नहीं करेंगे तो कब करेंगे?" और यह तकिया कलाम बनाया गया है इन चीजों के लिए:

1) जवानी में नशा नहीं करेंगे तो फिर कब करेंगे?
2) इसी उम्र में आशिकी नहीं मारेंगे तो फिर कब मारेंगे (यहाँ अमर्यादित व् असामाजिक आशिकी का चलन ज्यादा निकल पड़ा है)|

यह तकिया-कलाम दुर्भाग्य से जिन चीजों के लिए होना चाहिए था उनके लिए नहीं हुआ, जैसे कि इस उम्र में अबोध जवानी की अवस्था में तप करना नहीं सीखेंगे तो कब सीखेंगे, शारीरिक इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना अब नहीं सीखेंगे तो कब सीखेंगे, जीवन के ध्येय (career) की जड़ें अभी से नहीं सींचेंगे तो फिर वह पेड़ कब बनेगा (जिसके लिए पढाई से ले, शारीरिक अनुशासन में स्वयं को ढालना होता है)| परन्तु काल की अवनति ऐसी पसर चुकी है कि ग्रामीण आँचल नें जैसे दूर की कौड़ी के युवा बनाने ही बंद कर दिए हों| किसी इक्का-दुक्का को छोड़ कर, सारे गरम पानी में उठते बुलबुले की भांति उछल के जब उपरी शीतलता को छूते हैं तो वापिस उसी पानी में समां जाते हैं|

आखिर इन पहलुओं पर समाज में खुल-कर चिंतन क्यों नहीं हो रहा? गावों के बुजुर्ग तो इतने निर्जीव और आशाहीन हो गए हैं कि वो घुण के साथ चना पीसने लग गए हैं अर्थात गाँव के शरीफ और शालीन बच्चों को भी शरारती-तत्वों की श्रेणी में खड़ा कर तोलने लग गए हैं| एक बुजुर्ग से गाँव में बच्चों के लिए एक सुविधा-संपन खेल-क्रीडा केंद्र बनाने की बात कही तो उलाहना देने लगे कि क्या लाभ इनमें से अधिकतर तो जार बन चुके हैं, इनके लिए सुविधाएँ बना भी दी तो सारी मेहनत को जारी में खो देंगे?

जारी का जब उन्होंने प्रश्न उठाया तो मैंने पूछा कि जारी को तो आजकल आशिकी कहते हैं, तो भड़कते हुए बोले की आशिकी जैसी पाक चीज को जारी का चोला पहना कलंकित मत करो, बेटा| वो भावनाओं में बहते हुए कहने लगे कि तुम्हें क्या लगता है कि तुम्हारी (लेखक की) पीढ़ी नें ही आशिकी सिखाई है दुनिया को? हम लोग क्या जानवर थे कि एक असभ्य जानवर समाज की भांति जिससे चाहा सम्भोग किया और तुम (लेखक) पैदा हो गए? (लेखक एक पल को तो अचम्भे में पड़ गया कि ऐसे भोले से इंसान को जिसको कि आज के तथाकथिक NGO चलित जमाने नें प्यार के दुश्मन करार दे दिया है उनके अंदर प्यार को ले के इतना दर्द?)

मर्म के स्पर्श से उदरित उस बुजुर्ग नें आगे कहना जारी रखा और कहने लगे बेटा मुझे एक बात बताओ, तुम तो एक कृषक समाज में जन्मे हो हर चीज अपनी आँखों से देखी है, क्या गाँव का सरकारी सांड हल में उतना लम्बा चल सकता है जितनी देर कि एक उन्ना बनाया हुआ बैल? मैंने जब पूछा कि उन्ना क्या होता है तो वो बोले कि जिस बैल की वीर्यपात की रग को कुंध (यानी बंद) कर दिया जाए उस बैल को उन्ना बैल कहते हैं| और जब तक बैल को उन्ना नहीं बनाया जाता वो हल में घंटो, दिन-रातों जुत के हल को नहीं खींच सकता| वो बोले कि गोह्के (बछड़े-सांड) में इतनी उत्तेजना होती है कि अगर उनको उन्ना ना बनाया जाये तो वो हल में जुतें ही नहीं अपितु उत्तेजना-वश इतने उछलें कि वो हल की फाल को खुद अपने ही पैरों में मरवा बैठें| इस पर मैंने पूछा कि भैसों को तो कभी उन्ना नहीं बनाया जाता; तो कहने लगे कि तो फिर भैंसे कहाँ हल में जोते जाते हैं?

तो वो इस उदहारण से बात जोड़ते हुए आगे कहते हैं कि जिस तरीके से खेतों में पिलने के लिए एक बैल के वीर्य का पात बंद किया जाता है तो वो लम्बा चलता है, उसी तरह खेती करने की इच्छा वाले या खेती में कारोबार करने वाले इंसान के लिए भी अति-अनिवार्य है कि वो इस वीर्य का जितना हो सके उतना संचय करे अन्यथा खेती में तो मन-वांछित लाभ होगा ही नहीं साथ ही चारित्रिक पतन, आलस, इर्ष्या भी इंसान में घर कर लेती है| और इसीलिए तो पुराने जमाने में गावों में जब भी नौटंकियाँ आती थी उनमें बच्चों को नहीं जाने दिया जाता था| क्योंकि इन नौटंकियों में जो कामुक नृत्य होते थे उनसे शारीरिक नियन्त्रण विच्छेदित हो जाता था, क्योंकि अबोध-जवानी की उम्र वृक्ष की टहनी पर झूल रहे पत्ते की तरह होती है कि जिधर की भी हवा का झोंका आया उधर ही बह निकला| और मैं माथा पकड़ सोचने लगा कि तो यह कारण होता था मेरे दादा जी की हर उस ना के पीछे जिसमें मैं उनसे नौटंकी देखने जाने की जिद्द किया करता था और वो मुझे डांट देते थे|

मैंने आगे पूछा कि आप उलाहने वाली मुद्रा में कह रहे थे कि आशिकी क्या तुमनें ही सिखाई है दुनिया को? तो वह मूछों पर तांव देते हुक्के की गुड़गुड़ाहट लेते हुए ऐसे रोमांचित हुए जैसे रेगिस्तान की लू में सिसकते पौधे पर किसी नें पानी डाल दिया हो और रौब में आते हुए कहने लगे कि क्या तुम आज के जमानें में किसी गली जाती महिला की पीठ पर भाग के चढ़ सकते हो? मेरा अकस्मात विनय फूटा कि क्या आपको मेरी पीठ तुड्वानी है या मुझे जेल भिजवाना है? तो वो बोले कि ये देख लो तुम्हारे तथाकथित आधुनिक किन्तु सुरक्षा, सहनशीलता और निश्छलता से रहित जमाने की सच्चाई| फिर उन्होंने विजयी मुद्रा बनाते हुए कहा कि तेरे दादा इतने नौशिखिये होते थे कि गाँव की गली में चलती किसी भी औरत की पीठ पे जा चढ़ते थे और उल्लास का आलम ये होता था कि कोई बुरा नहीं मानती थी, ना कोई उलाहना होता था और वासना तो लेषमात्र भी नहीं| एक बात याद रखना बेटा जहां वासना हुई वहाँ आशिकी और प्यार नहीं होता| और आज की कच्ची उम्र से ही आशिकी में पड़ने वाली अधिकतर पीढ़ी आशिकी की चरम-प्रकाष्ठा के मार्ग में पड़ने वाली वासना के सागर को ही पार नहीं कर पाती तो आशिकी क्या ख़ाक करेंगे?

खेतों-खलिहानों में काम करते हुए, तीज-त्योहारों में अल्हड़ और मस्तियाँ करते हुए तेरे ही गाँव के कितने अनगिनत किस्से सुनाऊं जिनमें सिर्फ और सिर्फ आशिकी और प्यार हुआ करता था वासना तिल के दाने के बराबर भी नहीं| तुम युवा वर्ग ही देख लो आज के दिन, तेरी कितनी ऐसी भाभियों के पति यानी तेरे भाई हैं जो अपनी बीवियों को होली-फाग के दिन फाग खेलने देते हैं? कितने ऐसे हैं जो उनपे रंग डालने देते हैं? मैंने कहा कि सिर्फ 4-5 भाभियों के साथ खेलता हूँ, तो कहने लगे और गाँव में भाभियाँ कितनी हैं तेरी? तो मैंने उत्तर दिया सैंकड़ों में|

तो बुजुर्ग जैसे फूट पड़ा और झाड़ने लगा कि यही वो आधुनिकता है क्या जिसका चोला ओढ़े फिरते हो और समाज में आशिकी के पैरोकार बने फिरते हो? अरे हमारे जमाने में 4-5 तो वो होती थी जिनको कि देवर इतनी नैतिकता से मजबूर कर देते थे कि उनको कोरडा ले घरों से मैदान में उतरना ही पड़ता था होली खेलने को, और तुम अपने आप आपको आशिकी-प्यार के धनी कहते हो| जाओ बेटा जाओ और ढूंढ के लाओ उन घरों की चार-दीवारियों में जा सिकुड़े प्यार और खुलेपने को|

बेटा एक बात तो जरूर सीख ले आज इस बुजुर्ग से कि तुम लोग कम कपड़ों के पहनावे की आशिकी के पैरोकार हो और हम दिलों और अंतरात्मा की आशिकी के पैरोकार होते थे| तुम्हारी आशिकी तो कम कपड़ों में ही औरतों को देख नालों में बह निकलती है, जबकि हमारी आशिकी नालों में नहीं दिलों में बहती थी बेटा| मैं तो ऐसा जवाब सुन के भोंचक्का रह गया, कितनी बड़ी मील के पत्थर की बात कह दी इन बुजुर्ग ने|

अरे बेटा आज के जमाने में लोग आशिकी और नौशिखियेपन के जितने कंगाल हुए इतने मैंने कभी नहीं देखे| वो आगे कहते हैं कि क्या तुम आज के दिन अपनी बहन-बहु-बेटियों को गाँव के कुँए-जोहड़ों पे स्नान के लिए भेज सकते हो? मैंने चिंतित होते हुए कहा कि भेजना अरे मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता| तो वो कहते हैं जरा याद करो आज से 15-20 साल पहले कार्तिक के महीनों में कार्तिक स्नान के लिए गाँव-के-कुँए-जोहड़ों पर टोलियों में जाती बहु-बेटियों की स्वर-लहरियाँ| और एक पल को तो मैं भी गौरवान्वित हो ऊठा क्योंकि वो बचपन में सुनी लहरें आज भी मेरे जहन में कोंधती हुई सी दिखाई दी| मुझे सब स्मरण हो उठा कि कैसे सुव्यवस्थित तरीके से हर चीज होती थी और आदर, सम्मान और सयंम की तो ऐसी प्रकाष्ठा होती थी कि मर्द उन कुँए-जोहड़ों की तरफ जाने से कतराते थे जिधर बहु-बेटियाँ कार्तिक स्नान कर रही होती थी|

फिर वो कहने लगे कि कृषि का कारोबार ही ऐसा है कि इसमें मानसिक के साथ-साथ शारीरिक सुदृढ़ता जरूरी होती आई जो आज की अंधी आधुनिकता में बही जा रही पीढ़ी समझना ही नहीं चाहती| अरे बेटा नया मकान भी जब बनाया जाता है तो उसको तराई-लिपाई-धुप सिंकाई करके और उसके नीचे एक सुदृढ़ नींव कूट-कूट के जमा के ही तो मकान में रहने के लिए प्रवेश किया जाता है? और यही कहानी इस शरीर रुपी मकान की है|

लेकिन आज के जमाने के तथाकथित अंधों में काणे राजों जैसे कुछ चुनिन्दा NGOs और communal संगठन तो इतने धैर्यहीन और उतावले दीखते हैं जैसे समाज से इंसान और जानवर का भेदभाव मिटा दोनों को एक ही श्रेणी में ला खड़ा कर देना चाहते हों और बच्चे को पैदा होते ही टारजन समझते हों कि इसके शरीर और चेतना को जो चाहे परोस दो इसकी सेहत और व्यक्तित्व पे तो कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा| जो अबोध उम्र वीर्य-धैर्य को संचित कर तपा के एक सुसंगठित शरीर और दिमाग बनाने की होती है उसमें ही इनका पात हो रहा होगा तो भला कैसे कोई समाज राष्ट्र के लिए राष्ट्र के प्रणेता पैदा कर पायेगा?


continue on post 2....
 
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इस पर मैंने कहा लेकिन समाज को ऐसी अंधी आंधी में तो नहीं छोड़ा जा सकता और अबोध उम्र की युवा पीढ़ी से तो मुंह मोड़ के ये कतई संभव नहीं?

हाँ संभव नहीं, लेकिन तेरे जैसे धैर्य से सुनने वाले युवा भी तो नहीं| तुम तो ढीठ हो पक्के इसलिए मुझे सुन गए वरना आज के युवाओं का तो ये आलम हो रखा है कि हम जैसे बुजुर्ग तो उनको किसी म्यूजियम में सजा के रखने वाली कृति से ज्यादा कुछ लगते ही नहीं| शहरों में पढने जाते हैं और वापिस आने पर हमसे ढंग से बातें भी नहीं करते| माना हममें अख्खड़पना है पर बेटा यह अख्खड़पना हमनें पूरी जिंदगी तप के पैदा किया है| और जब तक तेरे जैसे हमारे अक्खड़पने को झेलते हुए हमें सुनेंगे ही नहीं तो बताओ कैसे पीढ़ियों का अन्तराल (generation gap) न्यून होगा? और उसपे ये तूफ़ान से भी तेज बहती अंधी आधुनिकता की आंधी जो हम ग्रामीण बुज्रुगों को तो जैसे समूल-मिटाने को उतारू है, और शहर में गया काबिल ग्रामीण युवा अपने गावों की सुध ही नहीं लेगा तो कुंठा तो हमें घेरेगी ही ना बेटा?

मैंने इसपे उनसे कहा कि आपने आपके ज़माने में खुलेपन और आशिकी के जितने किस्से सुनाये उन्होंने तो मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम आज के आधुनिक वाकई में दिलों वाली आशिकी करते हैं या कम कपड़ों पे ही आँखें सेंकने को आशिकी समझ बैठे हैं?

बुजुर्ग ने आगे कहा कि उड़ान उन्हीं ऊँचाइयों तक भरी जाती हैं जहां तक पंखों को आंच ना लगे वरना सूर्य को छूने की अंधी चेष्टा में तो जटायु के अग्रज सम्पाती भी अपने पंख जला बैठे थे| या यूं कहो कि वीर्य के मद में मस्त हो उड़ने वालों का सम्पाती जैसा ही हसर होता है, वो काल के ग्रास में ऐसे समा जाते हैं कि उनको संभालने वाला भी युगों तक कोई नहीं मिलता| सूर्य को छूना तभी संभव होता है जब उसकी शक्ति का आभास करके ही उससे मुकाबला किया जाए और मानव की वो शक्ति होती है उसका वीर्य, इसका जितना संचय होगा उतना इसान बलवती-कर्मवती-शोर्यपति और विश्वपति बन पायेगा| और इसके संचय की सबसे उत्तम आयु यही अबोध-युवावस्था होती है, जिसको कि आज का युवा यह कह के खो रहा है कि "जवानी में नहीं करेंगे तो कब करेंगे"| इनको जरूरत है आशिकी और वासना में अंतर समझ समाज की सभ्यता को कायम रखते हुए जीवन-आनंद उठाने की|

बुजुर्ग की बातें सुनके जो निष्कर्ष मेरे सामने आया उसनें मुझे समाज के कई अनछुए पहलुओं जिनको कि हम कई बार आधुनिकता मान टाल जाते हैं तो कई बार धर्म-समाज की परिणति, पर हमें ध्यान केन्द्रित करने होंगे जैसे कि
  1. हरियाणा का कृषक समाज धर्म के नाम पे मंदिरों-पुजारियों को दान देने वाला सबसे अग्रणी समाज रहा है| लेकिन आज तक दान यह कहके दिया जाता रहा है कि "दान कह के नहीं किया जाता अर्थात दान में स्वार्थ नहीं होता", लेकिन मैं कहता हूँ कि "बिना रोये तो माँ भी बेटे को दूध नहीं पिलाती", इसलिए तो हमारे कृषक समाज की राजकीय-शासकीय-युद्ध-शोर्यों-विजयों-योद्धेयों-कलाओं का इतिहास-सभ्यता-संस्कृति ना तो ढंग से लिखी गई और ना ही इसका प्रचार किया गया, क्योंकि किसी ने दान देते वक्त यह सुनिश्चित ही नहीं किया कि मेरा दान मेरे इतिहास-सभ्यता-संस्कृति को लिखने-संजोने और गाने में भी व्यय किया जाए| किसी ने इस बात का संज्ञान ही नहीं लिया कि खुद को यदा-कदा समाज के संरक्षक-संवाहक कहने वाले पंडितों-पुजारियों नें हमारी इतिहास-सभ्यता-संस्कृति को क्यों आगे नहीं बढाया? क्यों हरियाणा का कृषक समाज इतना दान-पुन करने पर भी अधार्मिक (anti-religious) कहलाता है?

    यहाँ पर आप कहेंगे कि प्यार-आशिकी का दान-पुन से क्या नाता? नाता है सीधा-सीधा नाता है, क्योंकि दान-पुन से ही इतिहास-सभ्यता-संस्कृति पाले जाते हैं, जिससे वो विश्वास भरा वातावरण बनता है कि फिर उसमें स्वच्छ प्यार पलता है और स्वच्छ और सभ्य प्यार से दिलों वाली (वासना वाली नहीं) आशिकियाँ चलती हैं, किस्से बनते हैं, उल्लास उमड़ते हैं और समाज में खुलापन आता है, वही खुलापन जिसकी अंधी आधुनिकता का लोलीपोप दिखा के आपको डराया जा रहा है और मुझे इस बुजुर्ग से बात करके अहसास हुआ कि हम अंधे खुलेपन के चक्कर में कैसे दिलों का खुलापन बिसरा चुके हैं| इसलिए अब कृषक समाज को अपने दान-पुन का हिसाब लेना होगा और उसको अपने इतिहास-सभ्यता-संस्कृति सम्पन्नता पे लगवाना होगा अन्यथा जो हाल आज के ग्रामीण बुजुर्ग का हो रहा है कल को यह अंधी आधुनिकता वाला समाज तेरा-मेरा भी यही हाल करेगा| इसलिए अब ये बंदोबस्त कृषक और ग्रामीण हरियाणवी समाज को करना ही होगा|
  2. बच्चों और अबोध युवा को जानवरों और इंसानी प्यार में अंतर समझाना होगा| आखिर भगवन नें तुमको मानव योनि में पैदा किया है उसका कोई तो अनुग्रह रहा होगा| "प्यार अँधा होता है" का सहारा ले समाज के हर अमर्यादित आकर्षण को प्यार बताने वालों को समझाना होगा कि प्यार और वासना में कुछ अंतर होता है| और "माँ औलाद को बिना देखे गर्भ में ही प्यार करने लगती है" वाला प्यार ममता कहलाता है आशिकी नहीं; ऐसी कहावतों को आधार-हीन आशिकी से जोड़ने वालों को ममता और आशिकी का अंतर भी समझाना होगा|
  3. गाँव-गोत्र-धर्म में निर्धारित मान-मान्यताओं को टाल जो प्यार ना ढून्ढ सकता हो तो फिर उसमें काहे का धैर्य, काहे का वो वीर्यवान| समाज के पुरोधाओं ने ये सीमायें आपमें सहनशक्ति, निर्णय शक्ति और वीर्य शक्ति का संचय हो उत्तम बुद्धि और विवेकशील चेतना बने इसलिए बनाए थे, इनको रूढ़ी मत समझिये| ये नियम तो सुच्ची आशिकी के रास्ते में पड़ने वाले वासना के सागरों को पार कर सुच्ची आशिकी तक पहुंचनें के साधन हैं, इनका पालन कीजिये वरना जिंदगी भर आप प्यार और वासना में कभी अंतर ही नहीं कर पायेंगे| आखिर इसी को तो मानव सभ्यता कहते हैं वरना मान्यताओं को ना मान के करने वाले प्यार और एक जानवर के प्यार में अंतर ही क्या हुआ ?
लेखक: फूल कुमार मालिक
 
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1. It is a birth right of an old men to condemn present time and tag appreciations to his times.

2. Arya Samaj helped decreasing a lot of Jat traditions related to life and celebrations. I am glad that it is sinking down and down.

3. This write up is too much biased and pro-old man's own assumptions and rants.
 
1. It is a birth right of an old men to condemn present time and tag appreciations to his times.

2. Arya Samaj helped decreasing a lot of Jat traditions related to life and celebrations. I am glad that it is sinking down and down.

3. This write up is too much biased and pro-old man's own assumptions and rants.


What is sinking down? Arya Samaj? If so, why are you glad?

In fact, Arya Samaj has been a great factor for upliftment of Jat society. It has helped decreasing social evils prevalent in Jat society, not "Jat Traditions". Arranging big feasts during marriages, and also after demise of a family member (Kaaj or Mrityubhoj), going to Hardwar for submerging of ashes, smoking hookah, child marriage, 'pardah' tradition amongst ladies etc. - these were some of the evils in Jat society which had crept in through various factors and Arya Samaj helped in eradicating those evils.
 
What is sinking down? Arya Samaj? If so, why are you glad?

In fact, Arya Samaj has been a great factor for upliftment of Jat society. It has helped decreasing social evils prevalent in Jat society, not "Jat Traditions". Arranging big feasts during marriages, and also after demise of a family member (Kaaj or Mrityubhoj), going to Hardwar for submerging of ashes, smoking hookah, child marriage, 'pardah' tradition amongst ladies etc. - these were some of the evils in Jat society which had crept in through various factors and Arya Samaj helped in eradicating those evils.

Deswal sahab, With due regards.First of all Arya samaj never believe in caste system so people who call themselves arya samaji can not be Jats because arya samaj does not believe in caste system rather it is believe in varna system.People belive in arya samaj but still they will not marry their kids as per laws of arya samaaj.What ever you have mentioned are still very much prevalent today and if it has gone down it is due to education not because of arya samaj because if you will see arya samaj was hardly prevalent in southern haryana and over there also it(kaaj/hardwaar) has gone down so arya samaj is not the sole factor in that.
 
Deswal sahab, With due regards.First of all Arya samaj never believe in caste system so people who call themselves arya samaji can not be Jats because arya samaj does not believe in caste system rather it is believe in varna system.People belive in arya samaj but still they will not marry their kids as per laws of arya samaaj.What ever you have mentioned are still very much prevalent today and if it has gone down it is due to education not because of arya samaj because if you will see arya samaj was hardly prevalent in southern haryana and over there also it(kaaj/hardwaar) has gone down so arya samaj is not the sole factor in that.


Really? It is a wonderful finding !!!!! In that case, great leaders like Swami Omanand and Swami Indervesh and many others who were staunch Arya Samajists, cannot be Jats!


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phoolkumar, would you like to tell how much 'tap' you have practiced in your life? First of all, you practice some 'tap' and then show the result, then expect others to follow you. If you have practiced some 'tap', then please share.
 
Really? It is a wonderful finding !!!!! In that case, great leaders like Swami Omanand and Swami Indervesh and many others who were staunch Arya Samajists, cannot be Jats!


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It is not my finding rather it is mentioned in arya samaaj only that thye dont believe caste system. You tell does arya samaj believe in caste system ? If yes ,Could you please let us know more about it? Who can be and who can not be decided by their ideology not us so please put more light in that.
 
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1. It is a birth right of an old men to condemn present time and tag appreciations to his times.

3. This write up is too much biased and pro-old man's own assumptions and rants.

Not completely Samar, there is some truth as well on what has been told by old man or may be Phool himself. The way people use to look towards things have changedd.We all know change is the only thing that does not change but in village this has come in wrong direction. Budhe ki baat mein dam kuch to verna aaj malik n malik ne jo byaah kia tha vo 30-40 saal pahle koi soch bhi na sakta tha.
 
Deswal sahab, With due regards.First of all Arya samaj never believe in caste system so people who call themselves arya samaji can not be Jats because arya samaj does not believe in caste system rather it is believe in varna system.People belive in arya samaj but still they will not marry their kids as per laws of arya samaaj.What ever you have mentioned are still very much prevalent today and if it has gone down it is due to education not because of arya samaj because if you will see arya samaj was hardly prevalent in southern haryana and over there also it(kaaj/hardwaar) has gone down so arya samaj is not the sole factor in that.

Not the sole factor, but has been a factor and you seem to be in agreement.
 
Rinku , By the same logic sikh jatts can not be jats beacause sikhism does not believe in caste system..then why do you guys keep crying about unity with jatts of all religions..and you always seem to be a great fond of sikh jatts...don't refute someone logic just for the sake of it!!

Now as far as arya samajis are concerned, I am not very sure about the past situation in haryana and West UP.. but now a days arya samajis in west UP are proving themselves more "dhongis" even in the comparsion of sanatani...they are spreading self-made stories to kill some of the prevailing jat customs..as it was discussed about dada nagar kheda/bhoombiya by Bhai phool kumar..they are very stubborn. don't bother to listen anything else except satayrtha prakash..they think that each and every word of taht book is true rest in the world is fake..most of them claim to have the profound knowledge and believe rest of the world is occupied by morons..and lastly..they know only criticism , never show praises for anything else..infact the building block of the arya samaj start with criticism of different religions...i wonder how that can be good for humanity..

P.S- Please forgive if I hurt soemone..may be arya samaj has doen greta in past but they are doing no good today..It is base don my experience , may be situation is different in other araes..or mere tai sab nakli hi faintte hai eibb tahi
 
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You are right Prashant, in past Arya Samaaj proved to be good for jats, but since I came to know about the incident and kind of activities Arya Samaajies are putting them (discussed and mentioned in my thread on topic of "Dada nagar kheda ji"....Arya Samaji's are proving fatal on impact......and I think this is due to which they are losing the charm and impression in lehman.....and are dragged to almost list of forgotten chapters now..........Rohtak incident on Satlok Ashram is its live testimony that now Arya Samaaj is a diminishing light of candle.....otherwise I never heard them involved in such activities.....

and when i mention in this article "in absence of Arya Samaj"...I mean to same that people are ditaching from Arya Samaj but its replica is a must to fill the void created in absence of its fellowship.....until Arya Samaj was in society there were no dhongi baba, dera, satsang etc....but since then these have entered Arya Samaj is seen hapless in giving a strong stand against these dera-baba mandalies......and it is really injurious for the community as a whole.....a thread of bonding is broken, whose share is now distributed and until Jats get an answer to it....their looting will continue......

and situations which the character (old man) of this article is facing tomorrow going to come our ways also......

A point for Samar, analysis needs explanation for the points like "biased" raised by you.....just writing "biased" is not a good way of debating or providing feedback....you should have provided reasons behind such analysis.....


Rinku , By the same logic sikh jatts can not be jats beacause sikhism does not believe in caste system..then why do you guys keep crying about unity with jatts of all religions..and you always seem to be a great fond of sikh jatts...don't refute someone logic just for the sake of it!!

Now as far as arya samajis are concerned, I am not very sure about the past situation in haryana and West UP.. but now a days arya samajis in west UP are proving themselves more "dhongis" even in the comparsion of sanatani...they are spreading self-made stories to kill some of the prevailing jat customs..as it was discussed about dada nagar kheda/bhoombiya by Bhai phool kumar..they are very stubborn. don't bother to listen anything else except satayrtha prakash..they think that each and every word of taht book is true rest in the world is fake..most of them claim to have the profound knowledge and believe rest of the world is occupied by morons..and lastly..they know only criticism , never show praises for anything else..infact the building block of the arya samaj start with criticism of different religions...i wonder how that can be good for humanity..

P.S- Please forgive if I hurt soemone..may be arya samaj has doen greta in past but they are doing no good today..It is base don my experience , may be situation is different in other araes..or mere tai sab nakli hi faintte hai eibb tahi
 
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You are right Prashant, in past Arya Samaaj proved to be good for jats, but since I came to know about the incident and kind of activities Arya Samaajies are putting them (discussed and mentioned in my thread on topic of "Dada nagar kheda ji"....Arya Samaji's are proving fatal on impact......and I think this is due to which they are losing the charm and impression in lehman.....and are dragged to almost list of forgotten chapters now..........Rohtak incident on Satlok Ashram is its live testimony that now Arya Samaaj is a diminishing light of candle.....otherwise I never heard them involved in such activities.....

and when i mention in this article "in absence of Arya Samaj"...I mean to same that people are ditaching from Arya Samaj but its replica is a must to fill the void created in absence of its fellowship.....until Arya Samaj was in society there were no dhongi baba, dera, satsang etc....but since then these have entered Arya Samaj is seen hapless in giving a strong stand against these dera-baba mandalies......and it is really injurious for the community as a whole.....a thread of bonding is broken, whose share is now distributed and until Jats get an answer to it....their looting will continue......

and situations which the character (old man) of this article is facing tomorrow going to come our ways also......

A point for Samar, you did a good analysis but analysis need explanation for the points like "biased" raised by you.....just writing "biased" is not a good way of debating or providing feedback....you should have provided reasons behind such analysis.....

Bhai Phool,

This article of yours, though eloquently presented, is all but 'unbiased'. They way the character ''old man'' goes one bashing whatever is modern and modern generation is doing, makes me pity his long years in which he didn't learn anything significant except being nostalgic about his times. In-fact, you also ve not presented any factual analysis but merely dragged upon some assumptions that modern day love is purely only lust. On the contrary, lust has been an integral part of love.

Human civilization,majorly, would never be able to behave according to the reason and rational. Instincts are that hardwired in genetics. So all these cries of Sacchi muchi aashiki or whatever it is will go in to the oblivion naturally. Such is the way of Selfish genes.

As far as Arya Samaj is concerned, I found it totally anti-life and fesitivity. May be, because of its rigidness, its biting the dust. Further to my dislike, Satyarth Prakash mentions Jat in Shudra Varna. Even further to my dislike Dayanand was a Brahmin. Call me biased and I would agree with you.

((आर्य-समाज की अनुपस्थिति से पैदा हुई आध्यात्म तप और चिन्तन की रिक्त)) What about the Pre-Dayanad time?
 
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Interesting but strange too on your mentioning that Jats have been told as "Shudra" in "Satyarth Prakash".....I carry the copy of Stayarth Prakash along with me and have read it serveral times and no where ever found such mentioning about Jats....would you mind suffering to get me exact location, "chapter, page, paragraph" of Satyarth Praksah where it is mentioned that Jats were put in "Shudra" class in Satyarth Prakash? where as and also many of friends on this thread only has uttered that Arya Samaaj was/is/has been a casteless system.....but you seem proving them also wrong?

Moreover, it is about the readers taste and likes to which part of an article to highlight, praise and/or critisize......ok you may be agree on your points.....but ar'nt the questions raised by old man on current day situation of diminishing of real openness like "Kartik Sanana" are the chapters of past now, holi-phaag sees minimal outing of participation......??? Why people are blocking their ladies now a days to participate in such public functions and festivals....modernization is something mean to get more people openness and involvement....where are these seen in current era....and in what form do you find them or fill with an alternative to?

Jats liked Arya Samaaj because Arya Samaaj came with the concept of anti-sculpture devotion i.e. "Moorti-pooja ka virodh".....and as it suited best to the "Dada Nagar Kheda" deity of Jats too, which are void of any statue or sculpture.....and it strikes the Jats....more over famous chapter on "Jat Ji" in Satyarth prakash first time raised the real voice of jats in real words to world against "dhong-pakhand".....

You seem very obessessive about Brahmins, but I differ a little from you here, though also oppose the present form of Arya Samaaj but on same time Arya Samaaj has given many-many things to Jats in past......all the gurukulas, woman education are the yieldings of Arya Samaj....before which these were not found in an applaudible extent.....I am not agree with present day Arya Samaaj but I have been the admirer of one or two decades ago form of Arya Samaaj.....

My village have been the vitness to many anti-drug and anti-wine movements under the flaship of Arya Samaj only, which were fully effective until they were not diluted.....you seem speaking the language of a businessman or their representative thus not seem asserting positives of Arya Samaj.....

Though I don't know until when but if until today my village was not having any temple, its because of Arya Samaaj only.....because people of my village know what really the human service is.....my village is in very few village of Haryana, where you shall find their own private water supply system....like in any city....i.e. door to door....water taps inside almost each home of village across the castes and religions.....you shall not find woman of my village toiling in fields and around wells for water, and if it all happened there then it was just because of Arya Samaaji soch of people.....and it was injucted in 1999...now its 1.5 decade almost since woman of my village, enjoying this facility not less than any urban colony water supply sytem....and that too without any government aide....totally village people venture.....

It was perhaps because they come to learn that real god is not in temples, real god lives in your people, their peace and they invested the money in creating this water supply system for their woman rather erecting a temple or dera....


Bhai Phool,

This article of yours, though eloquently presented, is all but 'unbiased'. They way the character ''old man'' goes one bashing whatever is modern and modern generation is doing, makes me pity his long years in which he didn't learn anything significant except being nostalgic about his times. In-fact, you also ve not presented any factual analysis but merely dragged upon some assumptions that modern day love is purely only lust. On the contrary, lust has been an integral part of love.

Human civilization,majorly, would never be able to behave according to the reason and rational. Instincts are that hardwired in genetics. So all these cries of Sacchi muchi aashiki or whatever it is will go in to the oblivion naturally. Such is the way of Selfish genes.

As far as Arya Samaj is concerned, I found it totally anti-life and fesitivity. May be, because of its rigidness, its biting the dust. Further to my dislike, Satyarth Prakash mentions Jat in Shudra Varna. Even further to my dislike Dayanand was a Brahmin. Call me biased and I would agree with you.

((आर्य-समाज की अनुपस्थिति से पैदा हुई आध्यात्म तप और चिन्तन की रिक्त)) What about the Pre-Dayanad time?
 
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Interesting but strange too on your mentioning that Jats have been told as "Shudra" in "Satyarth Prakash".....I carry the copy of Stayarth Prakash along with me and have read it serveral times and no where ever found such mentioning about Jats....would you mind suffering to get me exact location, "chapter, page, paragraph" of Satyarth Praksah where it is mentioned that Jats were put in "Shudra" class in Satyarth Prakash? where as and also many of friends on this thread only has uttered that Arya Samaaj was/is/has been a casteless system.....but you seem proving them also wrong?

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Good you asked for it. I am quoting from the book - Asli Lutere Kaun- present at wiki.

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19. स्वामी दयानन्द के आर्यसमाज से जाटों को क्या लेना-देना था?

इस अध्याय पर पिछले संस्करण में कुछ लोगों ने रोष जताया है। मैं जानता हूं कि मेरी कौम का आर्यसमाज से बड़ा गहरा लगाव रहा है और जाट समुदाय स्वामी दयानन्द को जाट ही समझते हैं। मेरी किसी जाट या आर्यसमाजी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की तनिक भी इच्छा नहीं है लेकिन वैदिक धर्म व वैदिक संस्कृति की बात तो की जाती है परन्तु इस धर्म व संस्कृति का भारतीय संविधान में नाम तक नहीं है, न ही आई.पी.सी.-सी.आर.पी.सी. या किसी अन्य भारतीय कानून में इनको कोई मान्यता है। जब देश के संविधान व कानून में ही मान्यता नहीं तो हम किस बात का इस धर्म और संस्कृति पर फक्र करें। दूसरा, आर्यसमाज ने हमारी कौम की बात छोड़कर केवल वर्ण की बात की है जिस कारण हमारी कौम गौण हो जाती है। क्योंकि कोई भी आर्यसमाजी मंच पर खड़ा होकर किसी जाति का नाम तक नहीं ले सकता है तो फिर जाट जाति का नाम कहा? मैं जानता हूं कि मेरी कौम के महापुरुषों ने आर्यसमाज के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया और बलिदान दिये जिसमें स्वामी स्वतन्त्रानन्द तथा भक्त फूल सिंह आदि का बलिदान उल्लेखनीय है। मैं जानता हूं मेरी जाट कौम की स्वामी दयानन्द तथा आर्यसमाज में गहन आस्था रही है। शहीद भगतसिंह के दादा अर्जुन सिंह ने स्वामी दयानन्द से ही जनेऊ ग्रहण किया था। उनके चाचा अजीत सिंह क्रान्तिकारी तो आर्यसमाज के उपदेशक भी रहे थे। मेरी सबसे बड़ी तड़फ है कि स्वामी दयानन्द जी महाराज के कहने पर भी आर्यसमाज को ‘हिन्दू’ शब्द से अलग नहीं किया गया, इसी कारण आज यह खण्डित व भ्रमित है। नतीजतन, फिर उसी पौराणिक व पाखण्डी धर्म की शरण में जा रहा है। मेरे इस दर्द के कारण मैं इस नीचे लिखे लेख को दोबारा से इस संस्करण में भी दोहरा रहा हूं। यदि इस लेख को कोई सतलोक का रामपाल अपने स्वार्थ में प्रयोग करता है तो वह कानूनी अपराधी है। जाट आर्य हैं या नहीं यह कोई बहस का मुद्दा नहीं है। क्योंकि इस बारे में विद्वान् इतिहासकारों के अलग-अलग ठोस मत हैं, जिसमें पाठकों को मैं उलझाना नहीं चाहता। बल्कि इसमें एक गहन शोध की आवश्यकता है। क्योंकि जाटों ने 100 वर्षों से जो मिथक पाल लिए हैं उन्हें भुलाना भी आसान नहीं है।
पं० शंकराचार्य ने 9वीं सदी के प्रारंभ में बौद्ध धर्म का विनाश करके हिन्दू (ब्राह्मण) धर्म की पुनः स्थापना की थी और भारत के चारों कोनों में हिन्दुओं की चार पीठ स्थापित की। लेकिन जाट क्षेत्र में कोई नहीं। इस ब्राह्मण धर्म की पुनःस्थापना पूरी तरह पौराणिक ब्राह्मणवाद पर ही आधारित थी, लेकिन कुछ सुधारों के साथ। जब इन पीठों में शंकराचार्य मनोनीत करने की बात आई तो उन्होंने चारों शंकराचार्यों का चुनाव दक्षिण भारत के ब्राह्मणों से किया, उनमें से दक्षिण की रामेश्वर पीठ में मध्य भारत से मंडन मिश्र उर्फ सुरेशाचार्य को बैठाया बाकी सभी सुदूर दक्षिण भारत से थे। उत्तर में बदरिकाश्रम की पीठ का शंकराचार्य तोटकाचार्य केरल के नमुदरीपाद ब्राह्मण थे लेकिन उन्होंने उत्तरी भारत से अर्थात् ब्राह्मणों की पीठ काशी (काशी प्राचीन में बौद्ध धर्मियों का शहर था) से किसी भी ब्राह्मण को इस योग्य नहीं समझा क्योंकि वे उन्हें भ्रष्टाचारी समझते थे। वैसे पं० शंकराचार्य जी ने धर्म के साथ-साथ अर्थशास्त्र को भी नहीं भुलाया क्योंकि उन्होंने दक्षिण भारत में पैदा होने वाले नारियल को देवी-देवताओं की उपासना में भेंट की प्रथा चलाई ताकि अपने दक्षिण के लोगों को आर्थिक तौर पर फायदा हो सके। पं० शंकराचार्य ने मायावाद के सिद्धान्त का जमकर प्रचार किया और उसने चिल्ला-चिल्ला कर कहा कि सभी ब्रह्म है तथा ब्रह्म के सिवाय कुछ नहीं। बाकी सब चीजें झूठी हैं। अर्थात् इनका ‘ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या’ का उपदेश रहा। लेकिन इसी ब्राह्मण ने वेदान्त के दर्शनसूत्र (1-3-34) में फिर क्यों लिखा कि यदि कोई शूद्र वेद को सुन ले तो उसके कान में शीशा और लाख भरवा देनी चाहिए? यही विचार उनके नारी के बारे में हैं। फिर कहां गया उनका ब्रह्म का सिद्धान्त? क्या शूद्र और नारी में ब्रह्म नहीं है? कितना बड़ा खोखलापन है इस ब्राह्मण धर्म में! इसी को हिन्दू सनातन धर्म कहते हैं जबकि सनातन धर्म तो वैदिक और बौद्ध धर्म ही है। वैदिक काल से सरस्वती नदी एक धार्मिक नदी रही लेकिन शनैः शनैः वह सूखती गई (वेदों में सरस्वती नदी का बार-बार उल्लेख आया है, लेकिन गंगा का केवल तीन ही बार उल्लेख है) तो पं० शंकराचार्य जी ने गंगा को हिन्दुओं की पवित्र नदी घोषित कर दिया तो साथ में एक गपोड़ भी जोड़ दिया कि सरस्वती अब इलाहाबाद में गंगा-जमना में धरती के नीचे से आकर मिल गयी है और वहां अब त्रिवेणी हो गई है। यह भी दुनिया का एक बड़ा झूठ है। सरस्वती नदी अपने उदगम से जमीन के नीचे इलाहाबाद में आकर कैसे मिल सकती है? हमने तो यह देखा है कि हमारे खेतों में एक छोटा पानी का नाला टूटने पर भारी मिट्टी का कटाव करता है लेकिन सरस्वती नदी हजारों साल से एक फुट जमीन को भी नहीं काट पाई। यह सभी पाखण्डवाद का लूटने और कमाने-खाने का एक धंधा है। इसलिए इन्होंने ही सबसे पहले गंगा के किनारे गंगोत्री मंदिर बनवाया और गंगा नदी को हिन्दुओं की पवित्र नदी घोषित किया, जिसमें डुबकी लगाने से सब पापों का अन्त होने लगा और आज इसी गंगा नदी के किनारे गंगोत्री से लेकर फराक्का बांध तक (बंगाल) भारतवर्ष के अधिक निर्धन लोग रहते हैं जिनके पाप तो धुल पाये या नहीं, लेकिन गरीबी नहीं धुल पाई। इसी गंगा की तर्ज पर गरीबी को पालने के लिए देश में अनेक गंगाएं बन गई। उदाहरण के लिए जम्मू क्षेत्र में ‘गुप्त गंगा’, मध्य प्रदेश में ‘बैन गंगा’, किस्तवाड क्षेत्र में ‘काली गंगा’ और तामिलनाडू में ‘शिव गंगा’ आदि-आदि। ये सभी गंगा भाग्य के भरोसे रहने का पाठ पढ़ाती हैं और स्वर्ग का झूठा लालच देकर हिन्दू समाज को निकम्मा बना रही हैं। आस्था के नाम से पाखण्ड व अंधविश्वास फैलाना सामाजिक अपराध है। लेकिन पाखण्डी लोगों ने वास्तविक जाट गंगा जिसे जाट कस्सियों से खोदकर लाये, भुलाने का प्रयास किया है। जब शंकराचार्य महाराज 32 वर्ष की अवस्था में ईश्वर को प्यारे हो गये तो उनकी मृत्यु के पश्चात् इस नवीन ब्राह्मण धर्म में फिर से अधिक भ्रष्टाचार की बाढ़ आ गई और यह धर्म फिर से घोर अंधविश्वासों और कुरीतियों में फंसता चला गया। इस ब्राह्मणवादी धर्म की चपेट में राजपूत आदि कुछ जातियां पूरी तरह आ गई लेकिन जाटों के संस्कार हिन्दू प्रतीत होते हुए भी प्रछन्न बौद्धधर्मी थे, जिसमें कुछ संस्कार आज भी जाट चरित्र में स्पष्ट दिखते हैं। जाट व कुछ अन्य सहयोगी जातियों के चरित्र में जो आदर्शता प्रतीत होती है वह सभी की सभी प्राचीन बौद्ध धर्म की देन है। डा० धर्मकीर्ति ने अपनी एक शोध पुस्तक “जाट जाति प्रछन्न बौद्ध है” लिखकर इसे ऐतिहासिक धरा पर सिद्ध कर दिया है। वास्तव में यह धर्म स्थापित करने के समय भी बहुत बड़ा गोलमाल हुआ था क्योंकि उस समय कुमारिल भट्ट ब्राह्मण ही भारत में बौद्ध धर्म के एक बहुत बड़े विद्वान् थे। लेकिन वे जानबूझकर पं० शंकराचार्य से शास्त्रार्थ में हार गए और फिर शंकराचार्य जी के साथ मिल गए। जरूर दाल में कुछ बड़ा काला था। इसी के बाद हिन्दू धर्म में मुर्गे, बकरे व भैंसों आदि की बलि चढ़ने लगी।
जब यह ब्राह्मण धर्म फिर से अपने पतन की तरफ लौट रहा था, उसी समय 19वीं सदी में पं० स्वामी दयानन्द उर्फ पं० मूलशंकर शर्मा जी प्रकट हो गये। जब उन्होंने सन् 1875 में बम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की तो 96 सभासदों में से 39 ब्राह्मण, 24 अरोड़ा व खत्री, 18 गुजराती/मराठी बनिये तथा शेष 15 लोग वहाँ की स्थानीय जातियों से थे। इनमें से कोई एक भी जाट नहीं था। स्वामी दयानन्द का उद्देश्य गिरते हुए ब्राह्मण धर्म को फिर से ऊपर उठाना तथा उसमें सुधार करना था। अर्थात् उनका उद्देश्य ब्राह्मण जाति में सुधार करना था जिसमें अनेक बुराइयां आ चुकी थीं। जबकि जाट जाति अपने बौद्धधर्मी संस्कारों के कारण इन बुराइयों से कोसों दूर थी, जैसे कि माँस-मिट्टी खाना, शराब पीना, अय्यासी करना व विधवा लड़कियों का पुनः विवाह न करना आदि-आदि। याद रहे, ब्राह्मण वर्ण एक ऐसा वर्ण है जिसमें केवल एक ही जाति है - ब्राह्मण।
कहने का अर्थ है कि स्वामी दयानन्द का यह आर्यसमाज ब्राह्मणवाद के सुधार के लिए था न कि जाटों के सुधार के लिए। एक बार स्वामी जी जब रिवाड़ी में ठहरे थे तो उनसे कुछ जाट लोग मिलने गये तो उन्होंने स्वामी जी से आग्रह किया कि वे उनके यहाँ आकर प्रवचन करें। इस पर स्वामी जी ने कहा था कि मैं आपको क्या प्रवचन करूं, जाट लोग तो पहले से ही आर्यसमाजी हैं। लेकिन जाट इस उत्तर को गहराई से नहीं समझ पाये और उत्साहित होकर आर्यसमाज का झण्डा उठा लिया। जाट जाति बहुत ही ऊर्जावान् जाति रही है। जाट का अर्थ ही एकजुट होना होता है अर्थात् बिखरी हुई शक्ति को इकट्ठा करना। जाट तो एक शक्ति है, जाट बारूद के समान है। यदि इसी बारूद को कोने में डाल दिया जाये तो यह राख के समान प्रतीत होती है जैसे कि आज हो रहा है। वरना इसी बारूद से बड़े-बड़े पहाड़ तोड़कर सड़क और बांध बनाये जा सकते हैं और यदि यही बारूद गलत हाथों में (नेतृत्व) में पड़ जाये तो बड़े से बड़ा विध्वंश या सर्वनाश किया जा सकता है। इस ऊर्जावान् जाति में हमेशा ऊर्जावान् पुरुष और महापुरुष पैदा होते रहे हैं। आर्यसमाज का झण्डा भी इन्हीं ऊर्जावान् जाटों ने उठा लिया। जबकि इस झण्डे से हम जाटों का किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं था और न ही होना चाहिए था। लेकिन हमारे इन महान् ऊर्जावान् लोगों ने वैदिक धर्म व संस्कृति की पुनःस्थापना का अनचाहा ठेका ले लिया और जब जाट जाति को ‘कानवैन्ट’ स्कूलों (अंग्रेजी स्कूल) की परम आवश्यकता थी तो इन्होंने संस्कृत स्कूलों व गुरुकुलों की बाढ़ ला दी। जो कार्य ब्राह्मणवाद ने करना चाहिये था, वह कार्य हमने अपने हाथों में ले लिया। इस देश के चरित्र और वैदिक धर्म के हम ठेकेदार बन गये। जबकि इस ठेकेदारी से हमारा कोई भी लेना-देना नहीं था।
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दूसरी तरफ इसी सभा में जो 96 सदस्य थे उनकी संतान स्वामी दयानन्द के नाम पर अंग्रेजी पढ़ती रही और बड़े-बड़े सरकारी पदों पर पहुंचते रहे। इसका जीवन्त उदाहरण है महात्मा हंसराज (हिन्दू पंजाबी खत्री) जिन्होंने ‘दयानन्द एंग्लो वैदिक’ (डी.ए.वी.) स्कूलों व कालेजों की बाढ़ ला दी और वहाँ पंजाब में स्वामी दयानन्द के नाम पर आधुनिक शिक्षा पढ़ाई जाती रही। यह अलग बात है कि इन्हीं लोगों ने जैसे कि ज्ञानप्रकाश अरोड़ा (हिन्दू पंजाबी अरोड़ा) जैसों ने इन संस्थाओं को जी भरकर लूटा भी। इस लूट पर ‘पंजाब केसरी’ ने सन् 2003 में धारावाहिक लेख लिखे। मैं लगभग दो साल दयानन्द कालेज हिसार का छात्र रहा जहाँ मैंने सुना था कि हर शुक्रवार को हास्टल के पास कहीं हवन होता था। कालेज में सप्ताह में शायद एक या दो बार आध्यात्मिक पीरियड (Divinity period) होता था, जिसके लिए यह भी प्रचारित किया जाता था कि जब तक कोई विद्यार्थी आध्यात्मिक सर्टिफिकेट प्राप्त नहीं कर लेता तो वह फाईनल परीक्षा में नहीं बैठ सकता। लेकिन व्यवहार में मैंने कभी ऐसा नहीं पाया और ना ही मैंने कभी हवन देखा, न आध्यात्मिक पीरियड और सर्टिफिकेट, लेकिन मैं अपनी क्लास में पास होता चला गया। मेरा कहने का अर्थ है कि जो लोग आर्यसमाज की स्थापना में सहायक थे उनका कोई भी बच्चा कभी गुरुकुल नहीं गया जबकि आज भी गुरुकुलों में 90 प्रतिशत जाटों के बच्चे हैं। जो काम हमारा नहीं था वह काम हमने अपने हाथों में लिया और वही आर्यसमाज साफ तौर पर लंगोट और चड्डी की संस्कृति में बंट गया। हमारे हाथ लंगोट आया और आज यही लंगोट इस चड्डी से बुरी तरह से पिछड़ रहा है अर्थात् पिछड़ चुका है। हमें कोई बतलाये कि गुरुकुलों में पढ़नेवाले कितने बच्चे सिविल सर्विसिज पास कर पाये? इन गुरुकुलों की उपयोगिता केवल संस्कृत के मास्टर पैदा करने तक सीमित रही, यह कर्तव्य ब्राह्मणवाद का था, हमारा नहीं। ये गुरुकुल गरीब तबके के जाट किसानों की लड़कियों को मास्टर बनाने तक ही सफल रहे, जबकि आज सभी सरकारें स्कूलों में संस्कृत विषयों को हटाकर अंग्रेजी को अनिवार्य कर रही है। क्योंकि यह समय की मांग है। चाहे प्राचीन में इन ग्रंथों में चाहे जितना विज्ञान हो, लेकिन आधुनिक युग की लगभग सभी खोजें यूरोप की देन हैं और आज विज्ञान का साहित्य विशेषकर मेडिकल व इंजीनियरिंग संस्थानों में अंग्रेजी भाषा में है और यही हमारे देश में लागू है और रहेगा। लेकिन जाट जाति एक के बाद एक निष्ठावान् और कर्मठ आर्यसमाजी देती रही, फिर भी हमारे हाथ क्या आया? एक बार एक समय था कि कई अन्य जातियाँ भी अपने को राजपूत कहलाने में गर्व का अनुभव करती थीं। क्योंकि यह असत्य इतिहास के प्रचार का परिणाम था। इसी प्रकार यह भी एक फैशन बन गया था कि कोई भी जाट पुरुष विख्यात होने पर उसे आर्यसमाजी कहा जाने लगा। चौ० छोटूराम को भी लोगों ने आर्यसमाजी लिखा है, जबकि सच्चाई यह है कि उन्होंने 1923 से ही मन से आर्यसमाजी विचारधारा को निकाल दिया था। जिसका प्रमाण उनके जाट महासभा के भाषणों से प्रमाणित है और आज भी पाकिस्तान के जाट मुसलमान उन्हें आदर भाव से याद करते हैं। इसी कारण वे जिन्ना को उसकी औकात बतलाने में सफल हुए और हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख और ईसाइयों को एक मंच पर खड़ा कर दिया। इस प्रकार इसी फैशन में जाट अपने घरों में स्वामी दयानन्द द्वारा लिखी पुस्तक ‘सत्यार्थप्रकाश’ की प्रतियां रखकर गौरव का अनुभव करने लगे। जबकि स्वामी दयानन्द की शिक्षायें कहीं भी व्यावहारिक, राष्ट्रवादी व आधुनिक विज्ञान पर आधारित नहीं हैं। कुछ उदाहरण इस प्रकार है:-
(i) 24 वर्ष की कन्या का विवाह 48 वर्ष के पुरुष से हो तो वह उत्तम विवाह है। (पृ. 54 स.प्र.) (यह साफ तौर गैर व्यावहारिक शिक्षा है – लेखक)
(ii) ब्राह्मण वर्ण का ब्राह्मणी, क्षत्रिय वर्ण का क्षत्रिय, वैश्य वर्ण का वैश्य और शूद्र वर्ण का शूद्र वर्ण के साथ विवाह करे। (पृ. 60 स.प्र.) (यह स्पष्ट रूप से ब्राह्मणवादी विचारधारा है – लेखक)
(iii) जच्चा अपने बच्चे को केवल 6 दिन तक दूध पिलाये, इसके बाद बच्चे को दूध धाई पिलाये जिसे उत्तम खाना दिया जाये। (पृ. 20 स.प्र.) (स्वामी जी ने पूरे विज्ञान व मातृत्व को ही अमान्य कर दिया - लेखक)।
(iv) आर्य वर को भूरे नेत्रों वाली नारी से विवाह नहीं करना चाहिए आदि-आदि। (पृ. 53 स.प्र.) (अर्थात् बेचारी भूरे नेत्रों वाली कन्यायें तो त्याग के योग्य हैं - लेखक)।
(v) नीच, भंगी व चमार आदि का खाना न खाये। (पृ. 184 स. प्र.) - (स्वामी जी का कहने का अर्थ यह निकलता है कि दलित समाज जाति के लोग तो होटलों/ढाबों में ही ना जायें - लेखक)।

जाट आर्यसमाजी भाइयों से प्रार्थना है कि वे सत्यार्थप्रकाश को बड़े ध्यान से पढ़ें ! चौथे समुल्लास के पेज नं० 76 पर स्वामी जी ने मनु के श्लोक को स्वीकार करते हुए लिखा है कि “किसी विधवा का संयोग अर्थात् मुकलावा या गौणा होने के बाद केवल शूद्र जातियां उस विधवा का पुनर्विवाह कर सकती हैं, दूसरे वर्ण नहीं।” लेकिन जाट तो मुकलावा की बात छोड़ो. बच्चा होने के बाद भी पुनर्विवाह करते रहे हैं। इसलिए स्वामी जी ने जाट कौम को शूद्र माना है न कि क्षत्रिय।

दूसरे ब्राह्मण ग्रन्थ ऐसी ही घृणित शिक्षाओं से अटे पड़े हैं। (इसका विस्तार से विवरण अध्याय नं० 15 में दिया गया है।) लिखा है शूद्रों का उपनयन न करें। उन्हें वेद न पढ़ायें, शूद्रों को जनेऊ पहनने की आज्ञा नहीं होनी चाहिये, चण्डालों को दूर बसाये, नीच जातियों से अनाज तक न लें आदि-आदि। इसी प्रकार इन्होंने कबीर व गुरुनानक जी आदि की बुराई करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। गुरुनानक जी को तो मूर्ख तक लिखा है। रामदास को ढ़ेड कहकर लिखा और कबीर को तुम्बा बजाने वाला कहा। अर्थात् सम्पूर्ण ब्राह्मणवाद के भूत को स्वामी जी ने एक नई बोतल में डालकर पेश कर दिया तथा इस भूत को जाटों पर छोड़ दिया और इस भूत ने जाटों को सौ वर्षों से भी अधिक समय से नचाये रखा है। लेकिन हम स्वामी जी के गुप्त एजेण्डे को अभी तक नहीं समझ पाये, उनका एजेण्डा था जाटों को सिक्ख व ईसाई धर्मी बनने से रोकना और हमेशा-हमेशा के लिए ब्राह्मणवाद का गुलाम रखकर हिन्दू जाट जाति को लुप्त कर देना। यह बात चाहे हमें कितनी भी अटपटी लगे लेकिन इसके अन्दर एक कटु सच्चाई छिपी है जिसे हमें कम से कम अब तो स्वीकार कर लेना चाहिए। सिक्ख धर्म उस समय फैलता हुआ पंजाब से अम्बाला की सीमाओं को पार कर गया था लेकिन स्वामी जी अपने उद्देश्य में सफल रहे और हम जाटों को सिक्ख नहीं बनने दिया। डा. धर्मकीर्ति अपनी शोध पुस्तक ‘जाट जाति प्रछन्न बौद्ध है’ में लिखते हैं कि “इसलिए परोक्ष रूप से सिक्ख धर्म पर बौद्ध महायान का प्रभाव पड़ा था। इस कारण सिक्ख धर्म अपनी प्रगतिशीलता मार्ग पर चलता रहा। लगभग एक शताब्दी पूर्व महर्षि दयानन्द का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने सनातन धर्म की दकियानूसी विचारधारा और मूर्तिपूजा का खण्डन कर वर्ण-व्यवस्था और जाति की व्यापक और प्रगतिशीलता के आधार पर व्याख्या की तो बची हुई जाट जाति आर्यसमाजी हो गई।” यही विद्वान् इस बारे में आगे लिखते हैं कि “आज के ब्राह्मणवाद ने इस महान् जाति को आर्यसमाज का झुनझुना हाथ में पकड़ा दिया है, जिसे भोले-भाले जाट बजाते फिर रहे हैं और ब्राह्मणवाद के मृत शरीर को अपने कन्धों पर उठाकर घूम रहे हैं।”

जाट जाति में बहुत बड़ी तर्कशक्ति है और फिर जाट आर्यसमाजी हो तो सोने पर सुहागा। इसलिए कहावतें चली कि ‘65वीं विद्या जाट विद्या है’ दूसरी कहावत है ‘अनपढ़ जाट पढ़े जैसा, पढ़ा जाट खुदा जैसा’। सन् 1857 की क्रान्ति के पश्चात् दिल्ली के रजिडैण्ट पद पर मि० मैटकॉफ आये, जो ईसाई जाट थे। (‘हरयाणा की लोक संस्कृति’ नाम पुस्तक में भी डा. भारद्वाज भी मानते हैं कि मैटकॉफ तथा चार्ल्स इलियट जाट प्रतीत होते थे)। मिस्टर मार्श आई.सी.एस. को भी आधा जाट कहा गया है। जब मैटकॉफ ने दिल्ली व उसके चारों ओर फैली अपनी जाट जाति का अध्ययन किया तो पाया कि उसकी जाति अशिक्षा और अन्धविश्वास में फंसकर बुरी तरह से ब्राह्मणवाद ने जकड़ी है। इस पर उसने जाटों का उद्धार करने के लिए इन्हें ईसाई बनाकर आधुनिक शिक्षा दिलाने की योजना बनाई। उन्होंने एक हिन्दी के जानकार पादरी डॉ० फिलेल को बुलाकर अपनी योजना समझायी तथा उसे कुछ दिन जाटों की भाषा व संस्कृति सीखने की सलाह दी। कुछ दिनों के बाद डॉ० फिलेल ने अपना पहला प्रवचन एक जाट सभा बुलाकर इन शब्दों से आरंभ किया “जाट भाइयो, आप ईसा-मसीह में विश्वास लायें, वे खुदा के बेटे हैं, आपके सभी गुनाहों को माफ कर देंगे।” ये शब्द बोलते ही एक वृद्ध जाट खड़ा हो गया और पादरी को उसके शब्द फिर से दोहराने को कहा। जब पादरी ने उन्हीं शब्दों को दोहराया तो जाट ने पादरी से पूछा “खुदा मर गया या जिन्दा है?” इस पर पादरी ने कहा “खुदा जिन्दा है” तो वृद्ध जाट बोला – हमारे जाटों में तो यह रिवाज है कि जब तक बाप जिन्दा होता है तो बेटे की चौधर नहीं होती। इसके उत्तर में पादरी को कुछ भी कहने के लिए नहीं सूझा तो वह सभा से चुपचाप चला गया। डा. धर्मचन्द्र विद्यालंकर तो लिखते हैं कि उस पादरी ने अपना ईसाई धर्म छोड़ दिया था लेकिन यह निश्चित है कि उसने अपना पादरीपना अवश्य छोड़ दिया था। जिस प्रकार ‘कश्मीरी ब्राह्मण सभा’ की तर्क ने आज लगभग 600 वर्षों बाद कश्मीरी ब्राह्मणों को बेघर कर दिया, इसी प्रकार हमारे उस बूढ़े जाट ने हमारी आने वाली संतानों को आधुनिक शिक्षा से वंचित कर दिया और फिर से ब्राह्मणवाद के चुंगल में फंसा दिया।
इसी प्रकार पहले हमें दो बार सिक्ख धर्मी बनने का अवसर मिला और बाद में स्वामी जी ने हमें कट्टर हिन्दू बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी तथा हम जाटों को सदा-सदा के लिए ब्राह्मणवाद की गुलामी झेलने के लिए छोड़ दिया। अभी हम चींटियों के बिलों पर आटा डालते हैं तो चौराहों पर टूना-टंकन करते फिरते हैं या फिर गुरनामे के चक्कर में रात भर जागरणों में तालियाँ पीटते फिरते हैं। लगभग प्रतिवर्ष 8 लाख जाट कांवड़ उठाए घूम रहे हैं जो औसतन 40 करोड़ रुपये इस पाखण्डवाद की भेंट चढ़ाकर उनमें से कुछ सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान दे रहे हैं। केवल 20 साल में हरयाणा के 5130 जाटों के गांवों के क्षेत्रों में 12000 मन्दिर बन चुके हैं, जिन पर लगभग 5 अरब रुपया खर्च करके वहां पाखण्डियों को रोजगार दिया जा रहा है, जबकि जाटों के लाखों बच्चे आज बेरोजगार होकर सड़कों पर हैं। इन्हीं मन्दिरों में यह पाखण्डी हमारी औरतों को गंडे, ताबीज बनाकर बहका रहे हैं तथा साथ-साथ हमारे बच्चों की जन्मपत्री बनाकर उसमें हमारा वर्ण शूद्र लिख रहे हैं। इसी प्रकार विशेषकर राजस्थान और दक्षिणी हरयाणा में प्रतिवर्ष लगभग एक लाख मृत्युभोज (काज) जिन पर औसतन खर्चा प्रति भोज 50 हजार रुपये होता है, किये जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त जाट समाज में प्रतिवर्ष लाखों सवामणी और भण्डारे हो रहे हैं जिन पर प्रतिवर्ष कई अरबों रुपया खर्च हो रहा है। जबकि गांवों में सरकारी स्कूलों में हमारे बच्चों को बैठने के लिए टाट तक नहीं हैं। और यह सारा पैसा दूसरों की जेब में जा रहा है।
 
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जाट कौम बुरी तरह पाखण्डवाद की चपेट में है। कहां गई हमारी आधुनिक शिक्षा? कहां है हमारा आर्यसमाज? मुझे यह लिखने में तनिक भी संकोच नहीं कि हमारे आर्यसमाज ने आज इस जाट कौम को बीच मंझधार में छोड़ दिया है जिस कारण हम न तो आर्यसमाजी रहे और न वैदिक और न ही हिन्दू। यदि हम हिन्दू होते तो फिर हिन्दू कोड से हमें आज तकलीफ क्यों हो रही है? क्योंकि हिन्दू कोड समगोत्र विवाह को वैध मानता है जबकि जाट कौम समगोत्र विवाह को पाप और व्यभिचार मानती है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? जाट कौम जाए तो जाए कहां? जाटों का आर्यसमाज कृपया इस पर गौर करे। आज जाट कौम के अस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो गया है। लेकिन आर्यसमाज आज अपने मन्दिरों का केवल एक ही काम के लिए इस्तेमाल करता है कि वहां जाटों के भगौड़े लड़के-लड़कियों के विवाह रचाकर उन्हें विवाह का प्रमाणपत्र देना हैं, चाहे वे एक ही गोत्र के क्यों न हों। वर्तमान में आर्यसमाजियों का काम केवल गरिष्ठ (गच) भोजन खाना रह गया है। अब हम न तो आर्यसमाजी रहे और न ही पूर्ण ब्राह्मणवादी। वही कहावत हुई “गंगा गया तो गंगादास, जमना गया तो जमनादास”। इस बारे में गुरुनानक जी कहते हैं कि -
घट में है सूझत नहीं लानत ऐसी जिन्द।
नानक इस संसार को हुआ मोतियाबिन्द॥
स्वामी दयानन्द जी ने कहा था कि अरबी/फारसी भाषा के अनुसार तो हिन्दू का अर्थ काफिर होता है इसलिए हम अपने को हिन्दू न कहें आर्य कहें। लेकिन हमारे आर्यसमाजी उनकी बात न मानकर अभी भी अपने को हिन्दू कहते और लिखते हैं और हिन्दू कोड के अधीन हैं। इस प्रकार आर्यसमाजी स्वयं ही स्वामी जी का विरोध कर रहे हैं। चौ० छोटूराम ने तो स्कूल में अपना धर्म वैदिक लिखवाया और बाद में सन् 1931 में इन आर्यसमाजियों की अलग से जनगणना भी करवाई थी। लेकिन यहीं लोग फिर डर गये कि कहीं हिन्दू कम न पड़ जांए। स्वामी दयानन्द जी, पं. बस्तीराम व पं. विष्णुप्रभाकर को ब्राह्मणों ने ‘रत्न’ भेंट किया। लेकिन हमारे जाट आर्यसमाजियों ऐसा कुछ क्यों नहीं किया?
इस सब अध्ययन के बाद मेरे मस्तिष्क में तीन प्रश्न पैदा हुए -
(1) आर्यसमाज व वैदिक धर्म को कहां पर कानूनी मान्यता है?
(2 ) जब आर्यसमाज वर्ण व्यवस्था को ही मानता है तो उसके पास किसी का वर्ण का जानने के लिए क्या मापदण्ड है कि कौन किस वर्ण में आता है?
(3) जब आर्यसमाज जाति को नहीं मानता केवल वर्ण को ही मानता है तो अपनी जाट जाति कैसे कह सकता है या लिख सकता है?
मेरा अध्ययन कहता है कि आर्यसमाज में सिख जाटों व मुसलमान जाटों के विरुद्ध में तथाकथित हिन्दू जाटों के दिलों में दुराव पैदा किया है और उन्होंने चौ० छोटूराम के बाद उन्हें कभी एक नहीं होने दिया।
 
भाई साहब मेरे पास स्वामी ओमानंद सरस्वती जी के लिखे हुए सत्यार्थ प्रकाश की प्रति है और उसके मैंने चौथे समुल्लास के ७० से ले ८० तक पन्ने पलट डाले, जिनमें की विवाह के प्रकारों के बारे में लिखा हुआ है पर इसके अंदर विधवा विवाह का जिक्र तक नहीं है..... क्या कहूँ, या तो मैं गलत जगह ढून्ढ रहा हूँ या फिर मेरे पास जो प्रति है वो गलत है?

...anyway leave this chapter....lets not divert the topic....answer to my other questions raised on your analysis.....and talk about current day situation in relation to the main article of this thread...

जाट आर्यसमाजी भाइयों से प्रार्थना है कि वे सत्यार्थप्रकाश को बड़े ध्यान से पढ़ें ! चौथे समुल्लास के पेज नं० 76 पर स्वामी जी ने मनु के श्लोक को स्वीकार करते हुए लिखा है कि “किसी विधवा का संयोग अर्थात् मुकलावा या गौणा होने के बाद केवल शूद्र जातियां उस विधवा का पुनर्विवाह कर सकती हैं, दूसरे वर्ण नहीं।” लेकिन जाट तो मुकलावा की बात छोड़ो. बच्चा होने के बाद भी पुनर्विवाह करते रहे हैं। इसलिए स्वामी जी ने जाट कौम को शूद्र माना है न कि क्षत्रिय।
 
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विषय गंभीर है गाँवों में स्तिथि कुछ हद तक चिन्ताजनक है| सिर्फ किशोर वर्ग (फूल भाई की नज़र में युवा )पर दोषारोपण बिलकुल गलत है| लेख के शुरुआत में ही इस समस्या की वजह बताई गयी है जिन्हें पूर्ण रूप से ख़ारिज करता हूँ और इस समस्या से उनका कोई लेना देना नहीं है| सबसे पहले बात "अंधी आधुनिकता" - आधुनिकता कभी अंधी नहीं होती सिर्फ उसे देखने वाले की नज़रों का खोट है, आधुनिकता सदियों से रही है क्योंकि किसी वस्तु, क्रिया, संस्कृति के वर्तमान स्वरुप को ही आधुनिक कहा जाता है और भूतकाल भी कभी वर्तमान था यानी आधुनिक था | अर्थ ये है कि वर्तमान हमेशा आधुनिक रहा है, आधुनिक ही वर्तमान है | प्रकृति परिवर्तनशील है और जो लोग जड़ता की बात करते है वो अज्ञानी है| हर पिछली पीढ़ी को नयी पीढ़ी की आधुनिकता में खोट नज़र आता है|

आर्य समाज की शुरुआत 1875 में हुई तो क्या उस से पहले हमारे पूर्वजो को सामाजिकता और नैतिकता का ज्ञान नहीं था? क्या उनमें आध्यात्मिक ज्ञान, बल और चिंतन नहीं नही था? और उनका क्या जो आर्य समाज के अनुयायी ही नहीं है यानि वहाँ तो कोई नैतिकता, सामाजिकता और मर्यादाएं होगी ही नहीं ? क्या आर्यसमाजी होना ही इस समस्या का निदान है? क्या हर आर्यसमाजी व्यक्ति सभी सामाजिक मान मर्यादाओ का पूर्णतः पालन करता है ?

प्ररेणादायक स्तंभ की अनुपस्तिथि - किसी के लिये प्ररेणादायक स्रोत्र क्या है ये व्यक्ति विशेष के लिये अलग अलग है| कोई भी एक घटना, व्यक्ति या विचार सब के लिये प्ररेणादायक साबित नहीं हो सकता | इसलिए ये कहना कि प्ररेणादायक स्तंभ की अनुपस्तिथि है बिलकुल गलत धारणा है| मेरा मानना है कि हमें सबसे पहले प्ररेणा अपने माँ बाप दादा दादी नाना नानी आदि निकट सम्बन्धियों से ही मिलती हैं|

इस स्तिथि के कारक - गलत परवरिश, अशिक्षा, बड़े बुजुर्गो का आचरण, सामजिक परिवेश और रूढिवादिता |

समाधान - अच्छी परवरिश यानि माँ बाप और बच्चो के बीच का सम्बन्ध आत्मियता का हो | बडो का बच्चो पर अधिकारपूर्ण व्यवहार दोनों के दूरिया बढाता है| सामाजिक मर्यादाओ के सबसे अच्छे शिक्षक माँ बाप ही है हमें अपने बच्चो को समय समय पर सही बाते बताते रहना चाहिए लेकिन एक बात खास ध्यान रखना चाहिए कि बच्चो की नज़र में हम उपदेशक ना लगे बल्कि दोस्त की तरह से बाते बतानी चाहिए और उनके सवालों और जिज्ञासाओ के उत्तर देना भी बहुत जरूरी है| बच्चे की किसी गलती का पता लगते ही लठ्ठ लेके उनके पीछे भाजने से, उसकी गलती छिपाने की प्रवत्ति बढ़ेगी | बडो के आचारण का बच्चो पर गहरा प्रभाव पड़ता है यदि दादा हुक्का पीते हुए भी पोते तै कहे हुक्का पीना गलत है तो असर कितना होगा आप समझ ही सकते है| बच्चो को नादान समझ कर उनके सामने की जाने वाली बाते या क्रिया कलाप सबसे बड़ी दिक्कत पैदा करते है दरअसल बच्चे उतने नादान होते नहीं है जितने बड़े लोग सोचते है और उन सुनी हुयी बातो से या देखे गए व्यव्हार से पैदा हुयी उत्सुकता वश कई बच्चे गलती करते है| "बाप की जूती बेटे के पैर में आने लगे तो उसे दोस्त बना लेना चाहिए" ये बात मेरे दादा ने कही थी एक बार मेरे सामने मेरे पिताजी को | माँ बाप और बच्चो के बीच के संबंधों का मूलमन्त्र है ये | हमें अपने बच्चो के दोस्तों और उठ बैठ पर नज़र रखनी चाहिए गलत संगति में पड़ने से बचाना चाहिए | बच्चो को भी बडो की सलाह पर अमल करना चाहिए लेकिन ये बात भी तो हम बडो को ही उन्हें समझानी है |

अपवाद रूप में सब कुछ अच्छा होते हुए भी कुछ बच्चे गलत रस्ते पर चले जाते है|




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अंधी आधुनिकता, आर्य-समाज की अनुपस्थिति से पैदा हुई आध्यात्म तप और चिन्तन की रिक्तता, दूसरों (पड़ोसियों, सहकर्मियों, सहपाठियों, सहविचरणियों ) से बड़ा दिखने या बराबर का बनने की अस्थाई चंचलता और समाज में किसी कालजयी प्रेरणादायक सामाजिक सभ्यता के स्तंभ की अनुपस्थिति का हरियाणा के ग्रामीण आंचल में ईतना दुष्प्रभाव हो चुका है कि अबोध युवा-पीढ़ी (12 से 18 साल तक खासकर) नें अपने अनैतिक कार्यों की वैधता के लिए एक नया तकिया-कलाम गढ़ लिया है कि "जवानी में नहीं करेंगे तो कब करेंगे?" और यह तकिया कलाम बनाया गया है इन चीजों के लिए:

1) जवानी में नशा नहीं करेंगे तो फिर कब करेंगे?
2) इसी उम्र में आशिकी नहीं मारेंगे तो फिर कब मारेंगे (यहाँ अमर्यादित व् असामाजिक आशिकी का चलन ज्यादा निकल पड़ा है)|
 
तथाकथित बजुर्ग के हवाले कुछ बातें उठाई गयी है और बकौल फूल कुमार जी वो नयी पीढ़ी को आइना दिखाने वाली है| परन्तु कुछ प्रश्नचिह्न लगे है उनपर |

किसी व्यस्क व्यक्ति द्वारा गली में जाती किसी औरत की पीढ पर चढ जाने वाली अमर्यादित आचरण को जिस गौरवान्वित भाव में दिखाया है वो निंदनीय है| ये कौन तय करेगा कि किसकी आशिकी में वासना है और किसकी आशिकी में नहीं है| वो पैमाना क्या है जिस के आधार पर आप को आज सभी की आशिकी में वासना नज़र आती है और उन तथाकथित बजुर्ग की पीढ़ी में नहीं थी| एक महत्वपूर्ण सवाल यहाँ ये भी उठता है एक गाँव में कोई किसी का आशिक कैसे हो सकता है, जबकि गाँव में बहन, भाभी, चाची, ताई, बुआ, दादी के अलावा दूसरा कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता| क्या सामाजिक मान्यताए इस बात की इज़ाज़त देती है |




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मैंने आगे पूछा कि आप उलाहने वाली मुद्रा में कह रहे थे कि आशिकी क्या तुमनें ही सिखाई है दुनिया को? तो वह मूछों पर तांव देते हुक्के की गुड़गुड़ाहट लेते हुए ऐसे रोमांचित हुए जैसे रेगिस्तान की लू में सिसकते पौधे पर किसी नें पानी डाल दिया हो और रौब में आते हुए कहने लगे कि क्या तुम आज के जमानें में किसी गली जाती महिला की पीठ पर भाग के चढ़ सकते हो? मेरा अकस्मात विनय फूटा कि क्या आपको मेरी पीठ तुड्वानी है या मुझे जेल भिजवाना है? तो वो बोले कि ये देख लो तुम्हारे तथाकथित आधुनिक किन्तु सुरक्षा, सहनशीलता और निश्छलता से रहित जमाने की सच्चाई| फिर उन्होंने विजयी मुद्रा बनाते हुए कहा कि तेरे दादा इतने नौशिखिये होते थे कि गाँव की गली में चलती किसी भी औरत की पीठ पे जा चढ़ते थे और उल्लास का आलम ये होता था कि कोई बुरा नहीं मानती थी, ना कोई उलाहना होता था और वासना तो लेषमात्र भी नहीं| एक बात याद रखना बेटा जहां वासना हुई वहाँ आशिकी और प्यार नहीं होता| और आज की कच्ची उम्र से ही आशिकी में पड़ने वाली अधिकतर पीढ़ी आशिकी की चरम-प्रकाष्ठा के मार्ग में पड़ने वाली वासना के सागर को ही पार नहीं कर पाती तो आशिकी क्या ख़ाक करेंगे?

खेतों-खलिहानों में काम करते हुए, तीज-त्योहारों में अल्हड़ और मस्तियाँ करते हुए तेरे ही गाँव के कितने अनगिनत किस्से सुनाऊं जिनमें सिर्फ और सिर्फ आशिकी और प्यार हुआ करता था वासना तिल के दाने के बराबर भी नहीं| तुम युवा वर्ग ही देख लो आज के दिन, तेरी कितनी ऐसी भाभियों के पति यानी तेरे भाई हैं जो अपनी बीवियों को होली-फाग के दिन फाग खेलने देते हैं? कितने ऐसे हैं जो उनपे रंग डालने देते हैं? मैंने कहा कि सिर्फ 4-5 भाभियों के साथ खेलता हूँ, तो कहने लगे और गाँव में भाभियाँ कितनी हैं तेरी? तो मैंने उत्तर दिया सैंकड़ों में|

तो बुजुर्ग जैसे फूट पड़ा और झाड़ने लगा कि यही वो आधुनिकता है क्या जिसका चोला ओढ़े फिरते हो और समाज में आशिकी के पैरोकार बने फिरते हो? अरे हमारे जमाने में 4-5 तो वो होती थी जिनको कि देवर इतनी नैतिकता से मजबूर कर देते थे कि उनको कोरडा ले घरों से मैदान में उतरना ही पड़ता था होली खेलने को, और तुम अपने आप आपको आशिकी-प्यार के धनी कहते हो| जाओ बेटा जाओ और ढूंढ के लाओ उन घरों की चार-दीवारियों में जा सिकुड़े प्यार और खुलेपने को|

बेटा एक बात तो जरूर सीख ले आज इस बुजुर्ग से कि तुम लोग कम कपड़ों के पहनावे की आशिकी के पैरोकार हो और हम दिलों और अंतरात्मा की आशिकी के पैरोकार होते थे| तुम्हारी आशिकी तो कम कपड़ों में ही औरतों को देख नालों में बह निकलती है, जबकि हमारी आशिकी नालों में नहीं दिलों में बहती थी बेटा| मैं तो ऐसा जवाब सुन के भोंचक्का रह गया, कितनी बड़ी मील के पत्थर की बात कह दी इन बुजुर्ग ने|

अरे बेटा आज के जमाने में लोग आशिकी और नौशिखियेपन के जितने कंगाल हुए इतने मैंने कभी नहीं देखे| वो आगे कहते हैं कि क्या तुम आज के दिन अपनी बहन-बहु-बेटियों को गाँव के कुँए-जोहड़ों पे स्नान के लिए भेज सकते हो? मैंने चिंतित होते हुए कहा कि भेजना अरे मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता| तो वो कहते हैं जरा याद करो आज से 15-20 साल पहले कार्तिक के महीनों में कार्तिक स्नान के लिए गाँव-के-कुँए-जोहड़ों पर टोलियों में जाती बहु-बेटियों की स्वर-लहरियाँ| और एक पल को तो मैं भी गौरवान्वित हो ऊठा क्योंकि वो बचपन में सुनी लहरें आज भी मेरे जहन में कोंधती हुई सी दिखाई दी| मुझे सब स्मरण हो उठा कि कैसे सुव्यवस्थित तरीके से हर चीज होती थी और आदर, सम्मान और सयंम की तो ऐसी प्रकाष्ठा होती थी कि मर्द उन कुँए-जोहड़ों की तरफ जाने से कतराते थे जिधर बहु-बेटियाँ कार्तिक स्नान कर रही होती थी|
 
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