phoolkumar
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जवानी में नहीं तो फिर कब करेंगे:
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अंधी आधुनिकता, आर्य-समाज की अनुपस्थिति से पैदा हुई आध्यात्म तप और चिन्तन की रिक्तता, दूसरों (पड़ोसियों, सहकर्मियों, सहपाठियों, सहविचरणियों ) से बड़ा दिखने या बराबर का बनने की अस्थाई चंचलता और समाज में किसी कालजयी प्रेरणादायक सामाजिक सभ्यता के स्तंभ की अनुपस्थिति का हरियाणा के ग्रामीण आंचल में ईतना दुष्प्रभाव हो चुका है कि अबोध युवा-पीढ़ी (12 से 18 साल तक खासकर) नें अपने अनैतिक कार्यों की वैधता के लिए एक नया तकिया-कलाम गढ़ लिया है कि "जवानी में नहीं करेंगे तो कब करेंगे?" और यह तकिया कलाम बनाया गया है इन चीजों के लिए:
1) जवानी में नशा नहीं करेंगे तो फिर कब करेंगे?
2) इसी उम्र में आशिकी नहीं मारेंगे तो फिर कब मारेंगे (यहाँ अमर्यादित व् असामाजिक आशिकी का चलन ज्यादा निकल पड़ा है)|
यह तकिया-कलाम दुर्भाग्य से जिन चीजों के लिए होना चाहिए था उनके लिए नहीं हुआ, जैसे कि इस उम्र में अबोध जवानी की अवस्था में तप करना नहीं सीखेंगे तो कब सीखेंगे, शारीरिक इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना अब नहीं सीखेंगे तो कब सीखेंगे, जीवन के ध्येय (career) की जड़ें अभी से नहीं सींचेंगे तो फिर वह पेड़ कब बनेगा (जिसके लिए पढाई से ले, शारीरिक अनुशासन में स्वयं को ढालना होता है)| परन्तु काल की अवनति ऐसी पसर चुकी है कि ग्रामीण आँचल नें जैसे दूर की कौड़ी के युवा बनाने ही बंद कर दिए हों| किसी इक्का-दुक्का को छोड़ कर, सारे गरम पानी में उठते बुलबुले की भांति उछल के जब उपरी शीतलता को छूते हैं तो वापिस उसी पानी में समां जाते हैं|
आखिर इन पहलुओं पर समाज में खुल-कर चिंतन क्यों नहीं हो रहा? गावों के बुजुर्ग तो इतने निर्जीव और आशाहीन हो गए हैं कि वो घुण के साथ चना पीसने लग गए हैं अर्थात गाँव के शरीफ और शालीन बच्चों को भी शरारती-तत्वों की श्रेणी में खड़ा कर तोलने लग गए हैं| एक बुजुर्ग से गाँव में बच्चों के लिए एक सुविधा-संपन खेल-क्रीडा केंद्र बनाने की बात कही तो उलाहना देने लगे कि क्या लाभ इनमें से अधिकतर तो जार बन चुके हैं, इनके लिए सुविधाएँ बना भी दी तो सारी मेहनत को जारी में खो देंगे?
जारी का जब उन्होंने प्रश्न उठाया तो मैंने पूछा कि जारी को तो आजकल आशिकी कहते हैं, तो भड़कते हुए बोले की आशिकी जैसी पाक चीज को जारी का चोला पहना कलंकित मत करो, बेटा| वो भावनाओं में बहते हुए कहने लगे कि तुम्हें क्या लगता है कि तुम्हारी (लेखक की) पीढ़ी नें ही आशिकी सिखाई है दुनिया को? हम लोग क्या जानवर थे कि एक असभ्य जानवर समाज की भांति जिससे चाहा सम्भोग किया और तुम (लेखक) पैदा हो गए? (लेखक एक पल को तो अचम्भे में पड़ गया कि ऐसे भोले से इंसान को जिसको कि आज के तथाकथिक NGO चलित जमाने नें प्यार के दुश्मन करार दे दिया है उनके अंदर प्यार को ले के इतना दर्द?)
मर्म के स्पर्श से उदरित उस बुजुर्ग नें आगे कहना जारी रखा और कहने लगे बेटा मुझे एक बात बताओ, तुम तो एक कृषक समाज में जन्मे हो हर चीज अपनी आँखों से देखी है, क्या गाँव का सरकारी सांड हल में उतना लम्बा चल सकता है जितनी देर कि एक उन्ना बनाया हुआ बैल? मैंने जब पूछा कि उन्ना क्या होता है तो वो बोले कि जिस बैल की वीर्यपात की रग को कुंध (यानी बंद) कर दिया जाए उस बैल को उन्ना बैल कहते हैं| और जब तक बैल को उन्ना नहीं बनाया जाता वो हल में घंटो, दिन-रातों जुत के हल को नहीं खींच सकता| वो बोले कि गोह्के (बछड़े-सांड) में इतनी उत्तेजना होती है कि अगर उनको उन्ना ना बनाया जाये तो वो हल में जुतें ही नहीं अपितु उत्तेजना-वश इतने उछलें कि वो हल की फाल को खुद अपने ही पैरों में मरवा बैठें| इस पर मैंने पूछा कि भैसों को तो कभी उन्ना नहीं बनाया जाता; तो कहने लगे कि तो फिर भैंसे कहाँ हल में जोते जाते हैं?
तो वो इस उदहारण से बात जोड़ते हुए आगे कहते हैं कि जिस तरीके से खेतों में पिलने के लिए एक बैल के वीर्य का पात बंद किया जाता है तो वो लम्बा चलता है, उसी तरह खेती करने की इच्छा वाले या खेती में कारोबार करने वाले इंसान के लिए भी अति-अनिवार्य है कि वो इस वीर्य का जितना हो सके उतना संचय करे अन्यथा खेती में तो मन-वांछित लाभ होगा ही नहीं साथ ही चारित्रिक पतन, आलस, इर्ष्या भी इंसान में घर कर लेती है| और इसीलिए तो पुराने जमाने में गावों में जब भी नौटंकियाँ आती थी उनमें बच्चों को नहीं जाने दिया जाता था| क्योंकि इन नौटंकियों में जो कामुक नृत्य होते थे उनसे शारीरिक नियन्त्रण विच्छेदित हो जाता था, क्योंकि अबोध-जवानी की उम्र वृक्ष की टहनी पर झूल रहे पत्ते की तरह होती है कि जिधर की भी हवा का झोंका आया उधर ही बह निकला| और मैं माथा पकड़ सोचने लगा कि तो यह कारण होता था मेरे दादा जी की हर उस ना के पीछे जिसमें मैं उनसे नौटंकी देखने जाने की जिद्द किया करता था और वो मुझे डांट देते थे|
मैंने आगे पूछा कि आप उलाहने वाली मुद्रा में कह रहे थे कि आशिकी क्या तुमनें ही सिखाई है दुनिया को? तो वह मूछों पर तांव देते हुक्के की गुड़गुड़ाहट लेते हुए ऐसे रोमांचित हुए जैसे रेगिस्तान की लू में सिसकते पौधे पर किसी नें पानी डाल दिया हो और रौब में आते हुए कहने लगे कि क्या तुम आज के जमानें में किसी गली जाती महिला की पीठ पर भाग के चढ़ सकते हो? मेरा अकस्मात विनय फूटा कि क्या आपको मेरी पीठ तुड्वानी है या मुझे जेल भिजवाना है? तो वो बोले कि ये देख लो तुम्हारे तथाकथित आधुनिक किन्तु सुरक्षा, सहनशीलता और निश्छलता से रहित जमाने की सच्चाई| फिर उन्होंने विजयी मुद्रा बनाते हुए कहा कि तेरे दादा इतने नौशिखिये होते थे कि गाँव की गली में चलती किसी भी औरत की पीठ पे जा चढ़ते थे और उल्लास का आलम ये होता था कि कोई बुरा नहीं मानती थी, ना कोई उलाहना होता था और वासना तो लेषमात्र भी नहीं| एक बात याद रखना बेटा जहां वासना हुई वहाँ आशिकी और प्यार नहीं होता| और आज की कच्ची उम्र से ही आशिकी में पड़ने वाली अधिकतर पीढ़ी आशिकी की चरम-प्रकाष्ठा के मार्ग में पड़ने वाली वासना के सागर को ही पार नहीं कर पाती तो आशिकी क्या ख़ाक करेंगे?
खेतों-खलिहानों में काम करते हुए, तीज-त्योहारों में अल्हड़ और मस्तियाँ करते हुए तेरे ही गाँव के कितने अनगिनत किस्से सुनाऊं जिनमें सिर्फ और सिर्फ आशिकी और प्यार हुआ करता था वासना तिल के दाने के बराबर भी नहीं| तुम युवा वर्ग ही देख लो आज के दिन, तेरी कितनी ऐसी भाभियों के पति यानी तेरे भाई हैं जो अपनी बीवियों को होली-फाग के दिन फाग खेलने देते हैं? कितने ऐसे हैं जो उनपे रंग डालने देते हैं? मैंने कहा कि सिर्फ 4-5 भाभियों के साथ खेलता हूँ, तो कहने लगे और गाँव में भाभियाँ कितनी हैं तेरी? तो मैंने उत्तर दिया सैंकड़ों में|
तो बुजुर्ग जैसे फूट पड़ा और झाड़ने लगा कि यही वो आधुनिकता है क्या जिसका चोला ओढ़े फिरते हो और समाज में आशिकी के पैरोकार बने फिरते हो? अरे हमारे जमाने में 4-5 तो वो होती थी जिनको कि देवर इतनी नैतिकता से मजबूर कर देते थे कि उनको कोरडा ले घरों से मैदान में उतरना ही पड़ता था होली खेलने को, और तुम अपने आप आपको आशिकी-प्यार के धनी कहते हो| जाओ बेटा जाओ और ढूंढ के लाओ उन घरों की चार-दीवारियों में जा सिकुड़े प्यार और खुलेपने को|
बेटा एक बात तो जरूर सीख ले आज इस बुजुर्ग से कि तुम लोग कम कपड़ों के पहनावे की आशिकी के पैरोकार हो और हम दिलों और अंतरात्मा की आशिकी के पैरोकार होते थे| तुम्हारी आशिकी तो कम कपड़ों में ही औरतों को देख नालों में बह निकलती है, जबकि हमारी आशिकी नालों में नहीं दिलों में बहती थी बेटा| मैं तो ऐसा जवाब सुन के भोंचक्का रह गया, कितनी बड़ी मील के पत्थर की बात कह दी इन बुजुर्ग ने|
अरे बेटा आज के जमाने में लोग आशिकी और नौशिखियेपन के जितने कंगाल हुए इतने मैंने कभी नहीं देखे| वो आगे कहते हैं कि क्या तुम आज के दिन अपनी बहन-बहु-बेटियों को गाँव के कुँए-जोहड़ों पे स्नान के लिए भेज सकते हो? मैंने चिंतित होते हुए कहा कि भेजना अरे मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता| तो वो कहते हैं जरा याद करो आज से 15-20 साल पहले कार्तिक के महीनों में कार्तिक स्नान के लिए गाँव-के-कुँए-जोहड़ों पर टोलियों में जाती बहु-बेटियों की स्वर-लहरियाँ| और एक पल को तो मैं भी गौरवान्वित हो ऊठा क्योंकि वो बचपन में सुनी लहरें आज भी मेरे जहन में कोंधती हुई सी दिखाई दी| मुझे सब स्मरण हो उठा कि कैसे सुव्यवस्थित तरीके से हर चीज होती थी और आदर, सम्मान और सयंम की तो ऐसी प्रकाष्ठा होती थी कि मर्द उन कुँए-जोहड़ों की तरफ जाने से कतराते थे जिधर बहु-बेटियाँ कार्तिक स्नान कर रही होती थी|
फिर वो कहने लगे कि कृषि का कारोबार ही ऐसा है कि इसमें मानसिक के साथ-साथ शारीरिक सुदृढ़ता जरूरी होती आई जो आज की अंधी आधुनिकता में बही जा रही पीढ़ी समझना ही नहीं चाहती| अरे बेटा नया मकान भी जब बनाया जाता है तो उसको तराई-लिपाई-धुप सिंकाई करके और उसके नीचे एक सुदृढ़ नींव कूट-कूट के जमा के ही तो मकान में रहने के लिए प्रवेश किया जाता है? और यही कहानी इस शरीर रुपी मकान की है|
लेकिन आज के जमाने के तथाकथित अंधों में काणे राजों जैसे कुछ चुनिन्दा NGOs और communal संगठन तो इतने धैर्यहीन और उतावले दीखते हैं जैसे समाज से इंसान और जानवर का भेदभाव मिटा दोनों को एक ही श्रेणी में ला खड़ा कर देना चाहते हों और बच्चे को पैदा होते ही टारजन समझते हों कि इसके शरीर और चेतना को जो चाहे परोस दो इसकी सेहत और व्यक्तित्व पे तो कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा| जो अबोध उम्र वीर्य-धैर्य को संचित कर तपा के एक सुसंगठित शरीर और दिमाग बनाने की होती है उसमें ही इनका पात हो रहा होगा तो भला कैसे कोई समाज राष्ट्र के लिए राष्ट्र के प्रणेता पैदा कर पायेगा?
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अंधी आधुनिकता, आर्य-समाज की अनुपस्थिति से पैदा हुई आध्यात्म तप और चिन्तन की रिक्तता, दूसरों (पड़ोसियों, सहकर्मियों, सहपाठियों, सहविचरणियों ) से बड़ा दिखने या बराबर का बनने की अस्थाई चंचलता और समाज में किसी कालजयी प्रेरणादायक सामाजिक सभ्यता के स्तंभ की अनुपस्थिति का हरियाणा के ग्रामीण आंचल में ईतना दुष्प्रभाव हो चुका है कि अबोध युवा-पीढ़ी (12 से 18 साल तक खासकर) नें अपने अनैतिक कार्यों की वैधता के लिए एक नया तकिया-कलाम गढ़ लिया है कि "जवानी में नहीं करेंगे तो कब करेंगे?" और यह तकिया कलाम बनाया गया है इन चीजों के लिए:
1) जवानी में नशा नहीं करेंगे तो फिर कब करेंगे?
2) इसी उम्र में आशिकी नहीं मारेंगे तो फिर कब मारेंगे (यहाँ अमर्यादित व् असामाजिक आशिकी का चलन ज्यादा निकल पड़ा है)|
यह तकिया-कलाम दुर्भाग्य से जिन चीजों के लिए होना चाहिए था उनके लिए नहीं हुआ, जैसे कि इस उम्र में अबोध जवानी की अवस्था में तप करना नहीं सीखेंगे तो कब सीखेंगे, शारीरिक इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना अब नहीं सीखेंगे तो कब सीखेंगे, जीवन के ध्येय (career) की जड़ें अभी से नहीं सींचेंगे तो फिर वह पेड़ कब बनेगा (जिसके लिए पढाई से ले, शारीरिक अनुशासन में स्वयं को ढालना होता है)| परन्तु काल की अवनति ऐसी पसर चुकी है कि ग्रामीण आँचल नें जैसे दूर की कौड़ी के युवा बनाने ही बंद कर दिए हों| किसी इक्का-दुक्का को छोड़ कर, सारे गरम पानी में उठते बुलबुले की भांति उछल के जब उपरी शीतलता को छूते हैं तो वापिस उसी पानी में समां जाते हैं|
आखिर इन पहलुओं पर समाज में खुल-कर चिंतन क्यों नहीं हो रहा? गावों के बुजुर्ग तो इतने निर्जीव और आशाहीन हो गए हैं कि वो घुण के साथ चना पीसने लग गए हैं अर्थात गाँव के शरीफ और शालीन बच्चों को भी शरारती-तत्वों की श्रेणी में खड़ा कर तोलने लग गए हैं| एक बुजुर्ग से गाँव में बच्चों के लिए एक सुविधा-संपन खेल-क्रीडा केंद्र बनाने की बात कही तो उलाहना देने लगे कि क्या लाभ इनमें से अधिकतर तो जार बन चुके हैं, इनके लिए सुविधाएँ बना भी दी तो सारी मेहनत को जारी में खो देंगे?
जारी का जब उन्होंने प्रश्न उठाया तो मैंने पूछा कि जारी को तो आजकल आशिकी कहते हैं, तो भड़कते हुए बोले की आशिकी जैसी पाक चीज को जारी का चोला पहना कलंकित मत करो, बेटा| वो भावनाओं में बहते हुए कहने लगे कि तुम्हें क्या लगता है कि तुम्हारी (लेखक की) पीढ़ी नें ही आशिकी सिखाई है दुनिया को? हम लोग क्या जानवर थे कि एक असभ्य जानवर समाज की भांति जिससे चाहा सम्भोग किया और तुम (लेखक) पैदा हो गए? (लेखक एक पल को तो अचम्भे में पड़ गया कि ऐसे भोले से इंसान को जिसको कि आज के तथाकथिक NGO चलित जमाने नें प्यार के दुश्मन करार दे दिया है उनके अंदर प्यार को ले के इतना दर्द?)
मर्म के स्पर्श से उदरित उस बुजुर्ग नें आगे कहना जारी रखा और कहने लगे बेटा मुझे एक बात बताओ, तुम तो एक कृषक समाज में जन्मे हो हर चीज अपनी आँखों से देखी है, क्या गाँव का सरकारी सांड हल में उतना लम्बा चल सकता है जितनी देर कि एक उन्ना बनाया हुआ बैल? मैंने जब पूछा कि उन्ना क्या होता है तो वो बोले कि जिस बैल की वीर्यपात की रग को कुंध (यानी बंद) कर दिया जाए उस बैल को उन्ना बैल कहते हैं| और जब तक बैल को उन्ना नहीं बनाया जाता वो हल में घंटो, दिन-रातों जुत के हल को नहीं खींच सकता| वो बोले कि गोह्के (बछड़े-सांड) में इतनी उत्तेजना होती है कि अगर उनको उन्ना ना बनाया जाये तो वो हल में जुतें ही नहीं अपितु उत्तेजना-वश इतने उछलें कि वो हल की फाल को खुद अपने ही पैरों में मरवा बैठें| इस पर मैंने पूछा कि भैसों को तो कभी उन्ना नहीं बनाया जाता; तो कहने लगे कि तो फिर भैंसे कहाँ हल में जोते जाते हैं?
तो वो इस उदहारण से बात जोड़ते हुए आगे कहते हैं कि जिस तरीके से खेतों में पिलने के लिए एक बैल के वीर्य का पात बंद किया जाता है तो वो लम्बा चलता है, उसी तरह खेती करने की इच्छा वाले या खेती में कारोबार करने वाले इंसान के लिए भी अति-अनिवार्य है कि वो इस वीर्य का जितना हो सके उतना संचय करे अन्यथा खेती में तो मन-वांछित लाभ होगा ही नहीं साथ ही चारित्रिक पतन, आलस, इर्ष्या भी इंसान में घर कर लेती है| और इसीलिए तो पुराने जमाने में गावों में जब भी नौटंकियाँ आती थी उनमें बच्चों को नहीं जाने दिया जाता था| क्योंकि इन नौटंकियों में जो कामुक नृत्य होते थे उनसे शारीरिक नियन्त्रण विच्छेदित हो जाता था, क्योंकि अबोध-जवानी की उम्र वृक्ष की टहनी पर झूल रहे पत्ते की तरह होती है कि जिधर की भी हवा का झोंका आया उधर ही बह निकला| और मैं माथा पकड़ सोचने लगा कि तो यह कारण होता था मेरे दादा जी की हर उस ना के पीछे जिसमें मैं उनसे नौटंकी देखने जाने की जिद्द किया करता था और वो मुझे डांट देते थे|
मैंने आगे पूछा कि आप उलाहने वाली मुद्रा में कह रहे थे कि आशिकी क्या तुमनें ही सिखाई है दुनिया को? तो वह मूछों पर तांव देते हुक्के की गुड़गुड़ाहट लेते हुए ऐसे रोमांचित हुए जैसे रेगिस्तान की लू में सिसकते पौधे पर किसी नें पानी डाल दिया हो और रौब में आते हुए कहने लगे कि क्या तुम आज के जमानें में किसी गली जाती महिला की पीठ पर भाग के चढ़ सकते हो? मेरा अकस्मात विनय फूटा कि क्या आपको मेरी पीठ तुड्वानी है या मुझे जेल भिजवाना है? तो वो बोले कि ये देख लो तुम्हारे तथाकथित आधुनिक किन्तु सुरक्षा, सहनशीलता और निश्छलता से रहित जमाने की सच्चाई| फिर उन्होंने विजयी मुद्रा बनाते हुए कहा कि तेरे दादा इतने नौशिखिये होते थे कि गाँव की गली में चलती किसी भी औरत की पीठ पे जा चढ़ते थे और उल्लास का आलम ये होता था कि कोई बुरा नहीं मानती थी, ना कोई उलाहना होता था और वासना तो लेषमात्र भी नहीं| एक बात याद रखना बेटा जहां वासना हुई वहाँ आशिकी और प्यार नहीं होता| और आज की कच्ची उम्र से ही आशिकी में पड़ने वाली अधिकतर पीढ़ी आशिकी की चरम-प्रकाष्ठा के मार्ग में पड़ने वाली वासना के सागर को ही पार नहीं कर पाती तो आशिकी क्या ख़ाक करेंगे?
खेतों-खलिहानों में काम करते हुए, तीज-त्योहारों में अल्हड़ और मस्तियाँ करते हुए तेरे ही गाँव के कितने अनगिनत किस्से सुनाऊं जिनमें सिर्फ और सिर्फ आशिकी और प्यार हुआ करता था वासना तिल के दाने के बराबर भी नहीं| तुम युवा वर्ग ही देख लो आज के दिन, तेरी कितनी ऐसी भाभियों के पति यानी तेरे भाई हैं जो अपनी बीवियों को होली-फाग के दिन फाग खेलने देते हैं? कितने ऐसे हैं जो उनपे रंग डालने देते हैं? मैंने कहा कि सिर्फ 4-5 भाभियों के साथ खेलता हूँ, तो कहने लगे और गाँव में भाभियाँ कितनी हैं तेरी? तो मैंने उत्तर दिया सैंकड़ों में|
तो बुजुर्ग जैसे फूट पड़ा और झाड़ने लगा कि यही वो आधुनिकता है क्या जिसका चोला ओढ़े फिरते हो और समाज में आशिकी के पैरोकार बने फिरते हो? अरे हमारे जमाने में 4-5 तो वो होती थी जिनको कि देवर इतनी नैतिकता से मजबूर कर देते थे कि उनको कोरडा ले घरों से मैदान में उतरना ही पड़ता था होली खेलने को, और तुम अपने आप आपको आशिकी-प्यार के धनी कहते हो| जाओ बेटा जाओ और ढूंढ के लाओ उन घरों की चार-दीवारियों में जा सिकुड़े प्यार और खुलेपने को|
बेटा एक बात तो जरूर सीख ले आज इस बुजुर्ग से कि तुम लोग कम कपड़ों के पहनावे की आशिकी के पैरोकार हो और हम दिलों और अंतरात्मा की आशिकी के पैरोकार होते थे| तुम्हारी आशिकी तो कम कपड़ों में ही औरतों को देख नालों में बह निकलती है, जबकि हमारी आशिकी नालों में नहीं दिलों में बहती थी बेटा| मैं तो ऐसा जवाब सुन के भोंचक्का रह गया, कितनी बड़ी मील के पत्थर की बात कह दी इन बुजुर्ग ने|
अरे बेटा आज के जमाने में लोग आशिकी और नौशिखियेपन के जितने कंगाल हुए इतने मैंने कभी नहीं देखे| वो आगे कहते हैं कि क्या तुम आज के दिन अपनी बहन-बहु-बेटियों को गाँव के कुँए-जोहड़ों पे स्नान के लिए भेज सकते हो? मैंने चिंतित होते हुए कहा कि भेजना अरे मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता| तो वो कहते हैं जरा याद करो आज से 15-20 साल पहले कार्तिक के महीनों में कार्तिक स्नान के लिए गाँव-के-कुँए-जोहड़ों पर टोलियों में जाती बहु-बेटियों की स्वर-लहरियाँ| और एक पल को तो मैं भी गौरवान्वित हो ऊठा क्योंकि वो बचपन में सुनी लहरें आज भी मेरे जहन में कोंधती हुई सी दिखाई दी| मुझे सब स्मरण हो उठा कि कैसे सुव्यवस्थित तरीके से हर चीज होती थी और आदर, सम्मान और सयंम की तो ऐसी प्रकाष्ठा होती थी कि मर्द उन कुँए-जोहड़ों की तरफ जाने से कतराते थे जिधर बहु-बेटियाँ कार्तिक स्नान कर रही होती थी|
फिर वो कहने लगे कि कृषि का कारोबार ही ऐसा है कि इसमें मानसिक के साथ-साथ शारीरिक सुदृढ़ता जरूरी होती आई जो आज की अंधी आधुनिकता में बही जा रही पीढ़ी समझना ही नहीं चाहती| अरे बेटा नया मकान भी जब बनाया जाता है तो उसको तराई-लिपाई-धुप सिंकाई करके और उसके नीचे एक सुदृढ़ नींव कूट-कूट के जमा के ही तो मकान में रहने के लिए प्रवेश किया जाता है? और यही कहानी इस शरीर रुपी मकान की है|
लेकिन आज के जमाने के तथाकथित अंधों में काणे राजों जैसे कुछ चुनिन्दा NGOs और communal संगठन तो इतने धैर्यहीन और उतावले दीखते हैं जैसे समाज से इंसान और जानवर का भेदभाव मिटा दोनों को एक ही श्रेणी में ला खड़ा कर देना चाहते हों और बच्चे को पैदा होते ही टारजन समझते हों कि इसके शरीर और चेतना को जो चाहे परोस दो इसकी सेहत और व्यक्तित्व पे तो कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा| जो अबोध उम्र वीर्य-धैर्य को संचित कर तपा के एक सुसंगठित शरीर और दिमाग बनाने की होती है उसमें ही इनका पात हो रहा होगा तो भला कैसे कोई समाज राष्ट्र के लिए राष्ट्र के प्रणेता पैदा कर पायेगा?
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