A View on Gandhi

[h=5]मित्रों ! कल 30 जनवरी है अर्थात "राष्ट्रीय कलंक मुक्ति दिवस". आप लोगों का तो ज्ञात नहीं पर मैं कल मंदिर में जाकर प्रसाद चढाऊंगा। [/h][h=5][/h]
 
"अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च: l"




(अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है और धर्म रक्षार्थ हिंसा भी उसी प्रकार श्रेष्ठ है)




Ahimsa Paramo Dharma Dharma himsa tathaiva cha.


(Non-violence is the ultimate dharma. So too is violence in service of Dharma).







भारत में स्वयंभू अहिंसा का पुजारी का ढोंग करने वाला गाँधी हिन्दुओं की सभा में सदैव यही श्लोक पढता था किन्तु हिन्दुओं को कायर रखने के लिए गांधी इस श्लोक को अधूरा ही पढ़ता था जिससे हिन्दुओं का धार्मिक रक्त उबल न पड़े। इसमें कोई संशय नहीं कि अहिंसा बहुत ही स्वीकार्य और महान सोच है परन्तु उसी के साथ हिन्दुओं / सनातनियो को अपने धर्म की रक्षा (राष्ट्र धर्म,मानवता, प्रकृति, कर्त्तव्य रक्षा, समाज रक्षा, गृहस्थ रक्षा अर्थात जितने धार्मिक कर्तव्य हैं ) के आड़े आने वाली प्रत्येक बाधा को समाप्त करने के लिए की गयी आवश्यक हिंसा उतनी ही श्रेष्ठ है। अपने बन्धु-बान्धवों की रक्षा राष्ट्र रक्षा का एक भाग जिसमें यदि हिंसा आवश्यक है तो करना श्रेष्ठ है।
 
[h=5]गाँधी और वीर सावरकर के बीच मुलाकात और बातचीत।
ये वीडियो दिखाता है कि महात्मा गाँधी और वीर सावरकर की सोच मे कितने मतभेद थे।
कितना अंतर था इनकी सोच में।
सावरकर हिंदुत्व को संगठित करना चाहते थे कास्ट सिस्टम को तोड़ कर। गाँधी इसके विरुद्ध था।
सावरकर गाँधी को बोलते हैं कि जो लोग धर्म परिवर्तन करके पछता रहे हैं उन्हें पुनः हिंदू धर्म मे लाना चाहिए। गाँधी इसका भी विरोध करता है।

आप ही बताइए इनमें से "महात्मा" कौन था?

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता विनायक दामोदर सावरकर जी के जन्मदिन पर उनको शत शत नमन |


पूरी बातचीत के लिए वीडियो देखें।




http://www.youtube.com/watch?v=f2QJQ52Utl8
[/h]


Savarkar meets Gandhi at Ratnagiri
[url]www.youtube.comVinayak
Damodar Savarkar meets Mahatma Gandhi at Ratnagiri. Clip from the movie Veer Savarkar.

[/URL]



 
नाथूराम गोडसे का अंतिम बयान
{इसे सुनकर अदालत में उपस्थित
सभी लोगों की आँखे नम हो गई
थी और कई तो रोने लगे थे एक जज महोदय ने
अपनी टिप्पणी में लिखा था कि यदि उस
समय अदालत में उपस्थित लोगो को जूरी बनाया जाता और उनसे
निर्णय देने को कहा जाता तो निःसंदेह वे प्रचंड बहुमत से नाथूराम के निर्दोष होने
का निर्देश देते।
नाथूराम ने कोर्ट में कहा --

"सम्मान ,कर्तव्य और अपने देश
वासियों के प्रति प्यार कभी कभी हमे
अहिंसा के सिद्धांत से हटने के लिए
बाध्य कर देता है।
में कभी यह नहीं मान सकता कि किसी आक्रामक का सशस्त्र प्रतिरोध करना कभी गलत अथवा अन्याय
पूर्ण भी हो सकता है।
प्रतिरोध करने और यदि संभव हो तो ऐसे शत्रु को बलपूर्वक वश में
करना, मैं एक धार्मिक और नैतिक कर्तव्य मानता हूँ।
मुसलमान अपनी मनमानी कर रहे
थे या तो कांग्रेस
उनकी इच्छा के सामने आत्मसर्पण कर दे
और उनकी सनक ,मनमानी और आदिम
रवैये के स्वर में स्वर मिलाये अथवा उनके
बिना काम चलाये। वे अकेले ही प्रत्येक
वस्तु और व्यक्ति के निर्णायक थे।
गाँधी अपने लिए जूरी और जज
दोनों था। गाँधी ने मुस्लिमो को प्रसन्न
करने के लिए हिंदी भाषा के सौंदर्य और
सुन्दरता के साथ बलात्कार किया।
गाँधी के सारे प्रयोग केवल और केवल
हिन्दुओ के मूल्य पर किये जाते थे।
जो कांग्रेस अपनी देश भक्ति और
समाज वाद का दंभ भरा करती थी।
उसी ने गुप्त रूप से बन्दूक की नोक पर
'धूम्रलोचन पाकिस्तान' को स्वीकार कर लिया और
जिन्ना के सामने नीचता से आत्मसमर्पण कर दिया। मुस्लिम
तुष्टिकरण की नीति के कारण भारत माता के टुकड़े कर दिए गए।
और 15 अगस्त 1947 के पश्चात देश का एक
तिहाई भाग हमारे लिए ही विदेशी भूमि बन गई।
नेहरु तथा उसकी भीड़ की स्वीकृति के
साथ ही एक धर्म के आधार पर नया देश
बना दिया गया। इसी को वे
बलिदानों द्वारा जीती गई स्वतन्त्रता
कहते हैं किसका बलिदान?
जब कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने गाँधी की
सहमति से इस देश को काट डाला ,जिसे
हम पूजा की वस्तु मानते हैं
तो मेरा मस्तिष्क भयंकर क्रोध से भर
गया। में साहस पूर्वक कहता हूँ
कि गाँधी अपने कर्तव्य में असफल हो गया
उसने स्वयं को पाकिस्तान
का पिता होना सिद्ध किया।
मैं कहता हूँ कि मेरी गोलियाँ एक ऐसे
व्यक्ति पर चलाई गई थी ,जिसकी नीतियों और
कार्यों से करोडो हिन्दुओं को केवल
बर्बादी और विनाश ही मिला ऐसी कोई
क़ानूनी प्रक्रिया नहीं थी जिसके
द्वारा उस अपराधी को दंड दिया
जा सके इसलिये मैंने इस घातक मार्ग का अनुसरण किया।
मैं अपने लिए क्षमा की प्रार्थना नहीं करूँगा। जो मैंने
किया उस पर मुझे गर्व है।. मुझे कोई सन्देह
नहीं है कि इतिहास के निष्ठावान लेखक
मेरे कार्य का भार तौल कर भविष्य में
किसी दिन इसका सही मूल्याँकन करेंगे।
जब तक सिन्धु नदी भारत के ध्वज के
नीचे से ना बहे तब तक
मेरी अस्थियों का विसर्जन मत करना।"

 
गाँधी का पाखंड और तानाशाही

"सादा जीवन उच्च विचार" का दम भरने वाले मूर्खात्मा गाँधी वास्तव में पाखंड और तानाशाही की मिसाल थे. उनके पाखंड के एक नहीं अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं. कभी गाय को पवित्र मानने वाले गाँधी ने किसी मूर्ख आदमी के कहने पर दूध एकदम छोड़ दिया था और जिंदगी भर दूध न पीने का संकल्प किया था. लेकिन जब इसके बिना काम न चला तो गाय या भैंस की जगह बकरी का दूध पीना शुरू कर दिया. यह पाखंड नहीं तो क्या है? अगर दूध ही पीना था तो अत्यंत गुणकारी गोदुग्ध पीना चाहिए था.
इसी तरह वे गरीबी में रहने का पाखंड करते थे. वे गरीबों की तरह रेल में तीसरी श्रेणी में यात्रा करते थे. लेकिन उनके लिए उनके चेले पूरा डिब्बे पर कब्ज़ा कर लेते थे. इस गुंडागर्दी का गाँधी विरोध नहीं करते थे और यह मान लेते थे कि उनके लिए जनता ने खुद डिब्बा खाली छोड़ दिया है. वे बकरी का दूध पीते थे, इसलिए हर जगह बकरी उनके साथ ही जाती थी. वे इस बात की चिंता नहीं करते थे कि इस पर कितना खर्च होगा. सरोजिनी नायडू ने एक बार स्पष्ट स्वीकार किया था कि गाँधी को गरीब बनाये रखने में हमें बहुत धन खर्च करना पड़ता है.
स्वभाव से गाँधी अधिनायकवादी थे. अपनी बात किसी भी प्रकार से सबसे मनवा लेते थे. उनके इस तानाशाही स्वभाव को देखकर ही एक बार किसी विदेशी विद्वान ने कहा था कि यदि इस आदमी के हाथ में कभी सत्ता आई, तो यह इतिहास का सबसे नृशंस और निकृष्ट तानाशाह सिद्ध होगा. गाँधी की इस प्रवृति का स्वाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को बार-बार चखना पड़ता था. हर आन्दोलन को वे चरम पर पहुँचने के बाद भी उद्देश्य पूरा होने से पहले ही वापस ले लेते थे. इसी कारण कांग्रेस द्वारा चलाये गए सारे आन्दोलन बुरी तरह असफल रहे.
एक बार कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारी बहुमत से जीत गए और गाँधी के उम्मीदवार प. सीतारामैय्या बुरी तरह हार गए. गाँधी इस हार को नहीं पचा सके. उन्होंने इसे व्यक्तिगत हार माना और नेताजी के प्रति असहयोग का रवैय्या अपना लिया. उनके चमचे कई नेताओं जैसे नेहरु, आजाद आदि ने भी ऐसा ही किया. मजबूर होकर नेताजी को अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देना पड़ा और वे कांग्रेस को भी छोड़ गए. गाँधी की तानाशाही इस घटना से सबके सामने नंगी हो गयी.
 
"मूर्ख आदमी के कहने पर दूध एकदम छोड़ दिया था और जिंदगी भर दूध न पीने का संकल्प किया था , अगर दूध ही पीना था तो अत्यंत गुणकारी गोदुग्ध पीना चाहिए था."

As per me , this is personal choice . Also , Milk is boon for kids not for adults .some lactose intolerance thing .

"
लेकिन उनके लिए उनके चेले पूरा डिब्बे पर कब्ज़ा कर लेते थे. इस गुंडागर्दी का गाँधी विरोध नहीं करते थे और यह मान लेते थे कि उनके लिए जनता ने खुद डिब्बा खाली छोड़ दिया है"
N how can we say so , some assumption or different view point .

"
सरोजिनी नायडू ने एक बार स्पष्ट स्वीकार किया था कि गाँधी को गरीब बनाये रखने में हमें बहुत धन खर्च करना पड़ता है."
Well this is good fact by Sarojini against Gandhi , how some anti congress has not use this fact yet .( if this is fact )

"
तो यह इतिहास का सबसे नृशंस और निकृष्ट तानाशाह सिद्ध होगा"
Now this is new , somebody who had used non violence thing -----could be a Brutal ruler .

A leader is one who has followers , n Gandhi had big mass of followers . There could be 2 reasons for this 1- Either he had some charisma that no one could escape or 2- Followers were blind ....dhhhhh just following with no reason ...,Possible hai " One eyed man rules the kingdom of blind people -kuch aise hi ek quote hai "

"चुनाव में नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारी बहुमत से जीत गए"
Even I heard something like that , as per the version I had heard . Kuch tha , n majority had nominated Neta ji's name . Then Gandhi ji wrote something on a piece of paper n handed over to Neta ji - he read it n withdraw his nomination .
Ab usmie kya likha tha , no body knew just 2 people Gandhi ji and Neta ji .

We all know there were 2 groups Moderates and extremists . No one was better or worse just different ways . People as per their choice opted either of the group .
 
गाँधी का पाखंड और तानाशाही

"सादा जीवन उच्च विचार" का दम भरने वाले मूर्खात्मा गाँधी वास्तव में पाखंड और तानाशाही की मिसाल थे. उनके पाखंड के एक नहीं अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं. कभी गाय को पवित्र मानने वाले गाँधी ने किसी मूर्ख आदमी के कहने पर दूध एकदम छोड़ दिया था और जिंदगी भर दूध न पीने का संकल्प किया था. लेकिन जब इसके बिना काम न चला तो गाय या भैंस की जगह बकरी का दूध पीना शुरू कर दिया. यह पाखंड नहीं तो क्या है? अगर दूध ही पीना था तो अत्यंत गुणकारी गोदुग्ध पीना चाहिए था.
इसी तरह वे गरीबी में रहने का पाखंड करते थे. वे गरीबों की तरह रेल में तीसरी श्रेणी में यात्रा करते थे. लेकिन उनके लिए उनके चेले पूरा डिब्बे पर कब्ज़ा कर लेते थे. इस गुंडागर्दी का गाँधी विरोध नहीं करते थे और यह मान लेते थे कि उनके लिए जनता ने खुद डिब्बा खाली छोड़ दिया है. वे बकरी का दूध पीते थे, इसलिए हर जगह बकरी उनके साथ ही जाती थी. वे इस बात की चिंता नहीं करते थे कि इस पर कितना खर्च होगा. सरोजिनी नायडू ने एक बार स्पष्ट स्वीकार किया था कि गाँधी को गरीब बनाये रखने में हमें बहुत धन खर्च करना पड़ता है.
स्वभाव से गाँधी अधिनायकवादी थे. अपनी बात किसी भी प्रकार से सबसे मनवा लेते थे. उनके इस तानाशाही स्वभाव को देखकर ही एक बार किसी विदेशी विद्वान ने कहा था कि यदि इस आदमी के हाथ में कभी सत्ता आई, तो यह इतिहास का सबसे नृशंस और निकृष्ट तानाशाह सिद्ध होगा. गाँधी की इस प्रवृति का स्वाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों को बार-बार चखना पड़ता था. हर आन्दोलन को वे चरम पर पहुँचने के बाद भी उद्देश्य पूरा होने से पहले ही वापस ले लेते थे. इसी कारण कांग्रेस द्वारा चलाये गए सारे आन्दोलन बुरी तरह असफल रहे.
एक बार कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारी बहुमत से जीत गए और गाँधी के उम्मीदवार प. सीतारामैय्या बुरी तरह हार गए. गाँधी इस हार को नहीं पचा सके. उन्होंने इसे व्यक्तिगत हार माना और नेताजी के प्रति असहयोग का रवैय्या अपना लिया. उनके चमचे कई नेताओं जैसे नेहरु, आजाद आदि ने भी ऐसा ही किया. मजबूर होकर नेताजी को अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देना पड़ा और वे कांग्रेस को भी छोड़ गए. गाँधी की तानाशाही इस घटना से सबके सामने नंगी हो गयी.

In spite of his many a human failings and error of judgement, he was a great man.

That is why, Netaji Subhash chandra Bose was the first to address him as the Father of the Nation.
 
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"चुनाव में नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारी बहुमत से जीत गए"
Even I heard something like that , as per the version I had heard . Kuch tha , n majority had nominated Neta ji's name . Then Gandhi ji wrote something on a piece of paper n handed over to Neta ji - he read it n withdraw his nomination .
Ab usmie kya likha tha , no body knew just 2 people Gandhi ji and Neta ji ............ .

This is to update you that the election was held and Netaji defeated P Sitaramayya, the nominee sponsored by Mahatma Gandhi with a big margin.

This is also on record that Mahatma Gandhi and his closest group members in the party did not co operate with Netaji S C Bose,duly elected President of All India Congress for the second time at Haripura Congress Session.
 
Clean train coach by sms.

गांधी एक बहुत बड़ा नाम है. इस दुनिया में इस नाम ने पता नहीं कितने लोगों को प्रेरणा दी है और कितने लोगों का भला किया है. अधिकतर अफ़्रीकी देश, जैसे दक्षिण अफ्रीका, जिंबाब्वे इत्यादि इसी नाम से प्रेरित होकर अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुए. अमेरिका में इसी गाँधी नाम से प्रेरित होकर अफ्रीकन अमेरिकन सिविल राइट्स के लिए मार्टिन लूथर किंग जैसे लोगों ने आवाज उठाई और सफलता भी हासिल की. गाँधी को भारतीय परिप्रेक्ष्य में नहीं, बल्कि विश्व परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए. गाँधी से ज्यादा मशहूर नाम इस दुनिया में भगवानों को छोड़कर किसी का भी नहीं है. गाँधी ने लोगों को शराब न पीने की शिक्षा दी, जो एक अच्छी शिक्षा है. गाँधी ने अछूतों को भी हिंदू धर्म से जोड़े रखने में अहम् भूमिका निभाई. गाँधी को एक महात्मा कहा जा सकता है.



अहिंसक आंदोलन उस समय की मजबूरी थी. ब्रिटेन के पास बी-52 बमवर्षक विमान थे, जबकि भारत के पास तो अपनी कोई सेना भी नहीं थी. ऐसे में कुछ न करने से बेहतर था कुछ करना. गाँधी ने वही किया. उसने भारतीय लोगों को एकजुट किया और अहिंसक आंदोलन से अंग्रेजों को ये अहसास करवाया कि वे गलत कर रहे हैं. सबसे बड़ी बात ये कि उसकी कोशिश का कुछ नतीजा निकला और सौभाग्य से या दुर्भाग्य से उसी दौरान भारत को आज़ादी मिल गई, उस वजह से 'गाँधी' नाम और भी बड़ा बन गया. देश के विभाजन के लिए अकेले गाँधी को जिम्मेदार ठहराना हरगिज उचित नहीं है. उसके लिए मोहम्मद अली जिन्ना और अंग्रेज भी बराबर के जिम्मेदार थे. अच्छा हुआ जो भारत का विभाजन हो गया, नहीं तो आज भारत में लगभग 50 करोड़ मुसलमान होते और बहुत संभव था कि एकाध प्रधानमंत्री भी मुसलमान बन गया होता. अब हमारे पास पाकिस्तान और बंगलादेश के रूप में एक लक्ष्य तो है उन्हें वापस हिंदू बनाकर भारत में मिलाने के लिए, यदि देश का विभाजन न हुआ होता तो फिर तो ये हम लोगों में घुल-मिलकर रहते और फिर इन्हें निशाने पर नहीं लिया जा सकता था. हाँ, ये जरूर हैं कि गाँधी का अहिंसा का सिद्धांत वर्तमान समय में अप्रासंगिक हो चुका है और मेरा इस सिद्धांत में हरगिज विश्वास नहीं है, लेकिन इसके बावजूद गांधी को हम अच्छा नहीं कह सकते तो फिर बुरा भी क्यों कहें. 35-40 साल की उम्र के बाद उसने लगातार बस एक धोती पहनी, चरखा कातकर खादी को बढ़ावा दिया, राम भजन गाए, पढ़ा-लिखा वकील होने के बावजूद कोई बंगला, गाड़ी, धन-दौलत नहीं बनाई. ये भी कोई कम बात थोड़े ही है. ठीक बात तो यही है कि चाहे गरम दल वाले रहे हों या नरम दल वाले, जिन लोगों ने भी भारत की आज़ादी में योगदान दिया, उनके लिए समान रूप से सम्मान व्यक्त करना चाहिए. बाकी सब लोगों के अपने-अपने विचार हैं.
I agree with author that both parties be equally whether they are from Garam dal or Naram dal.As a matter of fact Garam dal gave more sacrifices & deserve more respect.dharmendra16
 
Bhai "dharmendra16", aapki har post ka title "Clean train coach by sms. " hi hota hai. Bhai train na clean rahi, aur na clean hovengi. Baki chutkule ke roop me ye baat thik hai ;)
 
Bhai "dharmendra16", aapki har post ka title "Clean train coach by sms. " hi hota hai. Bhai train na clean rahi, aur na clean hovengi. Baki chutkule ke roop me ye baat thik hai ;)

यु ठेकेदार होगा ! डब्बे साफ़ करवान आला ।
 
[h=5]मैंने कहीं पठन किया था कि अँग्रेजों ने गाँधी को ट्रेन के डब्बे से उठाकर बाहर फेंक दिया था।


काश यदि गाँधी का उसी समय "राम नाम सत्य" हो गया होता तो:-[/h][h=5]
इंदिरा गाँधी नही होती।
[/h][h=5]
फिरोज गाँधी नही होता।
[/h][h=5]
राजीव गाँधी नही होता।
[/h][h=5]
सोनिया गाँधी नही होती।
[/h][h=5]
भोंदू राहुल गाँधी नही होता।
[/h][h=5]
किन्तु भारत विश्वगुरु अवश्य बन गया होता।
[/h]
 
[h=5]ये है गाँधी का असली चेहरा...........

23 मार्च 1931 को शहीद-ए-आजम भगतसिंह को फांसी के तख्ते पर ले जाने वाला पहला जिम्मेवार सोहनलाल वोहरा हिन्दू की गवाही थी ।
यही गवाह बाद में इंग्लैण्ड भाग गया और वहीं पर मरा । शहीदे आजम भगतसिंह को फांसी दिए जाने पर अहिंसा के महान पुजारी गांधी ने कहा था, ‘‘हमें ब्रिटेन के
विनाश के बदले अपनी आजादी नहीं चाहिए ।’’ और आगे कहा, ‘‘भगतसिंह की पूजा से देशको बहुत हानि हुई और हो रही है ।
वहीं इसका परिणाम गुंडागर्दी का पतन है । फांसी शीघ्र दे दी जाए ताकि 30 मार्च सेकरांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन में कोई
बाधा न आवे ।” अर्थात् गांधी की परिभाषा में किसी को फांसी देना हिंसा नहीं थी ।

इसी प्रकार एक ओर महान् क्रान्तिकारी जतिनदास को जो आगरा में अंग्रेजों ने शहीद किया तो गांधी आगरामें ही थे और जब गांधी को उनके पार्थिक शरीर पर माला चढ़ाने को कहा गया तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया अर्थात् उस नौजवान द्वारा खुद को देश के लिए कुर्बान करने पर भी गांधी के दिल में किसी प्रकार की दया और सहानुभूति नहीं उपजी, ऐसे थे हमारे अहिंसावादी गांधी ।

जब सन् 1937 में कांग्रेस अध्यक्ष के लिए नेताजी सुभाष और गांधी द्वारा मनोनीत सीताभिरमैया के मध्य मुकाबला हुआ तो गांधी ने कहा यदि रमैया चुनाव हार गया तो वे राजनीति छोड़ देंगे लेकिन उन्होंने अपने मरने तक राजनीति नहीं छोड़ी जबकि रमैया चुनाव हार गए थे।

इसी प्रकार गांधी ने कहा था, “पाकिस्तान उनकी लाश पर बनेगा” लेकिन पाकिस्तान उनके समर्थन से ही बना । ऐसे थे हमारे सत्यवादी गांधी । इससे भी बढ़कर गांधी और कांग्रेस ने दूसरे विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का समर्थन किया तो फिर क्या लड़ाई में हिंसा थी या लड्डू बंटरहे थे ?

पाठक स्वयं बतलाएं ? गांधी ने अपने जीवन में तीन आन्दोलन (सत्याग्रहद्) चलाए और तीनों को ही बीच में वापिस ले लिया गया फिर भी लोग कहते हैं कि आजादी गांधी ने दिलवाई ।

इससे भी बढ़कर जब देश के महान सपूत उधमसिंहने इंग्लैण्ड में माईकल डायर को मारा तो गांधी ने उन्हें पागल कहा इसलिए नीरद चौ० ने गांधी को दुनियां का सबसे बड़ा सफल पाखण्डी लिखा है ।

इस आजादी के बारे में इतिहासकार सी. आर. मजूमदार लिखते हैं –
“भारत की आजादी का सेहरा गांधी के सिर बांधना सच्चाई से मजाक होगा । यह कहना उसने सत्याग्रह व चरखे से आजादी दिलाई बहुत बड़ी मूर्खता होगी । इसलिए गांधी को आजादी का ‘हीरो’ कहना उन सभी क्रान्तिकारियोंका अपमान है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना खून
बहाया ।”
[/h]
 
देश में एक गीत बहुत अधिक गाया जाता है "दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढ़ाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल।"


अब कोई ये बताये कि जिस देश ने 1830 का संथाल, 1839 का कूका आन्दोलन, 1838 का भील आन्दोलन, सिख आन्दोलन, नागा साधू आन्दोलन में 4 करोड़ भारतीय हुतात्मा (शहीद) हुए। उसके बाद देश के इतिहास में महान प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुए जिसमें 1 करोड़ 70 लाख भारतीयों ने मातृभूमि के लिए प्राण न्यौछावर किये, देश में 7 लाख क्रान्तिकारियों जिनमे भगत सिंह, अशफाक उल्लाह खान, बटुकेश्वर दत्त, राजगुरु, सुखदेव, राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, राजेंदर लाहिरी, जतिन दस, रोशन लाल, भगवती चरण वोहरा, दुर्गा भाभी ने देश की स्वाधीनता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।


क्या देश इतने सारे बलिदान भूल गया?????????????????
 
The things about Gandhi I do not like - apni aulad ko kabhi acchi tarah pala nahi kabhi dyan nahee diya. apna naam kamane ke liye
second him doing his so called "brahmacharya experiments" sleeping naked with other women including his niece and he continued to do this even after sardar patel and others asked him to stop this.
what did he do for jats?
him fighting at times for muslims
I dont think hindus could have lived alongside with them so many muslims in peace. look at Pakistan now.
 
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Details that continue to emerge about Asaram’s past indicate that he not only sexually abused and raped other women, but that he regarded the women in his ashram as his sexual ‘toys.’ Gandhi on the other hand would have among the younger of his female followers, some in their late teens, sleep naked with him, in his bed, at night. He claimed that was his way of testing his ‘power’ of abstinence. More shockingly, this was open knowledge not just among his followers, but among everyone who came in contact with him—his large fan following of politicians, activists, philosophers, and journalists—both from Indian and abroad. While having the girls and women sleep naked with him was in and of itself a form of sexual abuse – a privilege Gandhi exercised because of his position and stature, what actually took place in his bed remains hidden, because the women were sworn to secrecy. Non-the-less studying the behavior and responses of the women around him, and examining excerpts from some of their diaries, there are clear indications of sexual manipulation and exploitation. [See below an excerpt from my book ‘Sex and Power.’]

http://genderbytes.wordpress.com/2013/09/04/gandhi-to-asaram-who-empowers-the-sex-crimes-of-gurus/
 
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