गांधी एक बहुत बड़ा नाम है. इस दुनिया में इस नाम ने पता नहीं कितने लोगों को प्रेरणा दी है और कितने लोगों का भला किया है. अधिकतर अफ़्रीकी देश, जैसे दक्षिण अफ्रीका, जिंबाब्वे इत्यादि इसी नाम से प्रेरित होकर अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुए. अमेरिका में इसी गाँधी नाम से प्रेरित होकर अफ्रीकन अमेरिकन सिविल राइट्स के लिए मार्टिन लूथर किंग जैसे लोगों ने आवाज उठाई और सफलता भी हासिल की. गाँधी को भारतीय परिप्रेक्ष्य में नहीं, बल्कि विश्व परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए. गाँधी से ज्यादा मशहूर नाम इस दुनिया में भगवानों को छोड़कर किसी का भी नहीं है. गाँधी ने लोगों को शराब न पीने की शिक्षा दी, जो एक अच्छी शिक्षा है. गाँधी ने अछूतों को भी हिंदू धर्म से जोड़े रखने में अहम् भूमिका निभाई. गाँधी को एक महात्मा कहा जा सकता है.
अहिंसक आंदोलन उस समय की मजबूरी थी. ब्रिटेन के पास बी-52 बमवर्षक विमान थे, जबकि भारत के पास तो अपनी कोई सेना भी नहीं थी. ऐसे में कुछ न करने से बेहतर था कुछ करना. गाँधी ने वही किया. उसने भारतीय लोगों को एकजुट किया और अहिंसक आंदोलन से अंग्रेजों को ये अहसास करवाया कि वे गलत कर रहे हैं. सबसे बड़ी बात ये कि उसकी कोशिश का कुछ नतीजा निकला और सौभाग्य से या दुर्भाग्य से उसी दौरान भारत को आज़ादी मिल गई, उस वजह से 'गाँधी' नाम और भी बड़ा बन गया. देश के विभाजन के लिए अकेले गाँधी को जिम्मेदार ठहराना हरगिज उचित नहीं है. उसके लिए मोहम्मद अली जिन्ना और अंग्रेज भी बराबर के जिम्मेदार थे. अच्छा हुआ जो भारत का विभाजन हो गया, नहीं तो आज भारत में लगभग 50 करोड़ मुसलमान होते और बहुत संभव था कि एकाध प्रधानमंत्री भी मुसलमान बन गया होता. अब हमारे पास पाकिस्तान और बंगलादेश के रूप में एक लक्ष्य तो है उन्हें वापस हिंदू बनाकर भारत में मिलाने के लिए, यदि देश का विभाजन न हुआ होता तो फिर तो ये हम लोगों में घुल-मिलकर रहते और फिर इन्हें निशाने पर नहीं लिया जा सकता था. हाँ, ये जरूर हैं कि गाँधी का अहिंसा का सिद्धांत वर्तमान समय में अप्रासंगिक हो चुका है और मेरा इस सिद्धांत में हरगिज विश्वास नहीं है, लेकिन इसके बावजूद गांधी को हम अच्छा नहीं कह सकते तो फिर बुरा भी क्यों कहें. 35-40 साल की उम्र के बाद उसने लगातार बस एक धोती पहनी, चरखा कातकर खादी को बढ़ावा दिया, राम भजन गाए, पढ़ा-लिखा वकील होने के बावजूद कोई बंगला, गाड़ी, धन-दौलत नहीं बनाई. ये भी कोई कम बात थोड़े ही है. ठीक बात तो यही है कि चाहे गरम दल वाले रहे हों या नरम दल वाले, जिन लोगों ने भी भारत की आज़ादी में योगदान दिया, उनके लिए समान रूप से सम्मान व्यक्त करना चाहिए. बाकी सब लोगों के अपने-अपने विचार हैं.