इस कौम से लोग यूं ही पर्ले दर्जे की नफरत नहीं करते हैं। Because we sincerely deserve it. जाने किस बात की मरोड़ है हम लोगों में? जिस कौम में दूसरों को आदर देना, उसकी चापलूसी करना समझा जाता है, वो इससे भी बदतर स्थिति को Deserve करती है। बाप से बेहतर बंटवारा पंचायत करे, इस बात पर कौम फूली ना समाई फिरती हो, तो कम से कम मेरे तो यह समझ से परे की बात है। जिस कौम में समझदारी भरी बातें करने का विशेषाधिकार 60 साल से ऊपर के ही आदमी को हो, तो कम से कम मेरे तो यह समझ से परे की बात है।
इस वैबसाइट पर पोस्टेड पचास फीसदी से ज़्यादा बहस इसी तरीके से अपनी परिणति को पाती हैं। हमारे खून में ही गड़बड़ है, इसमें कोई बुरा माने तो सौ बार माने। जो कौम सुनना नहीं जानती, वह लिखना, पढ़ना, बोलना सीख जाए - यह हो ही नहीं सकता। एक को दूसरे से यूं दिक्कत है कि उसे कुछ नहीं आता, एक को दूसरे से यूं भी दिक्कत है कि उसे इतना क्यूँ आता है। किसी को इस बात से तकलीफ है कि वह अँग्रेजी में क्यूँ लिखता है, किसी को इस बात से भी दिक्कत है कि वह अँग्रेजी में इतना बढ़िया क्यूँ लिखता है। किस कारण यह कौम गर्व करने लायक है, कोई एक कारण तो बताए? बहादुर - बहादुर कह कर तुमसे अपने घरों की रखवाली करवाते रहे हैं, मरवाते रहे हैं। मैं भी आपकी तरह ये मानता हूँ कि ये गर्व की बात है। लेकिन यह केवलमात्र हमारी ही ज़िम्मेदारी नहीं है। हम भी पेट भरने के लिए रोजगार में विकल्पों को परख सकते हैं। लेकिन यह संभव नहीं है - क्योंकि हम वास्तव में इस लायक नहीं हैं। हम सिर्फ़ पुलिस, फ़ौज, ड्राइवर के ही लायक हैं? हो सकता है कि मैं सौ फीसदी तक भी गलत होऊं लेकिन दुर्भाग्य से अपना अनुभव तो यही है दोस्तो।
हुड्डा - चौटाला, मोदी - राहुल, शैलजा - भुक्कल> इन्हीं में उलझते रहना ही हमारी दिनचर्या हैं। मजे की बात ये है कि हमारी बहस का विषय नकारात्मक रूप से वही होता है जो बहस का विषय होना ही नहीं चाहिए। वे लोग सभी एक हैं। धनवान की अपनी एक अलग जात होती है। उनमें जाट, पंजाबी, ब्राह्मण, बानिया अथवा दलित नहीं होता।
अगर हम किसी से असहमत हैं तो एक बार की प्रतिक्रिया ही काफी है। इस प्लेटफॉर्म पर अगर साल-छह महीनों में आओ और उस आने पर भी आपको वही माहौल मिले जो आप छह महीने पहले छोड़ कर गए हो, तो स्थिति निराशाजनक ही है।
माफ कीजिएगा अगर किसी को तकलीफ पहुंची हो।
"गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक़्ल, हुक्म के कुएँ पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है"