Food Security Bill or a Lollypop?

खाद्य सुरक्षा बिल में कोई राजनीती नहीं है
इसका दूर दूर तक भी चुनाव से कोई लेना देना नहीं है
ये तो गलती से चुनाव इस टाइम आ गए
या कांग्रेस, इसते भी घने बढ़िया कामो में लगी पड़ी थी पहलया
खामखा ये बाकि पार्टी आले कांग्रेस के पीछे पड़े है

वाह वाह संजीव बाल्यान जी ! कांग्रेस पर क्या टोंट मारा है। ग्रेट। :victorious::victorious:
 
आपका वोट:-

फूड सिक्योरिटी बिल लाकर कांग्रेस ने 2014 लोकसभा चुनाव के लिए सबसे बड़ा दांव खेला है. आपको क्या लगता है कि 2014 का लोकसभा चुनाव कौन जीतेगा?

कांग्रेस बीजेपी तीसरा मोर्चा.

नतीजा:-

फूड सिक्योरिटी बिल लाकर कांग्रेस ने 2014 लोकसभा चुनाव के लिए सबसे बड़ा दांव खेला है. आपको क्या लगता है कि 2014 का लोकसभा चुनाव कौन जीतेगा?
कांग्रेस 212 10.1%
बीजेपी 1779 85%
तीसरा मोर्चा 101 4.8%

कुल वोट : 2092

और भी... http://aajtak.intoday.in/poll.php/poll/results/1188
 
भाई यो नाज़ खामखाँ मै सड़न लाग रह्या, जाण द्यो किसे के पेट मै i पाछे सी एक थ्रेड चाल्या था, जिसमे काफी लोग न्यू कह रहे थे अक, इसतैं आछा तो गरीबां नै बाँट देती सरकार i ईब थारा कहणा मान के सरकार नाज़ बाँटण लागी तो भी तम्ने एतराज़ i किम्मे करण द्योगे क नहीं?


रोटी की भूख आर पाणी की प्यास तो माणस की मूलभूत (बेसिक) जरूरत हैं जिनकी पूर्ति के साधन सरकार के द्वारा जुटाना समाज की जिम्मेवारी है i जिनके पास रोजगार नहीं है और निकट भविष्य में मिलने की उम्मीद भी नहीं है, या जिनकी मजदूरी इतनी कम है कि वे मंडी के भाव अनाज खरीदने की क्षमता नहीं रखते तो उनके लिए खाद्द सुरक्षा की गारंटी किसी भी सरकार का दायित्व है i इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि कोई भी सरकार योजनायें वोट को ध्यान में रखते हुए ही बनाती है और यही कारण है कि कुछ प्रमुख विपक्षी पार्टियों को भी आगामी चुनाव में गरीबों के वोटों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर सरकार का साथ देना पड़ा i


लेकिन, इस सबके बावजूद, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हमारे देश में अभी तक की सभी सरकारें गरीबी उन्मूलन के लिए कारगर कदम उठाने में लगभग असफल रही हैं i और यह भी सही है कि यह खाद्य सुरक्षा बिल समस्या का कोई दूरगामी हल नहीं हो सकता i जब तक रोज़गार के साधन जुटाने की दिशा में कारगर कदम नहीं उठाये जायेंगे, गरीबी हटने वाली नहीं i यह सस्ता अनाज और सब्सिडी स्थाई और दूरगामी हल नहीं है i बीमारी का सिर्फ प्रथम उपचार है, पक्का इलाज़ नहीं i
 
Last edited:
Bhai Vikas, jaisa mahaul/vataavaran hai aajkal, us hisab se log Congress ko kam hi vote denge. Mahangaayi ne kamar tod rakhi hai logo ki, aur ab jyada badhegi bhi. Rupee has fallen down below 66 against Dollar. Ye Food Security Bill laye to kuch nahi hona. Nira desh ka battha baithan laag rhya hai. Ye oil te subsidy hata kar bhi kuch nahi hua. Bol rahe the CAD kam hoga... yu to sursa ke muh ki trah badhta hi jaa raha hai.. Upar se Food Security Bill ki subsidy aur thop di.. Ye to subsidy ko ek traf se hata kar dusri traf karne wali baat ho gayi. Kaha ki samjhdaari hai isme?
 
भाई यो नाज़ खामखाँ मै सड़न लाग रह्या, जाण द्यो किसे के पेट मै i पाछे सी एक थ्रेड चाल्या था, जिसमे काफी लोग न्यू कह रहे थे अक, इसतैं आछा तो गरीबां नै बाँट देती सरकार i ईब थारा कहणा मान के सरकार नाज़ बाँटण लागी तो भी तम्ने एतराज़ i किम्मे करण द्योगे क नहीं?


रोटी की भूख आर पाणी की प्यास तो माणस की मूलभूत (बेसिक) जरूरत हैं जिनकी पूर्ति के साधन सरकार के द्वारा जुटाना समाज की जिम्मेवारी है i जिनके पास रोजगार नहीं है और निकट भविष्य में मिलने की उम्मीद भी नहीं है, या जिनकी मजदूरी इतनी कम है कि वे मंडी के भाव अनाज खरीदने की क्षमता नहीं रखते तो उनके लिए खाद्द सुरक्षा की गारंटी किसी भी सरकार का दायित्व है i इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि कोई भी सरकार योजनायें वोट को ध्यान में रखते हुए ही बनाती है और यही कारण है कि कुछ प्रमुख विपक्षी पार्टियों को भी आगामी चुनाव में गरीबों के वोटों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर सरकार का साथ देना पड़ा i


लेकिन, इस सबके बावजूद, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हमारे देश में अभी तक की सभी सरकारें गरीबी उन्मूलन के लिए कारगर कदम उठाने में लगभग असफल रही हैं i और यह भी सही है कि यह खाद्य सुरक्षा बिल समस्या का कोई दूरगामी हल नहीं हो सकता i जब तक रोज़गार के साधन जुटाने की दिशा में कारगर कदम नहीं उठाये जायेंगे, गरीबी हटने वाली नहीं i यह सस्ता अनाज और सब्सिडी स्थाई और दूरगामी हल नहीं है i बीमारी का सिर्फ प्रथम उपचार है, पक्का इलाज़ नहीं i

Agreed bhaisaab...

par mudda ye bhi hai ki.. anaaz X sad raha hai aur sarkaar baantna chaah rahi hai N times of X. (agar us X ko hi baant de to koi dikkat nahi).

par ye N times of X ko baantne ke chakkar me desh ki lutiya dubone pe utarru hai sarkaar.


Nithallo ko free fund me anaaz dene se, achcha unse kuch kaam hi karwa le.

Kaam ke badle anaaz scheme hi laa de..

Gaon me kaam bhatere pade hain jo karwaye ja sakte hain, manhours ki koi kami hi nahi..

shauchalya banwanana, gaal pakki karwana, sakool ki marammat karwana, naya banwana, samudayik swasthya kendra banwana, sadke pakki banwana, solar street lights lagwana, johad khudwana.

jo log statistics ke hisab se bhookhe marr rahe hain, karenge kaam.. kyun na karenge...unka foffa bhi karega.... but agar sarkar NREGA ke naam pe free me paise luta rahi hai (bina kaam ke hoye, sirf kaagazo me kaam ke hoye).... uski jageah kaam ke badle anaaz me kuch kaam to honge...


+ keep it voluntary, ki jo bhookha mar raha hai, wo saamne aaye (sabko is scheme ke preview me lane ki koi jarurat nahi)

Gramin Infrastructure bhi sudhrega, aur gareeb bhoookhe ke pet me anaaz bhi jayega... vote bank bhi banega, aur virodhi parti ke bhi muh band.... aur anaaz bhi nahi sadega..
 
Vote for food is much better than Vote for Temple

Vikas Ji! This attitude is dangerous. This is the situation of Emotional Blackmailing. We are not reacting as we should.
हम खुद ही बुराई का वर्गीकरण कर रहे हैं। परिस्थितियाँ अथवा निर्णय या तो अच्छे होते हैं या बुरे, बीच का कोई रास्ता नहीं होता। व्यक्तिगत स्तर पर तो यह बात पचने लायक हो सकती है मगर सरकारें अगर बीच का रास्ता निकालने लगी तो स्थिति भयावह है।
सरकार के पास अपनी असफलता को छिपाने के लिए तुष्टिकरण से बढ़िया कोई नीति नहीं होती। और ये अपना Challenge है कि तुष्टिकरण की नीति से किसी वर्ग विशेष की प्रगति/उन्नति का नजदीक का भी संबंध नहीं है। Education, Honest Tax Collection, Population Check पर कोई बहस नहीं हो रही है। ना सरकारें कर रही हैं ना हम कर रहे हैं।

"पाश" की दो पंक्तियाँ
हाथ अगर हों
तो “हीर” के हाथों से चूरी पकड़ने के लिए ही नहीं होते
“सैद” की बारात रोकने के लिए भी होते हैं
हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते
लुटेरे हाथों को तोड़ने के लिए भी होते हैं

 
Pradeep bhai,

Maine to sirf ek prayas kiya tha un logo ko ek aina dikhane ka jo sarkar par ye to ilzam laga rahe hai ki ye food security bill voto ke lie laya gaya hai jabki khud har bar eleciton ke aas paas uthaye mandir ke mudde ko bhul jate hai, jo election hote hi fir dab jata hai.

Jab hamam main sabhi nange hai to dusro ka majjak kyun udana?


Vikas Ji! This attitude is dangerous. This is the situation of Emotional Blackmailing. We are not reacting as we should.
हम खुद ही बुराई का वर्गीकरण कर रहे हैं। परिस्थितियाँ अथवा निर्णय या तो...ए ही नहीं होते[/B]
लुटेरे हाथों को तोड़ने के लिए भी होते हैं

 
तो ये बात सही हे या ग़लत के यो बिल वोट खातिर आया हे ?
 
पहले से चरमरायी भारतीय अर्थव्यवस्था खाद्य सुरक्षा के अतिरिक्त बोझ को सहन करने में असफल रही।


परिणाम रूपया डॉलर के सामने ऐतिहासिक निम्न स्तर 68 के लगभग पहुँच गया है और भविष्य में और गिरावट अवश्यम्भावी है।


upa सरकार को वास्तविक भूखमरी की समस्या से अधिक चिंता आने वाले चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करने की प्रतीत होती है।


कहीं इस खाद्य सुरक्षा के कारण निर्धनों का जीना ही कठिन ना हो जाये।



हो रहा भारत निर्माण।
 
तो ये बात सही हे या ग़लत के यो बिल वोट खातिर आया हे ?

राजस्थान सरकार से जब पूछा गया की पुलिस आशाराम के खिलाप वो एक्सन नहीं ले रही है जो उसे लेना चाहिए था
तो जबाब था की बीजेपी तो आशाराम ने पहले ही क्लीन चिट दे चुकी है
मतलब सरकार इस तरह के मामला में भी विपक्षी पार्टी की पर्तिकिर्या के आधार पर काम करती है ना की कानून के अनुसार

हकीकत ये है की हर जगह वोट की राजनीती है upa की तीसरी पारी की नीव इस खाद्य सुरक्षा बिल के सहारे ही है

विडंबना ये है की हमारी जनता इन सब पर्पंचो के बहकावे में आ जाती है

जो जनता अपनी वोट दारू / कैश आदि के बदले दे देती है वो इसी सरकार ही डिजरव करती है
 
तो ये बात सही हे या ग़लत के यो बिल वोट खातिर आया हे ?

उसमे गलत बात क्या है? यहाँ कोन्स राजनेता ऐसा काम करता है जो वोट के लिए नहीं होता? फिर ये ही क्यों अलग से रखना? आपने पिछले ४ सालो मैं मंदिर का ज़िक्र सुना या ये चौरासी कोसी परिक्रमा का सुना?
 
राजस्थान सरकार से जब पूछा गया की पुलिस आशाराम के खिलाप वो एक्सन नहीं ले रही है जो उसे लेना चाहिए था
तो जबाब था की बीजेपी तो आशाराम ने पहले ही क्लीन चिट दे चुकी है
मतलब सरकार इस तरह के मामला में भी विपक्षी पार्टी की पर्तिकिर्या के आधार पर काम करती है ना की कानून के अनुसार

हकीकत ये है की हर जगह वोट की राजनीती है upa की तीसरी पारी की नीव इस खाद्य सुरक्षा बिल के सहारे ही है

विडंबना ये है की हमारी जनता इन सब पर्पंचो के बहकावे में आ जाती है

जो जनता अपनी वोट दारू / कैश आदि के बदले दे देती है वो इसी सरकार ही डिजरव करती है

कांग्रेस सर्कार फूँक फूँक कर कदम रख रही है, कानून को ताक पर रख रही है पर उससे बड़ा संकट पैदा कर रहे है भाजपा वाले जो खुले आप इस पाखंडी के समर्थन मैं खड़े है| शायद आप ने उमा भारती का बयान नहीं सुना या न्यूज़ चैनल नहीं देखते जहाँ भाजपा वाले खुले आम इस भू-माफिया के सरदार, स्वं-भू भगवन कहलाने वाले ढोंगी का समर्थन करते दीखते है
 
VP sir, do you really think it is that easy solution ? surprised that India's hunger could have been resolved with just passing a bill, What we were doing since 1947 ?


भाई यो नाज़ खामखाँ मै सड़न लाग रह्या, जाण द्यो किसे के पेट मै i पाछे सी एक थ्रेड चाल्या था, जिसमे काफी लोग न्यू कह रहे थे अक, इसतैं आछा तो गरीबां नै बाँट देती सरकार i ईब थारा कहणा मान के सरकार नाज़ बाँटण लागी तो भी तम्ने एतराज़ i किम्मे करण द्योगे क नहीं?


रोटी की भूख आर पाणी की प्यास तो माणस की मूलभूत (बेसिक) जरूरत हैं जिनकी पूर्ति के साधन सरकार के द्वारा जुटाना समाज की जिम्मेवारी है i जिनके पास रोजगार नहीं है और निकट भविष्य में मिलने की उम्मीद भी नहीं है, या जिनकी मजदूरी इतनी कम है कि वे मंडी के भाव अनाज खरीदने की क्षमता नहीं रखते तो उनके लिए खाद्द सुरक्षा की गारंटी किसी भी सरकार का दायित्व है i इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि कोई भी सरकार योजनायें वोट को ध्यान में रखते हुए ही बनाती है और यही कारण है कि कुछ प्रमुख विपक्षी पार्टियों को भी आगामी चुनाव में गरीबों के वोटों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर सरकार का साथ देना पड़ा i


लेकिन, इस सबके बावजूद, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हमारे देश में अभी तक की सभी सरकारें गरीबी उन्मूलन के लिए कारगर कदम उठाने में लगभग असफल रही हैं i और यह भी सही है कि यह खाद्य सुरक्षा बिल समस्या का कोई दूरगामी हल नहीं हो सकता i जब तक रोज़गार के साधन जुटाने की दिशा में कारगर कदम नहीं उठाये जायेंगे, गरीबी हटने वाली नहीं i यह सस्ता अनाज और सब्सिडी स्थाई और दूरगामी हल नहीं है i बीमारी का सिर्फ प्रथम उपचार है, पक्का इलाज़ नहीं i
 
Congress kee apni kartoot achhi hoti te, unko foonk foonk ke kadam rakhne kee jaroorat nahi padtee

कांग्रेस सर्कार फूँक फूँक कर कदम रख रही है, कानून को ताक पर रख रही है पर उससे बड़ा संकट पैदा कर रहे है भाजपा वाले जो खुले आप इस पाखंडी के समर्थन मैं खड़े है| शायद आप ने उमा भारती का बयान नहीं सुना या न्यूज़ चैनल नहीं देखते जहाँ भाजपा वाले खुले आम इस भू-माफिया के सरदार, स्वं-भू भगवन कहलाने वाले ढोंगी का समर्थन करते दीखते है
 
yeh and numbers do not lie
Were be worse than japan and Germany who were devestated by WWII ?

We inherited a economy struggling at a growth rate of just 0.8% per annum in 1947. Life expectancy at birth has more than doubled from 32. The literacy rate has grown from 12% to 74%.
 
Are we same as them? Do we have a population like theirs? Do we have resources like they do? Do we have strategic locations like they do? Do our citizens have same attitude like theirs?

yeh and numbers do not lie
Were be worse than japan and Germany who were devestated by WWII ?
 
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