Shayri (Continued)

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अजीब सी हालत हुई है तेरे जाने के बाद .. अब भूख ही नहीं लगती खाना खाने के बाद
 
Zaruri nahi har baat shabdo se byan ki jaye,
Chup reh kar bhi bahut kuch keh jana ,ye bhi ek ada hoti hai.

How about this one;

Zaruri to nahi har baat ko lafzon se byan kiya jaaye,
band honth aur jhuki nazren ne jaane kiya kiya kah jati hain.

RK^2
 
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अजीब सी हालत हुई है तेरे जाने के बाद .. अब भूख ही नहीं लगती खाना खाने के बाद

hahhahaa... nice one... here is my version;

ajeeb si haalat huee hai ai dost, tere jaane ke baad;
jism me garmee badh jaati hai aur bhi, nahane ke baad.

RK^2
 
hamaare chehre ko ai dost zara gaur se dekh
waqt ki karwaton ke nisan har jhurri me darz hain.

RK^2
 
Last edited:
सीख ली अदा जिसने गम में भी मुस्कुराने की
उसे क्या खाक मिटा सकेंगी ,ये गर्दिशें ज़माने की!!
 



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हर किसी के हाथ बिक जाने को तैयार नही
ये दिल है मेरा, तेरे शहर का अख़बार नहीं.
 
सीख ली अदा जिसने गम में भी मुस्कुराने की
उसे क्या खाक मिटा सकेंगी ,ये गर्दिशें ज़माने की!!

with almost similar sentiments I wrote many years back;

Tajjub hota hai, unhe muflasi me hansta dekh kar
eik hum hain ki umar bhar dukhi rahe, khusi ki talash me

RK^2
 
How about this one;

Zaruri to nahi har baat ko lafzon se byan kiya jaaye,
band honth aur jhuki nazren ne jaane kiya kiya kah jati hain.

RK^2

बेकरार है इश्क जलवा फरोशी को यह राज़ शोख नज़र ने बयाँ कर दिया
लब भी अगर कर जाते थोड़ा इकरार तो कौन सी क़यामत आ जाती
काश दिल के जुबां होती तो कर देते हम भी चुपके से इश्क का इज़हार
ना होता इश्क पर ज़माने का पहरा, ना ज़हमत मासूम नज़र को होती

वी . पी . सिंह मासूम
 
In the present age, where material comforts and riches determine the intensity of relations, mothers are the only exception who shower selfless love and affection on their children even when they are grown up. Of course, fathers are also not far behind but cannot surpass mothers in this regard. Hence I was prompted to cobble up a few lines randomly in response to a friends post on facebook, which I feel like sharing with friends here. It is neither a pure Urdu nor pure Hindi poetry but mix of both. Therefore, pardon me for this unconventional and unusual blend.

अरमानों की मंडी है दुनिया, मिलता नहीं यहाँ कुछ भी बिन मोल
मोहब्बत भी है यहाँ तिजारत और चांदी के सिक्कों में है इसका तोल
महफ़िल रोज़ सजे हुस्न की दौलत ओ शोहरत के हैं अम्बार जहाँ
हीरे पन्नों की है चमक अनोखी इनसे बेहतर मोहब्बत का हार कहाँ
सब रिश्ते हैं यहाँ बिकाऊ बिन नजरानों के बीबी का भी प्यार कहाँ
ममता का लेकिन रिश्ता है पक्का जो दुनिया की हर दौलत को ठुकरा दे
वक्त पड़े अगर कभी तो माँ बच्चों की खातिर खुद की बलि चढ़ा दे
मगर भूल जाते हैं सब माँ को जब बीबी काली जुल्फें लहराती है
बैठ सिरहाने शौहर के जब मेनका सास की चुगली रोज़ लगाती है
हैं नादान बड़ी ये बीबी लेकिन भूल रही हैं सास इन्हें भी बनना होगा
इस नाटक के नए मोड़ में लाचार सास का रोल इन्हें करना होगा
 
Last edited:
वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से,
मैं ऐतबार न करता, तो और क्या करता?


= अमृतो
 
सूरज नहीं करता दोस्ती तारों से अंधियारों से।
मेल नहीं होता जल का शोलो के अंगारों से।।
राष्ट्रभक्त समझौता नहीं करते कभी देश के गद्दारों से।।
 
बेकरार है इश्क जलवा फरोशी को यह राज़ शोख नज़र ने बयाँ कर दिया
लब भी अगर कर जाते थोड़ा इकरार तो कौन सी क़यामत आ जाती
काश दिल के जुबां होती तो कर देते हम भी चुपके से इश्क का इज़हार
ना होता इश्क पर ज़माने का पहरा, ना ज़हमत मासूम नज़र को होती

वी . पी . सिंह मासूम


तो आखिर आपने अपना उपनाम सुनिश्चित कर ही लिया : मासूम :victorious:
 
मरहम न सही कोई जख्म ही दे दो |
मालूम तो हो हमें कोई भुला नहीं है ||
 
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