Shayri (Continued)

खुशी का हर लम्हा और, ज़िंदगी का गम भी है,
इसी का है हर सितम, इसका नज़रे करम भी है,
झुका दिया इसने सबको, क्या पीर क्या सिकंदर,
वक़्त बेरहम भी है, और वक़्त ही मरहम भी है.
 
कुंआं झूठे -सुच्चे को नहीं जानता ,

वो अमीर- गरीब को नहीं पहचानता ,

उसकी फितरत हे प्यास बुझाने की ,

ये तुम पर छोड़ा ए बटोही ,

किसी के लिए हे वो जिन्दगी ,


किसी के लिए हे जगह मर जाने की ॥

-------रवि "अतृप्त"
Beautiful reply.

To say in other words every coin has two sides and it is the choice of the onlooker which side he sees.
 
सूरज ढला तो कद से ऊँचे हो गए साये |
कभी पैरों से रौंदी थी यहीं परछाइयां हमने ||
 
हम ज़माने में यूँ ही बेवफा मशहूर हो गए 'फ़राज़'
हज़ारो चाहने वाले थे किस किस से वफ़ा करते।।
 
वो इश्क भी क्या गजब रहा होगा
वो इश्क भी क्या गजब रहा होगा
हीर जिसमे आजादी थी ओर
रान्झा जिसमे भगत सिंह रहा होगा
 
बेताब से रहते हैं तेरी याद में अक्सर !
रात भर नहीं सोते हैं तेरी याद में अक्सर !!
जिस्म में दर्द का बहाना बना के.....!
हम टूट के रोते हैं तेरी याद में अक्सर !!
 
फिर कहीं दूर से इक बार सदा दो मुझको,
मेरी तन्हाई का एहसास दिला दो मुझको |
तुम तो चाँद हो तुम्हे मेरी जरुरत क्या है,
मैं दिया हूँ, किसी चौखट पे जला दो मुझको ||
 
हम बचाते रहे दीमकों से घर अपना..
और चंद कुर्सी के कीड़े पूरा मुल्क खा गए.. !!

 
ऐसा बदला हूँ तेरे शहर का पानी पीकर,
झूठ बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझ को |

नदामत = शर्म
 
कभी शिकवा ना किया किसी से तो गिला क्या करूँ...
इस दिल को घायल कर दिया तो उसे बयां क्या करूँ ...
(सरला)
 
"मेरी आँखों में आँसू, तुझ से क्या कहूँ, क्या हैं,
ठहर जाएँ तो अँगारा हैं और बह जाएँ तो पानी है।"


 
"रोने से दुःख नहीं धुलते,
भला इंसान फिर क्यूँ रोता है,
सीने पर हर वक्त लाशें जलती हैं,
पर शमशान तो नहीं रोता है."
 
मैं खुद ज़मीन हूँ मगर ज़र्फ़ आसमान का है |
के टूट कर भी मेरा हौसला चट्टान का है ||

बुरा न मान मेरे हर्फ ज़हर-ज़हर से हैं |
मैं क्या करूँ के येही जायका जुबान का है ||
 
आगाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता

जब ज़ुल्फ़ की कालिख में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता

हँस हँस के जवान दिल के हम क्यों न चुनें टुकडे
हर शख्स की किस्मत में इनाम नहीं होता

बहते हुए आंसू ने आँखों से कहा थम कर
जो मै से पिघल जाए वो जाम नहीं होता

दिन डूबे हैं या डूबी बरात लिए कश्ती
साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता
 
"खाक़ मुट्ठी में लिए हुए कब्र की ये सोचता हूँ,
इन्सान जब मरता है तो ग़रूर कहाँ जाता है" !!
 
शाम के आगाज़ में जब रूबरू तेरी याद होती है,
रातों का अंजाम फिर नींद से फरियाद होती है....
 
Aansu na hote to aankhe
itni khubsurat na hoti.....
Dard na hota to khushi ki
kimat na hoti.....
Agar mil jate chane se har
koi to.......
Duniya me Rab ki Zarurat na hoti.....

Kya baat kya baat...........Ak humari taraf sai bhi bhaio..................

Kyu Mushkilon Me Saath Dete Hain Dost,
Kyun Gam Ko Baant Lete Hain Dost,
Na Rishta Khoon Se Na Riwaaz Se Bandha,
Fir Bhi Zindagi Bhar Saath Dete Hain Dost…
 
मुंह न दिखलाती, ना दिखा, पर ब-अंदाज-ए-इताब
खोल के पर्दा, आँखें ही दिखला दे
जरा
ब-अंदाज-ए-इताब = गुस्से से
 
"करने गए थे उससे तगाफुल का हम गिला
की एक ही निगाह कि बस खाक हो गए"

तगाफुल - बेरुख़ी
 
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