sandeepsirohi
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साथ रहते हैं मेरे सब, मतलबों की हद तक |
कहीं थकता हूँ तो अकेला, कहीं रुकता हूँ तो तनहा ||
कहीं थकता हूँ तो अकेला, कहीं रुकता हूँ तो तनहा ||
नौकरों पर जो गुज़रती है, मुझे मालूम है
बस करम कीजे, मुझे बेकार रहने दीजिये
अपने लुटने का मुझको रंज नहीं, गम अगर है तो सिर्फ इतना,
मेरे किरदार की शराफत से उसने जो फायदा उठाया हैं।
मौत आई इश्क़ में तो हमें नींद आ गई
निकली बदन से जान तो काँटा निकल गया
Good compositon of the legendary poet Sahir Ludhiyanvi, which is relevant in the communally charged atmoshphere and religious war-mongering prevailing nowadays all around.
ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ले-आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मग़रिब में हो कि मशरिक में
अमने आलम का ख़ून है आख़िर
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है
खेत अपने जलें या औरों के
ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है
टैंक आगे बढें कि पीछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
फ़तह का जश्न हो कि हार का सोग
जिंदगी मय्यतों पे रोती है
इसलिए ऐ शरीफ इंसानो
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शमा जलती रहे तो बेहतर है।
Great Sir! Thanx!
अँधेरे को उजाले का, सुबह को रात का डर है,
जिन्होंने मूंद ली आखें, उन्हें किस बात का डर है ?
बहुत सच बोलता है ये, इसे जल्दी ज़हर दे दो,
सियासत को ज़माने में फ़क़त सुकरात का डर है।
Nice. Did you write it ?
RK^2
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