फैशन / पहनावा तो समकालीन है, मनुष्य की विकास यात्रा के साथ बदलता रहता है | समाज के बिगड़ने का कारण फैशन को बताना बिलकुल वैसा है जैसा पैर में चोट लंगने पर आँख में दवाई डालना | चरित्रिक पतन का पहनावे से कोई भी सम्बन्ध नहीं, यदि होता तो मुस्लिम देशो में जहाँ औरते बुरका पहनकर ही बाहर निकलती वहाँ...