faishon se bigdata hamara samaaj

agreed people....about all the explanation you have given for the clothing of women...and about sindoor and bindi and mangalsutra...i think ...i haven't seen my grandmum's wearing any of these ever.... these things we just adopted in a generation ( i don't know from where) and if we leave them now...i don't think its a big deal :)

लुगाई का सिंगार स हया ।
जो आज कल कोणी रहया ॥


जाट संस्कर्ती में कदे बिंदी ,सिन्दूर ,मंगलसूत्र कोणी रहए ,ये सब जट्टों में पाछले १० -१५ साल तें बड़े सें , जब तें जाट भामण वाद के चक्कर में पड़े सें । ओहला भी जाट संस्क्रती में कोणी था ,यु भी १५ वि -१६ वि शताब्दी में मुसलमानों के आगमन के बाद शुरू होया स । जट्टां में लुगाई का ब्याहली होण की निशानी स चुन्दड (घोटे आला ),ज्याँ तें फेरयाँ पे भी चुन्दड ओढाया जाया करे आर दूसरी बारी ब्याह हो ,उहने भी चुन्दडी गेरना ,लत्ता ओढ़ाना ,चादर डालना कह्या करें न्यारे-न्यारे इलाक्याँ में । साडी भी जाटनियाँ का पहरावा कदे नि रहया । जाटनी शूंट में भतेरी आछी लाग्गें सें ,और किम्मे आग-अडंगा पहरण की जरूते ना ।
 
Proper clothing as per the climate ?

Of course, climate has to be taken into consideration while deciding for a dress and we all know that putting in a woolen suit in summer is not a wise choice. (कोए रविंदरजीत जिसा एक आधा रोहतक जिले मै ए मिल सकै सै जो गर्मियां मैं भी सूट गाड के आर रात नै काला चश्मा ला के बारात मै जांदा होगा I इब तै इसे बावले भैंसवाल मैं भी ना रहे I ) But, climate is not the only factor which should determine the selection of clothes. It is only one of the many factors. For example, in Indian summers when the temperature hovers around 40-45 degree, how many ladies can be seen in bikinis and short pants in small towns and villages? Whereas in places like London, one can see majority of women in summer, where the climate hardly crosses 32 degree, in very short outfits roaming around in public places bare and dare, which might have caused furore if they were in India. Therefore, among other things, it is also the level of consciousness and the prevailing mindset of the society you are living in, which substantially matters in selection of clothing by both men and women.
 
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Of course, climate has to be taken into consideration while deciding for a dress and we all know that putting in a woolen suit in summer is not a wise choice. (कोए रविंदरजीत जिसा एक आधा रोहतक जिले मै ए मिल सकै सै जो गर्मियां मैं भी सूट गाड के आर रात नै काला चश्मा ला के बारात मै जांदा होगा I इब तै इसे बावले भैंसवाल मैं भी ना रहे I ) But, climate is not the only factor which should determine the selection of clothes. It is only one of the many factors. For example, in Indian summers when the temperature hovers around 40-45 degree, how many ladies can be seen in bikinis and short pants in small towns and villages? Whereas in places like London, one can see majority of women in summer, where the climate hardly crosses 32 degree, in very short outfits roaming around in public places bare and dare, which might have caused furore if they were in India. Therefore, among other things, it is also the level of consciousness and the prevailing mindset of the society you are living in, which substantially matters in selection of clothing by both men and women.

फेर आपने सोनीपत में क्यूँ पिस्से लाये , लन्दन में कोठी गाड़नी थी ।
 
Of course, climate has to be taken into consideration while deciding for a dress and we all know that putting in a woolen suit in summer is not a wise choice. (कोए रविंदरजीत जिसा एक आधा रोहतक जिले मै ए मिल सकै सै जो गर्मियां मैं भी सूट गाड के आर रात नै काला चश्मा ला के बारात मै जांदा होगा I इब तै इसे बावले भैंसवाल मैं भी ना रहे I ) But, climate is not the only factor which should determine the selection of clothes. It is only one of the many factors. For example, in Indian summers when the temperature hovers around 40-45 degree, how many ladies can be seen in bikinis and short pants in small towns and villages? Whereas in places like London, one can see majority of women in summer, where the climate hardly crosses 32 degree, in very short outfits roaming around in public places bare and dare, which might have caused furore if they were in India. Therefore, among other things, it is also the level of consciousness and the prevailing mindset of the society you are living in, which substantially matters in selection of clothing by both men and women.

हसरतें पूरी नहीं होती ,कबर में जाने तक ,
बेकरार हैं जिद्दी नजरें ,यम के आने तक ॥ ---- रवि "अतृप्त"
 
हसरतें पूरी नहीं होती ,कबर में जाने तक ,
बेकरार हैं जिद्दी नजरें ,यम के आने तक ॥ ---- रवि "अतृप्त"
ज़िन्दा रहती हैं हसरतें ता-उम्र गर खून में हो रवानी,
गर मिट गई हसरतें तो फिर जिंदा लाश है जिंदगानी i
शौके दीदार ज़ुल्म नहीं गर पाकीज़गी हो निगाहे-राहगीर में,
मुद्दे की बात करो दोस्त क्या रखा है फ़िज़ूल की तक़रीर में i
ना होती है हद कोई बहस की ना होता जिद का कोई किनारा,
क्यों मुद्दों को तुम उलझाते हो लेकर जुमलों का रोज़ सहारा i
तृप्ति नहीं मिलेगी तुमको जीवन भर यों सींग-फसाई करके,
अतृप्त मियाँ बैठोगे एक दिन खटिया पर तुम भी पेशानी पे हाथ धरके
 
विजयपाल जी
समकालीन पुरुषों के आत्मसंयम का स्तर निश्चित रूप से काफी ऊंचा रहा होगा i आजकल के पुरुषों, विशेषकर नवयुवकों में आत्मसंयम का स्तर खतरे के निशान से ऊपर चला गया है और चारित्रिक ह्रास अपने न्यूनतम स्तर पर है i
समस्या पुरुषों के चरित्र और सयम मे है और आप उसका हल महिलाओं के कपड़ों मे निकाल रहे हैं। काफी दिलचस्प बात है।
कोई सलाह पुरुषों को भी दे दीजिये आप हर बार ये नैतिकता का बोझ महिलाओं पर क्यों डाला जाता है,,,,क्यों महिलाओं ही सब सहन करने को कहा जाता है???
जब पुरुष भेड़िया ही बन जाएगा तो ये कपड़े कम या ज्यादा पहनने से कोई विशेष अंतर नही आएगा।

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प्राचीन काल में नारी द्वारा वस्त्र कम पहनने के फैशन के पीछे जो तर्क मेरे मष्तिष्क में आता है वो ये है की, समकालीन पुरुषों के आत्मसंयम का स्तर निश्चित रूप से काफी ऊंचा रहा होगा i आजकल के पुरुषों, विशेषकर नवयुवकों में आत्मसंयम का स्तर खतरे के निशान से ऊपर चला गया है और चारित्रिक ह्रास अपने न्यूनतम स्तर पर है i ऐसे में महिलाओं का कम या भड़काऊ (provocative) वस्त्र पहनना शायद वांछनीय नहीं है i इसके अतिरिक्त कोई और तर्क महिलाओं की अर्धनग्नता के विरुद्ध शायद नहीं हो सकता क्योंकि पहनावा एक व्यक्तिगत पसंद नापसंद की चीज़ है i अगर पुरुषों में संयम हो तो फिर महिलाओं के परिधान पर विवाद भी अपने आप ख़त्म हो जाये i लेकिन हमारे देश में यह आदर्श परिस्थिति शायद कभी ना आ पाए i हर तीसरा आदमी औरत को भूखे भेड़िये की तरह निहारता है और ऐसे में प्राचीनकाल वाली अंगिया पहन कर निकलना बेवकूफी के सिवा कुछ नहीं है i

english translation for urmila ji

the logic that comes to my mind behind wearing short clothes by men and women in the ancient times is that the level of self-restraint of the contemporary men-folk must have been certainly of very high degree. The level of self-control among modern age men-folk, especially the youngsters, has reached the danger-level and their character is at its lowest ebb. There can be no argument other than this against the perceived sartorial impropriety on the part of modern women because fashion is something which is a matter of individual taste. If men learn how to control themselves, the whole controversy would come to an end. But that ideal situation might never come in india. In the prevailing scenario, it is nothing but foolishness on the part of a lady to venture out clad in a bikini akin to that worn by the ancient ladies depicted in our epics/ancient sculptures and carvings of khajuraho fame.
 
विजयपाल जी
समकालीन पुरुषों के आत्मसंयम का स्तर निश्चित रूप से काफी ऊंचा रहा होगा i आजकल के पुरुषों, विशेषकर नवयुवकों में आत्मसंयम का स्तर खतरे के निशान से ऊपर चला गया है और चारित्रिक ह्रास अपने न्यूनतम स्तर पर है i
समस्या पुरुषों के चरित्र और सयम मे है और आप उसका हल महिलाओं के कपड़ों मे निकाल रहे हैं। काफी दिलचस्प बात है।
कोई सलाह पुरुषों को भी दे दीजिये आप हर बार ये नैतिकता का बोझ महिलाओं पर क्यों डाला जाता है,,,,क्यों महिलाओं ही सब सहन करने को कहा जाता है???
जब पुरुष भेड़िया ही बन जाएगा तो ये कपड़े कम या ज्यादा पहनने से कोई विशेष अंतर नही आएगा।

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नीलम, हमेशां की तरह आपका विश्लेष्ण अच्छा है और आपने बिलकुल जायज सवाल उठाया है i चाहते तो हम सभी जिम्मेवार नागरिक यही हैं की हमारा पुरुष वर्ग अपने चरित्र को सुधारे ताकि उसकी कमियों का बोझ महिला वर्ग को न ढोना पड़े i लेकिन हमारी सदिच्छा इस तथ्य तो नकार तो नहीं सकती कि ऐसे ख़राब वातावरण के चलते महिलाओं को अपनी इच्छानुसार कपड़े पहनने की इज़ाज़त अधिकाँश परिवार नहीं दे पाते i

हमे चरित्र निर्माण पर जोर देने की जरूरत है और यह काम शिक्षा कार्यक्रमों में वांछित परिवर्तन (नैतिक शिक्षा पर जोर) और सामाजिक स्तर पर सांस्कृतिक आन्दोलन के द्वारा ही हो सकता है I i हालांकि मै आर्यसमाज की सारी बातों का समर्थन नहीं करता, परन्तु उत्तरी भारत (खासकर हरियाणा) में एक समय में आर्यसमाज ने चरित्र निर्माण में अभूतपूर्व भूमिका निभाई थी i इसी प्रकार का कोई आन्दोलन जब तक नहीं उठेगा, जन चेतना नहीं जागेगी i
 
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ज़िन्दा रहती हैं हसरतें ता-उम्र गर खून में हो रवानी,
गर मिट गई हसरतें तो फिर जिंदा लाश है जिंदगानी i
शौके दीदार ज़ुल्म नहीं गर पाकीज़गी हो निगाहे-राहगीर में,
मुद्दे की बात करो दोस्त क्या रखा है फ़िज़ूल की तक़रीर में i
ना होती है हद कोई बहस की ना होता जिद का कोई किनारा,
क्यों मुद्दों को तुम उलझाते हो लेकर जुमलों का रोज़ सहारा i
तृप्ति नहीं मिलेगी तुमको जीवन भर यों सींग-फसाई करके,
अतृप्त मियाँ बैठोगे एक दिन खटिया पर तुम भी पेशानी पे हाथ धरके

खून हे गर गर्म ,तो उसको एक मोड़ दो ,
कुच्छ हसरतें ऐसी होती हैं जिंदगी में ,
उनको एक मुकाम पर ले जा कर छोड़ दो ,
निगाहें राहगीर में पाक-नापाक कोण देखे ,
उम्र के पड़ाव पर आत्मा-परमात्मा को जोड़ दो ,
हम तो "अतृप्त " रहेंगे जिन्द की रवानी तक ,
तुम्हें नाम्नजूर हे ये रिश्ता तो तोड़ दो ॥ ---------रवि "अतृप्त"
 
खून हे गर गर्म ,तो उसको एक मोड़ दो ,
कुच्छ हसरतें ऐसी होती हैं जिंदगी में ,
उनको एक मुकाम पर ले जा कर छोड़ दो ,
निगाहें राहगीर में पाक-नापाक कोण देखे ,
उम्र के पड़ाव पर आत्मा-परमात्मा को जोड़ दो ,
हम तो "अतृप्त " रहेंगे जिन्द की रवानी तक ,
तुम्हें नाम्नजूर हे ये रिश्ता तो तोड़ दो ॥ ---------रवि "अतृप्त"

डटज्य़ा मखा i क्यों दुखी हो रह्या भाई जी, टॉपिक पै आ ज्या i
 
Even I gurgaon women can be seen in public in such outfits.

QUOTE=ravinderjeet;344317]हसरतें पूरी नहीं होती ,कबर में जाने तक ,
बेकरार हैं जिद्दी नजरें ,यम के आने तक ॥ ---- रवि "अतृप्त"[/QUOTE]
 
फैशन / पहनावा तो समकालीन है, मनुष्य की विकास यात्रा के साथ बदलता रहता है | समाज के बिगड़ने का कारण फैशन को बताना बिलकुल वैसा है जैसा पैर में चोट लंगने पर आँख में दवाई डालना | चरित्रिक पतन का पहनावे से कोई भी सम्बन्ध नहीं, यदि होता तो मुस्लिम देशो में जहाँ औरते बुरका पहनकर ही बाहर निकलती वहाँ बलात्कार जैसी घटनाये ना होती |

आज भी दुनिया में कुछ ऐसी सभ्यताए है जिनकी औरते सिर्फ अधोवस्त्र हीं पहनती है फिर भी उनके समाज किसी भी तरह की कोई दिक्कत पैदा नहीं होती उनके इस पहनावे से | यानि दोष पहनावे में नहीं देखने के नजरिये में है, देखने वाले व्यक्ति के विचारों और संस्कारों में है |
 
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फैशन / पहनावा तो समकालीन है, मनुष्य की विकास यात्रा के साथ बदलता रहता है | समाज के बिगड़ने का कारण फैशन को बताना बिलकुल वैसा है जैसा पैर में चोट लंगने पर आँख में दवाई डालना | चरित्रिक पतन का पहनावे से कोई भी सम्बन्ध नहीं, यदि होता तो मुस्लिम देशो में जहाँ औरते बुरका पहनकर ही बाहर निकलती वहाँ बलात्कार जैसी घटनाये ना होती |

आज भी दुनिया में कुछ ऐसी सभ्यताए है जिनकी औरते सिर्फ अधोवस्त्र हीं पहनती है फिर भी उनके समाज किसी भी तरह की कोई दिक्कत पैदा नहीं होती उनके इस पहनावे से | यानि दोष पहनावे में नहीं देखने के नजरिये में है, देखने वाले व्यक्ति के विचारों और संस्कारों में है |
सिवाच साहब, आदर्शवाद और व्यवहारिकता में फर्क होता है i सिद्दांत रूप में हर किसी को इच्छानुसार कपड़े पहनने का अधिकार होना चाहिए, लेकिन व्यवहारिक रूप में आप आस पास के माहौल और सोच को आप नज़रंदाज़ नहीं कर सकते i कितने लोग ऐसे हैं यहाँ पर जो अपने घर की लड़कियों या औरतों को इतने ज्यादा छोटे कपड़ों पहनने देते हैं जो आपके द्वारा उद्धृत "कुछ देशों" में पहने जाते हैं i शायद कोई एक आध बड़े जिगर वाला, क्योंकि लम्पटपना और हूटिंग हमारे देश के काफी भागों (खासकर उत्तरी भारत) में एक आम बात है i और ऐसे माहौल में बहुत कम लोग चाहेंगे कि औरतें अर्ध नग्न अवस्था में विचरण करें i कहना आसान होता है, परन्तु जब समाज से रूबरू होना पड़ता है तो सिद्दांत धरे के धरे रह जाते हैं i इसीलिये मैंने यह भी कहा था कि हमारे समाज के पुरुषों को अपना रवैया बदलने की जरूरत है, ताकि महिलायें मन पसंद लिबास पहनने की अपनी आज़ादी का लुत्फ़ उठा सकें i
 
सिवाच साहब, आदर्शवाद और व्यवहारिकता में फर्क होता है i सिद्दांत रूप में हर किसी को इच्छानुसार कपड़े पहनने का अधिकार होना चाहिए, लेकिन व्यवहारिक रूप में आप आस पास के माहौल और सोच को आप नज़रंदाज़ नहीं कर सकते i कितने लोग ऐसे हैं यहाँ पर जो अपने घर की लड़कियों या औरतों को इतने ज्यादा छोटे कपड़ों पहनने देते हैं जो आपके द्वारा उद्धृत "कुछ देशों" में पहने जाते हैं i शायद कोई एक आध बड़े जिगर वाला, क्योंकि लम्पटपना और हूटिंग हमारे देश के काफी भागों (खासकर उत्तरी भारत) में एक आम बात है i और ऐसे माहौल में बहुत कम लोग चाहेंगे कि औरतें अर्ध नग्न अवस्था में विचरण करें i कहना आसान होता है, परन्तु जब समाज से रूबरू होना पड़ता है तो सिद्दांत धरे के धरे रह जाते हैं i इसीलिये मैंने यह भी कहा था कि हमारे समाज के पुरुषों को अपना रवैया बदलने की जरूरत है, ताकि महिलायें मन पसंद लिबास पहनने की अपनी आज़ादी का लुत्फ़ उठा सकें i

वीपी जी, आप सही कह रहे है आदर्शवाद और व्यवहारिकता में फर्क होता है| लेकिन मैंने आदर्शवाद की बात तो की ही नहीं | पहली पंक्ति में ही मैंने कहा है कि फैशन / पहनावा समकालीन है| देशी भाषा में जैसा देश वैसा भेष | मेरी पोस्ट का केन्द्र बिन्दु सिर्फ इतना सा है फैशन या पहनावे को समाज के बिगड़ने का दोष देना सही नहीं है | किस पहनावे को अर्ध नग्नता कहा जाये ये हर व्यक्ति के नज़रिए से अलग अलग है | जिस पहनावे को देखकर मुझे कुछ भी गलत नहीं लगता उसी को देखकर मेरे पास गाँव से आये एक दो लोगो को बड़ा ही अजीब लगा|
 
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