जवानी में नहीं तो फिर कब करेंगे:

City internet cafee pe individual checking ki jagah, internet cafee waale ne adult content filter as wholesome lagwa rakhe hain ya nahin wo hi kaafi hai.....

vaise dekha jaaye to internet cafee waale jyadatar paisa kamate hi adult cheejon ko internet pe permit karwa ke hi hain otherwise simple work related cheejon se to unki kamaai hi naa ho.....but whatever youth ka physical dohan bachana internet waale ki is tareeke ki kamaai se jyada jaroori hai.....

aur in internet cafee waalon ke customers apne gaon ka youth student hi rahta hai....ye kaafi observe ki hui baat hai....

Sahi baat hai... gaon me koi bhi chora internet connection(ya data card) leta hai, to gaon ke representative ko Interet Service Provider se contact kar ke... har mahine ki history mangwani chahiye...ki kya kya sites dekhi... aur google/yahoo/fb/etc se contact karna chaiye... kis kis se chat kari... aur chat content kya the...

+ har chhore ke gaam ke bas adde pe tampo/tamtam/bus se utarte ki bag check karna chaiye... ki kahin uske pas ki CD/pendrive me ashleel saahitya to nahi.

+ aisa na ho ki chhora apna thaila bado ko pakda dein... sabke thaile check hone chaiye... gaaon ke retired maastero ko laptop pradaan kiye jane chahiye.. duty lagani chaiye.. taaki is tareh ki saamagri.. gaon me na pahunch paye aur vatavaran dooshit na ho...

paas ke shahar ke sabhi cyber cafe walo ko suchit kiya jana chahiye.. ki agar unke gaon ka ladka (ID card check karke), koi asheel site kholta hai to phatphat gaon ke bujurgo ko phone kiya jana chaihye..

gaon ke chhore ke shahri dosto ke laptops pe bhi pendrive port/dvd drive disable ki jani chaiye.. taaki wo aise contents unhe na de paaye...
 
OMG .......
Seriously is this the Plan of Action .

God Speed


Sahi baat hai... gaon me koi bhi chora internet connection(ya data card) leta hai, to gaon ke representative ko Interet Service Provider se contact kar ke... har mahine ki history mangwani chahiye...ki kya kya sites dekhi... aur google/yahoo/fb/etc se contact karna chaiye... kis kis se chat kari... aur chat content kya the...

+ har chhore ke gaam ke bas adde pe tampo/tamtam/bus se utarte ki bag check karna chaiye... ki kahin uske pas ki CD/pendrive me ashleel saahitya to nahi.

+ aisa na ho ki chhora apna thaila bado ko pakda dein... sabke thaile check hone chaiye... gaaon ke retired maastero ko laptop pradaan kiye jane chahiye.. duty lagani chaiye.. taaki is tareh ki saamagri.. gaon me na pahunch paye aur vatavaran dooshit na ho...

paas ke shahar ke sabhi cyber cafe walo ko suchit kiya jana chahiye.. ki agar unke gaon ka ladka (ID card check karke), koi asheel site kholta hai to phatphat gaon ke bujurgo ko phone kiya jana chaihye..

gaon ke chhore ke shahri dosto ke laptops pe bhi pendrive port/dvd drive disable ki jani chaiye.. taaki wo aise contents unhe na de paaye...
 
Porn is like sand, the more you try to clutch it the more freely it wants to run. So better is let people who consume it be the judge of if they want to consume it or not
 
Last edited:
यार विकास मानता हूँ liberal छोड़ना चाहिए, लेकिन मेरे भाई वो कहावतें भी तो कुछ होती हैं जो कहती हैं कि, "जरूरी तो नहीं कि आपने नदी बिना पुल के पार की हो तो उसको दूसरों से भी बिना पुल ही पार करवाया जाए"?

कितनी ऐसी studies आ चुकी हैं जो साबित करती हैं कि बालिग उम्र में पोर्न देखने का बच्चे के दिमाग और शारीर दोनों पे नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और फिर हर पोर्न फिल्म शुरू होने से पहले भी और कानून तौर पर भी आप अगर 18 साल से छोटी उम्र के हैं तो पोर्न देखना आपके लिए कानूनी अपराध है?

वैसे भी मैंने ये तो नहीं कहा कि सारी उम्र ही नहीं देखनी बस तब तक की बात हो रही है जब तक बच्चे शारीरिक और मानसिक स्तर पर इन चीजों देखने को तैयार ना हो जाएँ| आखिर सारे कोई जिन्न के जने तो होते नहीं कि जिन्न कि भांति चिराग से निकलते ही, "हुक्म मेरे आका" कहने का ऐसा दम रखते हों चाहे जो करवा लो या जो परोस दो उनको, उससे कोई फर्क ही नहीं पड़ेगा| यार इंसान के बच्चों को जिन्न मत समझो या बनाओ मेरे भाई, उनको इंसान ही रहने दो|

Porn is like sand, the more you try to clutch it the more freely it wants to run. So better is let people who consume it be the judge of if they want to consume it or not
 
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अंधी आधुनिकता, आर्य-समाज की अनुपस्थिति से पैदा हुई आध्यात्म तप और चिन्तन की रिक्तता, दूसरों (पड़ोसियों, सहकर्मियों, सहपाठियों, सहविचरणियों ) से बड़ा दिखने या बराबर का बनने की अस्थाई चंचलता और समाज में किसी कालजयी प्रेरणादायक सामाजिक सभ्यता के स्तंभ की अनुपस्थिति का हरियाणा के ग्रामीण आंचल में ईतना दुष्प्रभाव हो चुका है कि अबोध युवा-पीढ़ी (12 से 18 साल तक खासकर) नें अपने अनैतिक कार्यों की वैधता के लिए एक नया तकिया-कलाम गढ़ लिया है कि "जवानी में नहीं करेंगे तो कब करेंगे?" और यह तकिया कलाम बनाया गया है इन चीजों के लिए:

1) जवानी में नशा नहीं करेंगे तो फिर कब करेंगे?
2) इसी उम्र में आशिकी नहीं मारेंगे तो फिर कब मारेंगे (यहाँ अमर्यादित व् असामाजिक आशिकी का चलन ज्यादा निकल पड़ा है)|

यह तकिया-कलाम दुर्भाग्य से जिन चीजों के लिए होना चाहिए था उनके लिए नहीं हुआ, जैसे कि इस उम्र में अबोध जवानी की अवस्था में तप करना नहीं सीखेंगे तो कब सीखेंगे, शारीरिक इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना अब नहीं सीखेंगे तो कब सीखेंगे, जीवन के ध्येय (career) की जड़ें अभी से नहीं सींचेंगे तो फिर वह पेड़ कब बनेगा (जिसके लिए पढाई से ले, शारीरिक अनुशासन में स्वयं को ढालना होता है)| परन्तु काल की अवनति ऐसी पसर चुकी है कि ग्रामीण आँचल नें जैसे दूर की कौड़ी के युवा बनाने ही बंद कर दिए हों| किसी इक्का-दुक्का को छोड़ कर, सारे गरम पानी में उठते बुलबुले की भांति उछल के जब उपरी शीतलता को छूते हैं तो वापिस उसी पानी में समां जाते हैं|

आखिर इन पह
continue on post 2....
भाई फूल, या जवानी तो आण तैं रहगी i फूल बणन तैं पहल्यां कली मुरझावण लाग की i आजकाल के जवान छोरे छोरी भीतर की उर्जा का महत्व नहीं समझते और सारे काम ऐसे करते हैं जिससे कामुकता और व्यस्नात्म्क प्रवृतियों को बढ़ावा मिलता है i
अन्तर्निहित उर्जा का संचय यौवन की सुरक्षा और आनंद का आधार होता है i आर्यसमाज की विचारधारा इस दिशा में बहुत ही सटीक और उपयोगी सिद्ध हुई है i यह सही है कि बदलते हुए परिवेश में आर्य समाज की हर शिक्षा को जस का तस नहीं अपनाया जा सकता परन्तु शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए उनके द्वारा प्रचारित दिनचर्या और जीवन शैली उपयोगी सिद्ध हुई है, यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है i परन्तु उनकी कई बातें फ़ालतू की भी होती हैं जैसे मन्त्रों के उच्चारण, हवन, जनेउ इत्यादि क्योंकि इन सब का उर्जा संचय और स्वास्थ्य से कोई लेना देना नहीं है i

आजकल के छोरे छोरी भोत तावले उत्तेजना में आ जाते हैं जिससे शारीरिक और मानसिक ह्रास होता है i जीवन में संयम बहुत जरूरी होता है और यह बात महात्मा बुद्ध ने भी समझाई है i जमाना तेज़ी से पतन की तरफ जा रहा है क्योंकि आत्म-संयम का स्तर जितनी तेज़ी से घट रहा है, बेलगाम कामुकता का स्तर उतना ही तेज़ी से बढ़ रहा है i बढ़ते हुए जवानी के उफान को अगर आत्म-संयम से नहीं रोका जाता तो ये होश के किनारे तोड़कर समाज की मान मर्यादा और अच्छे संस्कारों को अपने साथ बहा ले जाता है i

हम भी इस तूफ़ान से गुज़रे हैं मगर बुजुर्गों और खासकर अपने पिता जी के द्वारा समझाए गए आर्य समाज के सिधान्तों ने काफी सहारा दिया यह मेरा अपना अनुभव है i हालांकि रह रह कर कुछ हिचकोले हमने भी खाए, और ये कहना बिलकुल झूठ होगा कि हम तो ऋषि मुनि थे i परन्तु इन हिचकोलों के बावजूद जवानी को काफी संजोकर रखा शरीर को तपा कर और शारीरिक व्यायाम और खेती बाडी का कठोर काम करके i वो शायद भीतर की उर्जा ही थी कि जब मै कॉलेज के आखरी साल में था तो पूरी सर्दी मैंने कोई उनी वस्त्र न पह्नने का संकल्प लिया और उसे निभाया जिस पर मेरे सभी सहपाठी और शिक्षकों ने बड़ा आश्चर्य जताया और कुछ ने तो सनकी तक कह डाला मगर मुझे अपनी दृढ़ता पर गर्व था i इसी प्रकार कभी शरीर बेकाबू होता तो रात को सर्दियों में ठन्डे पानी से नहा लिया करता i शायद उसी आत्म संयम, कठोर शारीरिक कार्य, साधारण जीवन शैली एवं नियमित व्यायाम का असर है की शरीर के भीतर आज उतनी ही उर्जा और यौवन की अनुभूति होती है जो पच्चीस की अवस्था में होती थी i इसीलिये दिल कभी कभी चुहल बाज़ी कर उठता है और फिर कुछ जाटलैंड के साथी मुझे उम्र का आभास कराते हैं, मगर क्या करें दिल है कि मानता नहीं i

मै तो सभी नौजवान लड़के लड़कियों से यही कहूँगा कि अपनी जवानी के आवेग के साथ मत बहो बल्कि आवेग को अपने काबू में रखो और फिर मर्यादित होकर अपनी जवानी का भरपूर आनंद सारी उम्र उठाओ i आत्म -संयम, नित्य व्यायाम, साधारण जीवन शैली, हल्का आहार और स्वस्थ साहित्य पढ़ कर आप अपनी खोई हुई जवानी को वापिस ला सकते हो, अगर जवानी अभी खोई नहीं है उसको कायम रख सकते हो i जवानी की अनमोल उर्जा को नाली में मत बहने दो, वक्त रहते संभलो i
 
Last edited:
Very precisely explained V.P. Singh ji, and you have cited exactly the same line as uttered by the main character our old man of this story, perhaps he also uttered the same and wanted to convey similar message when he commented, "तुम लोग कम कपड़ों के पहनावे की आशिकी के पैरोकार हो और हम दिलों और अंतरात्मा की आशिकी के पैरोकार होते थे| तुम्हारी आशिकी तो कम कपड़ों में ही औरतों को देख नालों में बह निकलती है, जबकि हमारी आशिकी नालों में नहीं दिलों में बहती थी बेटा|"

जवानी की अनमोल उर्जा को नाली में मत बहने दो, वक्त रहते संभलो i
 
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