भारत माता की जय-राष्ट्रवाद या राजनीति?

भारत माता की जय-राष्ट्रवाद या राजनीति?

राष्ट्रवाद पूरे उफ़ान पर है| इस उफ़ान में अब भारत माता की जय का नारा भी जुड़ गया है| फतवों और पंचायतो का दौर चल निकला है| मुस्लिम संस्था दारूल-उलूम ने तो इसे इस्लाम विरोधी क़रार दे ही दिया है| जो कि ग़ैरज़रूरी मालूम होता है| इस्लाम में भी तो मादरेवतन को सलाम सदियों से चलन में है| यह सच है कि इस्लाम में खुदा के सिवा किसी और की इबादत करने की इज़ाज़त नहीं है| लेकिन भारत माता की जय कहना किसी हिन्दू देवी की इबादत नहीं बल्कि मुल्क के लिए एहतराम (कृतज्ञता/इज्ज़त) जताना है| यह नारा आज़ादी से पहले देशवासियों में राष्ट्रवाद का भाव भरने के लिए बोला गया था| तब हर मज़हब को मानने वाले एक सुर में यह नारा बोलते थे|

लेकिन अब क्या हो गया? क्या इस भारत माता में वो आजादी से पहले वाली बात नहीं रही? क्या यह भारत माता चरित्रहीन हो गयी है? या फिर यह संघ की गोद में बैठ गयी है? या यह भारत माता इस्लाम को लेकर असहिष्णु हो गयी है ? क्या भारत माता की जय की मुखालफ़त बस इसलिए हो रही है कि कुछ तथाकथित सेकुलरवादियो को यह नारा संघ प्रायोजित हिन्दू राष्ट्रवाद की साजिश लगता है?

हमेशा की तरह मुल्क के मुस्लिमो को संघ का डर दिखाया जा रहा है| क्या संघ विरोध पर राजनीति करने वालो के लिए यह मुस्लिम तुष्टिकरण का नया हथियार है?

सवाल यह भी है कि क्या वाकई यह नारा किसी की देशभक्ति का प्रमाणपत्र है? शायद नहीं| देशभक्ति ज़ाहिर करने के और भी ज़रिये है| लेकिन यह एक चीज़ तो साफ़ कर ही देता है कि आप अपने धर्म को राष्ट्र से पहले रखते है तभी तो आपको नारे से पहले अपने धर्म की याद आती है| यहाँ बात इस्लाम की हो रही है| देश के मुस्लिमो को तय करना है कि वो कैसे अपनी मोहब्बत-ए-मुल्क बयाँ करते है| लेकिन औवेसी या कोई दूसरी इस्लामी संस्था अपनी मर्ज़ी मुस्लिमो पर ना थोपे| बागपत की एक खाप पंचायत ने तो अपना फरमान भी सुना दिया इन भारत माता की जय न बोलने वालो के लिए|
http://aajtak.intoday.in/story/panc...who-dont-say-bharat-mata-ki-jai-1-862144.html

आप ज़बरदस्ती किसी को भारत माता की जय कहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते| यह तो खुद के अन्दर से निकला भाव है जो किसी भी धर्म और राजनीति से ऊपर है| मुल्क से मोहब्बत किसी संघ या औवेसी या दारुल उलूम की मोहताज़ नहीं है| यह तो हमेशा दिलो में रहेगी| इस मोहब्बत को किसी की राजनीति की नज़र न लगे| बस इतनी सी दुआ है|
 
निक्कर चली गयी किन्तु पेंट ने भी कोई अक्ल नहीं दी ! पिच्छले हफ्ते ही सिमरनजीत सिंह मान ने भारत माता की जय बोलने से ये कह कर मना कर दिया कि सिख औरत कि पूजा नहीं करते !

पता नहीं ये सब क्या है किन्तु समावेश और सबका साथ सबका विकास तों कम से कम है नहीं ! विविधता कि सुंदरता के ऊपर थोपी हुई ज़बरदस्ती की एकता की राजनीति है वर्ना इसी पार्टी का एक चुना हुआ संसाद हरयाणा को जाती के आधार पर जलने को तयार है ! पेंट वाले बाबू ,ये 2016 है 1857 नहीं !

भारत अगर माता है तों गाँधी का क्या स्टेटस बनता है इसके बाद ?

आने वाले दिनों शायद गौ मूत्र पीना भी शायद रास्ट्रवाद की श्रेणी में शामिल हों सकता है !
 
To avoid critical questioning on implementation of promises made during election campaign and also through party manifesto, the ruling elite has brought out this non issue as major discussion/debate issue on media.

As if it was not enough, the other day advocacy of saffron flag in preference to National Tricolour Flag has also appeared in media.

Friends, this is just to hoodwink the voters once more from real issues like rising unemployment, price rise, widening of gulf between the poor and the rich and so on. Therefore to influence the voters on the basis of Hindu nationalism [without showing tangible results of two years in power in centre] their masters are coming out with newer slogans everyday.
 
To avoid critical questioning on implementation of promises made during election campaign and also through party manifesto, the ruling elite has brought out this non issue as major discussion/debate issue on media.

As if it was not enough, the other day advocacy of saffron flag in preference to National Tricolour Flag has also appeared in media.

Friends, this is just to hoodwink the voters once more from real issues like rising unemployment, price rise, widening of gulf between the poor and the rich and so on. Therefore to influence the voters on the basis of Hindu nationalism [without showing tangible results of two years in power in centre] their masters are coming out with newer slogans everyday.
Yes true to some extent but why Islamic institutions react in that manner. Even all the so called secular parties seek scope for political mileage in such issue.These parties focus on the appeasement of a particular community rather than questioning on current government functioning . They are equally responsible for whole scenario which rolling around this disputed slogan.
 
That is why I say it is pure politics and nothing more or less. All political parties want to secure mileage on the issue by opposing or supporting the new found no issue of importance to secure votes of their respective constituencies.

Every political party registered with Election commission of India is secular and no religion based party is registered.

The so called tag of 'secular vs no secular political party' is just sham.
 
Yes true to some extent but why Islamic institutions react in that manner. Even all the so called secular parties seek scope for political mileage in such issue.These parties focus on the appeasement of a particular community rather than questioning on current government functioning . They are equally responsible for whole scenario which rolling around this disputed slogan.

Since the issue originated from RSS, the Islamic institutions are trying to show to Muslims that they are there to protect them from RSS. Thus both the religious institutions are trying not to compromise on the issue with each other.

In this way the matter has snow balled into a major issue of debate and discussion pushing the real issues under the carpet during the ongoing elections in five States' Assemblies. No political party whether it is rightist, leftist or centrist, is leaving any stone unturned to attract vote bank on this issue towards their party candidates. They have nothing to do with nationalism or secularism for India and Indians. They have one thing in common : unlimited hunger for political power and that too be achieved at whatever price Indian democratic institutions might have to pay.

This is the crux of the problem.
 
निक्कर चली गयी किन्तु पेंट ने भी कोई अक्ल नहीं दी ! पिछले हफ्ते ही सिमरनजीत सिंह मान ने भारत माता की जय बोलने से ये कह कर मना कर दिया कि सिख औरत कि पूजा नहीं करते !

पता नहीं ये सब क्या है किन्तु समावेश और सबका साथ सबका विकास तों कम से कम है नहीं ! विविधता कि सुंदरता के ऊपर थोपी हुई ज़बरदस्ती की एकता की राजनीति है वर्ना इसी पार्टी का एक चुना हुआ संसाद हरयाणा को जाती के आधार पर जलने को तयार है ! पेंट वाले बाबू ,ये 2016 है 1857 नहीं !

भारत अगर माता है तों गाँधी का क्या स्टेटस बनता है इसके बाद ?

आने वाले दिनों शायद गौ मूत्र पीना भी शायद रास्ट्रवाद की श्रेणी में शामिल हों सकता है !
भारत माता की परिकल्पना रबींद्र नाथ टैगोर की थी। क्या वो भी संघी थे। लोगो को तो वन्देमातरम पर भी एतराज है। वैसे भाई आप इतनी जल्दी में क्यूँ रहते है किसी को आरएसएस का एजेंट घोषित करने में। जिस बात से आपको इत्तेफ़ाक़ न हो वह संघ की विचारधारा मान ली जाती है। क्या आपने पूरी पोस्ट ध्यान से पढ़ी थी? उसमे कहा संघ का समर्थन दिखाई दिया?
मैंने तो एक सवाल उछाला था कि भारत माता की जय को क्या ज़बरदस्ती किसी से बुलवाया जा सकता है।

चलिए संघ और राजनीति को कुछ देर के लिए एकतरफ रख दीजिये। कभी किसी आर्मी कैंप तो गए ही होंगे। उनसे पूछा है कि उनके लिए भारत माँ के क्या मायने है या वो भी संघ के एजेंट है। आपके हिसाब से शायद उनमे भी अक्ल की कमी है तभी तो वो फ़ौज में भर्ती हुए। हर रेजिमेंट अपने धर्म के हिसाब से नारे लगाने के लिए स्वतंत्र होती है। सिख रेजिमेंट में वाहे गुरू जी दा ख़ालसा वाहे गुरु जी की फ़तेह या जो बोले सो निहाल सत् श्री अकाल जैसे नारे लगते है। अलग अलग रेजीमेंट में आपको बिरसा मुंडा की जय, हर हर महादेव जैसे नारे भी सुनने को मिल जायेंगे। कोई फ़ौजी भाई चाहे तो इसकी तस्दीक कर सकता है।
भगवान बचाये इन संघियो और सेक्युलरो से। हम तो अपनी मर्ज़ी के मालिक ही अच्छे।
 
क्या आपने पूरी पोस्ट ध्यान से पढ़ी थी? उसमे कहा संघ का समर्थन दिखाई दिया?

क्या आपने खुद का पेस्ट किआ हुआ आज तक का लिंक पढ़ा या सिर्फ छापने की जल्दी थी? खैर मैं पेस्ट कर देता हूँ पढ़ लीजिए:


"कहां से शुरू हुआ विवाद
ये मामला आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान से शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश के लोगों को 'भारत माता की जय' बोलना सिखाना होगा. इसपर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि अगर उनके गले पर छुरी रख दी जाए, तब भी वो 'भारत माता की जय' नहीं बोलेंगे."


खैर अब मेरी सोच, राष्ट्रभक्ति के प्रमाण देने की आवशयकता अव्वल को किसी को नहीं है और देना भी हो तो उसके लिए 'भारत माता की जय' बोलना कोई लष्मण रेखा नहीं | ये सब मुद्दे भटकाने के तरीके है जिसमे लोग फसते है|

As a famous saying goes, "Patriotism is the last refuge of the scoundrel'
 
Last edited:
भारत माता एन डी ए सरकार में बड़ी कमजोर सी हों गयी लगती है कि जय बुलवाकर ही इसे अपनी प्रति वफादारी का अहसास होगा ! कुछ हों ना हों पर इस तरह के विवाद मोदी की प्रगतिशील छवि को निरंतर धूमिल ही कर रहे हैं ! इन सबसे लगता है कि सरकार मोदी नहीं संघ चला रहा है !
 
भारत माता की परिकल्पना रबींद्र नाथ टैगोर की थी। क्या वो भी संघी थे। लोगो को तो वन्देमातरम पर भी एतराज है। वैसे भाई आप इतनी जल्दी में क्यूँ रहते है किसी को आरएसएस का एजेंट घोषित करने में। जिस बात से आपको इत्तेफ़ाक़ न हो वह संघ की विचारधारा मान ली जाती है। क्या आपने पूरी पोस्ट ध्यान से पढ़ी थी? उसमे कहा संघ का समर्थन दिखाई दिया?
मैंने तो एक सवाल उछाला था कि भारत माता की जय को क्या ज़बरदस्ती किसी से बुलवाया जा सकता है।

चलिए संघ और राजनीति को कुछ देर के लिए एकतरफ रख दीजिये। कभी किसी आर्मी कैंप तो गए ही होंगे। उनसे पूछा है कि उनके लिए भारत माँ के क्या मायने है या वो भी संघ के एजेंट है। आपके हिसाब से शायद उनमे भी अक्ल की कमी है तभी तो वो फ़ौज में भर्ती हुए। हर रेजिमेंट अपने धर्म के हिसाब से नारे लगाने के लिए स्वतंत्र होती है। सिख रेजिमेंट में वाहे गुरू जी दा ख़ालसा वाहे गुरु जी की फ़तेह या जो बोले सो निहाल सत् श्री अकाल जैसे नारे लगते है। अलग अलग रेजीमेंट में आपको बिरसा मुंडा की जय, हर हर महादेव जैसे नारे भी सुनने को मिल जायेंगे। कोई फ़ौजी भाई चाहे तो इसकी तस्दीक कर सकता है।
भगवान बचाये इन संघियो और सेक्युलरो से। हम तो अपनी मर्ज़ी के मालिक ही अच्छे।

संघ की ही विचारधारा है ये मौजूदा काल में तों बंधू ! संघ के अलावा कोन ये चीज़े पिछले दो साल से कह रहा है ? लेकिन तुमने इसे कैसे खुद से जोड़ लिया की मैंने तुम्हे संघी कहा है ?

जहाँ तक आर्मी केम्प की बात है तों मुझे हंसी आ गयी , गलत आदमी से सवाल पुछ लिया और वैसे भी गलत सवाल है ! मेरे दादा श्री 1973 के युद्ध में दो तीन साल युद्ध बंधी थे तों कम से कम ये फ़ौज की देशभक्ति का गोला मेरी तरफ ना सरकाओ ! उन्होंने मेरे लिए देशभक्ति का कोटा पूरा कर दिया था तों मुझे इस देशभक्ति के ड्रामे की जरुरत नहीं पर तुम्हे शायद ये समझना चाहिए की धरातल पर देशभक्ति के कारण से कोई बिरला ही भर्ती होता है, अपने रोज़गार के लिए भर्ती होते हैं !

अब तुम ये बताओ की एक राज्य के मुखिया देवेंदर फंदंविस ने ये कैसी गैर सैवंधानिक कसौटी रख दी अपने नागरिको के लिए ?

अगर अपनी मर्ज़ी के मालिक हों तों मुसलमानों को अपनी देशभक्ति दिखाने के लिए क्या चुनना चाहिए ये विचार नहीं आना चाहिए , वो भी अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं जैसे तुम हों !
 
जिस ’भारत माता की जय’ ओर ’वन्देमातरम’ का नारा लगाते हुए न जाने कितने देशभक्त फ़ाँसी के फ़न्दे पर झूल गये वही नारा अगर आर एस एस प्रमुख ने बोल दिया तो सेकूलरों की नजरों में नारा ही अछूत ओर सांम्प्रदायिक हो गया ! सेकूलर कब से छुआ-छूत में विश्वास करने लग गये ? चलो मान लिया कि ओवैसी बहुत ही नेक, ईमानदार ओर देशभक्त है ओर उनका सारा जीवन हर धर्म ओर हर भारतीय का भला करने में व्यतीत हुआ है लेकिन भागवत ने "भारत माता की जय" करने को कह दिया तो कौन सी आफ़त टूट पङी ! अपने देश की जय बोलने में भी लोगों को सांम्प्रदायिकता नजर आ रही है ! आज सारे देशभक्त या सांम्प्रदायिक हो गये या फ़िर संघी हो गये ! मरते हुए अपने आखिरी शब्द "हे राम" कहने वाला तो कट्टर संघी या सांम्प्रदायिक होने के सिवा कुछ हो ही नहीं सकता !

हर राजनेता अपनी चुनावी जनसभा में पचासों बार जनता से "भारत माता की जय" के नारे लगवाता है ! शायद अब वो नारे लगने बन्द हो जायेंगे ओर "भारत की बर्बादी तक" के नारे लगा कर वोट माँगेगे ?

नेताऒं का तो काम ही बेवजह के मुद्दों को उछाल कर लोगॊ को आपस में बाँटना है ओर इस से कोई फ़र्क भी नहीं पङता ! समस्या तब होती है जब आम आदमी इस घटिया राजनीति का अनुसरण करता है ओर इन नेताऒं की हाँ मे हाँ मिलाकर अपने ही लोगों से बहस करने लगता है ! लोग राजनीति में अपना भविष्य बनाने के लिये रातों रात ’कन्हैया’ बनने की कोशिश में अपने देश, समाज ओर परिवार की ही बुराई करने में संकोच नहीं करते ! अफ़सोस की बात ये है कि कुछ ज्यादा ही दूरदर्शी लोगॊं को ऎसे स्वार्थी नेताओं के हाथ में अपना ओर देश का भविष्य उज्जवल नजर आता है !

धन्य है ऎसी सेक्यूलर विचारधारा जिसके कारण भारत माता की जय, वन्देमातरम, राष्ट्रगान, राष्ट्रवाद, हिन्दुत्व, योग, आयुर्वेद ओर न जाने क्या-क्या - सब धीरे धीरे संघी ओर सांम्प्रदायिक होते जा रहे हैं ओर लगता है चार पांच साल में सिर्फ़ एक दो खास धर्मों ओर कुछ राजनैतिक परिवारों को छोङकर सारा हिन्दुस्तान ही संघी ओर सांम्प्रदायिक को जायेगा ! हिन्दुस्तान शब्द प्रयोग हुआ है तो एक ओर मजेदार सेक्यूलर थ्योरी याद आ रही है ! "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" गीत लिखने वाला तो पक्का सेक्य़ूलर है लेकिन इसको गुनगुनाने वाला संघी ओर सांम्प्रदायिक क्योकि इसमे हिन्दुस्तान शब्द का प्रयोग हुआ है ! लिखने वाले आल्लमा इकबाल सेक्यूलर क्यों है ये आप खुद समझ सकते हैं !
 
क्या आपने खुद का पेस्ट किआ हुआ आज तक का लिंक पढ़ा या सिर्फ छापने की जल्दी थी? खैर मैं पेस्ट कर देता हूँ पढ़ लीजिए:


"कहां से शुरू हुआ विवाद
ये मामला आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान से शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश के लोगों को 'भारत माता की जय' बोलना सिखाना होगा. इसपर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि अगर उनके गले पर छुरी रख दी जाए, तब भी वो 'भारत माता की जय' नहीं बोलेंगे."


खैर अब मेरी सोच, राष्ट्रभक्ति के प्रमाण देने की आवशयकता अव्वल को किसी को नहीं है और देना भी हो तो उसके लिए 'भारत माता की जय' बोलना कोई लष्मण रेखा नहीं | ये सब मुद्दे भटकाने के तरीके है जिसमे लोग फसते है|

As a famous saying goes, "Patriotism is the last refuge of the scoundrel'
मित्र (मोदी वाला मित्र नहीं),

यंहा लिंक की बात नहीं हो रही थी| वह तो खाप पंचायत के आदेश को लेकर दिया गया
रेफरेंस था|

मैं यहाँ उस चीज़ पर बहस कर सकता हूँ जो मैंने लिखी है ना कि किसी लिंक में दी गयी|

मेरी ही पोस्ट का यह भाग समझने की कोशिश करोगे तो समझ में आ जायेगा कि मेरा इस पूरे घटनाक्रम को लेकर क्या नजरिया है|

"आप ज़बरदस्ती किसी को भारत माता की जय कहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते| यह तो खुद के अन्दर से निकला भाव है जो किसी भी धर्म और राजनीति से ऊपर है| मुल्क से मोहब्बत किसी संघ या औवेसी या दारुल उलूम की मोहताज़ नहीं है| यह तो हमेशा दिलो में रहेगी| इस मोहब्बत को किसी की राजनीति की नज़र न लगे| बस इतनी सी दुआ है|"

"सवाल यह भी है कि क्या वाकई यह नारा किसी की देशभक्ति का प्रमाणपत्र है? शायद नहीं| देशभक्ति ज़ाहिर करने के और भी ज़रिये है| देश के मुस्लिमो को तय करना है कि वो कैसे अपनी मोहब्बत-ए-मुल्क बयाँ करते है| लेकिन औवेसी या कोई दूसरी इस्लामी संस्था अपनी मर्ज़ी मुस्लिमो पर ना थोपे|"

I hope now you can understand better what I wanted to convey.

 
Everyone loves his country and none has a right to ask him/her to raise this or that slogan to prove patriotism. Why these political leaders not raise slogans like Inquilab Zindabad as raised by revolutionaries like Bhagat Singh et al. or why Jaihind slogan of Netaji Subhash Chandra Bose does not satisfy them ? Politics on both sides of the fence as why other side is afraid of Bharatmata Slogan. But Vote bank politics has made a no issue as the only issue to be debated for and against.
 


अब तुम ये बताओ की एक राज्य के मुखिया देवेंदर फंदंविस ने ये कैसी गैर सैवंधानिक कसौटी रख दी अपने नागरिको के लिए ?

मैंने तो पहले ही इस बात का ज़िक्र अपनी पोस्ट में भी किया कि आप जबरदस्ती किसी से भारत माता की जय नहीं बुलवा सकते| ये भाव तो इंसान के अंदर से आता है| देशभक्ति को आप बाध्यता नहीं बना सकते| जो इस भाव से वंचित है उन्हें आत्मावलोकन कि आवश्यकता है| यह सीखने की विषयवस्तु नहीं है|

अगर अपनी मर्ज़ी के मालिक हों तों मुसलमानों को अपनी देशभक्ति दिखाने के लिए क्या चुनना चाहिए ये विचार नहीं आना चाहिए , वो भी अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं जैसे तुम हों !
बिलकुल सही लेकिन क्यूँ औवेसी और दूसरी इस्लामी संस्थाए मुस्लिमो को जय ना बोलने के फतवे दी रही है| भाई हर मुसलमान का हक है अगर किसी को सही लगता है जय बोलना वो बोले जिसे नहीं बोलना वो खुद से पूछे ऐसा क्यूँ| लेकिन ये औवेसी जैसे लोग क्यों मुसलमानों को बरगला रहे है| क्यों ये इस्लाम कि दुहाई देकर भारत माता की जय को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश में है|
ठीक वैसे ही जैसे संघ या बीजेपी किसी हिन्दू को जय बोलने के लिए बाध्य नहीं कर सकते वैसे ही ये औवेसी और दारूल उलूम मुस्लिमो को न बताये कि उन्हें भारत माता की जय बोलनी है या नहीं| देशभक्ति व्यक्ति विशेष का अंतर्बोध है| इस पर मज़हबी बंदिशों का मुलम्मा ना चढ़ाया जाये|
 
मैंने तो पहले ही इस बात का ज़िक्र अपनी पोस्ट में भी किया कि आप जबरदस्ती किसी से भारत माता की जय नहीं बुलवा सकते| ये भाव तो इंसान के अंदर से आता है| देशभक्ति को आप बाध्यता नहीं बना सकते| जो इस भाव से वंचित है उन्हें आत्मावलोकन कि आवश्यकता है| यह सीखने की विषयवस्तु नहीं है|


बिलकुल सही लेकिन क्यूँ औवेसी और दूसरी इस्लामी संस्थाए मुस्लिमो को जय ना बोलने के फतवे दी रही है| भाई हर मुसलमान का हक है अगर किसी को सही लगता है जय बोलना वो बोले जिसे नहीं बोलना वो खुद से पूछे ऐसा क्यूँ| लेकिन ये औवेसी जैसे लोग क्यों मुसलमानों को बरगला रहे है| क्यों ये इस्लाम कि दुहाई देकर भारत माता की जय को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश में है|
ठीक वैसे ही जैसे संघ या बीजेपी किसी हिन्दू को जय बोलने के लिए बाध्य नहीं कर सकते वैसे ही ये औवेसी और दारूल उलूम मुस्लिमो को न बताये कि उन्हें भारत माता की जय बोलनी है या नहीं| देशभक्ति व्यक्ति विशेष का अंतर्बोध है| इस पर मज़हबी बंदिशों का मुलम्मा ना चढ़ाया जाये|

सही बात ! अगर ध्यान से समझो तों ये क्रिया-प्रतिक्रिया के नियम का सत्यापन है ! सैनी ने क्रिया की , जाटो ने प्रतिक्रिया ! संघियो ने क्रिया की , गैर संघियो /मुसलमानों ने प्रतिक्रिया दी ! पहली पार्टी नैतिक रूप से उकसा रही है और ऐसे मुद्दों पर उकसा रही है जहाँ प्रतिक्रिया को रोकना बहुत मुश्किल है ! इसमें पहली पार्टी अवश्य रूप से जानती है की प्रतिक्रिया का परिणाम कहीं न कहीं उनके पक्ष में हैं !
 
पहली पार्टी नैतिक रूप से उकसा रही है और ऐसे मुद्दों पर उकसा रही है जहाँ प्रतिक्रिया को रोकना बहुत मुश्किल है ! इसमें पहली पार्टी अवश्य रूप से जानती है की प्रतिक्रिया का परिणाम कहीं न कहीं उनके पक्ष में हैं !

अगर प्रतिक्रिया का परिणाम पक्ष में न हो तो प्रतिक्रिया करना कहाँ की समझदारी है ? अगर प्रतिक्रिया नहीं होगी तो क्रिया करने का मकसद ही खत्म हो जायेगा !

लेकिन अगर देखा जाये तो ऎसी क्रिया पर प्रतिक्रिया सबसे पहले वह पार्टी करती है जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता जैसा कि ओवैसी ने किया ! जबकि जन आधार वाली पार्टीयों के लिये इस पर प्रतिक्रिया करना बहुत मुश्किल हो जाता है ! अगर इसका समर्थन करे तो विपक्ष कैसे कहलायेगी, अगर विरोध करे तो वोट बैंक टूटने का खतरा !

वैसे राष्ट्रवाद कोई मुद्दा नहीं है लेकिन ये लोगों की भावनाऒं के तार छेङने का अचूक बाण है जो कभी भी खाली नहीं जाता ! हर पार्टी इसका इस्तेमाल करने के लिये आजाद है लेकिन वो करती क्यों नहीं, शायद मजह्बी वोटों के लिये जो राष्ट्रवाद में ज्यादा रुचि नहीं दिखाते ! ओर इस तरह राष्ट्र्वाद एक मुद्दा बन जाता है क्योंकि एक पार्टी की यह सोच है कि राष्ट्रवादी बनने से एक धर्म विशेष के लोग उसे वोट नहीं देंगे ! सिर्फ़ एक धर्म विशेष के वोट लेने के चक्कर में दूसरे लोग उससे छिटक जाते हैं ओर फ़िर छटपटाहट में वह पार्टी दुसरी पार्टी पर लोगों की धार्मिक ओर राष्ट्रवादी भावनाऒं से खेलने का आरोप लगाती है ! लेकिन यह भूल जाती है कि एक धर्म विशेष के वोटों के लिये खुद भी तो ऎसी ही राजनीति कर रही है !

सब पार्टीयों का अपना अपना राजनैतिक खेल है जो खुल कर खेला जा रहा है ! मीडिया इसमें मसाला डाल कर कुछ ज्यादा ही रोचक बना देता है ! राजनैतिक दलो के समर्थक अपनी अपनी पार्टी को जिताने के लिये नेताओं के हर झूठे सच्चे बयानों का अपना अपना मतलब निकाल कर आपस में मरने मारने को उतारू हैं ! जबकि आम जनता पोप कार्न खाते हुए मजे से शो का आंनन्द उठाने में मशगूल है !

सारा भारत व्यस्त है ! राजनीति की जय हो !
 
क्या विडंबना है रोहतक में सदभावना रैली और उसमे भारत कुमार कानिया रामदेव दुर्भावना का दूत बन गया ! लाखो की गर्दन काटने की धमकी ! ये दारुल उल्लुम का दूसरा पहलु है दूसरी तरफ से ! इससे कोई याद दिलाए कि लठ लगने के समय लुगाई के सुइट सलवार पहन कर भागा था !

http://www.bhaskar.com/news/HAR-PAN-HMU-baba-ramdev-trolled-on-twitter-5291656-PHO.html
 
Yeh Ramdev, Ramrahimsingh aur anya kuch babalog sarkar banne sey pehle BJP key saath jude thay. Nestle ki maggi jabh blacklist hui, uske turant baad ramdev ney apni maggi launch karri. Rajeev dixitg ki maut aaj bhi rahasyamay hai. Kabhi deshbhakti key naare, kabhi Kanheya, Yeh sabh bas bahane hen, dusre muddon sey dhyan bhatkane key liye. Humare desh men bde bde mudde Akhbar ki surkhiyon sey 1 din men gayab hote aye hen.
 
अगर प्रतिक्रिया का परिणाम पक्ष में न हो तो प्रतिक्रिया करना कहाँ की समझदारी है ? अगर प्रतिक्रिया नहीं होगी तो क्रिया करने का मकसद ही खत्म हो जायेगा !

लेकिन अगर देखा जाये तो ऎसी क्रिया पर प्रतिक्रिया सबसे पहले वह पार्टी करती है जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता जैसा कि ओवैसी ने किया ! जबकि जन आधार वाली पार्टीयों के लिये इस पर प्रतिक्रिया करना बहुत मुश्किल हो जाता है ! अगर इसका समर्थन करे तो विपक्ष कैसे कहलायेगी, अगर विरोध करे तो वोट बैंक टूटने का खतरा !

वैसे राष्ट्रवाद कोई मुद्दा नहीं है लेकिन ये लोगों की भावनाऒं के तार छेङने का अचूक बाण है जो कभी भी खाली नहीं जाता ! हर पार्टी इसका इस्तेमाल करने के लिये आजाद है लेकिन वो करती क्यों नहीं, शायद मजह्बी वोटों के लिये जो राष्ट्रवाद में ज्यादा रुचि नहीं दिखाते ! ओर इस तरह राष्ट्र्वाद एक मुद्दा बन जाता है क्योंकि एक पार्टी की यह सोच है कि राष्ट्रवादी बनने से एक धर्म विशेष के लोग उसे वोट नहीं देंगे ! सिर्फ़ एक धर्म विशेष के वोट लेने के चक्कर में दूसरे लोग उससे छिटक जाते हैं ओर फ़िर छटपटाहट में वह पार्टी दुसरी पार्टी पर लोगों की धार्मिक ओर राष्ट्रवादी भावनाऒं से खेलने का आरोप लगाती है ! लेकिन यह भूल जाती है कि एक धर्म विशेष के वोटों के लिये खुद भी तो ऎसी ही राजनीति कर रही है !

सब पार्टीयों का अपना अपना राजनैतिक खेल है जो खुल कर खेला जा रहा है ! मीडिया इसमें मसाला डाल कर कुछ ज्यादा ही रोचक बना देता है ! राजनैतिक दलो के समर्थक अपनी अपनी पार्टी को जिताने के लिये नेताओं के हर झूठे सच्चे बयानों का अपना अपना मतलब निकाल कर आपस में मरने मारने को उतारू हैं ! जबकि आम जनता पोप कार्न खाते हुए मजे से शो का आंनन्द उठाने में मशगूल है !

सारा भारत व्यस्त है ! राजनीति की जय हो !

The purpose of the politicians by pushing up such non issues to central stage and harping on them by media day and night is neither spreading sense of patriotism nor cementing nationalism in the country. Rather it is an attempt to garner votes of a special group of people known in electoral politics as 'vote bank'.
You have beautifully summed up the theme of the thread in just four words :" राजनीति की जय हो !"
 
Today Bharat Mata ki jai, Tomorrow Gau Mata ki Jai, Day after tomorrow some other mata ki jai. And it will go on and on. Stray Gau matas eat polythene and other rubbish and die. No one cares. Only Gau Mata ki jai is important for Bodi supporters.
 
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