A View on Gandhi

राष्ट्र पिता बनने के सही अधिकारी सुभाष चन्द्र बोस ही हैं.
राष्ट्र बनता है लोगों से और लोगों के पास अपने-अपने बाप हैं या थे I वैसे भी एक आदमी सारे राष्ट्र का बाप कैसे हो सकता है I Officially , गाँधी सिर्फ चार-पांच बच्चों का पिता था और सुभाष सिर्फ एक लड़की का पिता I इन नै तम सारे राष्ट्र के बाप क्यों बणावो सो I हिन्दुस्तान मैं व्यक्ति पूजा का रिवाज़ घणा ज्यादा सै I देश की आजादी मैं लाखों ऐसे महान देशभक्त और क्रांतिकारी शहीद हो गए जिनका कोई नाम नहीं, परन्तु कुछ संभ्रांत लोगों की भूमिका को हमेशा जरूरत से ज्यादा प्रचारित प्रसारित किया गया और आज भी वही मानसिकता काम कर रही है I पता नहीं कितने गुदड़ी के लाल आज भी देशभक्ति के भावों से ओतप्रोत हैं परन्तु उनके पास प्रचार प्रसार के साधन नहीं और सच्चे देशभक्त और समाज-सेवी को प्रचार की भूख भी नहीं होती I
 
इस दुनिया में 'परिणाम' का महत्त्व है. जिसने जो रास्ता पकड़ा, उसका परिणाम क्या रहा. सुभाष चंद्र बोस निःसंदेह एक महान देशभक्त थे, लेकिन उन्होंने उस समय देश को आजाद करवाने का जो रास्ता चुना, उसका परिणाम नकारात्मक रहा था. अंग्रेजों ने उनके नेतृत्व वाली आजाद हिंद फ़ौज को हरा दिया था. भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, खुदीराम बोस, मंगल पांडे इत्यादि सभी शहीदों की देशभक्ति का स्तर बेहद ऊंचा था, लेकिन वे अपने मकसद को अंजाम तक नहीं पहुंचा सके और यही कारण है कि उनके जैसे अनेकों हो गए. जिसके जैसे अनेकों हो गए, उसे राष्ट्र पिता का दर्जा नहीं दिया जा सकता (हालांकि किसी को भी यह दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए. यह एक अर्थहीन अवधारणा है). बहरहाल गांधी ने जो रास्ता चुना, उसका परिणाम सकारात्मक रहा. वास्तविकता तो यह है कि गांधी का पूरा जीवन उनके किसी पिछले जन्म के संघर्षपूर्ण जीवन का फल था. वे उस विश्व स्तर की प्रसिद्धि के हकदार थे. द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों को कमजोर करना और भारत को स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए विवश करना इस दुनिया को चलाने वाली अदृश्य शक्ति का कारनामा था, क्योंकि गांधी को उसका हक़ प्रदान करना उस शक्ति का दायित्व था. हम चाहें ऐसे गूढ़ रहस्यों को न समझें, लेकिन दुनिया में और बहुत से तो समझते हैं.
अब यदि हम कहें कि सुभाष चंद्र बोस को राष्ट्र पिता बनाया जाना चाहिए था तो सवाल खड़ा होता है कि यदि उन्हें अपने लक्ष्य में असफल रहने के बावजूद यह दर्जा दिया जाता तो फिर यह गांधी जैसी शख्सियत के साथ अन्याय होता, जो अपने लक्ष्य में सफल हुए. यदि भगत सिंह की तस्वीर नोटों पर छपनी चाहिए तो फिर चंद्रशेखर आजाद और इनके जैसे अन्य देशभक्तों की भी छपनी चाहिए. फिर तो कैप्टन सौरभ कालिया और उनके 5 साथी फौजियों की तस्वीर भी नोटों पर छपनी चाहिए, जिन्हें बुजदिल पाकिस्तानियों ने तमाम युद्ध नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए करगिल युद्ध के दौरान तड़पा-तड़पाकर मारा था. उनकी आंखें फोड़ दी गई थीं, कानों के परदे नुकीले शूलों से बेध दिए गए थे, शरीर पर बार-बार उबलता पानी डाला गया था, गुप्तांगों को बड़ी बेरहमी से भंग किया गया था.
दरअसल जो देश के लिए कुर्बान हो गए, उनके लिए देशवासियों के दिलों में सम्मान होना चाहिए, लेकिन असली सम्मान उनके लिए होना चाहिए, जो दुश्मनों के हाथों खुद का बुरा हश्र न करवाएं, बल्कि दुश्मनों का हश्र बुरा करें. गांधी के समय में हमारे पास न तो अत्याधुनिक हथियार थे और न ही कोई सेना. ऐसा होने की संभावना भी न के ही बराबर थी. ऐसे में कुछ भी न करने की बजाय कुछ करना ठीक था. अहिंसात्मक आंदोलन उस समय की मजबूरी थी. खैर, मैं गांधी का कोई बहुत बड़ा प्रशंसक नहीं हूं, लेकिन आलोचक भी नहीं हूं. गांधी के सिद्धांत वर्तमान में प्रासंगिक नहीं हैं. इसके बावजूद अपने निजी विचार यहां रख रहा हूं. जरूरी नहीं है कि दूसरे भी ऐसा ही सोचें.
 
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क्यों मुझे गाँधी पसंद नहीं है ?

1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में
थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए।
गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।

2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व
गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं,
किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग
को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों
को आतंकवादी कहा जाता है।

3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम
लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।

4.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते
हुए 1921 में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी
केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग
1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस
हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में
वर्णन किया।

5.1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी
श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी
प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को
उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम
एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।

6.गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द
सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।

7.गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम
बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं
दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।

8. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।

9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा
अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर
दिया गया।

10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से
कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर
रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।

11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु
गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।

12. 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक
में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ
पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था
कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।

13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की
सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।

14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय
पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के
सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त
करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की
मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब
अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व
बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर
किया गया।

16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व
माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का
परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने
को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के
लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे
दी गयी।

17.गाँधी ने गौ हत्या पर पर्तिबंध लगाने का विरोध किया

18. द्वितीया विश्वा युध मे गाँधी ने भारतीय सैनिको को ब्रिटेन का लिए हथियार
उठा कर लड़ने के लिए प्रेरित किया , जबकि वो हमेशा अहिंसा की पीपनी बजाते है

.19. क्या ५०००० हिंदू की जान से बढ़ कर थी मुसलमान की ५ टाइम की नमाज़ ?????
विभाजन के बाद दिल्ली की जमा मस्जिद मे पानी और ठंड से बचने के लिए ५००० हिंदू
ने जामा मस्जिद मे पनाह ले रखी थी…मुसलमानो ने इसका विरोध किया पर हिंदू को ५
टाइम नमाज़ से ज़यादा कीमती अपनी जान लगी.. इसलिए उस ने माना कर दिया. .. उस
समय गाँधी नाम का वो शैतान बरसते पानी मे बैठ गया धरने पर की जब तक हिंदू को
मस्जिद से भगाया नही जाता तब तक गाँधी यहा से नही जाएगा….फिर पुलिस ने मजबूर
हो कर उन हिंदू को मार मार कर बरसते पानी मे भगाया…. और वो हिंदू— गाँधी
मरता है तो मरने दो —- के नारे लगा कर वाहा से भीगते हुए गये थे…,,,
रिपोर्ट — जस्टिस कपूर.. सुप्रीम कोर्ट….. फॉर गाँधी वध क्यो ?

२०. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी लगाई जानी थी, सुबह
करीब 8 बजे। लेकिन 23 मार्च 1931 को ही इन तीनों को देर शाम करीब सात बजे फांसी
लगा दी गई और शव रिश्तेदारों को न देकर रातोंरात ले जाकर ब्यास नदी के किनारे
जला दिए गए। असल में मुकदमे की पूरी कार्यवाही के दौरान भगत सिंह ने जिस तरह
अपने विचार सबके सामने रखे थे और अखबारों ने जिस तरह इन विचारों को तवज्जो दी
थी, उससे ये तीनों, खासकर भगत सिंह हिंदुस्तानी अवाम के नायक बन गए थे। उनकी
लोकप्रियता से राजनीतिक लोभियों को समस्या होने लगी थी।
उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी को मात देनी लगी थी। कांग्रेस तक में अंदरूनी
दबाव था कि इनकी फांसी की सज़ा कम से कम कुछ दिन बाद होने वाले पार्टी के
सम्मेलन तक टलवा दी जाए। लेकिन अड़ियल महात्मा ने ऐसा नहीं होने दिया। चंद
दिनों के भीतर ही ऐतिहासिक गांधी-इरविन समझौता हुआ जिसमें ब्रिटिश सरकार सभी
राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर राज़ी हो गई। सोचिए, अगर गांधी ने दबाव बनाया
होता तो भगत सिंह भी रिहा हो सकते थे क्योंकि हिंदुस्तानी जनता सड़कों पर उतरकर
उन्हें ज़रूर राजनीतिक कैदी मनवाने में कामयाब रहती। लेकिन गांधी दिल से ऐसा
नहीं चाहते थे क्योंकि तब भगत सिंह के आगे इन्हें किनारे होना पड़ता.
 
इस दुरात्मा गांधी, नेहरु ने मिलकर भारत को बर्बाद कर दिया | जिस का खामियाजा हम आज भी उनकी नाजायज ओलादों को ढो कर उठा रहे हैं |
 
गाँधी प्रायः चापलूसी का शिकार हो जाया करता था. यही कारण था कि उसने सुभाषचंद्र बोस जैसे प्रतिभाशाली देशभक्त को पहले कांग्रेस से बाहर किया और इसके पश्चात देश से निष्कासित करवाकर नेहरु जैसे मतिमंद चापलूसों को आगे बढाने में अधिक रुचि दिखाई. मोतीलाल ने मानो जवाहर को गाँधी की झोली में डाल दिया था. कसौटी के निर्णायक क्षणों में (जब अंग्रेजों द्वारा कांग्रेस को सत्ता हस्तांतरित की जानी थी, उससे पूर्व देश में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होना था, तब एक भी प्रांत से नेहरु के नाम का समर्थन न होने पर और कुल सत्रह में से चौदह प्रान्तों द्वारा सरदार पटेल का खुला समर्थन करने के बाद भी गाँधी ने दबाव डालकर नेहरु को ही उस निर्णायक वर्ष में कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवाया और मानो तत्क्षण ही जवाहरलाल को देश का प्रथम प्रधानमंत्री भी बना दिया) गाँधी ने नेहरु परिवार के साथ जैसी यारी निभाई, उतनी निष्ठा तो उसने देश के प्रति भी न दिखाई. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक सच्चे गाँधीवादी ही तो हैं, जो देश से अधिक नेहरु परिवार के प्रति अपनी वफादारी निभाने में गाँधी का ही अनुसरण किये जा रहे हैं.

अस्तु, स्वाधीनता संग्राम के दिनों में अंग्रेजों ने गाँधी को कई समस्याओं में एक साथ उलझा रखा था. तब, समाज में हिंदू-मुस्लिम का प्रश्न तो खड़ा था ही, साथ ही, कपटी फिरंगियों ने भारत के समरस समाज से दलितों को भी तोड़ने के लिए जाल फैला दिए थे.

इसी तनावग्रस्त वातावरण में गाँधी ने अहिंसा और सत्याग्रह के नाम पर अपने जो-जो प्रयोग किए अथवा उसने जब-जब जितने आंदोलन आरंभ किए, अंग्रेजों की कुटिल चालों ने प्रायः उन सभी को विफल कर दिया. गाँधी का प्रत्येक आंदोलन यद्यपि अपार जन चेतना तो जगाता था, परन्तु जिस-जिस लक्ष्य को लेकर आंदोलन आरंभ किया जाता था, वह लक्ष्य कभी पूरा नहीं हो पाता था. गाँधी या तो स्वयं ही अपने नियम-कायदों के बंधक बनकर बैठ जाता था और आंदोलन को उग्र होता देख स्वयं ही उसकी समाप्ति की घोषणा कर देता था, या फिर अंततः वार्ता की मेज़ पर परास्त हो जाता था. अंग्रेज किसी न किसी तरह उसकी वैचारिक दृढ़ता में सेंध लगाने में सफल रहते थे. इसका सबसे प्रमुख कारण यह था कि गाँधी अपमानित होने से बहुत डरता था, इसलिए तत्पर बीच का मार्ग निकालने और समझौते करने में अधिक विश्वास रखता था.

देश भर से मिलने वाली जय-जयकार के प्रभाव से गाँधी के भीतर जो 'महात्मा' उठ खड़ा हुआ था, वह 'हिंद स्वराज' के चिंतनशील लेखक पर हावी हो गया और उसने ग्रामोत्थान का स्वप्न देखने वाले मोहनदास को दबा लिया. तत्पश्चात, आगे चलकर उस नए 'महात्मा' ने पूरे देश को ही दबा लिया. गाँधी को सादगी तो पसंद थी, परन्तु उसे देश के किसी भी गाँव में रहना अधिक नहीं भाया. फिर भी, चूँकि उसे अपनी संत-महात्मा वाली छवि को प्रामाणिकता भी दिलानी थी, इसलिए उसने साधुओं के अखाड़ों की तरह अपने लिए अलग से कृत्रिम आश्रमों का निर्माण करवाना उचित समझा और उनमें बैठ गया. उन आश्रमों में गाँधी के देशी-विदेशी प्रशंसक ही अधिक रहते थे, आम गाँववालों की उनमें अधिक भागीदारी न थी. संभवतः किन्हीं अज्ञात कारणों से गाँधी को अपनी अन्त्योदय, सर्वोदय जैसी योजनाओं व ग्रामोत्थान के विविध प्रकल्पों को किसी बसे-बसाए अभावग्रस्त गाँव में चलाना संभव नहीं लगा होगा, इसलिए उसने कई पृथक आश्रम खड़े किये और विश्व भर के मीडिया को बुला-बुलाकर अपने सब प्रकल्प दिखाए.

यदि गाँधी पर उसकी 'महात्मा' की छवि का सतोगुणी राक्षस हावी न होता तो क्या नौआखली से लौटने के पश्चात भी गाँधी सांप्रदायिक हिंसा से निपटने में बुरी तरह उलझे हुए नेहरु-पटेल से दूरी बनाकर रखता और उनसे पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने का दुराग्रह करता? क्या 'हिंद स्वराज' का लेखक अपनी ही सरकार पर एक शत्रु राष्ट्र को विशाल धनराशि देने का दबाव डालता और ऐसा न करने की स्थिति में अनशन करने की धमकी देकर उसे ब्लैकमेल करता? 'महात्मा' बन जाने से गाँधी अपनी ही कृत्रिम छवि के व्यामोह में फँसकर सत्य से कोसों दूर जा खड़ा हो गया था. वह भारत और पाकिस्तान दोनों के 'बापू' बनना चाहता था. परन्तु, आज अखंड भारत के उपासक जितनी घृणा (गाँधी वाले) कायदे आज़म व पाकिस्तानियों के पैरोकार, मुहम्मद अली जिन्नाह से करते हैं, किसी 'अव्यक्त' कारण से, उससे भी अधिक घृणा पाकिस्तानी लोग महात्मा गाँधी से करते हैं. यहाँ, एक और अविश्वसनीय सत्य यह है कि गाँधी के कटु आलोचकों की जितनी संख्या पाकिस्तान सहित पूरे विश्व में है, शायद गाँधीवाद के आलोचकों की उससे भी कहीं अधिक संख्या गाँधी के अपने भारत में ही है.
 
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यहाँ मुंबई में एक मुहावरा चलता हे "मजबूरी का नाम महात्मा गांधी "| समझने की बात हे की इस दुरात्मा की ,आम जनता कितनी बेज्जती करती हे |
 
i can only say " saari azadi ne akla gandhi ye pi gya" courtes- babbu mann.
 
इस दुनिया में 'परिणाम' का महत्त्व है. जिसने जो रास्ता पकड़ा, उसका परिणाम क्या रहा. सुभाष चंद्र बोस निःसंदेह एक महान देशभक्त थे, लेकिन उन्होंने उस समय देश को आजाद करवाने का जो रास्ता चुना, उसका परिणाम नकारात्मक रहा था. अंग्रेजों ने उनके नेतृत्व वाली आजाद हिंद फ़ौज को हरा दिया था. भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, खुदीराम बोस, मंगल पांडे इत्यादि सभी शहीदों की देशभक्ति का स्तर बेहद ऊंचा था, लेकिन वे अपने मकसद को अंजाम तक नहीं पहुंचा सके और यही कारण है कि उनके जैसे अनेकों हो गए. जिसके जैसे अनेकों हो गए, उसे राष्ट्र पिता का दर्जा नहीं दिया जा सकता (हालांकि किसी को भी यह दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए. यह एक अर्थहीन अवधारणा है). बहरहाल गांधी ने जो रास्ता चुना, उसका परिणाम सकारात्मक रहा. वास्तविकता तो यह है कि गांधी का पूरा जीवन उनके किसी पिछले जन्म के संघर्षपूर्ण जीवन का फल था. वे उस विश्व स्तर की प्रसिद्धि के हकदार थे. द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों को कमजोर करना और भारत को स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए विवश करना इस दुनिया को चलाने वाली अदृश्य शक्ति का कारनामा था, क्योंकि गांधी को उसका हक़ प्रदान करना उस शक्ति का दायित्व था. हम चाहें ऐसे गूढ़ रहस्यों को न समझें, लेकिन दुनिया में और बहुत से तो समझते हैं.
अब यदि हम कहें कि सुभाष चंद्र बोस को राष्ट्र पिता बनाया जाना चाहिए था तो सवाल खड़ा होता है कि यदि उन्हें अपने लक्ष्य में असफल रहने के बावजूद यह दर्जा दिया जाता तो फिर यह गांधी जैसी शख्सियत के साथ अन्याय होता, जो अपने लक्ष्य में सफल हुए. यदि भगत सिंह की तस्वीर नोटों पर छपनी चाहिए तो फिर चंद्रशेखर आजाद और इनके जैसे अन्य देशभक्तों की भी छपनी चाहिए. फिर तो कैप्टन सौरभ कालिया और उनके 5 साथी फौजियों की तस्वीर भी नोटों पर छपनी चाहिए, जिन्हें बुजदिल पाकिस्तानियों ने तमाम युद्ध नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए करगिल युद्ध के दौरान तड़पा-तड़पाकर मारा था. उनकी आंखें फोड़ दी गई थीं, कानों के परदे नुकीले शूलों से बेध दिए गए थे, शरीर पर बार-बार उबलता पानी डाला गया था, गुप्तांगों को बड़ी बेरहमी से भंग किया गया था.
दरअसल जो देश के लिए कुर्बान हो गए, उनके लिए देशवासियों के दिलों में सम्मान होना चाहिए, लेकिन असली सम्मान उनके लिए होना चाहिए, जो दुश्मनों के हाथों खुद का बुरा हश्र न करवाएं, बल्कि दुश्मनों का हश्र बुरा करें. गांधी के समय में हमारे पास न तो अत्याधुनिक हथियार थे और न ही कोई सेना. ऐसा होने की संभावना भी न के ही बराबर थी. ऐसे में कुछ भी न करने की बजाय कुछ करना ठीक था. अहिंसात्मक आंदोलन उस समय की मजबूरी थी. खैर, मैं गांधी का कोई बहुत बड़ा प्रशंसक नहीं हूं, लेकिन आलोचक भी नहीं हूं. गांधी के सिद्धांत वर्तमान में प्रासंगिक नहीं हैं. इसके बावजूद अपने निजी विचार यहां रख रहा हूं. जरूरी नहीं है कि दूसरे भी ऐसा ही सोचें.

Independence didnot come because of gandhi but due to long fight of many patriots like Bhagat, Subhas etc, Gandhi was never in strugle earlier but later joined to make use of situation. the fact seems to me that since rulers realised that they have to go, but they were afraid of voilence so they prefered nonvoilence and gandhi who was close to rulers, given importance in dealing with the govt. Ofcourse, he was lucky, independence was to come but this person got the credit. Also if he was not killed by godse, he wouldnot have become father of the nation but he was really lucky. In gujarat a temple is coming up on his name. Fronkly speaking niether he was a good person nor was a leader and took all wrong decision but.....luck
 
क्या आप जानते हैं कि: ---

३० जनवरी को यदि गांधी वध ना होता तो ३ फरवरी १९४८ को देश का एक और विभाजन निश्चित था.
जिन्ना की मांग थी कि पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने में बहुत समय लगता है एवं वायु यान से जाने की सभी की क्षमता नहीं है, तो हमको बिलकुल मध्य भारत से एक कोरिडोर बना कर दिया जाए जो :-

१. लाहौर से ढाका जाता हो,

२. दिल्ली के पास से जाता हो,

३. जिसकी चौड़ाई कम से कम १० मील अर्थात १६ किलोमीटर हो,

४. १० मील के दोनों और केवल मुस्लिम बस्तियां ही बनेंगी.

तत्कालीन परिस्थितियों में सभी भारतीय और पाकिस्तानी इस सत्य से परिचित थे कि एक और विभाजन निश्चित है, उसके पश्चात नाथूराम गोडसे ने जो किया वो इतिहास है, यदि गाँधी वध का संकल्प पूरा ना होता तो आप ही बताइये आज भारत का मानचित्र कैसा होता?

गोडसे भागे नहीं, और इस पुण्य कार्य को न्यायालय के सभी ३५ सुनवाइयों पर स्वीकार किया.
पर क्या हम इस देवतुल्य वीर पुरुष के त्याग और बलिदान को सार्थक कर पा रहे हैं अथवा फिर अनेकों जिन्ना और अनेकों गाँधी के स्वार्थ में सनातन की बलि दी जा रही है.
 
Ghadhi --- jo gandh(perfume) ka buisness karte hain Gujrat main unko Gandhi kahte hain,matlab ek baniya. Baniya kitna chalak hota hai kisi se chupa nahin hai.Is ghandi ne itne bade bade andolan kare hain angrenjo ke khilf, kabhi kaale pani ki saaja nahin hui isko,kabhi is per goli nahin chali,kabhi police ki ladhi nahin chali iss per ki ladhi khnae se maut ho jaati iski.
Jab hindustan ki janta jaan gayi thi ki yeh sab desk ke khilaf kar raha hai tab ek sache hindustani ne isko goli maari thi. Agar yeh sach main des bhagat hota to angrej hi isko goli mar dete. phir hindustani ne kyon goli maari.Kyon ki yeh hindustan ke khilf tha.
Agar koi hindustani kisi angrej ko thappad hi maar deta to usk kaya haal hota tha. yeh kisi se achoota nahin hai. to yeh kaise bach gaya. Hinudstaniyon ko bewkoof banane ke liye isko jail main daal dete the bas ,taki yeh safe rahe.
Yeh sab angrejo ke agent the bas. Isilye yeh jinda rahe aur aaj bhi dekh sakte hain inki jade hindustan main kitni gahari hain.
 
Gandhi was a killer, he killed Bhagat Singh. is baat se fark ni padta ki kya circumstances thi, Bhagat Singh aur unki baten Gandhi aur congress ke liye khatra thi, isliye gandhi ne Hamare Bhai ko Phansi lagva di, AUR BHAGAT SINGH SHAHEED ho gaye.
 
फिल्मा में कई बडे बूढ़े कहते सुने हैं कि "हमने गाँधी जी के साथ अंग्रेजो की लाठियां खाई हैं"पर गाँधी तो लाठी खाता कद्दे न दिखाया (गाँधी मूवी में भी नहीं !!!!)
यो बच्या क्यूकर करता उनते ????

Answer from any Gandhi Fan??
 
गाँधी ने कभी कोई आन्दोलन पूर्णता तक पहुँचने ही नहीं दिया | कहीं ना कहीं किसी बात पर आन्दोलन को बीच अधूरे छोड़ देता था | वास्तव में गांधी और नेहरु अंग्रेजों के एजेंट थे ,जो स्वतंत्रता आन्दोलन को भोंथरा करने के लिए गर्म दल ( जो हिंसक गतिविधियों द्वारा अंग्रेजों को भगाना चाहते थे ) वालों से जनता का ध्यान हटाने के लिए और एक समानांतर बिना किसी असर वाली ,दिखावटी गतिविधि चलाते थे | इसीलिए कभी भी किसी गांधीवादी को अंग्रेजों ने नहीं मारा ,केवल इनको जेल में डाल कर कुछ दिनों में माफ़ी दे कर फिर से छोड़ देते थे ,ताकि फिर से कोई दिग्भर्मित करने वाला आन्दोलन चला कर जनता का ध्यान बंटा दें | अगर ध्यान से देखा जाए तो इन्ही गांधी वादी कांग्रेसियों ने अंग्रेजों को कह कर अपने विरोधिओं को मरवाया हे ,जो आगे चल कर सत्ता ह्स्तान्तार्ण में हिस्सा ना मांग सकें | जितने भी गर्म दल के नेता या कार्यकर्ता मारे गए थे , उनमे इन् कान्ग्रेसिओं की खबरी की भूमिका जरूर मिलेगी |वास्तव में आज भी हर कांग्रेसी देशद्रोही हे |---- सद भावनाओं सहित |
 
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बाबु मान न अपने एक गीत म तोड़ की बात कह राखी स '' भगत सिंह आ गया शराबा किथे रह गया आजादी ता कल्ला गाँधी ले गया , गद्दर बाब्या दा गद्दर किवें भुलावा झूठे इतिहास ते मोहर किवें लावा '' |

शहीद-ऐ - आज़म भगत सिंह एक बात कहता था के '' यो गाँधी देश में सिर्फ वहां वहां घूमता हैं जहाँ जहाँ अंग्रेजो की रेल जाती हैं , इसे असल देश देहात का क्या पता '' |

पंडित लख्मीचंद वाली बात स के '' एक दिन इसा आवेगा भुंडे लोग अर्र भुंडी धरती की चढ़ेगी '''''''' न्यू की न्यू बणरी स आज
 
Godse! An unsung Hero, Misunderstood Patriot, read the reality! -

Godse is often a misunderstood character. He is referred to as a Hindu fanatic. It is often hard to understand Godse because the Government of India had suppressed information about him. His court statements, letters etc. were all banned from the public until recently. Judging from his writings one thing becomes very clear – He was no fanatic. His court statements are very well read out and indicate a calm and collected mental disposition. He never even once speaks ill about Gandhi as a person, but only attacks Gandhi's policies which caused ruin and untold misery to Hindus. Another interesting point to note is that Godse had been working with the Hindu refugees fleeing from Pakistan. He had seen the horrible atrocities committed on them. Many women had their hands cut off, nose cut off, even little girls had been raped mercilessly. Despite this Godse did not harm even single Muslim in India which he could easily have. So it would be a grave mistake to call him a Hindu fanatic.

Let us start by studying the motive behind Godse's act. By seeing the nature of the assassination in public space and Godse's act of turning himself over to the Police, we can see that Godse did not do this for personal reasons. He very well knew that he would be hanged and his name would be disgraced as Gandhi was considered a saint. And again Godse could have ran away and escaped punishment. But he did the reverse. He called a police officer and courted arrest. Before we proceed it would be wise to understand the backdrop of the assassination.

The central government had taken a decision — Pakistan will not be given Rs 55 crores. On January 13 Gandhi started a fast unto death that Pakistan must be given the money. On January 13, the central government changed its earlier decision and announced that Pakistan would be given the amount. On January 13, Nathuram decided to assassinate Gandhi.

Nathuram Godse was a learned man, very sharp and intelligent – editor of "Agrani" (one of the most famous newspaper of that time – with Nana Aapte). In his last editorial of "Agrani" which he changed overnight – he said "Gandhi must be stopped – at any cost" and he justified why Gandhiji's assassination was not only inevitable but also a delayed action, sth tht shud've happened LONG AGO.

In Nathuram's words - " I don't refute Gandhi's theory of non-violence. He may be a saint but he is not a politician. His theory of non-violence denies self-defence and self-interest. The non-violence that defines the fight for survival as violence is a theory not of non-violence but of self-destruction.The division of the nation was an unnecessary decision. What was the percentage of the Muslim population as compared to the population of the nation? There was no need for a separate nation. Had it been a just demand, Maulana Azad would not have stayed back in India. But because Jinnah insisted and because Gandhi took his side, India was divided, in spite of opposition from the nation, the Cabinet. An individual is never greater than a nation.

In a democracy you cannot put forward your demands at knife-point. Jinnah did it and Gandhi stabbed the nation with the same knife. He dissected the land and gave a piece to Pakistan. We did picket that time but in vain. The Father of our Nation went to perform his paternal duties for Pakistan! Gandhi blackmailed the cabinet with his fast unto death. His body, his threats to die are causing the destruction — geographical as well as economical — of the nation. Today, Muslims have taken a part of the nation, tomorrow Sikhs may ask for Punjab. The religions are again dividend into castes, they will demand sub-divisions of the divisions. What remains of the concept of one nation, national integration? Why did we fight the British in unison for independence? Why not separately? Bhagat Singh did not ask only for an independent Punjab or Subhash Chandra Bose for an independent Bengal?

I am going to assassinate him in the open, before the public, because I am going to do it as my duty. If I do it surreptitiously, it becomes a crime in my own eyes. I will not try to escape, I will surrender and naturally I will be hanged. One assassination, one hanging. I don't want two executions for one assassination and I don't want your involvement, participation or company. (This was for Nana-Apte and Veer Savarkar as they were against ghandhi's policies too, Godse wanted to assassinate gandhi all by himself and took promise from Nana Apte that he will continue helping Veer Savarkar in rebuilding India as a strong free nation.)

On January 30, I reached Birla Bhavan at 12 pm. Gandhi was sitting outside on a cot enjoying the sunshine. Vallabhbhai Patel's granddaughter was sitting at his feet. I had the revolver with me. I could have assassinated him easily then, but I was convinced that his assassination was to be a punishment and a sentence against him, and I would execute him. I wanted witnesses for the execution but there were none. I did not want to escape after the execution as there was not an iota of guilt in my mind. I wanted to surrender, but surrender to whom? There was a good crowd to collect for the evening prayers. I decided on the evening of January 30 as the date for Gandhi's execution.

Gandhi climbed the steps and came forward. He had kept his hands on the shoulders of the two girls. I wanted just three seconds more. I moved two steps forward and faced Gandhi. Now I wanted to take out the revolver and salute him for whatever sacrifice and service he had made for the nation. One of the two girls was dangerously close to Gandhi and I was afraid that she might be injured in the course of firing. As a precautionary measure I went one more step ahead, bowed before him and gently pushed the girl away from the firing line. The next moment I fired at Gandhi. Gandhi was very weak, there was a feeble sound like 'aah' (There are proof that Gandhi did NOT say "Hey Raam" at that time – it's just made up stuff ) from him and he fell down.

After the firing I raised my hand holding the revolver and shouted, 'Police, police'. For 30 seconds nobody came forward and I scanned the crowd. I saw a police officer. I signalled to him to come forward and arrest me. He came and caught my wrist, then a second man came and touched the revolver… I let it go…"


​
 
Untold truths about Gandhi (Copy p)
1. Gandhi used to sleep with girls of aged
between 18 to 25. Very few people know
about this but its true (for detail you can
read books by Dr L .R. BALI named
“RANGEELA GANDHI” & “KYA GANDHI
MAHATMA THE”) the girls who slept with
Gandhi accepted this. Gandhi used to say
that he is doing all this for his
BRAHMCHARI Experiments. What from
his experiments he was wanted to prove
nobody knows? Gandhi himself accepted
this that at the time of going to London
for higher studies he decided to keep
himself away from MEAT, DARU and SEX,
but he accepted that he could not control
himself in the matter of SEX.
2. Gandhi went to South Africa just for
earning money and name because here in
India he could not do well(flop) there he
went mainly to save Abdullah &co.
whose business was of smuggling and
charged very much for this.
3. In 1932, Gandhi collected 1crore & 32
lakh Rs in the name of “TILAK SWRAJ”
fund, which was collected for the use of
DALITS. However, he did not spend even
a single penny on DALITS.
4. In his whole life Gandhi kept on
shouting that, he is in the supports
AAHINSA. However, at the time of
Second World War he himself sends
Indian army for the fight from England
side. AAHINSA kaha geye uss waqt?
5. During daytime, Gandhi spent the day
in the Jhugis but he spent the night in the
rest house of Birlas.
6. Gandhi advised people to live a simple
life, but his simplicity was that when he
was in jail there were three women in the
jail to serve him for his simplicity!
7. Gandhi did not open a single door of a
Hindu temple in Gujrat his home province
in India for the UNTOUCHABLES.
8. Gandhi used to say that Subhash
Chander Bose is like his own son, but
Gandhi went on hunger strike until Bose
leave his post in congress. Gandhi
promised to British govt. that if we
found Bose we will handover him to you
(Bose was wanted in those days).
9. Gandhi kept people in dark that he is
trying to save Bhagat Singh. However, the
truth is that he never tried to contact
VICEROY about Bhagat Singh issue. This
all is said by the friend of VICEROY &
Bhagat Singh named MANMATH NATH in
his writings. Gandhi was feared about the
popularity of Bhagat Singh because the
popularity of Bhagat Singh was increasing
of which Gandhi felt nervous.
10. Gandhi was saying that if the Pakistan
would made it will only happen after his
death. However, it was Gandhi who
signed 1st on the proposal of making
Pakistan.
11. Gandhi cheated all Indians at ROUND
TABLE CONFERENCES by not giving the
details in proper & those details, which
were true.
12. Gandhi started so many ANDOLANS
& LEHARS against British govt. but after a
month or after 2 months he withdraw he
all those ANDOLANS & LEHARS. Then
what was the use of starting all those?
What about the sacrifice of all those
people who took part in all those
ANDOLANS? In addition, he never went
to lead people in those ANDOLANS. Even
Gandhi’s own sons were against him but
I do not know why all people were
following him.
13. Now a days almost all Hindu people
say Gandhi as a revolutionair, but what
he said” I have come here on earth to
fulfill the laws of caste.” How can one
say such a person as a revolutionair? A
true revolutionair never thinks according
to caste line, not according to rich, poor
etc. These are very few points there are
many more truths about Gandhi. In
addition, from above point’s you people
can decide about Gandhi. In BABA
SAHEB’s own words “Gandhi Age is the
Dark Age of India”.
BABA SAHEB has also said in interview
to BBC that “A PERSON WHO CHEATS
AND KEEP OTHER PEOPLE IN DARK TO
THAT PERSON IF YOU SAY A MAHATMA
THEN GANDHI IS A MAHATMA
 
From my point of view also Gandhi and Nehru both were self centered and corrupt people.And encashed the efforts of Bose & Bhagat Singh.It is our bad luck that we got independence without Bose & Singh.
In last 60 years China become the world leader and we become the biggest begger due to Nehru and Gandhi prime ministership.After reading all replies and knowing the fact atleast now we should start supporting right people and stop those illegal heirs of Gandhi and Nehru families.
It is very sad that our Rastrapita is Gandhi and current Rastrapati is cook of Indira Gandhi. See the future of our country.
 
[h=5]आज पाकिस्तान के जनक मोहन दास करमचंद गाँधी का जन्मदिवस है, ये वो पाकिस्तान है जिसके कारण आजतक देश में लाखों घर बर्बाद हो गए. ना जाने कितने लाख बालक अनाथ हो गए, और ना जाने कितनी महिलायें विधवा हो गई |

और ये आज भी निरंतर जारी है, क्या हमें ऐसे किसी के जन्मदिवस पर प्रसन्न होना चाहिए ??

ये किसी की आस्था को चोट पहुचानें के नहीं लिखा गया है, यदि आपकी आस्था है गाँधी में तो हम आपकी भावनाओं का सम्मान करते हैं |





पर उन लाखों-करोड़ों जीवन से ऊपर हम केवल एक मनुष्य को नहीं बैठा सकते |

आप लोगों का क्या कहना है ??

जय हिन्द, जय भारत | |




[/h]
 
You acknowledged today as M.K.Gandhi's birthday, and forgot that it is also Lal Bahadur Shashtri's b'day?
आज पाकिस्तान के जनक मोहन दास करमचंद गाँधी का जन्मदिवस है, ये वो पाकिस्तान है जिसके कारण आजतक देश में लाखों घर बर्बाद हो गए. ना जाने कितने लाख बालक अनाथ हो गए, और ना जाने कितनी महिलायें विधवा हो गई |

और ये आज भी निरंतर जारी है, क्या हमें ऐसे किसी के जन्मदिवस पर प्रसन्न होना चाहिए ??

ये किसी की आस्था को चोट पहुचानें के नहीं लिखा गया है, यदि आपकी आस्था है गाँधी में तो हम आपकी भावनाओं का सम्मान करते हैं |





पर उन लाखों-करोड़ों जीवन से ऊपर हम केवल एक मनुष्य को नहीं बैठा सकते |

आप लोगों का क्या कहना है ??

जय हिन्द, जय भारत | |






 
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