इस दुनिया में 'परिणाम' का महत्त्व है. जिसने जो रास्ता पकड़ा, उसका परिणाम क्या रहा. सुभाष चंद्र बोस निःसंदेह एक महान देशभक्त थे, लेकिन उन्होंने उस समय देश को आजाद करवाने का जो रास्ता चुना, उसका परिणाम नकारात्मक रहा था. अंग्रेजों ने उनके नेतृत्व वाली आजाद हिंद फ़ौज को हरा दिया था. भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, खुदीराम बोस, मंगल पांडे इत्यादि सभी शहीदों की देशभक्ति का स्तर बेहद ऊंचा था, लेकिन वे अपने मकसद को अंजाम तक नहीं पहुंचा सके और यही कारण है कि उनके जैसे अनेकों हो गए. जिसके जैसे अनेकों हो गए, उसे राष्ट्र पिता का दर्जा नहीं दिया जा सकता (हालांकि किसी को भी यह दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए. यह एक अर्थहीन अवधारणा है). बहरहाल गांधी ने जो रास्ता चुना, उसका परिणाम सकारात्मक रहा. वास्तविकता तो यह है कि गांधी का पूरा जीवन उनके किसी पिछले जन्म के संघर्षपूर्ण जीवन का फल था. वे उस विश्व स्तर की प्रसिद्धि के हकदार थे. द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों को कमजोर करना और भारत को स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए विवश करना इस दुनिया को चलाने वाली अदृश्य शक्ति का कारनामा था, क्योंकि गांधी को उसका हक़ प्रदान करना उस शक्ति का दायित्व था. हम चाहें ऐसे गूढ़ रहस्यों को न समझें, लेकिन दुनिया में और बहुत से तो समझते हैं.
अब यदि हम कहें कि सुभाष चंद्र बोस को राष्ट्र पिता बनाया जाना चाहिए था तो सवाल खड़ा होता है कि यदि उन्हें अपने लक्ष्य में असफल रहने के बावजूद यह दर्जा दिया जाता तो फिर यह गांधी जैसी शख्सियत के साथ अन्याय होता, जो अपने लक्ष्य में सफल हुए. यदि भगत सिंह की तस्वीर नोटों पर छपनी चाहिए तो फिर चंद्रशेखर आजाद और इनके जैसे अन्य देशभक्तों की भी छपनी चाहिए. फिर तो कैप्टन सौरभ कालिया और उनके 5 साथी फौजियों की तस्वीर भी नोटों पर छपनी चाहिए, जिन्हें बुजदिल पाकिस्तानियों ने तमाम युद्ध नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए करगिल युद्ध के दौरान तड़पा-तड़पाकर मारा था. उनकी आंखें फोड़ दी गई थीं, कानों के परदे नुकीले शूलों से बेध दिए गए थे, शरीर पर बार-बार उबलता पानी डाला गया था, गुप्तांगों को बड़ी बेरहमी से भंग किया गया था.
दरअसल जो देश के लिए कुर्बान हो गए, उनके लिए देशवासियों के दिलों में सम्मान होना चाहिए, लेकिन असली सम्मान उनके लिए होना चाहिए, जो दुश्मनों के हाथों खुद का बुरा हश्र न करवाएं, बल्कि दुश्मनों का हश्र बुरा करें. गांधी के समय में हमारे पास न तो अत्याधुनिक हथियार थे और न ही कोई सेना. ऐसा होने की संभावना भी न के ही बराबर थी. ऐसे में कुछ भी न करने की बजाय कुछ करना ठीक था. अहिंसात्मक आंदोलन उस समय की मजबूरी थी. खैर, मैं गांधी का कोई बहुत बड़ा प्रशंसक नहीं हूं, लेकिन आलोचक भी नहीं हूं. गांधी के सिद्धांत वर्तमान में प्रासंगिक नहीं हैं. इसके बावजूद अपने निजी विचार यहां रख रहा हूं. जरूरी नहीं है कि दूसरे भी ऐसा ही सोचें.