वो भाददर जिह का पहलम जिकरा कर्या था , उह की अल्बाद स करी होड़ । उनके गाम कोए बटेउ आया करदा , अक्सर, अर कई -कई दिन डट जाँदा । वो सारी हांनाँ धोले लत्ते पहरे रहया करदा । अर जिह पोळी में उह ने बिठाया करदे , वा दरे की गाळ में पड्या करदी । उह पोळी के आग्गे आच्छा बड्डा सा खड्डा था , खांचे का , ते वो के करदा, अक जब छोरियाँ का पांणी भरण का बखत होन्दा , ते वो पोळी के आगे खडा हो जाँदा । इब्ब इतणी राह ना थी , ते छोरी उह के धोरे के खस के लिकड़ दी , अर वो इनके सुवाद लेंदा अर किम्मे ना किम्मे कह भी देन्दा । इब्ब बटेऊ कर के ने कई चुप रह जांदे । एक दिन यु भाददर उह पोळी के आगह क आपनी मेन्ह्स ले जावे था , सांझ सी के , अर वो बटेऊ खड्या , बगले की ढाळ बाट में , अक कोडबे मच्छली आवेँ । पर यु भाददर नामक मगरमच्छ आग्या । अर यु भाददर भी बाट में था , अक कदे यु फंसे ते इहने सबक सीखावाँ । भाददर हर के लहँडे में एक मरियल सा काट्डा था । वो ऊँ भी डडमैले खांदा चाल्ल्या करदा । जब काट्डा अर भाददर उह बटेऊ के धोरे सी पोंचे ,ते भाददर ने उह काट्ड़े के धक्का मार दिया , इस्सी ढाल अक जो झाल ऊठी , गार्या के काल़े पाणी की ,वा उह बटेऊ पे जा पड़ी , अर वो ते जूतियाँ सुधाँ सडाँध में घिच्च हो ग्या । गेल तें छोरियाँ का टोळ आवे था,पाणी आलियाँ का , उन्न ने मारी किलकी । अर बटेऊ फेर जिब्ब पाछे पोळी की बाहर ते के ,भीतर भी कदे ना दिख्या । घणा श्याणा ,कीचड में नहावे ।