दीपेंद्रजी मैंने पूरे लेख में कहीं नही लिखा की भगत सिंह स्वयं को आर्य कह रहे हैं!!! हाँ भगत सिंह राष्ट्र को आर्य समाज की दें थे. आर्य परिवार में ही भगत सिंह जैसा युवक पैदा हो सकता है जहाँ विचारों की स्वतंत्रता हो. अपने परिवार का युवक बलिदान हो गया, जब उसकी आयु मात्र २४ वर्ष की थी. अभी तो उसने सिद्धांतों का प्रतिपादन करना था. भगत सिंह के आर्य संस्कार भी हुए थे-
१. यज्ञोपवित संस्कार (इसी संस्कार पर उनके दादा ने उसे राष्ट्र को समर्पित कर दिया था, ये एक आर्य ही कर सकता है नास्तिक नही)
२. उनकी शिक्षा नेशनल कॉलेज लाहोरे में हुई थी (जो की लाला लाजपत राय द्वारा संचालित था, जो आर्य समाज और राष्ट्र के जाज्वल्यमान नक्षत्र थे )
३. सांडर्स की हत्या के बाद उन्हें छिपने के लिए कोलकाता में स्थान "आर्य समाज" ही मिला था कोई नास्तिकों का अड्डा नही.
और जहाँ उन्होंने स्वयं को नास्तिक लिखा है उससे पहली पंक्ति में लिखते हैं मेरा अध्यन european ज्यादा रहा है एशियाटिक नही और चर्च की माने तो आर्य लोग भी नास्तिक ही हैं और आज भी आम अवधारणा है आर्यसमाजी किसी को नही मानते!!!
तो इसका अर्थ ये है की आर्य नास्तिक होते हैं???
काठ की हांडी बार नही चढ़ती दीपेन्द्र जी, कम्मुनिष्टों ने बहूत कोशिश कर ली है पर तथ्य झूठ्लाये नही जा सकते.
भगत सिंह आर्यपौत्र, आर्यपुत्र, आर्य विद्यार्थी, आर्यमित्र और यहाँ तक की HRA के कानपूर ब्रांच के अध्यक्ष भी क्रन्तिगुरु रामप्रसाद बिस्मिल आर्य थे जैसा आपने लिखा है.