Amzin movie!! First n one of its kind.....every Indian must watch the movie.
Read this amazin review bout the movie published in Danik Bhaskar today!
चक दे इंडिया भारत की गौरवगाथा!
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रोग निदान प्रयोगशाला में रक्त की एक बूंद से रोग का पता चल जाता है। गृहिणी चावल का एक दाना देखकर पुलाव का पकना जान जाती है। लोग लिफाफा देखकर मजमून भांप लेते हैं। निदान विशेषज्ञ नाड़ी पकड़कर रोग की जड़ तक पकड़ लेते हैं। आदमी को एक नजर देखकर उसकी आत्मा का हाल जान लेते हैं। ठीक इसी तरह 'चक दे इंडिया' फिल्म देखकर भारत को समझा जा सकता है। हमारे सारे गुण और दोष इस फिल्म में मौजूद हैं। इसे समाजशास्त्र की पाठ्यपुस्तक मान लेना चाहिए और हर भारतीय के लिए इसे देखना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
निर्देशक शमित अमीन, निर्माता आदित्य चोपड़ा और शाहरुख को नमन किया जाना चाहिए। सितारा शाहरुख इसमें अभिनेता के रूप में शिखर पर पहुंच गया है। हर भाव-भंगिमा सधी हुई है, एक्सप्रेशन में कमाल की किफायत है। बिना किसी नारेबाजी के देशभक्ति का भाव जगाने वाली इस फिल्म का प्रदर्शन अगस्त माह में होना भी शुभ ही है। फिल्म के प्रारंभ में सोलह लड़कियां आड़ी-तेड़ी और असुंदर नजर आती हैं, परंतु फ्रेम-दर-फ्रेम वे सुंदर लगने लगती हैं और क्लाइमैक्स में तो उनसे इश्क करने का जी चाहता है।
जब फाइनल के निर्णायक क्षण में एक लड़की गोल मारने की स्थिति में होते हुए भी अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी को पास देती है तो दर्शकों की आंखें छलछला जाती हैं। टीम भावना और एकजुटता को रेखांकित करने वाला यह महान क्षण है। आज के दौर की तमाम सामाजिक व्याधियों का चित्रण इतनी सहजता से किया गया है कि मुंह से बरबस निकलता है-चक दे इंडिया। मीडिया द्वारा खुली अदालत में तमाशे की तरह चलाया गया मुकदमा और प्रमाणहीन फैसले पर यह फिल्म करारी चोट पहुंचाती है। प्रांतीयता के जहर का भी सटीक चित्रण है। हॉकी की उपेक्षा के दृश्य भी दिल हिला देते हैं। आज के दौर में स्पांसर का मुर्गा बांग न दे तो शायद सूरज भी नहीं निकले। महिलाओं के प्रति भेदभाव भी खूब उभरकर प्रभावोत्पादक ढंग से सामने आता है। सारे दोषों के बावजूद भारत की आंतरिक ऊर्जा भी फिल्म को प्राणवान बनाती है। छोटी भूमिकाओं में प्रस्तुत कलाकारों ने भी स्वाभाविकता दिखाई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैच उनकी गरिमा के अनुसार ही विश्वसनीयता से प्रस्तुत किए गए हैं। तकनीकी गुणवत्ता भी उच्च स्तर की है।
आप अपने सबसे खराब मूड में फिल्म देखने पहुंचिए और यह फिल्म आपके सारे नैराश्य को धोकर रख देती है। आप सिनेमाघर से बाहर निकलते हैं तो आपके पैर बादलों पर पड़ते हैं और उड़ने का अहसास होता है। यह निर्मल आनंद प्रदान करने वाली फिल्म है। गीत-संगीत कथा-प्रवाह का हिस्सा हैं और रसानुभूति में किसी तरह का खलल नहीं डालते। प्रेम कथाओं की मधुमेही चाशनी से साफ बची हुई यह फिल्म स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करती है।
http://www.bhaskar.com/2007/08/12/chake_de_india.html
Salutations to the all the ppl who made sucha great msg givin movie n even to the writer of this thought-provokin review!!
Rock on
Jit
Read this amazin review bout the movie published in Danik Bhaskar today!
चक दे इंडिया भारत की गौरवगाथा!
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रोग निदान प्रयोगशाला में रक्त की एक बूंद से रोग का पता चल जाता है। गृहिणी चावल का एक दाना देखकर पुलाव का पकना जान जाती है। लोग लिफाफा देखकर मजमून भांप लेते हैं। निदान विशेषज्ञ नाड़ी पकड़कर रोग की जड़ तक पकड़ लेते हैं। आदमी को एक नजर देखकर उसकी आत्मा का हाल जान लेते हैं। ठीक इसी तरह 'चक दे इंडिया' फिल्म देखकर भारत को समझा जा सकता है। हमारे सारे गुण और दोष इस फिल्म में मौजूद हैं। इसे समाजशास्त्र की पाठ्यपुस्तक मान लेना चाहिए और हर भारतीय के लिए इसे देखना अनिवार्य किया जाना चाहिए।
निर्देशक शमित अमीन, निर्माता आदित्य चोपड़ा और शाहरुख को नमन किया जाना चाहिए। सितारा शाहरुख इसमें अभिनेता के रूप में शिखर पर पहुंच गया है। हर भाव-भंगिमा सधी हुई है, एक्सप्रेशन में कमाल की किफायत है। बिना किसी नारेबाजी के देशभक्ति का भाव जगाने वाली इस फिल्म का प्रदर्शन अगस्त माह में होना भी शुभ ही है। फिल्म के प्रारंभ में सोलह लड़कियां आड़ी-तेड़ी और असुंदर नजर आती हैं, परंतु फ्रेम-दर-फ्रेम वे सुंदर लगने लगती हैं और क्लाइमैक्स में तो उनसे इश्क करने का जी चाहता है।
जब फाइनल के निर्णायक क्षण में एक लड़की गोल मारने की स्थिति में होते हुए भी अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी को पास देती है तो दर्शकों की आंखें छलछला जाती हैं। टीम भावना और एकजुटता को रेखांकित करने वाला यह महान क्षण है। आज के दौर की तमाम सामाजिक व्याधियों का चित्रण इतनी सहजता से किया गया है कि मुंह से बरबस निकलता है-चक दे इंडिया। मीडिया द्वारा खुली अदालत में तमाशे की तरह चलाया गया मुकदमा और प्रमाणहीन फैसले पर यह फिल्म करारी चोट पहुंचाती है। प्रांतीयता के जहर का भी सटीक चित्रण है। हॉकी की उपेक्षा के दृश्य भी दिल हिला देते हैं। आज के दौर में स्पांसर का मुर्गा बांग न दे तो शायद सूरज भी नहीं निकले। महिलाओं के प्रति भेदभाव भी खूब उभरकर प्रभावोत्पादक ढंग से सामने आता है। सारे दोषों के बावजूद भारत की आंतरिक ऊर्जा भी फिल्म को प्राणवान बनाती है। छोटी भूमिकाओं में प्रस्तुत कलाकारों ने भी स्वाभाविकता दिखाई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैच उनकी गरिमा के अनुसार ही विश्वसनीयता से प्रस्तुत किए गए हैं। तकनीकी गुणवत्ता भी उच्च स्तर की है।
आप अपने सबसे खराब मूड में फिल्म देखने पहुंचिए और यह फिल्म आपके सारे नैराश्य को धोकर रख देती है। आप सिनेमाघर से बाहर निकलते हैं तो आपके पैर बादलों पर पड़ते हैं और उड़ने का अहसास होता है। यह निर्मल आनंद प्रदान करने वाली फिल्म है। गीत-संगीत कथा-प्रवाह का हिस्सा हैं और रसानुभूति में किसी तरह का खलल नहीं डालते। प्रेम कथाओं की मधुमेही चाशनी से साफ बची हुई यह फिल्म स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करती है।
http://www.bhaskar.com/2007/08/12/chake_de_india.html
Salutations to the all the ppl who made sucha great msg givin movie n even to the writer of this thought-provokin review!!
Rock on
Jit