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After I posted my play Kissa-e Maham-Chaubissi on this site on 16 April 2006, I have written another short play which I have titled “Dharti ke Lal” (sons of the Motherland). In India, although all castes are engaged in agriculture in one way or the other, Jats are truly the sons of soil - they not only plough the land and serve and respect it as their own mother, but protect it too by way of defending its frontiers. The present piece is written for reading pleasure only, not really for staging it, although it is not difficult. It could be a short story also but since it is a talk among some Jat farmers in their fields, it has acquired the plot of a short play. This piece is written in Hindi but the dialogues between the characters are in Haryanavi which is not much different from Hindi – some words with asterisk sign (*) have been explained at the end of the post, in English. If you have difficulty in finding the meaning of a particular word, please see Haryanavi Dictionary page : (click here) – this page has actually been expanded and thoroughly edited by myself.
If you have difficulty in viewing the Devanagri script on your computer, you need to install Hindi font ‘Mangal’ which can be downloaded from Internet or copied from another PC - please see my thread Tips for use of Hindi on your computer (“Tech Talk” forum).
ॐ
धरती के लाल (लघु नाटिका)
लेखक - दयानन्द देसवाल
स्थान : गाँव खेड़का गूजर, तहसील बहादुरगढ (जिला झज्जर, हरयाणा) - गांव से एक कोस दूर ताऊ बदले के खेत में स्थित लेसुवे के पेड़ के नीचे दोपहर को आराम करते हुए कुछ जाट किसान । गांव में मुख्य रूप से देसवाल जाट ही हैं, कुछ बाहमण, खात्ती, नाई, कुम्हार और लुहारों के घर हैं, एक छोटा सा मोहल्ला धाणक और चमारों का भी है। गांव अधिक बड़ा नहीं है और मुख्य सड़क (बहादुरगढ-झज्जर रोड) से एक किलोमीटर दूर बसा हुआ है। साथ वाले गावों के नाम ये हैं : दुल्हेड़ा, छुडाणी, भदाणी, कबलाणा, खुंघाई, गोयला कलां, गुभाणा, बुपणियां और डाबोदा खुर्द ।
समय : अक्तूबर 1971
पात्र :
चन्दगीराम : 8 कीले जमीन, हिन्दी पढ सकता है, गाँव के मौजिज व्यक्तियों में शामिल, पक्का आर्यसमाजी ।
चन्द्रभान: जमीन काफी (15 कीले), शरीर से तगड़ा, थोड़ा पढा लिखा ।
बदले : 6 कीले जमीन का मालिक, अनपढ किन्तु चालाक, ज्यादा काम धंधा उसके बसका नहीं, थोड़ा कंजूस भी।
भरतो : बदले की घरवाली ।
रोहतास : 18 साल का लड़का, मैट्रिक पास, बेरोजगार ।
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(बदले अकेला बैठा है, थोड़ी देर बाद चन्दगीराम का प्रवेश)
बदले : आ भई चन्दगी, आज तै वार* कर दी । हळ जोड़ रहया सै के ?
चन्दगी : अरै ना रै, बाजरे की चूंटणी मैं लाग-रे थे - एक कीले में थोड़े से झाड़ काटे थे, गंडासी का तै बीत्ता टूट-ग्या । एक तै इस साल मींह कम बरस्या, ऊपर तैं ये झाड़ और डाभ और दुखी करैं सैं ! और तै और, पाछलै साल तै कचरी की बेल निरी हुई थी खेत मैं, इस साल तै वे बी कम ऐं नजर आवैं सैं !
बदले : हां भाई, पाछलै साल तै म्हारी घर आळी नै घणीं सारी कचरी तोड़ कै सुखा दी थी - सारै साल खूब चटणी खाई, ईबके साल मींह ऐं कम बरस्या - तै कचरी बी कड़े तैं हो?
चन्दगी : पर वा भरतो आई नहीं ईब-लग - जवारा ले कै ?
बदले : अरै बेरा ना वा हर्या कित वार* ला रही सै? म्हारी तै देखी जा, बेचारे बुळधां नै भूख लाग रही सै । ईब तै बणी* मैं घास बी सूख ली । कोए बात ना, ले एक हुकटी* भर ल्यां, इतणै वा आ ज्यागी ।
चन्दगी : हां भाई इस बणी का जिकर आ-ग्या । उस जोहड़ के साथ आळी पाळ* पै जो बाबा का कोठड़ा सै, पहल्यां उसमैं एक बाबा रहया करता, नाम था मनकबाबा - उसके नाम पै इस बणी का नाम पड़-ग्या मनकाळा ! दूर-दूर ताहीं के लोग इस के नाम नै जाणैं सैं । बोझड़े तै इतणे हुया करते कि नजफगढ के साथ वाळे गामां के लोग बी आड़े तैं फळसी खातिर एकाध छोटे-मोटे बोझड़े नै काट कै ले ज्याया करते । और उस जोहड़ के साथ वाळी कूई का पाणी तै इतणा मीठा अमृत था कि जिसकै ताप चढ रह्या हो, उसका ताप उतर ज्याया करता । एक बै तै दिल्ली के एक सेठ की कार आई थी और कई सागळ पानी भर कै ले गये थे एक रोगी खातिर ।
बदले : पर ईब कुण सी आग लाग-गी इसमैं ?
चन्दगी : ना लागी सै तै लाग ज्यागी - न्यूं-ऐं चालता रहया तै । मन्नै सरपंच तैं बहुत कही कि भाई, इस बणी के रूखां नै मत बेच, फेर बी थोड़े से तै कसाई बेच कै मान्या । न्यूं के उसका पेट भरै सै, पी ज्यागा दारू उन पैस्यां की । कैर के पेड़ बी कम रह गये - साथ आळे गामां की धाणकी-चमारी टींट तोड़ कै ले ज्यां सैं, म्हारै हाथ ना आते । कुछ या रेही लाग-गी धरती मैं ! ईब इस बणी मैं नकछींकणी, कुरंढ, घिलोठ, झींझ, सांगर और पीहल बी पह्ल्यां कितणे कोन्यां होते । जोहड़ के साथ आळे पीपल के पेडां पै बरबंटी खूब हुया करती - ईब यो नया बाबा बी निकम्मा सै, ध्यान ना राखता - गाम आळे बी लापरवाह हो लिये - किमैं लोह खूंठा आर कुछ लोहार खोटा !
बदले : पर चन्दगी, यो इस कूई का पानी क्यूकर खराब हो-ग्या ?
चन्दगी : आड़े तैं 4 किले आगै नहर पड़ै सै - खूब भरी चाल्या करती - हरयाणा बणे पाछै तै पाणी इतणा ना आता । पहल्यां इसमैं काई लागी रहया करती । ईंख होण लाग-गे - मोकळा पाणी चाल्या करता - एक घंटे मैं एक कीला भर ज्याया करता । कई साल तै मौज रही - फेर इसका नुकसान दीखण लाग गया । चोवे का पाणी ऊपर आ-ग्या, धरती मैं रेही लाग-गी, इसा लागै सै ज्यूकर धरती पै नूण छिड़क राख्या सै ! नहर के साथ आळी जमीन बेकार हो-गी, न्यूं-ऐं इस कूई का पाणी बी खराब हो-ग्या ।
बदले : चलो, म्हारे और तेरे खेत तै बच रहे सैं ईब ताहीं । यो सिमाणा सै-ऐ ऊंचाई पै, न्यूं-ऐं तै इसका नाम ऊंचीजोळ पड़-ग्या ! नहर का पाणी तै इसमैं चढता ना ! चलो, इस साल मींह ना बरस्या तै चणे आर सिरसिम बो द्यांगे, गीहुआं की टाळ कर द्यांगे - दूसरे सिमाणे मैं नहर कै लागते दो कीले सैं, उसमैं गीहूं बो द्यांगे - खाण जोगे दाणे तै हो-ऐ जांगे !
चन्दगी : जब नबिया* के साल मैं डूबा आई थी, उस साल बी इस सिमाणे मैं पाणी खड़ा ना हुया था, इस नहर का पाणी क्यूकर आवैगा ? देखता नहीं वो जहांगीरपुर माईनर - बड्डे-बड्डे इंजन ला-राखे सैं - जिब कितै जा-कै पाणी चड्ढै सै उसमैं । अरै हां, मेरै खूब याद सै, नबिया* आळे साल तै इस धरती मैं चणे की खेती हुई थी - भाई तौड़ हो-ग्या था, इतने तगड़े चणे मन्नै आपणी जिन्दगी मैं नहीं देखे ।
बदले : हां भाई, तेरै तै खूब याद सै, मैं तै उस टाइम छोटा था, पर मन्नैं बी न्यूं ऐं सुण्या सै - तबाही तै खूब हुई थी पर फेर धरती की तिस बुझ गई थी - थळी पै बी चणे बो दिये थे लोगां नै, खूब पैदावार हुई थी । नबिया का काळ तै पाणी का काळ था, सूखे का नहीं ।
चन्दगी : भाई, पूरे 21 दिन तगड़ा मींह बरसता रहया था - गाम-के-गाम डूब गये, कच्चे मकान हुया करते, सारे ढह गये थे आर सबके घरां में जो राशन पाणी था, वो बी बह-ग्या । खेती सब खतम हो गई थी, साढू* आर सामणू* - दोनूं ! पर भाई जो ऊंची जमीन थी, उसमैं पाछै इसी तगड़ी साढू फसल हुई थी, तौड़ हो-ग्या था । पर लोगां धौरै खाण ताहीं कुछ ना बच्या था, सिर्फ एक टाईम की रोटी खातिर सारा दिन मजूरी करी थी । यो जो चन्द्रभान का घर सै ना, चूने मैं बण्या औड़, वो उसके दादा जोधाराम नै नबिया के काळ मैं बणवाया था - खात्तियां नै एक टाईम की रोटी खा-कै काम करा था, उन ताहीं चार आने मजूरी बी ना दी !
बदले : भाई, उस चन्द्रभान का खेत तै यो रहया, मेरे साथ आळा, कई दिन हो लिये डाक्की दीख्या ए ना !
(बदले की बहू का प्रवेश)
बदले : अरै हर्या रांड,इतणी वार कित कर दी आज ?
चन्दगी : क्यूं खामखा छोह में आ रहया सै बदले, बिचारी ले तै आई, जवारा-रोटी ।
भरतो : के बताऊं, रोटी पोवण मैं वार लाग-गी, किमैं छोटे छोहरे नै दुखी कर दी ।
बदले : ये दोनूं छोहरे तै लागै सै, निर्भाग लिकड़ैंगे, ल्या तावळी-सी घाल राबड़ी कचौळे* में - थौड़ी सी चन्दगी कै बी घाल दे ।
चन्दगी : अरै ना, मैं तै खा-पी कै आया था, हुक्टी बी पी लई, तू आराम तैं खा, मैं एक-बै चूंटणी करण आळ्यां नै संभाळ-कै योह आया !
(चन्दगीराम बाहर जाता है )
बदले : अरी भागवान, जा बुलध उन रूखां तळै बैठे सैं, यो जवारे का झल्ला ठा ले-ज्या, भूखे सैं घणी हाण के ।
(भरतो जाती है, रोहतास का प्रवेश)
बदले : आ भाई रोहतास, कित हांडै सै ?
रोहतास : काका, नहर आ रही सै, आज म्हारा औसरा सै - खेत मैं नाक्का कर-कै आया सूं - थोड़ी हाण पाच्छै जा-कै संभाळूंगा ।
बदले : आंच्छ्या, ले - इस कचौळे* मांह-तैं एक रोटी ले ले - खूब घी ला राख्या होगा तेरी काकी नै ।
रोहतास : ना काका, मन्नैं तै थोड़ी-सी वार हुई सै - घर तैं खा-कै आया था । मैं तै एक बीड़ी पी लूं, बस ।
बदले : अरै चन्दगी आवण आळा सै, फेर हुक्टी भरांगे - इस बीड़ी मैं किमैं ना धरया - या तै हलक नै फूक दे सै ! भाई, थारा यो खेत ठीक जगांह पै सै - नहर कै सहारै - उसमैं पाणी तै आ-ज्या सै नहर का - म्हारे आळे कील्यां मैं तै पाणी चढता-ए कोन्यां !
रोहतास : काका, मैं एक-बै नाक्के नै संभाळ कै ईब आया - दाहने* मैं पाणी की दाब लाग-कै नाक्का टूट ज्या सै - मैं तै फाहळी बी ऊड़ै ऐ छोड़ आया था !
बदले : ठीक सै, तावळा आईये !
(रोहतास बाहर जाता है - थोड़ी देर बाद चन्द्रभान प्रवेश करता है)
continued....
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If you have difficulty in viewing the Devanagri script on your computer, you need to install Hindi font ‘Mangal’ which can be downloaded from Internet or copied from another PC - please see my thread Tips for use of Hindi on your computer (“Tech Talk” forum).
ॐ
धरती के लाल (लघु नाटिका)
लेखक - दयानन्द देसवाल
स्थान : गाँव खेड़का गूजर, तहसील बहादुरगढ (जिला झज्जर, हरयाणा) - गांव से एक कोस दूर ताऊ बदले के खेत में स्थित लेसुवे के पेड़ के नीचे दोपहर को आराम करते हुए कुछ जाट किसान । गांव में मुख्य रूप से देसवाल जाट ही हैं, कुछ बाहमण, खात्ती, नाई, कुम्हार और लुहारों के घर हैं, एक छोटा सा मोहल्ला धाणक और चमारों का भी है। गांव अधिक बड़ा नहीं है और मुख्य सड़क (बहादुरगढ-झज्जर रोड) से एक किलोमीटर दूर बसा हुआ है। साथ वाले गावों के नाम ये हैं : दुल्हेड़ा, छुडाणी, भदाणी, कबलाणा, खुंघाई, गोयला कलां, गुभाणा, बुपणियां और डाबोदा खुर्द ।
समय : अक्तूबर 1971
पात्र :
चन्दगीराम : 8 कीले जमीन, हिन्दी पढ सकता है, गाँव के मौजिज व्यक्तियों में शामिल, पक्का आर्यसमाजी ।
चन्द्रभान: जमीन काफी (15 कीले), शरीर से तगड़ा, थोड़ा पढा लिखा ।
बदले : 6 कीले जमीन का मालिक, अनपढ किन्तु चालाक, ज्यादा काम धंधा उसके बसका नहीं, थोड़ा कंजूस भी।
भरतो : बदले की घरवाली ।
रोहतास : 18 साल का लड़का, मैट्रिक पास, बेरोजगार ।
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(बदले अकेला बैठा है, थोड़ी देर बाद चन्दगीराम का प्रवेश)
बदले : आ भई चन्दगी, आज तै वार* कर दी । हळ जोड़ रहया सै के ?
चन्दगी : अरै ना रै, बाजरे की चूंटणी मैं लाग-रे थे - एक कीले में थोड़े से झाड़ काटे थे, गंडासी का तै बीत्ता टूट-ग्या । एक तै इस साल मींह कम बरस्या, ऊपर तैं ये झाड़ और डाभ और दुखी करैं सैं ! और तै और, पाछलै साल तै कचरी की बेल निरी हुई थी खेत मैं, इस साल तै वे बी कम ऐं नजर आवैं सैं !
बदले : हां भाई, पाछलै साल तै म्हारी घर आळी नै घणीं सारी कचरी तोड़ कै सुखा दी थी - सारै साल खूब चटणी खाई, ईबके साल मींह ऐं कम बरस्या - तै कचरी बी कड़े तैं हो?
चन्दगी : पर वा भरतो आई नहीं ईब-लग - जवारा ले कै ?
बदले : अरै बेरा ना वा हर्या कित वार* ला रही सै? म्हारी तै देखी जा, बेचारे बुळधां नै भूख लाग रही सै । ईब तै बणी* मैं घास बी सूख ली । कोए बात ना, ले एक हुकटी* भर ल्यां, इतणै वा आ ज्यागी ।
चन्दगी : हां भाई इस बणी का जिकर आ-ग्या । उस जोहड़ के साथ आळी पाळ* पै जो बाबा का कोठड़ा सै, पहल्यां उसमैं एक बाबा रहया करता, नाम था मनकबाबा - उसके नाम पै इस बणी का नाम पड़-ग्या मनकाळा ! दूर-दूर ताहीं के लोग इस के नाम नै जाणैं सैं । बोझड़े तै इतणे हुया करते कि नजफगढ के साथ वाळे गामां के लोग बी आड़े तैं फळसी खातिर एकाध छोटे-मोटे बोझड़े नै काट कै ले ज्याया करते । और उस जोहड़ के साथ वाळी कूई का पाणी तै इतणा मीठा अमृत था कि जिसकै ताप चढ रह्या हो, उसका ताप उतर ज्याया करता । एक बै तै दिल्ली के एक सेठ की कार आई थी और कई सागळ पानी भर कै ले गये थे एक रोगी खातिर ।
बदले : पर ईब कुण सी आग लाग-गी इसमैं ?
चन्दगी : ना लागी सै तै लाग ज्यागी - न्यूं-ऐं चालता रहया तै । मन्नै सरपंच तैं बहुत कही कि भाई, इस बणी के रूखां नै मत बेच, फेर बी थोड़े से तै कसाई बेच कै मान्या । न्यूं के उसका पेट भरै सै, पी ज्यागा दारू उन पैस्यां की । कैर के पेड़ बी कम रह गये - साथ आळे गामां की धाणकी-चमारी टींट तोड़ कै ले ज्यां सैं, म्हारै हाथ ना आते । कुछ या रेही लाग-गी धरती मैं ! ईब इस बणी मैं नकछींकणी, कुरंढ, घिलोठ, झींझ, सांगर और पीहल बी पह्ल्यां कितणे कोन्यां होते । जोहड़ के साथ आळे पीपल के पेडां पै बरबंटी खूब हुया करती - ईब यो नया बाबा बी निकम्मा सै, ध्यान ना राखता - गाम आळे बी लापरवाह हो लिये - किमैं लोह खूंठा आर कुछ लोहार खोटा !
बदले : पर चन्दगी, यो इस कूई का पानी क्यूकर खराब हो-ग्या ?
चन्दगी : आड़े तैं 4 किले आगै नहर पड़ै सै - खूब भरी चाल्या करती - हरयाणा बणे पाछै तै पाणी इतणा ना आता । पहल्यां इसमैं काई लागी रहया करती । ईंख होण लाग-गे - मोकळा पाणी चाल्या करता - एक घंटे मैं एक कीला भर ज्याया करता । कई साल तै मौज रही - फेर इसका नुकसान दीखण लाग गया । चोवे का पाणी ऊपर आ-ग्या, धरती मैं रेही लाग-गी, इसा लागै सै ज्यूकर धरती पै नूण छिड़क राख्या सै ! नहर के साथ आळी जमीन बेकार हो-गी, न्यूं-ऐं इस कूई का पाणी बी खराब हो-ग्या ।
बदले : चलो, म्हारे और तेरे खेत तै बच रहे सैं ईब ताहीं । यो सिमाणा सै-ऐ ऊंचाई पै, न्यूं-ऐं तै इसका नाम ऊंचीजोळ पड़-ग्या ! नहर का पाणी तै इसमैं चढता ना ! चलो, इस साल मींह ना बरस्या तै चणे आर सिरसिम बो द्यांगे, गीहुआं की टाळ कर द्यांगे - दूसरे सिमाणे मैं नहर कै लागते दो कीले सैं, उसमैं गीहूं बो द्यांगे - खाण जोगे दाणे तै हो-ऐ जांगे !
चन्दगी : जब नबिया* के साल मैं डूबा आई थी, उस साल बी इस सिमाणे मैं पाणी खड़ा ना हुया था, इस नहर का पाणी क्यूकर आवैगा ? देखता नहीं वो जहांगीरपुर माईनर - बड्डे-बड्डे इंजन ला-राखे सैं - जिब कितै जा-कै पाणी चड्ढै सै उसमैं । अरै हां, मेरै खूब याद सै, नबिया* आळे साल तै इस धरती मैं चणे की खेती हुई थी - भाई तौड़ हो-ग्या था, इतने तगड़े चणे मन्नै आपणी जिन्दगी मैं नहीं देखे ।
बदले : हां भाई, तेरै तै खूब याद सै, मैं तै उस टाइम छोटा था, पर मन्नैं बी न्यूं ऐं सुण्या सै - तबाही तै खूब हुई थी पर फेर धरती की तिस बुझ गई थी - थळी पै बी चणे बो दिये थे लोगां नै, खूब पैदावार हुई थी । नबिया का काळ तै पाणी का काळ था, सूखे का नहीं ।
चन्दगी : भाई, पूरे 21 दिन तगड़ा मींह बरसता रहया था - गाम-के-गाम डूब गये, कच्चे मकान हुया करते, सारे ढह गये थे आर सबके घरां में जो राशन पाणी था, वो बी बह-ग्या । खेती सब खतम हो गई थी, साढू* आर सामणू* - दोनूं ! पर भाई जो ऊंची जमीन थी, उसमैं पाछै इसी तगड़ी साढू फसल हुई थी, तौड़ हो-ग्या था । पर लोगां धौरै खाण ताहीं कुछ ना बच्या था, सिर्फ एक टाईम की रोटी खातिर सारा दिन मजूरी करी थी । यो जो चन्द्रभान का घर सै ना, चूने मैं बण्या औड़, वो उसके दादा जोधाराम नै नबिया के काळ मैं बणवाया था - खात्तियां नै एक टाईम की रोटी खा-कै काम करा था, उन ताहीं चार आने मजूरी बी ना दी !
बदले : भाई, उस चन्द्रभान का खेत तै यो रहया, मेरे साथ आळा, कई दिन हो लिये डाक्की दीख्या ए ना !
(बदले की बहू का प्रवेश)
बदले : अरै हर्या रांड,इतणी वार कित कर दी आज ?
चन्दगी : क्यूं खामखा छोह में आ रहया सै बदले, बिचारी ले तै आई, जवारा-रोटी ।
भरतो : के बताऊं, रोटी पोवण मैं वार लाग-गी, किमैं छोटे छोहरे नै दुखी कर दी ।
बदले : ये दोनूं छोहरे तै लागै सै, निर्भाग लिकड़ैंगे, ल्या तावळी-सी घाल राबड़ी कचौळे* में - थौड़ी सी चन्दगी कै बी घाल दे ।
चन्दगी : अरै ना, मैं तै खा-पी कै आया था, हुक्टी बी पी लई, तू आराम तैं खा, मैं एक-बै चूंटणी करण आळ्यां नै संभाळ-कै योह आया !
(चन्दगीराम बाहर जाता है )
बदले : अरी भागवान, जा बुलध उन रूखां तळै बैठे सैं, यो जवारे का झल्ला ठा ले-ज्या, भूखे सैं घणी हाण के ।
(भरतो जाती है, रोहतास का प्रवेश)
बदले : आ भाई रोहतास, कित हांडै सै ?
रोहतास : काका, नहर आ रही सै, आज म्हारा औसरा सै - खेत मैं नाक्का कर-कै आया सूं - थोड़ी हाण पाच्छै जा-कै संभाळूंगा ।
बदले : आंच्छ्या, ले - इस कचौळे* मांह-तैं एक रोटी ले ले - खूब घी ला राख्या होगा तेरी काकी नै ।
रोहतास : ना काका, मन्नैं तै थोड़ी-सी वार हुई सै - घर तैं खा-कै आया था । मैं तै एक बीड़ी पी लूं, बस ।
बदले : अरै चन्दगी आवण आळा सै, फेर हुक्टी भरांगे - इस बीड़ी मैं किमैं ना धरया - या तै हलक नै फूक दे सै ! भाई, थारा यो खेत ठीक जगांह पै सै - नहर कै सहारै - उसमैं पाणी तै आ-ज्या सै नहर का - म्हारे आळे कील्यां मैं तै पाणी चढता-ए कोन्यां !
रोहतास : काका, मैं एक-बै नाक्के नै संभाळ कै ईब आया - दाहने* मैं पाणी की दाब लाग-कै नाक्का टूट ज्या सै - मैं तै फाहळी बी ऊड़ै ऐ छोड़ आया था !
बदले : ठीक सै, तावळा आईये !
(रोहतास बाहर जाता है - थोड़ी देर बाद चन्द्रभान प्रवेश करता है)
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