Dulhan ne dulhe ki tarah ki ghudchadi!

बेटियां अब किसी भी मायनों में लड़कों से कम नहीं हैं।

इसे-इसे नाटक करकै नै छोरे-छोरी नै बराबर का बणाण आळे किम्मै इसा सौद्दा भी कर सकै सै के अक फेरे फिरे पाछै बाळक या छोरी न जामै भलक वो छोरा जामै...असली बराबरी तै जिब्बै होवैगी...
 
[FONT=&quot] सामंतवादी[/FONT] [FONT=&quot]परिपाटियों को जीवंत रखने में अहम् भूमिका निभा रही है [/FONT]I [FONT=&quot]इस प्रथा पर[/FONT] [FONT=&quot]चर्चा करने से पहले इस बात का जानना आवश्यक है की इसका प्रारंभ कब क्यों और[/FONT] [FONT=&quot]कहाँ[/FONT] [FONT=&quot]हुआ [/FONT]I [FONT=&quot]मेरी कल्पना यह है कि प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं को जो[/FONT] [FONT=&quot]कोई सुंदर लडकी पसंद आ जाती थी उसका अपहरण कर लेते थे और पतिरोध की अवस्था[/FONT] [FONT=&quot]में वे अपनी सेना को साथ ले जा कर बलपूर्वक उस लडकी को डोली में बिठाकर ले[/FONT] [FONT=&quot]आते थे[/FONT] I [FONT=&quot]राजाओं की देखा देखी दूसरे लोंगों[/FONT], [FONT=&quot]विशेषकर सामंतों[/FONT], [FONT=&quot]ने भी इस[/FONT] [FONT=&quot]प्रथा का अनुकरण किया होगा और धीरे धीरे यह एक[/FONT] [FONT=&quot]रिवाज़ बन गया [/FONT]I

Aur phir dheere dheere jab samantvad kum hua to pichadi jati walon ne bhi isko apna liya :).
Pahele Samantvadi apni ghudchadi ke aage pichadi jati walon ko nachate honge ab samantvad kum ho gaya aur pichadi jati wale nachane ko nahi milte to samantvadi apni ghudchadiyon mein khud nachne lage :)
 
[FONT=&quot]वैसे तो घुड़चढी की प्रथा ही अपने आप में एक कुरीति है जो सामंतवादी[/FONT] [FONT=&quot]परिपाटियों को जीवंत रखने में अहम् भूमिका निभा रही है [/FONT]I [FONT=&quot]इस प्रथा पर[/FONT] [FONT=&quot]चर्चा करने से पहले इस बात का जानना आवश्यक है की इसका प्रारंभ कब क्यों और[/FONT] [FONT=&quot]कहाँ[/FONT] [FONT=&quot]हुआ [/FONT]I [FONT=&quot]मेरी कल्पना यह है कि प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं को जो[/FONT] [FONT=&quot]कोई सुंदर लडकी पसंद आ जाती थी उसका अपहरण कर लेते थे और पतिरोध की अवस्था[/FONT] [FONT=&quot]में वे अपनी सेना को साथ ले जा कर बलपूर्वक उस लडकी को डोली में बिठाकर ले[/FONT] [FONT=&quot]आते थे[/FONT] I [FONT=&quot]राजाओं की देखा देखी दूसरे लोंगों[/FONT], [FONT=&quot]विशेषकर सामंतों[/FONT], [FONT=&quot]ने भी इस[/FONT] [FONT=&quot]प्रथा का अनुकरण किया होगा और धीरे धीरे यह एक[/FONT] [FONT=&quot]रिवाज़ बन गया [/FONT]I [FONT=&quot]सो सेना[/FONT] [FONT=&quot]की जगह बरात ने ले ली और हाथी घोड़ों की जगह हीरांनंद घोड़ी वाले की कमजोर सी[/FONT] [FONT=&quot]घोड़ी ने ले ली [/FONT]I [FONT=&quot]ताज की कमी[/FONT] [FONT=&quot]एक मैले कुचेले और बदबूदार सेहरे ने पूरी[/FONT] [FONT=&quot]कर दी और यह सेहराबंदी का ताम झाम एक अच्छा-खासा व्यापर बन गया [/FONT]I [FONT=&quot]चूंकि यह[/FONT] [FONT=&quot]सिर्फ मेरी एक कल्पना भर है[/FONT], [FONT=&quot]इसलिए आप अपने अपने नेक विचार इस प्रथा के[/FONT] [FONT=&quot]बारे में प्रस्तुत कर सकते हैं और मेरी इस [/FONT]thesis [FONT=&quot]को [/FONT]reject [FONT=&quot]कर सकते है[/FONT], [FONT=&quot]परन्तु आधुनिक युग में इस प्रथा की उपयोगिता के बारे में अपने तर्क अवश्य[/FONT] [FONT=&quot]दें.[/FONT]

[FONT=&quot]जहाँ तक उस लडकी के द्वारा घोड़ी पर चढ़ [/FONT]कर[FONT=&quot] लड़के की तरह रस्मो रिवाज़[/FONT] [FONT=&quot]पूरे करने की बात है[/FONT], [FONT=&quot]उसने शायद यह बताने की कोशिश की है कि लड़के और[/FONT] [FONT=&quot]लडकी का सामाजिक दर्जा[/FONT] [FONT=&quot]और अधिकार बराबर होने चाहिए [/FONT]I [FONT=&quot]और जरूरी नहीं कि जो[/FONT] [FONT=&quot]लड़की समान अधिकारों की बात करे वो खराब हो और शादी के बाद [/FONT]अपनी[FONT=&quot] सास से पैर[/FONT] [FONT=&quot]दबवाए [/FONT]I [FONT=&quot]कई घूंघट में छिपी हुई लाजवंती भी कम खतरनाक नहीं होती [/FONT]I [FONT=&quot]इसके[/FONT] [FONT=&quot]विपरीत आधुनिक द्रष्टिकोण रखने वाली सुशिक्षित लड़कियां अच्छी बहूएँ साबित[/FONT] [FONT=&quot]हो जाती हैं.[/FONT]

जहां तक मेरे पूर्वजों ने बताया हे घोड़-चढ़ी और बरात के बारे में ,में वो ही यहाँ लिख रहा हूँ |

बारात ----- (बाहर आंत )बाहरने पे आंने वाले | पुराने जमाने में धन के साथ-साथ पशुओं और औरतों को भी हमला कर के छीन लिया जाता था | इसलिए जब शादी करने के लिए जाते थे तो अधिक से अधिक मनुष्यों को साथ लिया जाता था और पहले सब हथियार बंद हो कर जाते थे | ये एक प्रकार की सेना होती थी | जो की आजकल केवल दुल्हे को एक किरपान जेसा कुछ पहना कर रश्म पूरी कर दी जाती हे | बहुत सी जगहों पर तो अब वो भी नहीं होता | जट्टों जेसी कुछ दबंग कोमें ही दिन में शादी बियाह करते थे | बाकी सब रात में शादी करते थे इस प्रकार के हमलों से बचने के लिए |

घुडचढ़ी ----- घुड चढ़ी शब्द से लगता हे की घोड़े पे चढ़ कर परिक्रमा (अमूमन सब गाँव में परिक्रमा ही होती हे गाँव की ) की जाती हे पर वास्तव में घोड़ी पर चढ़ कर घुडचढ़ी होती हे ( मेरी तो ट्रेक्टर चढ़ी होई थी,घोड़ी मिली-ए कोणी ) उसका का कारण ये बताया जाता हे की घोड़े को पूर्ण परुष (कम्प्लीट मेल ) माना जाता हे | अगर घोड़े पे बैठ के करेंगे तो वो भी दुहले के समकक्ष हो जता हे | घुड चढ़ी करने का मुख्य कारण ये हे की पुरे गाँव को ये बताया जाता हे की इस लड़के की अब शादी हो रही हे और ये अब खाली नहीं हे किसी और से जुड़ने के लिए |बाकी मेरी जानकारी इतनी ही हे | किसी को और कुछ पता हे तो वो भी लिखें |

वि,पि.जी के लिए ------ मेरे मामा तो सुथरा चमकना सेहरा (मोड़ कह्या करें हरयाणवी में ,जो की मोर का अपभ्रंश स ) ल्याए थे | अर आप ने स्ड्या होया बांसला सेहरा मिल्या होगा तो वा आपके माम्याँ की गलती स |

विशेष ---- अगर हम अपने रीती रिवाज/त्यौहार छोड़ देंगे तो जीवन नीरस हो जाएगा | हर त्यौहार का ,रीती का कोई ना कोई कारण होता हे ,ये बात अलग हे की कई ऐसी प्रथाओं ने कुप्रथा का रूप ले लिया हे | जिन को खतम करने की बजाय सुधार की आवश्यकता हे | हाथ में गुमडा हो जा तो ऊह का मतलब नु तो कोणी होंदा अक हाथ काट कें फेंक दे |
मेने अपने 'अनेक ' विचार पर्स्तुत कर दिए |
 
सामान सामाजिक दर्जा और बराबर अधिकार ने ऐ ते दुनिया की इसी तीसी कर राखी है .....पुरे विश्व में आदमी के साथ भेदभाव किया जाता है! अगर औरत अपनी शादी में थोडा बहुत भी सामान ले आती तो सारी उम्र का दहेज़ का फंदा गले में डाल दे है आदमी के .....नु न देखती की आदमी की सारी कमाई औरत और उसके बच्चे इस्तेमाल करते है! औरतो के लिए दुनिया भर की ऍन. जी. ओ. और सामाजिक संस्थाए है ....आदमियों के बारे में ऐसा कुछ नहीं सुना जाता! मिडिया में भी औरतो की समस्याएँ उठाई जाती है और उनपे विचार विमर्श किया जाता है....आदमी का क्या ....आदमी औरत को पिटे तो आदमी गलत, अगर औरत आदमी को पिटे तो भी आदमी गलत .....औरत का बलात्कार हो तो आदमी गलत ...अगर आदमी तलाक ले तो भी आदमी गलत ...औरत की नौकरी न लगे तो आदमी गलत ....किसी औरत की शादी न हो तो भी आदमी गलत ....हमेश आदमी को ही अपनी निर्दोस्ता का प्रमाण देना पड़ता है ....

इतना सब कुछ होने क बाद भी औरत को अबला और असहाय माना जाता है .....और ऊपर से विधि का विधान देखिये की आदमी ये सब जनता है और फिर भी कुछ नहीं करता .....आदमी भी औरत की तरह औरत को ही आदर्श मानता है .....

यहाँ पर अबला का मतलब 'आ-बला' हे | और असहाय का मतलब 'जो सहायक ना हो '|
 
सामान सामाजिक दर्जा और बराबर अधिकार ने ऐ ते दुनिया की इसी तीसी कर राखी है .....पुरे विश्व में आदमी के साथ भेदभाव किया जाता है! अगर औरत अपनी शादी में थोडा बहुत भी सामान ले आती तो सारी उम्र का दहेज़ का फंदा गले में डाल दे है आदमी के .....नु न देखती की आदमी की सारी कमाई औरत और उसके बच्चे इस्तेमाल करते है! औरतो के लिए दुनिया भर की ऍन. जी. ओ. और सामाजिक संस्थाए है ....आदमियों के बारे में ऐसा कुछ नहीं सुना जाता! मिडिया में भी औरतो की समस्याएँ उठाई जाती है और उनपे विचार विमर्श किया जाता है....आदमी का क्या ....आदमी औरत को पिटे तो आदमी गलत, अगर औरत आदमी को पिटे तो भी आदमी गलत .....औरत का बलात्कार हो तो आदमी गलत ...अगर आदमी तलाक ले तो भी आदमी गलत ...औरत की नौकरी न लगे तो आदमी गलत ....किसी औरत की शादी न हो तो भी आदमी गलत ....हमेश आदमी को ही अपनी निर्दोस्ता का प्रमाण देना पड़ता है ....

इतना सब कुछ होने क बाद भी औरत को अबला और असहाय माना जाता है .....और ऊपर से विधि का विधान देखिये की आदमी ये सब जनता है और फिर भी कुछ नहीं करता .....आदमी भी औरत की तरह औरत को ही आदर्श मानता है .....
अक्षय तूं औरताँ कै घणा खिलाफ बोलन लाग ग्या, घर पै शिकायत पहुंचानी पड़ेगी i
 
अक्षय तूं औरताँ कै घणा खिलाफ बोलन लाग ग्या, घर पै शिकायत पहुंचानी पड़ेगी i

Baat aurata k khilaf ki na hai....baat reality ki hai....na ho te bata dyo.....look at the divorce rate, rape rate, intercast and inter gotra marriage rate....

I heard a DPS schoolgirls saying to her friend about another girl," what a looser she is she dont have a boyfriend yet"
 
Baat aurata k khilaf ki na hai....baat reality ki hai....na ho te bata dyo.....look at the divorce rate, rape rate, intercast and inter gotra marriage rate....

I heard a DPS schoolgirls saying to her friend about another girl," what a looser she is she dont have a boyfriend yet"
As far as social status and rights are concerned, the parity between male and female in our society is apparently highly imbalanced, with the deficit still favouring the male-folk. Ironically, the women have to suffer a double whammy. On the one hand, they are subjected to exploitation of all sorts by men-folk, they become victim of the jealousy and antipathy of their own gender, on the other.

Divorce, inter-caste and inter-gotra marriages are something reciprocal and men are equally responsible for these happenings. As for incidents of rape, in 99% cases men are squarely responsible and it is not fare to put a blame on women.

DPS school girls could be an aberration. But, tell me what percentage of our population living in countryside is attending such kind of hi-fi schools. At the best, not more than 5%. How many girls studying in village schools dare to talk about boyfriends, as openly as the DPS girls can. Moreover, the same applies to boys also who spare no opportunity to boast of their association with girls. Thus, granting of equal rights has nothing to do with this kind of attitude. There is nothing wrong with girls asserting themselves and seek a parity with boys with regard to observance of social customs viz. rituals at the time of marriage etc.

India’s male-dominated society has always been a victim of a phobia that "equal status to women would marginalise the male-folk divesting them of their masculinity". Therefore, the moment any girl ventures to do something which was so far considered to be prerogative of boys only, she is ridiculed by the society and the same is happening in the instant case involving this brave Bhiwani girl. What is a big issue, if she has performed a ritual which was so far monopolized by the bridegrooms only? Every tradition has to have a beginning. So, this is just a beginning of another tradition. There are so many superfluous traditions we have been carrying along. Let there be one more, if we are so obsessed with these traditions and not ready to change. It would hardly matter.
 
Last edited:
Such isolated conjugational incidents in any civilization only prove and substantially establish the mental bankcruptcy of bride and further of groom; irrespective of popularity it generates among masses. Natural gender role reversal would not bring anything but confused men, woman and family with a dysfunctional society and community. Feminism by its definition and its execution has only broaden the gap among men and women where; seperation, single parenthood and loneliness being its favourite side products. Irony is that few educated males [ * not Man by established definition of manhood & masculanity*] seems to be in die hard one sided infatuation of feminism because of their own incapablity as a man in their own family. Uncontrolled penis and associated emotions are disaster hard to manage even in seemingly mature men[*read insecure*]. Where as females themselves are not much in appreciation of such incidents evidently in this thread and in villages itself because they understand probably that manhood is the basic criteria of a happy man and woman union not the balatantly illogical support which is just a feel good criticism of established traditions by shameless and spineless neo-liberal-femi-nazis. This incident probably is not the case of a genius rather utter stupidity results of which will be among us soon.
 
Last edited:
मनोरोग विशेषज्ञों की शोध के अनुसार दूसरों को अपने से नीचा दिखाने की कोशिश करना न केवल एक मानवीय कमजोरी एवं नपुंसकता का द्योतक है अपितु, एक मानसिक रोग भी है. इस बीमारी से आदमी तेजी से मानसिक रूप से विक्षिप्त होता चला जाता है, और औरत से भी कोसों दूर भागना शुरू कर देता है और औरतों के प्रति बेहद नफरत वाला रवैया बना लेता है . भाई कोई कुछ भी कह ले, म्हारे दिल मैं तो औरत के प्रति प्यार और सम्मान हमेशां रहा है और रहेगा. हो सकता है कुछ लोगों की परवरिश उस माहौल में हुई हो जहाँ औरत को चार लात सुबह, दो लात दोपहर को और चार लात शाम को मारने के अलावा माँ बहन की भद्दी गालियों की सौगात देने का चलन हो. इसलिए मैं उनकी औरत के प्रति नफरत से अशर्याचाकित नहीं हूँ. आखिर वे भी तो माहौल की ही पैदायश हैं, भाई. जैसा माहौल आदमी देखता है अपने घर या आस पास में वैसे ही उसका दृष्टिकोण बनता चला जाता है. और हो सकता है कुछ औरतें भी इस प्रकार के व्यवहार को पसंद करती हों, पर ज्यादा नहीं. अंग्रेजी में इस प्रकार की इच्छाओं को "sadomasochistic desire" का नाम दिया गया है.
 
बात अगर अधिकारों की समानता
की है तो बिलकुल मिलने चाहिए औरत की सामान अधिकार.यहाँ कोई भी ठेकेदार नहीं है ये निर्धारित करने के लिए की औरत के अधिकार क्या होंने चाहिए.एक educated लड़की अगर है तो उससे शिख्शा दिलवाती है ये एहसास और उनका सदुपयोग.अगर शुरुवात करनी है तो .
1ladko का मुकाबला padai में उंनसे ज्यादा नंबर ले के दिखाए.
२शादी बहाय के टाइम सज्वाट की एक चीज़ की तरह त्रय में चाय लेजाकर अपनी नुमाईश लग्ग्वाने से इनकार कर्रे.
३ शादी उस घर में और उस लड्क्के से कर्रे जो दहेज़ में एक रुपया भी लेने को तयार न हो.
४जब गर्भवती हो तो लड़की की भुर्र्न्हात्य न करवाने के लिए माँ चंड्डी का रूप धारण कर्रे.
और ऐसा बहुत सारी लडकिया कर्र भी रही है.लडको जैसे कप्प्ड़े पहनने से ये घुड चड्डी
निकलवाने से कोई इन्कलाब नहीं आने वाला.उल्टा ये सभी और पड़ीं हुई लडकियो के नाम पर एक शोस्शेबाजी और पर्पन्न्च की खिल्ली उड़ाने जैस्सी बात है.
 
सभ्य समाज में रहते हुए यह हर किसी का एक नैतिक दायित्व बनता है कि उस औरत को उचित सम्मान मिले जो हमारी जननी है, बहन है, बेटी है , चाची, ताई, मामी और फूफी है. इसमें ठेकेदारी का सवाल कहाँ से आ गया I दुर्भाग्य पूर्ण है कि कुछ लोग मर्दानगी की धारणा से जोड़कर ही औरत का मूल्यांकन करते हैं और उसे सिर्फ एक "sex-symbol " से ज्यादा कुछ नहीं समझते I उससे भी दुर्भाग्यपूर्ण और हास्यास्पद यह है कि आज औरत ही औरत की दुश्मन बनी बैठी है I क्या एक आदमी और औरत के रिश्ते का सिर्फ एक ही रूप होता है ? यदि हम अपनी बहन बेटियों और माताओं के लिए समान अधिकार और सम्मान की बात करेंगे तो हम नामर्द और समाज के ठेकेदार कहलायेंगे ? कुछ लोगों की खीझ और जल्खोरापन समझ से बाहर है I
 
Last edited:
औरत और मर्द की जोड़ी दोपहिया वाहन जैसी है जिसमे आगले और पिछले पहिये के साइज़ में अंतर होता है क्योंकि वजन सामानांतर बंटा हुआ नहीं होता ! प्राचीन समय में पुरुष बाहर के और औरते घर के काम संभालती थी ! औरत पति के न होने की स्तिथि में दोनों काम संभाल लेती थी क्योंकि समाज में एक सोहार्द प्रेम और प्रसपर मदद का माहौल था ! आज समय बदल चुका है औरतें भी नौकरी करती हैं और चूल्हे चोंके तक सीमित नहीं हैं उसका कारण ये नहीं है की ये काम सिर्फ औरत को सामान अधिकार दिलाने के लिए या औरतो के उत्थान के लिए किये जा रहे हैं ! असल में लोगो की जरूरत और भूख दोनों बढ़ चुकी हैं वैसे मुझे ऐसे कोई मर्द नहीं मिले हैं जो औरत की कमाई पर जीते हैं और खुद को मर्द कहलवाने में इज्ज़त समझते हैं ! शायद जाटलैंड पर ऐसा कोई सदस्य हो जो इस बात को बताने में गर्व महसूस करे ! अर वाहे बात है घर में कई चौधरी हो जावे तो पाटत भी तवली ए हो जाया करे चाहे कोए कितना ए बड्डा ज्ञानी ध्यानी हो घर में चलती एक ए की पावेगी किसे के मर्द की अर किसे के जनानी की अर जड़े दोनु चलाते हो वो घर न चलता !
 
२शादी बहाय के टाइम सज्वाट की एक चीज़ की तरह त्रय में चाय लेजाकर अपनी नुमाईश लग्ग्वाने से इनकार कर्रे.
३ शादी उस घर में और उस लड्क्के से कर्रे जो दहेज़ में एक रुपया भी लेने को तयार न हो.
और ऐसा बहुत सारी लडकिया कर्र भी रही है.
To fir ladke waale kaise dekhenge ladki ko..
photo se...??
restaurant main jaayenge??
kya ladki waale ladke ko dekhne nahi jaate..aur ladka kabhi tray nahi laata chai ki??
iss numaish ke bina arrange marriage kais ehogi??................kriypa prakash daale?


and I apologize for this question ...
Kya aapne uss ladke se shaadi ki jisne 1 rupiya bhi dahej main nahi liya??

kya aap batyengi we konsi bahut saari ladkiya hai jo aisa kar rahi hai??...I see 1 out of 5000 marriage without dowry when both families are affluent...............koi bihar bangal aali maul aawe wo to kuch laati kona na to saari khoob adangga laawe baabu ke tai..aur isme burai kya hai..agar dahej maanger nahi liya jaata ..kya ladki ka maa-baap ke propery pe koi haq nahi..ek taraf to aap log equality ki baat karte ho doosri taraf kahte ho ki maa- baap apni beti ko nuhi nangi-boochi kaahd de ghar tai...kya matlab hai iss baat ka?...main kahta huin ki maa-baap ki saari property sab bette-betiyoun main barabar baati jaani chahiye ...........
 
Last edited:
मेरा ख्याल है कि जिस तरह से इस लड़की की घुड़चढ़ी हुई है, उससे लड़के-लड़की में कोई बराबरी नहीं होने वाली. आजकल कुछ लोग समाज में ऐसी भ्रांतियां फैलाने में लगे हुए हैं कि लड़कियों को लड़कों के बराबर का बनाकर रहेंगे और इसके लिए उनसे वही सब करवाया जाएगा, जो लड़के करते हैं. यह एक मूर्खतापूर्ण विचार है. आधारभूत रूप से स्त्री-पुरुष एक समान हैं. इस दुनिया में एक पुरुष भी अपने तपोबल से अमर हो सकता है और इस पूरे संसार का मालिक बन सकता है, इसी प्रकार एक स्त्री भी अपने तपोबल से ऐसा कर सकती है. तो सर्वोच्च पुरस्कार अमरत्व और शीर्ष पद है, जो स्त्री-पुरुष, दोनों हासिल कर सकते हैं. एक पुरुष का जीवन अलग तरह का होता है. वो अपेक्षाकृत बलशाली है, इसलिए उद्दंड है. एक स्त्री कोमल है, इसलिए उसका स्वभाव मृदु है. स्त्री का कर्त्तव्य बनता है कि वह पुरुष को अपनी कोमलता, अपने अच्छे चरित्र से कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करे. अगर एक स्त्री भी खुद को पुरुष की तरह ही बलशाली और उद्दंड दर्शाकर उसकी बराबरी करने का प्रयास करेगी तो यह एक मूर्खतापूर्ण विचार है. दुर्भाग्य से आजकल ऐसा ही हो रहा है...पुरुष ऐयाशी करेंगे तो हम भी करेंगी...पुरुष शराब पिएंगे तो हम भी पिएंगी...पुरुष घुड़चढ़ी करेंगे तो हम भी करेंगी...क्या बकवास है...ऐसे तो फिर स्त्री गर्भवती होगी तो पुरुष को भी वो ऐसा बनाकर दिखाए...उसे मासिक धर्म होगा तो वो पुरुष को भी ऐसा बनाकर दिखाए...क्या बकवास है...स्त्री की एक अपनी दुनिया है, जहां वो अपनी सहेलियों से, अन्य स्त्रियों से कढ़ाई-बुनाई सीखने की, अच्छा खाना बनाने की, बच्चों के अच्छे लालन-पालन की चर्चा करती हैं...पुरुषों की एक अलग दुनिया है, जहां वे कोई पराक्रम दिखाने, कोई काम-धंधा जोड़ने की चर्चा करते हैं...फिर जब विवाह के बाद दोनों का मिलन होता है तो अलग-अलग दुनिया से आए 2 इंसान काफी अच्छा महसूस करते हैं...अगर आचार-विचार का ये अंतर नहीं होगा तो फिर एक स्त्री स्त्री रह ही कहां जाएगी...वो तो एक ऐसे पुरुष की तरह होगी, जो मासिक धर्म और गर्भधारण की क्षमता से युक्त है...क्या बकवास है...जो लोग ऐसी समानता का समर्थन करते हैं, वे मूर्ख हैं. लड़के कार चलाते हैं, लडकियां भी चलाएं, अच्छा है...लड़के पढ़ते-लिखते हैं, लड़कियां भी पढ़ें अच्छा है...डॉक्टर बनें, अध्यापक बनें...लेकिन लड़के धूम्रपान करेंगे तो वे भी करेंगी, लड़के अपराधी बनेंगे तो वे भी बनेंगी, लड़के ऐयाशी करेंगे तो वे भी करेंगी...क्या बकवास है...इसका मतलब तो जिसने उन्हें बनाया है...ईश्वर...वो मूर्ख है...क्या बकवास है...
 
औरत और मर्द की जोड़ी दोपहिया वाहन जैसी है जिसमे आगले और पिछले पहिये के साइज़ में अंतर होता है क्योंकि वजन सामानांतर बंटा हुआ नहीं होता ! !
राकेश, गाडी के आगले आर पाछले पहियाँ का साइज़ तो शायद एक जिसा ऐ हो सै आजकाल i पर हाँ जिन नै आपने आप नै मर्द कहलवाना हो तो उनने औरत कती जूती कै तले राखनी चाहिए, नहीं तो वे मर्द नहीं माने जांगे जाटलैंड पै i आर जो मलंग सें उनने चाहिए के घर की सब महिलाओं से खूब क्रूरता बरतें, ताकि उनकी झूठी मर्दानगी की झंडी हवा में लहराती रहे I पहलम आड़े जाट होन का सबूत देना पड़े था, इब एक भाई नै यो नया टेस्ट भी शुरू करवा दिया आड़े i और बेरा ना के के टेस्ट देने पड़ेंगे i
 
Last edited:
Bhai, Shapat pater ki legal vetting bhi jaruri hai. kade bya pache aadha lagai pache shapat pater khinda-2 hande.
Er je waa aawan aali BEEDI peewan laag gyi byah paachhey to? Donuaa ke sign hone chahiye शपथ पत्र पर nahi to exploit howega ghar aala......
 
One variation is to have a 29" front wheel and a 26" rear wheel (commonly called a "69er"). Using the smaller rear wheel allows shorter and quicker handling frames, more options for rear suspension designs and lighter bicycle weight.[7] Another variation is to have a 26" front wheel with a 29" rear wheel (commonly called a "96er"). Depending on the manufacturer, these names can be, although rarely, reversed. For example, Trek introduced a "69er" in 2007 with a 29" front wheel and a 26" rear wheel.[

Bajaj Pulsar 150

pulsar150.jpg
Engine 4 Stroke, Single Cylinder, Air CooledCubic Capacity 143.9cc Max. Power 12 BHP @ 8500rpmGear Box 5 SpeedIgnition CDIFront Brakes 240mm DiscRear Brakes 130mm DrumFront Tyre 2.75 X 18Rear Tyre 100/90 X 18Wheelbase 1265mm Ground Clearance 155mm Dry Weight 132 Kg Tank Capacity 18 Litres Colours Black, Silver, Blue & Red
http://www.motosindia.com/bajaj-pulsar.html

Jitna bera hai wo diya bata baaki ji doosre swal ka jawab mein aapko mail mein bhej doonga
 
...main kahta huin ki maa-baap ki saari property sab bette-betiyoun main barabar baati jaani chahiye ...........
भाई, मां-बाप की सारी प्रोपर्टी तो कब से बेटे-बेटियों में बराबर बांटी जा रही है...उदाहरण के लिए:
एक जगह एक परिवार रहता है जिले सिंह का. उसके परिवार में उसकी पत्नी है, 1 बेटा है और 1 बेटी है. पूरे परिवार की संपत्ति 2 करोड़ रुपए की है. जिले सिंह ने अपने लड़के की शादी रामफल सिंह की लड़की से कर दी और और बेटी की शादी धारे सिंह के लड़के से कर दी.
रामफल और धारे के परिवार में भी 1-1 बेटी है. अब शादी के बाद जिले सिंह की लड़की ने अपने परिवार से अपना हिस्सा मांगा. क़ानून बेटी के साथ था. जिले सिंह ने बेटी को हिस्सा दे दिया, लेकिन अपने बेटे की ससुराल वालों से, यानी रामफल से हिस्सा मांग भी लिया...उधर जहां जिले सिंह की बेटी ब्याही थी, उसकी देखा-देखी उसकी ननद ने, यानी धारे की लड़की ने और जहां लड़का ब्याहा था, यानी रामफल के परिवार में, उसके लड़के ने भी हिस्सा मांग लिया...हिस्सा बंटने के बावजूद तीनों परिवारों पर संपत्ति तो उतनी ही रही, लेकिन आपसी संबंध खराब हो गए. एक और खराब काम यह हुआ तीनों परिवारों में कन्या भ्रूण हत्या और बढ़ गई, क्योंकि ये हो गया कि लड़की होगी तो हिस्सा मांगेगी, जबकि लड़का होगा तो पत्नी के मायके से भी धन आएगा...
कहने का मतलब यह कि यदि कोई लड़की शादी के बाद अपने मायके से हिस्सा लेती है तो फिर अपनी ननद और बेटी को भी हिस्सा देना होगा...इस तरह से ये हिस्सा बराबर बंटने वाली बात भी बिलकुल बकवास है...
नहीं है तो मुझे समझाओ...
 
One variation is to have a 29" front wheel and a 26" rear wheel (commonly called a "69er"). Using the smaller rear wheel allows shorter and quicker handling frames, more options for rear suspension designs and lighter bicycle weight.[7] Another variation is to have a 26" front wheel with a 29" rear wheel (commonly called a "96er"). Depending on the manufacturer, these names can be, although rarely, reversed. For example, Trek introduced a "69er" in 2007 with a 29" front wheel and a 26" rear wheel.[


Bajaj Pulsar 150

pulsar150.jpg
Engine 4 Stroke, Single Cylinder, Air CooledCubic Capacity 143.9cc Max. Power 12 BHP @ 8500rpmGear Box 5 SpeedIgnition CDIFront Brakes 240mm DiscRear Brakes 130mm DrumFront Tyre 2.75 X 18Rear Tyre 100/90 X 18Wheelbase 1265mm Ground Clearance 155mm Dry Weight 132 Kg Tank Capacity 18 Litres Colours Black, Silver, Blue & Red
http://www.motosindia.com/bajaj-pulsar.html

Jitna bera hai wo diya bata baaki ji doosre swal ka jawab mein aapko mail mein bhej doonga

राकेश, मैंने एक डेढ़ साल पहलम, गाडी के आगले आर पछले टायर swap करवाए थे, मेरे ख्याल से कार के चारों टायर एक जैसे होते हैं.
 
I am not talking about a Car family got only two wheels Husband and wife paache to 4 balak hoye pache poori LPT 1612 ho jawe hain .
In other words only one wheel of two wheeler is driving wheel and the other one is follower.

उपेंदर भाई मै आपकी बात से पूर्णतया सहमत हूँ पर हमारा समाज ऐसी लड़की को बुरी ही मानता है मैंने ऐसे कम ही किस्से देखे सुने हैं !
 
Last edited:
Back
Top