prahladdevenda
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ना किसी की आँख का नूर हूँ........
ना किसी की आँख का नूर हूँ, ना किसी के दिल का करार हूँ
जो किसी के काम ना आ सके, मैं वो एक मुश्त-ए-गुबार हूँ.
मैं नहीं हूँ नगमा-ए-जां फ़िज़ा, कोई सुन के मुझको करेगा क्या ?
मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा, मैं बड़े दुखों की पुकार हूँ.
मेरा रंग रूप बिगड़ गया, मेरा यार मुझसे बिछुड़ गया
जो चमन खिंज़ा से उजड़ गया, मैं उसी की फसल-ए-बहार हूँ.
ना 'जफ़र' किसी का हबीब हूँ, ना 'जफ़र' किसी का रकीब हूँ,
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ, जो उजड़ गया वो दयार हूँ.
पये फ़ातिहा कोई आये क्यों, कोई चार फूल चदाए क्यों ?
कोई श'अस लाके जलाये क्यों, मैं वो बे'कसी का मजार हूँ.
'बहादुर शाह जफ़र'
ना किसी की आँख का नूर हूँ, ना किसी के दिल का करार हूँ
जो किसी के काम ना आ सके, मैं वो एक मुश्त-ए-गुबार हूँ.
मैं नहीं हूँ नगमा-ए-जां फ़िज़ा, कोई सुन के मुझको करेगा क्या ?
मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा, मैं बड़े दुखों की पुकार हूँ.
मेरा रंग रूप बिगड़ गया, मेरा यार मुझसे बिछुड़ गया
जो चमन खिंज़ा से उजड़ गया, मैं उसी की फसल-ए-बहार हूँ.
ना 'जफ़र' किसी का हबीब हूँ, ना 'जफ़र' किसी का रकीब हूँ,
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ, जो उजड़ गया वो दयार हूँ.
पये फ़ातिहा कोई आये क्यों, कोई चार फूल चदाए क्यों ?
कोई श'अस लाके जलाये क्यों, मैं वो बे'कसी का मजार हूँ.
'बहादुर शाह जफ़र'