Gazals "The Finest Ever"

kiya baadalon mein safar zindagi bhar;
zameen par banaaya na ghar zindagi bhar.

sabhi log jeene ka fan jaante hain;
na aaya humein ye hunar zindagi bhar.

mohabbat rahi chaar din zindagi mein..
..rahaa chaar din ka asar zindagi bhar......


ANWAR SHAOOR
 
अब के बरसात की रुत और भी भड़कीली है
जिस्म से आग निकलती है , काबा* गीली है

सोचता हूँ के अब अंजाम -ए -सफ़र क्या होगा
लोग भी कांच के हैं , राह भी पथरीली है

शिद्दत -ए -करब में तो हंसना करब है मेरा
हाथ ही सख्त हैं ज़ंजीर कहाँ ढीली है

गर्द आँखों में सही दाग तो चहरे पे नहीं
लफ्ज़ धुंधले हैं मगर फ़िक्र तो चमकीली है

घोल देता है समात में वो मीठा लहजा
किस को मालूम के ये कंद भी ज़हरीली है

पहले रग़ -रग़ से मेरी खूँ निचोडा उस ने
अब ये कहता है के रंगत ही मेरी पीली है

मुझको बे -रंग ही ना करदे कहीं रंग इतने
सब्ज़ मौसम है , हवा सुर्ख , फिजा नीली है

मेरी परवाज़ किसी को नहीं भाती तो ना भाये
क्या करूं जेहन "मुज़फ्फर" मेरा जिबरीली है




*(काबा =सामने से खुला हुआ लंबा कोट )

मुज्ज़फर वारसी
 
किया बादलों में सफ़र ज़िन्दगी भर ;
ज़मीन पर बनाया ना घर ज़िन्दगी भर .

सभी लोग जीने का फन जानते हैं ;
ना आया हमें ये हुनर ज़िन्दगी भर .

मोहब्बत रही चार दिन ज़िन्दगी में ..
..रहा चार दिन का असर ज़िन्दगी भर ......


अनवर शूर

बेहद उम्दा , खुबसूरत अल्फाज़ , वाह !!!
 
Na ta-aruf na ta-alluk hai magar dil aksar
Naam sunta hai tumhara uchhal padta hai

Uski yaad aayi hai saanson zara dheere chalo
Dhadkano se bhi ibadat main khalal padta hai



If anyone knows complete ghazal.. pls share...
 
होती है तेरे नाम से वहशत कभी-कभी----नासिर काज़

होती है तेरे नाम से वहशत1 कभी-कभी
बरहम2 हुई है यूँ भी तबीयत कभी-कभी



ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी



तेरे करम से ऐ अलम-ए-हुस्न-ए-आफ़रीन
दिल बन गया है दोस्त की ख़िल्वत कभी-कभी



दिल को कहाँ नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िन्दगी में ये राहत कभी-कभी



जोश-ए-जुनूँ में दर्द की तुग़यानियों3 के साथ
अश्कों में ढल गई तेरी सूरत कभी-कभी



तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमईन4 न था
गुज़री है मुझ पे भी ये क़यामत कभी-कभी



कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़याल था
यूँ भी गुज़र गई शब-ए-फ़ुर्क़त5 कभी-कभी



ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मुहब्बत के बावजूद
महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी-कभी


1. वहशत = चिन्ता; 2. बरहम = बैचेन; 3. तुग़यानी = तूफ़ान; 4. मुतमईन = संतुष्ट; 5. शब-ए-फ़ुर्क़त = जुदाई की रात
 
Album----Muntazir....singer----jagjit singh

रुख़ से परदा उठा दे ज़रा साक़िया
बस अभी रंग-ए-महफ़िल बदल जायेगा
है जो बेहोश वो होश में आयेगा
गिरनेवाला जो है वो संभल जायेगा

तुम तसल्ली ना दो सिर्फ़ बैठे रहो
वक़्त कुछ मेरे मरने का टल जायेगा
क्या ये कम है मसीहा के रहने ही से
मौत का भी इरादा बदल जायेगा

मेरा दामन तो जल ही चुका है मग़र
आँच तुम पर भी आये गंवारा नहीं
मेरे आँसू ना पोंछो ख़ुदा के लिये
वरना दामन तुम्हारा भी जल जायेगा

तीर की जाँ है दिल, दिल की जाँ तीर है
तीर को ना यूँ खींचो कहा मान लो
तीर खींचा तो दिल भी निकल आयेगा
दिल जो निकला तो दम भी निकल जायेगा

फूल कुछ इस तरह तोड़ ऐ बाग़बाँ
शाख़ हिलने ना पाये ना आवाज़ हो
वरना गुलशन पे रौनक ना फ़िर आयेगी
हर कली का दिल जो दहल जायेगा

मेरी फ़रियाद से वो तड़प जायेंगे
मेरे दिल को मलाल इसका होगा मगर
क्या ये कम है वो बेनक़ाब आयेंगे
मरनेवाले का अरमाँ निकल जायेगा

इसके हँसने में रोने का अन्दाज़ है
ख़ाक उड़ाने में फ़रियाद का राज़ है
इसको छेड़ो ना ‘अनवर’ ख़ुदा के लिये
वरना बीमार का दम निकल जायेगा
 
यूँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे
साथ चल मौज-ए-सबा हो जैसे

लोग यूँ देख कर हँस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे

इश्क़ को शिर्क की हद तक न बड़ा
यूँ न मिल हमसे ख़ुदा हो जैसे

मौत भी आई तो इस नाज़ के साथ
मुझपे एहसान किया हो जैसे

ऐसे अंजान बने बैठे हो
तुम को कुछ भी न पता हो जैसे

हिचकियाँ रात को आती ही रहीं
तू ने फिर याद किया हो जैसे

ज़िन्दगी बीत रही है "दानिश"
एक बेजुर्म सज़ा हो जैसे
 
Jab bhi teri gali se...

जब भी तेरी गली से गुजरे हैं
जख्म जितने भी थे फिर से उभरे हैं

तेरे ग़म के समन्दरों में हम
रोज डूबे हैं रोज उभरे हैं

टूट कर ख्वाहिशों के आईने
रेजा रेजा जमीन पे बिखरे हैं

जब भी तेरी गली से गुजरे हैं
जख्म जितने भी थे फिर से उभरे हैं


-- रवि मोरे
 
Apni mohabbat ko aajmana tha...

हमें तो अपनी मोहब्बत को आजमाना था
तेरी गली से गुजरना तो एक बहाना था

करीब पहुंचे समंदर के तो ख्याल आया
हमें किसी की निगाहों में डूब जाना था

इसी उम्मीद पे दिल ने सदायें तुझको दी
के तेरे शहर में कुछ दिन मेरा ठिकाना था

शराब तुझको इसी बात पे अजीज किया
की एक घूँट में सब कुछ मुझे भुलाना था


-- Anoop Jalota
 
वो जो शायर था चुप सा रहता था
बहकी-बहकी सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था
गूँगी खामोशियों की आवाज़ें!
जमा करता था चाँद के साए
और गीली सी नूर की बूँदें
रूखे-रूखे से रात के पत्ते
ओक में भर के खरखराता था
वक़्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही, वो अजीब सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोड़ी चूमा करता था

चाँद से गिर के मर गया है वो
लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है |
 
Wonderful !
Thanks for sharing. :)


रुख़ से परदा उठा दे ज़रा साक़िया
बस अभी रंग-ए-महफ़िल बदल जायेगा
है जो बेहोश वो होश में आयेगा
गिरनेवाला जो है वो संभल जायेगा

तुम तसल्ली ना दो सिर्फ़ बैठे रहो
वक़्त कुछ मेरे मरने का टल जायेगा
क्या ये कम है मसीहा के रहने ही से
मौत का भी इरादा बदल जायेगा

मेरा दामन तो जल ही चुका है मग़र
आँच तुम पर भी आये गंवारा नहीं
मेरे आँसू ना पोंछो ख़ुदा के लिये
वरना दामन तुम्हारा भी जल जायेगा

तीर की जाँ है दिल, दिल की जाँ तीर है
तीर को ना यूँ खींचो कहा मान लो
तीर खींचा तो दिल भी निकल आयेगा
दिल जो निकला तो दम भी निकल जायेगा

फूल कुछ इस तरह तोड़ ऐ बाग़बाँ
शाख़ हिलने ना पाये ना आवाज़ हो
वरना गुलशन पे रौनक ना फ़िर आयेगी
हर कली का दिल जो दहल जायेगा

मेरी फ़रियाद से वो तड़प जायेंगे
मेरे दिल को मलाल इसका होगा मगर
क्या ये कम है वो बेनक़ाब आयेंगे
मरनेवाले का अरमाँ निकल जायेगा

इसके हँसने में रोने का अन्दाज़ है
ख़ाक उड़ाने में फ़रियाद का राज़ है
इसको छेड़ो ना ‘अनवर’ ख़ुदा के लिये
वरना बीमार का दम निकल जायेगा
 
Jagjit singh

Manzil Na De Charaag Na De Hauslaa To De,
Tinkay Ka Hi Sahee Tu Magar Aasraa To De

Main nay Ye Kab Kaha Ke Mere Haq Mein Ho Jawaab,
Lekin Khamosh Kyoon Hai Tu Koi Faislaa To De

Barson Main Tere Naam Pe Khaata Raha Fareb,
Mere Khuda Kahan Hai Tu Apna Pata To De

Beshaq Mere Naseeb Pe Rakh Apnaa Ikhtiyaar,
Lekin Mere Naseeb Mein Kya Hai Bata To De
 
Album--Face to Face...Singer--Jagjit Singh

Sachchi Baat Kahi Thi Maine
Logon Ne Sooli Pe Chadhaya
Mujh Ko Zahr Ka Jam Pilaya
Phir Bhi Un Ko Chain Na Aaya

Sachchi Baat Kahi Thi Maine
Le Ke Jahan Bhi, Waqt gya Hai
Zulm Mila Hai, Zulm Ssaha Hai
Sach Ka Ye Inaam Mila Hai

Sachchi Baat Kahi Thi Maine
Sab Se Behtar Kabhi Na Ban Na
Jag Ke Rahbar Kabhi Na Ban Na
Peer Payambar Kabhi Na Ban Na

Chup Rah Kar Hi Waqt Guzaro
Sach Kahnepe Jaan Mat Waro
Kuch To Seekho Mujh Se Yaro

Sachchi Baat Kahi Thi Maine
 
बुलन्दी देर तक----मुनव्वर राना

बुलन्दी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है

बहुत जी चाहता है क़ैद-ए-जाँ से हम निकल जाएँ
तुम्हारी याद भी लेकिन इसी मलबे में रहती है

यह ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटूँ मेरी माँ सजदे में रहती है

अमीरी रेशम-ओ-कमख़्वाब में नंगी नज़र आई
ग़रीबी शान से इक टाट के पर्दे में रहती है

मैं इन्साँ हूँ बहक जाना मेरी फ़ितरत में शामिल है
हवा भी उसको छू कर देर तक नश्शे में रहती है

मुहब्बत में परखने जाँचने से फ़ायदा क्या है
कमी थोड़ी-बहुत हर एक के शजरे में रहती है

ये अपने आप को तक़्सीम कर लेता है सूबों में
ख़राबी बस यही हर मुल्क के नक़्शे में रहती है.
 
रंजिश ही सही ----- अहमद फ़राज़

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मुहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फा है तो ज़माने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज्ज़त-ए-गिरिया से भी महरूम
ऐ राहत-ऐ-जाँ मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिल-ऐ-ख़ुशफ़हम को तुझ से है उम्मीदें
ये आखिरी शम्मएँ भी बुझाने के लिए आ
 
हर लफ़्ज़ तिरे जिस्म की खुशबू में ढला है
ये तर्ज़, ये अन्दाज-ए-सुख़न हमसे चला है

अरमान हमें एक रहा हो तो कहें भी
क्या जाने, ये दिल कितनी चिताओं में जला है

अब जैसा भी चाहें जिसे हालात बना दें
है यूँ कि कोई शख़्स बुरा है, न भला है


-jaa nisar akhtar
 

जब भी तेरी गली से गुजरे हैं
जख्म जितने भी थे फिर से उभरे हैं

टूट कर ख्वाहिशों के आईने
रेजा रेजा जमीन पे बिखरे हैं


यादें कितनी भी खुबसूरत ना हों, याद आने पर दुःख ही देती हैं
आपने बेहद ही गहरी बात लिख दी है
बहुत खूब ज़नाब !!!
 
मेजर गौतम राजरिशी भारत पाक सीमा पर हुई गोलीबारी में घयल हो गए हैं उन्हे हाँथ में गोली लगी है, गोली निकाल दी गयी है तथा वे अभी अस्पताल में ही स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं। जाटलैंड परिवार इस बात से संतोष का अनुभव करता है कि वे स्वस्थ हो रहे हैं तथा उन्हें जल्द ही अस्पताल से छुट्टी मिल जायेगी . उन्ही की लिखी हुई एक ग़ज़ल उनके सम्मान में यहाँ प्रस्तुत है ।




उनका हर एक बयान हुआ
दंगे का सब सामान हुआ

नक्शे पर जो शह्*र खड़ा है
देख जमीं पे बियाबान हुआ

झोंपड़ ही तो चंद जले हैं
ऐसा भी क्या तूफ़ान हुआ

कातिल का जब से भेद खुला
हाकिम क्यूं मेहरबान हुआ

कोना-कोना घर का चमके
है जब से वो मेहमान हुआ

आँखों में सनम की देख जरा
कत्ल का मेरे उन्वान हुआ

एक हरी वर्दी जो पहनी
दिल मेरा हिन्दुस्तान हुआ
 
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