बचपन की एक छोटी सी कहानी
सुणी थी हामने दादा- दादी की जुबानी
आज हमने उसे कविता में पिरोया
जाग उठा बचपन ,जो था सोया
काबर अर मेन्ह्स की काहणी:-
एक थी मेन्ह्स
एक थी काबर
दोनुआँ की थी करडी यारी
काबर बैठ के कड़ पे
कर्या करे थी मेंहस की सुवारी
कदे उछले,कदे कूदे
मेन्ह्स के सारे चिचड चुंडे
कदे कान में करे खाज
यु-ए था उनकी यारी का राज
एक दिन मेंहस ने न्यू सोची
उह के मन में एक बात आई ओछी
काबर का स मेरे ताण जीणा
मेरे पे हागे ,मेरे पे मुते
आज ताहि मेरे तें किम्मे ना दिहना
मेन्ह्स बोली आ-ए काबर
तू मेरे पे खेली -कूदी भोत
आज तू तले बैठ
में तेरे पे करुँगी चोथ
काबर ने भतेरे हाथ पाँ जोड़े
पर मेन्ह्स कती ना मानी
आज उह ने खाई थी
ताते बिन्दोले अर जुवार की सानी
मेन्ह्स तें ना कदे टूट जा यारी
न्यू सोच के तले बेठ्गी काबर बीचारी
मेन्ह्स ने उह पे मार दिया चोथ
अर चाल पड़ी , बुझया ना गोत
उड़े लव सी था एक मन्दर
उह पे बेठा लखावे था एक बंदर
बंदर ने काबर पे दया आई
काबर काढ के बाहर बगाई
फेर बंदर के मन में आया लोभ
टिकड़,मांडे ते में खाऊं रोज
आज ते में काबर खा ल्यूं
जिन्दगी का नया मजा ल्यूं
बंदर ने काबर हाथ में ठाई
बंदर ने कती दया ना आई
काबर की भी बंध गी घी-घी
पर उह ने बचन की चाल चलाई
काबर बोली बंदर भाई
में गोबर में धंसी ना जाऊं खाई
पहलम तू मन्ने नुहा दे
फेर नूण मिर्च मिला दे
बंदर के भी बात समझ में आई
काबर ने धो के लाग्या खाण
काबर बोली आली क्यूँ खावे
घाम लिकड़र्या धर दे सुखाण
बंदर ने बात ली मान
काबर धर दी भींत पे सुखाण
काबर बोली नूण मिर्च ले आ
इतन: में करड़ा कर ल्यूं जिया
बंदर गया उछलदा पार
आया इतन्ने काबर ले गी उड़ार
शिक्षआ : मुर्ख लोगों की दोस्ती हमेशा नुक्सान दायक होती हे | और मुसीबत में बुद्धि हमेशा काम आती हे |