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धन्यवाद अंजलि जी एक अत्यन्त विचारोत्तेजक कविता प्रस्तुत करने के लिए |


हम सब चुप क्यों हैं? कुछ कर क्यूँ नही गुजरते? हम लोग सदा इन सत्ता के भूखे भेड़ियों से डर कर कब तक जियेंगे. अब ये लडाई लड़ ही लेनी चाहिए आर या पार. कोई भी हमारे घर मैं घुस कर हमें थप्पड़ मार जाता है
और ये सरकार के तथाकथित नुमाइंदे अपनी मस्ती में मस्त रहते हैं.
.



काजू भुनी प्लेट में ह्विस्की गिलास में।
उतरा है रामराज विधायक निवास में।

पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में।


आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में।


पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नखास में।


जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशोहवास में ।
 
Subah subah ik khwab ki dastak par darwaza khola, dekha
Sarhad ke us paar se kuchh mehmaan aaye hain
Aankhon se maanoos the saarey

Chehre saarey sune sunaaye
Paanv dhoye, Haath dhulaye
Aangan mein aasan lagwaaye...
Aur tannoor pe makki ke kuchh mote mote rot pakaye
Potli mein mehmaan mere
Pichhale saalon ki faslon ka gud laaye the

Aankh khuli to dekha ghar mein koi nahin tha
Haath lagakar dekha to tannoor abhi tak bujha nahin tha
Aur hothon pe meethe gud ka jaayka ab tak chipak raha tha

Khwab tha shayad!
Khwab hi hoga! !
Sarhad par kal raat, suna hai, chali thi goli
Sarhad par kal raat, suna hai
Kuchh khwaabon ka khoon hua hai
 
HUMDUM

Mod pe dekha hai wo boodha-sa ek ped kabhi ?
Mera waqif hai, bahut salon se mein use jaanata hoon

Jab mein chhota tha to ik aam udaane ke liye
Parli deewar se kandhon pe chadha tha uske
Jaane dukhti huee kis shaakh se jaa paanv lagaa
Dhaad se phenk diya tha muje neeche usne
Meine khunnas main bahut phenke the pathar us par

Meri shaadi pe mujhe yaad hai shaakhein dekar
Meri vedi ka hawan garm kiya tha usne
Aur jab haamla thi 'Biba' to dopahar main har din
Meri biwi ki taraf kairiyan phenki thi isi ne
Waqt ke saath sabhi phool, sabhi patti gaye

Tab bhi jal jaata tha jab Munne se kehti 'Biba'
'Haan,usi ped se aaya hai tu, Ped ka phal hai'
Ab bhi jal jaata hoon. jab mod se gujarte mein kabhi
Khaanskar kehta hai, 'Kyo, Sar ke sabhi baal gaye?'

'Subah se kaat rahe hain woh Kameti wale
Mod tak jaane ki himmat nahin hoti mujhko'
 
Poornima Verman, one classy and deep touching poet that I admire a lot. Her pragmatic philosophical thought provoking creations always touches inner soul and gives inspiring msg.This very Poem also gives a beautiful msg to 'Stay Positive' against all odds. :)

खिड़की - पूर्णिमा वर्मन

बहुत दिनों बाद
खिड़की खोली थी
साफ-साफ दिखता काँच के उस पार

लगता था नयी धूप आएगी
फूल खिल जाएँगे
नई पत्तियाँ उगेंगी
वसंत फिर आएगा धीरे-धीरे

एक काँच खिसकाते ही
मिला शीतल झोंका
धीरे-धीरे क्यारी में फूल खिलने लगे
कि जैसे वसंत समाया था हर कण में

अचानक गहराया नभ
एक तेज़ झोंका आया
रेत ही रेत
बिखर गई फूलों पर - आँखों में
छितरायी पंखुड़ियाँ पत्तियाँ
छलछलायी आँखें

हम अक्सर भूल जाते हैं
मौसम बदला करते हैं
तो क्या मुझे
खिड़की खोलनी ही नहीं थी?
या सिखा गई मुझको
जीवन का एक अध्याय। ...


Rock on
Jit

 
Last edited:
दो नवयौवना सखियाँ आपस में पहलियाँ बुझती हुई
आप भी पढिये ये मजेदार पहेलियाँ



१.
खा गया पी गया
दे गया बुत्ता
ऐ सखि साजन?
ना सखि कुत्ता!


२.
लिपट लिपट के वा के सोई
छाती से छाती लगा के रोई
दांत से दांत बजे तो ताड़ा
ऐ सखि साजन? ना सखि जाड़ा!


३.
रात समय वह मेरे आवे
भोर भये वह घर उठि जावे
यह अचरज है सबसे न्यारा
ऐ सखि साजन? ना सखि तारा!


४.
नंगे पाँव फिरन नहिं देत
पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत
पाँव का चूमा लेत निपूता
ऐ सखि साजन? ना सखि जूता!


५.
ऊंची अटारी पलंग बिछायो
मैं सोई मेरे सिर पर आयो
खुल गई अंखियां भयी आनंद
ऐ सखि साजन? ना सखि चांद!


६.
जब माँगू तब जल भरि लावे
मेरे मन की तपन बुझावे
मन का भारी तन का छोटा
ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा!


७.
वो आवै तो शादी होय
उस बिन दूजा और न कोय
मीठे लागें वा के बोल
ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल!


८.
बेर-बेर सोवतहिं जगावे
ना जागूँ तो काटे खावे
व्याकुल हुई मैं हक्की बक्की
ऐ सखि साजन? ना सखि मक्खी!


९.
अति सुरंग है रंग रंगीले
है गुणवंत बहुत चटकीलो
राम भजन बिन कभी न सोता
ऐ सखि साजन? ना सखि तोता!


१०.
आप हिले और मोहे हिलाए
वा का हिलना मोए मन भाए
हिल हिल के वो हुआ निसंखा
ऐ सखि साजन? ना सखि पंखा!


११.
अर्ध निशा वह आया भौन
सुंदरता बरने कवि कौन
निरखत ही मन भयो अनंद
ऐ सखि साजन? ना सखि चंद!


१२.
शोभा सदा बढ़ावन हारा
आँखिन से छिन होत न न्यारा
आठ पहर मेरो मनरंजन
ऐ सखि साजन? ना सखि अंजन!


१३.
जीवन सब जग जासों कहै
वा बिनु नेक न धीरज रहै
हरै छिनक में हिय की पीर
ऐ सखि साजन? ना सखि नीर!


१४.
बिन आये सबहीं सुख भूले
आये ते अँग-अँग सब फूले
सीरी भई लगावत छाती
ऐ सखि साजन? ना सखि पाती!


१५.
सगरी रैन छतियां पर राख
रूप रंग सब वा का चाख
भोर भई जब दिया उतार
ऐ सखी साजन? ना सखि हार!


१६.
पड़ी थी मैं अचानक चढ़ आयो
जब उतरयो तो पसीनो आयो
सहम गई नहीं सकी पुकार
ऐ सखि साजन? ना सखि बुखार!


१७.
सेज पड़ी मोरे आंखों आए
डाल सेज मोहे मजा दिखाए
किस से कहूं अब मजा में अपना
ऐ सखि साजन? ना सखि सपना!


१८.
बखत बखत मोए वा की आस
रात दिना ऊ रहत मो पास
मेरे मन को सब करत है काम
ऐ सखि साजन? ना सखि राम!


१९.
सरब सलोना सब गुन नीका
वा बिन सब जग लागे फीका
वा के सर पर होवे कोन
ऐ सखि ‘साजन’ना सखि! ,लोन(नमक)


२०.
सगरी रैन मिही संग जागा
भोर भई तब बिछुड़न लागा
उसके बिछुड़त फाटे हिया’
ए सखि ‘साजन’ ना,सखि! दिया(दीपक)




अमीर खुसरो
 
One more from Poornima Ji for the day and this one is Fabulous Patriotic Poem that certainly fills sense of pride and patriotism. Kudos to Poornima ji ! :)

तिरंगा - पूर्णिमा वर्मन

गणतंत्र हर तूफ़ान से गुज़रा हुआ है
पर तिरंगा प्यार से फहरा हुआ है

ज़िन्दगी के साथ में
चलते ही जाना
हर गरीबी बेबसी में
ढूँढ पाना
अपने जीने का बहाना
जंग की कठिनाइयों से
उबर आना
फिर किसी परिणाम तक
जाने का रस्ता
एक बनाना
दर्द में विश्वास-सा ठहरा हुआ है ।
यह तिरंगा प्यार से फहरा हुआ है ।

कितना पाया और क्या खोया
इस गणित में कैसा जाना
स्वर्ण-चिड़िया उड़ गयी तो
कैसा उसका दुख मनाना
ताल दो मिलकर
कि कलयुग में
नया भारत बनाना
सिर उठाना
गर्व से जय हिन्द गाना
मुश्किलों की
धूप में ईमान-सा गहरा हुआ है ।
यह तिरंगा प्यार से फहरा हुआ है ।

जय हिंद !!..



Rock on
Jit
 
Sunshine in the chilly winters, Aah! .. feels like heaven isn't it? A wonderful poem once again from Poornima ji that depicts the beauty and warmth of 'winter sunshine' really well, Nostalgia at its best !! :)


जाड़े की धूप - पूर्णिमा वर्मन

अलसाई
इतराई
पेड़ों के पत्तों से
गिर-गिर के बिखरायी
किरनों का गुलदस्ता
जाड़े की धूप ।

अनमनी
गुनगुनी
नीले आकाश तले
धरती संग छुईमुई
सड़क-सड़क दूर तलक
जाड़े की धूप ।

सोने के
हिरनों-सी
सरपट चौकड़ी भरी
किसे पता कहाँ तलक
एकाकी सूना पथ
जाड़े की धूप ।

सरसों-सी
खिली-खिली
अनजाने रस्तों पर
खरहे-सी दौड़ पड़ी
क्वाँर का कुँआरापन
जाड़े की धूप ।

रौशनता
गतिमयता
चटकाती बढ़ी चली
यहाँ-वहाँ सभी कहाँ
पहियों की प्रतिद्वन्द्वी
जाड़े की धूप ।


Rock on
Jit

 
Hindi litreature would have been impotent without Ramdhari Singh .None of his contemporary match him in Philosophy,spirtiuality.prowess, mascualinity,soul searching sensibility, zeal for humanity as he does.Since his death no one even gives the vague glimpse of a little greatness which he showered 'aise hi'.Thaty I call him 'Nirala' .Here is one of his creation which is one of my favourite.true to the core of life.ENjoy................:)




~~~~~~Shakti aur Akshma~~~~~~


क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा ?



क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनीत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।



अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।



क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो ।



तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे ।



उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से ।



सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।



सच पूछो , तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की ।



सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

It could be more than an everlasting gift to Indians that portrait of Veer-Ras Kavi Ramdhai Singh Dhankar is being put in Sansad Bhavan. This is a great reverance to his works and thinking and a great gift to poets n poetry lovers on the occassion of new year.His words are becoming more and more significant nowadays.Cheers!!
 
हास्य कवि श्री अशोक चक्रधर अपनी बेबाक कविताओं के लिए जाने जाते हैं
उनके द्वारा लिखी गई ऐसी ही एक कविता पढिये और लुत्फ़ उठाइए
इस कवित का शीर्षक है "दया"



भूख में होती है कितनी लाचारी,
ये दिखाने के लिए एक भिखारी,
लॉन की घास खाने लगा,
घर की मालकिन में
दया जगाने लगा।


दया सचमुच जागी
मालकिन आई भागी-भागी-
क्या करते हो भैया ?


भिखारी बोला
भूख लगी है मैया।
अपने आपको
मरने से बचा रहा हूं,
इसलिए घास ही चबा रहा हूं।


मालकिन ने आवाज़ में मिसरी घोली,
और ममतामयी स्वर में बोली—
कुछ भी हो भैया
ये घास मत खाओ,
मेरे साथ अंदर आओ।


दमदमाता ड्रॉइंग रूम
जगमगाती लाबी,
ऐशोआराम को सारे ठाठ नवाबी।
फलों से लदी हुई
खाने की मेज़,
और किचन से आई जब
महक बड़ी तेज,
तो भूख बजाने लगी
पेट में नगाड़े,
लेकिन मालकिन ले आई उसे
घर के पिछवाड़े।


भिखारी भौंचक्का-सा देखता रहा
मालकिन ने और ज़्यादा प्यार से कहा—
नर्म है, मुलायम है। कच्ची है
इसे खाओ भैया
बाहर की घास से
ये घास अच्छी है !



अशोक चक्रधर
 
हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते

गुलज़ार साहेब का अपना अलग ही अंदाज़ रहा है, वो रिश्तों को बहुत गहरे से देखते हैं, उनकी कविताओं नज़मो में आप ये बात हमेशा महसूस करेंगे


हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते


जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते


शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिये दिल नहीं थोड़ा करते


तूने आवाज़ नहीं दी कभी मुड़कर वरना
हम कई सदियाँ तुझे घूम के देखा करते


लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसी दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते



समपूरन सिंह ( गुलज़ार)
 
प्रस्तुत कविता श्री गोपालदास 'नीरज' के काव्य संग्रह " आसावरी" से ली गई है

हर दर्पन तेरा दर्पन है, हर चितवन तेरी चितवन है,
मैं किसी नयन का नीर बनूँ, तुझको ही अर्घ्य चढ़ाता हूँ !


नभ की बिंदिया चन्दावाली, भू की अंगिया फूलोंवाली,
सावन की ऋतु झूलोंवाली, फागुन की ऋतु भूलोंवाली,
कजरारी पलकें शरमीली, निंदियारी अलकें उरझीली,
गीतोंवाली गोरी ऊषा, सुधियोंवाली संध्या काली,
हर चूनर तेरी चूनर है, हर चादर तेरी चादर है,
मैं कोई घूँघट छुऊँ, तुझे ही बेपरदा कर आता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!


यह कलियों की आनाकानी, यह अलियों की छीनाछोरी,
यह बादल की बूँदाबाँदी, यह बिजली की चोराचारी,
यह काजल का जादू-टोना, यह पायल का शादी-गौना,
यह कोयल की कानाफूँसी, यह मैना की सीनाज़ोरी,
हर क्रीड़ा तेरी क्रीड़ा है, हर पीड़ा तेरी पीड़ा है,
मैं कोई खेलूँ खेल, दाँव तेरे ही साथ लगाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!


तपसिन कुटियाँ, बैरिन बगियाँ, निर्धन खंडहर, धनवान महल,
शौकीन सड़क, गमग़ीन गली, टेढ़े-मेढ़े गढ़, गेह सरल,
रोते दर, हँसती दीवारें नीची छत, ऊँची मीनारें,
मरघट की बूढ़ी नीरवता, मेलों की क्वाँरी चहल-पहल,
हर देहरी तेरी देहरी है, हर खिड़की तेरी खिड़की है,
मैं किसी भवन को नमन करूँ, तुझको ही शीश झुकाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!


पानी का स्वर रिमझिम-रिमझिम, माटी का रव रुनझुन-रुनझुन,
बातून जनम की कुनुनमुनुन, खामोश मरण की गुपुनचुपुन,
नटखट बचपन की चलाचली, लाचार बुढ़ापे की थमथम,
दुख का तीखा-तीखा क्रन्दन, सुख का मीठा-मीठा गुंजन,
हर वाणी तेरी वाणी है, हर वीणा तेरी वीणा है,
मैं कोई छेड़ूँ तान, तुझे ही बस आवाज़ लगाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!


काले तन या गोरे तन की, मैले मन या उजले मन की,
चाँदी-सोने या चन्दन की, औगुण-गुण की या निर्गुण की,
पावन हो या कि अपावन हो, भावन हो या कि अभावन हो,
पूरब की हो या पश्चिम की, उत्तर की हो या दक्खिन की,
हर मूरत तेरी मूरत है, हर सूरत तेरी सूरत है,
मैं चाहे जिसकी माँग भरूँ, तेरा ही ब्याह रचाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है!!
 
दूर से दिखता है पेड़
पत्तियाँ नहीं, फल नहीं

पास से दिखती हैं डालें
धूल से नहाई, सँवरी ।

एक स्त्री नहीं दिखती कहीं से
न दूर से, न पास से ।

उसे चिता में
जलाकर देखो
दिखेगी तब भी नहीं ।

स्त्री को देखना उतना आसान नहीं
जितना तारे देखना या
पिंजरा देखना ।
 
Suraj ka gola

सूरज का गोला
इसके पहले ही कि निकलता
चुपके से बोला, हमसे - तुमसे, इससे - उससे
कितनी चीजों से
चिडियों से पत्तों से
फूलो - फल से, बीजों से-
"मेरे साथ - साथ सब निकलो
घने अंधेरे से
कब जागोगे, अगर न जागे, मेरे टेरे से ?"

आगे बढकर आसमान ने
अपना पट खोला
इसके पहले ही कि निकलता
सूरज का गोला

फिर तो जाने कितनी बातें हुईं
कौन गिन सके इतनी बातें हुईं
पंछी चहके कलियां चटकी
डाल - डाल चमगादड लटकी
गांव - गली में शोर मच गया
जंगल - जंगल मोर नच गया

जितनी फैली खुशियां
उससे किरनें ज्यादा फैलीं
ज्यादा रंग घोला
और उभर कर ऊपर आया
सूरज का गोला

सबने उसकी आगवानी में
अपना पर खोला
 
वे हवा को क़ैद कर

वे हवा को क़ैद कर
कहते है कि-
मौसम का बयान करो

उस चरित्रहीन मौसम का
जिसको तमीज नही है
हरे और पीले पत्तों में अन्तर की
उसकी बदतमीजी का गवाह है
ये सूखी टहनियों वाला पेड़

ये केवल पैतींस वर्ष में
बूढ़ा हो गया पेड़
जिसके पत्ते अभी
ठंऽऽऽऽऽऽडी हवा में
झूम भी नही पाए थे कि
साजिश शुरू हो गई

इस पेड़ की जड़ो में
उन लोगों का ख़ून है
जो शब्दों को
हवा में विचरने की
आज़ादी चाहते थे

उन लोगों का ख़्वाब था कि
इस पेड़ से निकलने वाली
लोकतन्त्र, स्वतंत्रता, समानता की

टहनियाँ पूरे रेगिस्तान में फैल जाएगी
जिसके पत्तों की हवा से
शब्दों को एक नई ज़िन्दगी मिलेगी

लेकिन उनके उत्तराधिकारी
जंगल का दोहन कर
अपने शोंटों के घरों की
सुरक्षा मे व्यस्त हैं
हवा को क़ैद कर खुश हैं

वे नहीं जानते
हवा कभी क़ैद नही हो सकती
ये हवा प्रचंड आँधी बन कर
उनके शोंटो के घरों को
चूर कर देगी
शोंटो के करोड़ों टुकड़े
ख़ून के कतरों में बदल जाएंगे
ख़ून का हर कतरा
एक-एक शब्द होगा
बयान करेगा मौसम का
एक-एक शब्द
बदला लेगा हवा को
क़ैद करने की साजिश का।


"गोविंद माथुर"
 
जाड़े की धूप - पूर्णिमा वर्मन

अलसाई
इतराई
पेड़ों के पत्तों से
गिर-गिर के बिखरायी
किरनों का गुलदस्ता
जाड़े की धूप ।

सोने के
हिरनों-सी
सरपट चौकड़ी भरी
किसे पता कहाँ तलक
एकाकी सूना पथ
जाड़े की धूप ।

सरसों-सी
खिली-खिली
अनजाने रस्तों पर
खरहे-सी दौड़ पड़ी
क्वाँर का कुँआरापन
जाड़े की धूप ।

Nice One.. gives a warm feeling sply in these sunny days after fogggy mornings.
 
Chhip-2 ashru bahane walo......

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है |
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है |

माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है |

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चाँदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों, चाल बदलकर जाने वालों
चँद खिलौनों के खोने से, बचपन नहीं मरा करता है |

लाखों बार गगरियाँ फ़ूटी,
शिकन न आयी पर पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल पहल वो ही है तट पर
तम की उमर बढ़ाने वालों, लौ की आयु घटाने वालों,
लाख करे पतझड़ कोशिश पर, उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी ना लेकिन गंध फ़ूल की
तूफ़ानों ने तक छेड़ा पर,
खिड़की बंद ना हुई धूल की
नफ़रत गले लगाने वालों, सब पर धूल उड़ाने वालों
कुछ मुखड़ों के की नाराज़ी से, दर्पण नहीं मरा करता है।
 
meri pasand....

धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ

मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है
अरमान आरजू की लाशें निकल रही हैं
भीगी खुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ

आँसू भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ
बेचैन जिन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ
 
Dear All,

Its a humble request to all the contributers of this very beautiful thread, that kindly search the thread with 'Search' feature of the thread, if the very Poem u want to post is already posted or not;..cuz I've been observing that for last sometimes poems are being re-posted again n again!

One more thing, please don't post Urdu Nazms, this thread is solely dedicated to quality 'Hindi Poems' only.

Thanks ! :)


Rock on
Jit


 
सरफरोशी की तमन्ना

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल द्वारा अमर देशभक्ति गीत जो बाद में देशभक्तों के लिए महान प्रेरणा बना-

सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है।


करता नहीं क्यूं दूसरा कुछ बात चीत
देखता हूं मैं जिसे वो चुप तिरी मेहफ़िल में है।


ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है।

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है।


खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद
आशिक़ों का आज झमघट कूचा-ए-क़ातिल में है।


है लिए हथियार दुश्मन ताक़ में बैठा उधर
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है।


हाथ जिन में हो जुनून कटते नहीं तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है।


हम तो घर से निकले ही थे बांध कर सर पे क़फ़न
जान हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये क़दम
ज़िंदगी तो अपनी मेहमाँ मौत की महफ़िल में है।


दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इंक़िलाब
होश दुशमन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज
दूर रह पाए जो हम से दम कहां मंज़िल में है।


यूं खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है।
 
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