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A really nice composition that describes perplexity of Life.. :)


उलझन - दुष्यन्त कुमार चतुर्वेदी

जीवन क्यों तुम बीत रहे हो
व्यर्थ अनर्थ सी बातों में
रात सी काली शंकाओं मे
भाग्य अभाग्य के खातों मे
कल था निर्धन आज धनी मैं
कल का धनी अब निर्धन क्यों हूं
ये रिश्ता है वो रिश्ता है
रिश्तों मे बंध जाता क्यों हूं
अति तनाव के वो क्षण काले
आत्मा तक मे लगते छाले
लेकिन जिनसे तनाव बढता
उनसे ही क्यों लगाव बढता??

कर्तव्यों मे घिरा हुआ सा
मुक्ति की आशा क्यों करता मै
सबसे निर्भय दिखने वाला
अपने आप से क्यों डरता मै
जीवन भर का जोङ घटाना
शून्य साथ मे ले कर जाना
फिर भी जीवन गणित ना समझा
जाने किन पन्नों मे उलझा

उलझन उलझन उलझन उलझन
जीवन क्या तुम उलझन ही हो
या फिर चिन्ताओं मे डूबे
थके हुए टूटे मन ही हो
अगर तुम्हें कुछ पता लगे तो
तुम ही आ कर के बतलाना
जीवन क्या है-जीवन क्यूं है
जीवन क्योंकर बीत रहा है ??


Rock on
Jit

Gud hai... Very Realistic.
 
Realistic but Gloomy one, yet quite touchin' n Sensible! :)


तलाश - दुष्यन्त कुमार

रिश्तों मे दुख, नातों मे दुख
घर मे भी दुख, बाहर भी दुख
जीवन के हर मोङ पे बस दुख
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये

कभी किसी की बातें दुखतीं
कहीं पुरानी यादें दुखतीं
रक्त के वो सम्बन्ध खो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये

मन मे जो भी तनाव भरता
जाकर इक कागज़ पे उतरता
कागज़ भी अब बोझ हो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये

कभी पुराने लोग थे कहते
बँटने से सुख दुगुना होता
मैने भी था सुखों को बाँटा
पर बँट कर वे लोप हो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये

भटक भटक कर मन भी हारा
रहा अकेला मै बेचारा
सपने भी अब स्वयम् सो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये

कोई कहे कर्तव्य मे सुख है
कोई कहे वैराग्य में सुख है
सारे सच अब झूठ हो गये
ओ सुख अब तुम कहाँ खो गये.


Rock on
Jit
 
Last edited:
A Sweet & Serene Poem on the eve of V'Day! :)


हृदय - विश्व पारीक

हर पुष्प चमन का खिल जाए,
खुद हीं धागों में सिल जाए,
हर वृक्ष कोपलों से लदकर
सुरम्य सुषमा में मिल जाए,
सुरधनु गगन से उतर यहाँ
अगणित रंगों में बँट जाए,
उन रंगों की हो रंगोली
हर रंगोली के हों साये।
जल के तरंग के संग कभी
हर अंग धरा का हिल जाए,
मन का उमंग लेकर अनंग
नई राह , नई मंजिल पाए।
जलचर ,नभचर की कौन कहे
हर गुण मानव का जुड़ जाए,
श्रृंगार प्रकृति का छोटा हो,
उसके जैसा जो उर पाए।

वह हृदय कहीं एक लोक नहीं,
जिसमें रह कर हो शोक नहीं,
है राह एक , दो नेत्र नेक,
कर दे नेत्रों से विलोक कहीं।

द्वि-अंबुज हैं, ठहरा दृग-जल,
प्रीत बहे जिनमें प्रति-पल,
उस राह से पहुँचे जो उर में
भुले खुद हीं वह विश्व सकल।

हर धड़क्न से वायु बहती,
हर सिसक्न से भींगे है रवि,
हर हंसी है मानो मधुकुंभ
है लिए वसंत उसकी छवि।

क्या पुष्प तुम्हें दूँ इस दिन मैं,
जिसे देख पुष्प खुद शर्माए।
कुछ बोल सखे, लब खोल सखे,
हमसे क्यों इतना घबराए।


Rock on
Jit
 
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teri baat

here is one I just wrote;

Teri bat

sirf tujh se hi bat karta hun, aur teri hi bat karta hun
Tum falak pe raj karti ho, mai zamin pe basr karta hun
tera daman chand sitaron se damkta rahta hai,
mai to ek purane se fate hue kurte me thiturta hun

do waqt ki roti ki kasm-e-kash me laga rahta hun
jab bhi thak jata hun, bas teri aur dekh leta hun
dil bahal jata hai, tujhe hansta dekh kar
bhookh me bas teri hansi se , pet bhar leta hun

tujhe muskurate dekhna, meri aadat ban gayee hai
tujh se ekele me bat karna meri ibadat ban gayee hai
Zameen ke unginat insaanon ko dekh dekh kar
mere liye tum ek haseen hoor-e-zannat ban gayee ho

Tere sans ki khusboo, zameen ke har fool se behtar hai
tera jishm me laga ne jane kaunsa sang-e-marmar hai
tum kabhi tajmahal lagti ho, to aur kabhi chasm-e-shahi
teri jaban me ganga ke pani ki kal kal aur jhar jhar hai
.....................................................

RK^2
 
One gracious poem that helps you to do introspection!..:)


स्वयं की तलाश - अभिनव

एकाकी की परछाइयों में,
मन की गहराइयों में,
जब खो जाता हूँ मैं,
स्वयं को स्वयं से दूर ही पाता हूँ मैं।

कई लोगों से मैं मिला,अनेकों को जाना।
पर कहाँ मिलाप हुआ मेरा स्वयं से,
खुद को कहाँ है पहचाना ?
परिजनों को प्यार से,परजनों को ललकार से,
भिन्न-भिन्न व्यवहार से,सारे संसार से,
जब अपना परिचय बताता हूँ मैं,
स्वयं को स्वयं से दूर ही पाता हूँ मैं।

जीवन एक युद्घ,प्रतिदिन-प्रतिपल मैं लड़ रहा हूँ।
पथ में आती हार को कर के दरनिकार
बस जीतने का प्रयास कर रहा हूँ
जीत की आशा में,हार की निराशा में,
कठिण प्रयास में,दुःख में,उल्लास में,
जब खुद को ढूंढ़ना चाहता हूँ मैं,
स्वयं को स्वयं से दूर ही पाता हूँ मैं।

जीवन की इस भाग दौड़ में,
एक दूजे से आगे बढ़ने की होड़ में,
ऐसा लगता है कहीं कुछ छूट गया है,
मेरा मन जैसे मुझसे रूठ गया है।
इस आपाधापी से जब भी कुछ क्षण
अपने लिये चुराता हूँ मैं,
स्वयं को स्वयं से दूर ही पाता हूँ मैं।

खुद को जानने की कोशिश में,
मैंने बस इतना जाना है,
जीवन का एक गूढ़ रहस्य,
शायद मैंने पहचाना है।
हार-जीत निरर्थक,यहाँ
जीत का प्रयास ही जीत का अहसास है।
ज़िंदगी है ऐसा सफ़र जिसमें,रास्ते बड़े मंज़िलों से
स्वयं को पाना महत्वपूर्ण नहीं,
महत्वपूर्ण स्वयं की तलाश है ।।


Rock on
Jit
 
Mere Gaon ka kunwa

O mere gaon ke sukhe hue kunwe,
teri halat pe mujhe taras aata hai
jahan kabhi panghat laga karta tha,
wahan ub kudaa pada rahta hai

kabhi teri pooja huaa karti thee
tere pani me lahar utha karti thee
mere muhalle ke har ghar ki,
tere pani se, gagri bhara karti thee

sham ko tere charon taraf,
ek mela sa laga karta thaa
tujh se pani lane ke bahane
ne jane kia kia hua karta thaa

kitnon ne tera pani peekar
har roj naya jeevan paaya
kuche ne tere under jakar
jeevan se chutkara paaya

aaj tera pani kho gaya hai
kunwe se, kurdi ho gaya hai
tera nirmal pani kiya gaya
gaon beemar ho gaya hai

duniya ke sab ameeron se
aaj ek bheekh mangta hoon
agar paise me shakti hai to,
tumse kunwe ka pani mangta hoon

RK^2
 
How True!!.. :)


जो पत्थर काटकर - राजेंद्र पासवान घायल


जो पत्थर काटकर सबके लिए
पानी जुटाता है
उसे पानी नहीं मिलता
पसीने में नहाता है

लगा रहता है जो हर दिन किसी का
घर बनाने में
उसी को घर नहीं होता उसे
मौसम सताता है

जुता रहता है बैलों की तरह
जो खेत में दिन भर
उसी का अपना बच्चा भूख से
आँसू बहाता है

बनाए जिसके धागों से बने हैं
आज ये कपड़े
उसी का तन नहीं ढँकता
कोई गुड़िया सजाता है

जलाता है बदन कोई हमेशा
धूप में 'घायल'
ज़रा-सी गर्मी लगने पर कोई
पंखा चलाता है |



Rock on
Jit


 
Last edited:
How True!!.. :)

जलाता है बदन कोई हमेशा
धूप में 'घायल'
ज़रा-सी गर्मी लगने पर कोई
पंखा चलाता है |

Aaj kal to pankhon se bhi kaam nahin chalta... AC chalte hain....:)
 
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं / इक़बाल

One of all times great

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं / मोहम्मद इक़बाल

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं


ताही ज़िन्दगी से नहीं ये फ़ज़ायें
यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं


कना'अत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू पर
चमन और भी, आशियाँ और भी हैं


अगर खो गया एक नशेमन तो क्या ग़म
मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुगाँ और भी हैं


तू शहीं है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमाँ और भी हैं


इसी रोज़-ओ-शब में उलझ कर न रह जा
के तेरे ज़मीन-ओ-मकाँ और भी हैं


गए दिन की तन्हा था मैं अंजुमन में
यहाँ अब मेरे राज़दाँ और भी हैं
 
one beautiful and touching creation !! ... :)


धूप - आचार्य सारथी

झाँक-झूँक खिड़की की
स्याह सलाख़ों से
कमरे को पोत रही
अलसाई धूप!

जागा था
चिड़ियों की चोंचों में दिन
सूरज को पाया था
तारे गिन-गिन
देख-देख आंगन से
उठते धुएँ को
अंधियारे घूँघट में
घबराई धूप!

भीगी थी सुर्ख-सुर्ख
बारिश से रात
सोची थी मौसम ने
फ़सलों की बात
खुशबू की फाँसों में
फूलों की चाह लिए
काँटों की बाँदी बन
पछताई धूप!


Rock on
Jit
 
One of all times great

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं / मोहम्मद इक़बाल

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं


ताही ज़िन्दगी से नहीं ये फ़ज़ायें
यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं


कना'अत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू पर
चमन और भी, आशियाँ और भी हैं


अगर खो गया एक नशेमन तो क्या ग़म
मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुगाँ और भी हैं


तू शहीं है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमाँ और भी हैं


इसी रोज़-ओ-शब में उलझ कर न रह जा
के तेरे ज़मीन-ओ-मकाँ और भी हैं


गए दिन की तन्हा था मैं अंजुमन में
यहाँ अब मेरे राज़दाँ और भी हैं



Awesome one...but little tough:) but nice...very nice..!




Pyar jidhar hai jeet hai wahi, gar prem nahi to jeet nahi

Itne intehaano me jale hai jo, waha ek intehaan aur sahi
 
Awesome one...but little tough:) but nice...very nice..!




Pyar jidhar hai jeet hai wahi, gar prem nahi to jeet nahi

Itne intehaano me jale hai jo, waha ek intehaan aur sahi

Wah wah Wah wah kya baat kahi hai Rahul ji..... wanna quote one sher to continue... bt wont write here... as nt in the interest of the thread.....:)
 
One gracious poem that helps you to do introspection!..:)


स्वयं की तलाश - अभिनव

खुद को जानने की कोशिश में,
मैंने बस इतना जाना है,
जीवन का एक गूढ़ रहस्य,
शायद मैंने पहचाना है।
हार-जीत निरर्थक,यहाँ
जीत का प्रयास ही जीत का अहसास है।
ज़िंदगी है ऐसा सफ़र जिसमें,रास्ते बड़े मंज़िलों से
स्वयं को पाना महत्वपूर्ण नहीं,
महत्वपूर्ण स्वयं की तलाश है ।।


Rock on
Jit

Toooooo Gud jit bhai....
 
A fine poem with lil romantic touch! :)


जाने क्यूँ??? - दुष्यन्त कुमार

दिल मे कोई बात नहीं है
कोई भी जज़्बात नहीं है
इन्तज़ार की बात नहीं है
फिर भी तकता राह किसी की...

ग़म का कोई नहीं अन्धेरा
नहीं खुशी का कोई सवेरा
ना अरमानों का कोई डेरा
फिर भी तकता राह किसी की...

कोई फूल ना खिलने वाला
नहीं कोई भी मिलने वाला
जाम न साक़ी, खाली प्याला
फिर भी तकता राह किसी की...

इक तरफा इक़रार है शायद
बिना कहे इज़हार है शायद
हुआ नहीं, पर प्यार है शायद
फिर भी तकता राह किसी की |


Rock on
Jit
 
आज शाम है बहुत उदास / भगवतीचरण वर्मा

जाने क्यूँ...???

आज शाम है बहुत उदास
केवल मैं हूँ अपने पास ।

दूर कहीं पर हास-विलास
दूर कहीं उत्सव-उल्लास
दूर छिटक कर कहीं खो गया
मेरा चिर-संचित विश्वास ।


कुछ भूला सा और भ्रमा सा
केवल मैं हूँ अपने पास
एक धुंध में कुछ सहमी सी
आज शाम है बहुत उदास ।


एकाकीपन का एकांत
कितना निष्प्रभ, कितना क्लांत ।


थकी-थकी सी मेरी साँसें
पवन घुटन से भरा अशान्त,
ऐसा लगता अवरोधों से
यह अस्तित्व स्वयं आक्रान्त ।


अंधकार में खोया-खोया
एकाकीपन का एकांत
मेरे आगे जो कुछ भी वह
कितना निष्प्रभ, कितना क्लांत ।


उतर रहा तम का अम्बार
मेरे मन में व्यथा अपार ।


आदि-अन्त की सीमाओं में
काल अवधि का यह विस्तार
क्या कारण? क्या कार्य यहाँ पर?
एक प्रशन मैं हूँ साकार ।


क्यों बनना? क्यों बनकर मिटना?
मेरे मन में व्यथा अपार
औ समेटता निज में सब कुछ
उतर रहा तम का अम्बार ।


सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास,
आज शाम है बहुत उदास ।


जोकि आज था तोड़ रहा वह
बुझी-बुझी सी अन्तिम साँस
और अनिश्चित कल में ही है
मेरी आस्था, मेरी आस ।


जीवन रेंग रहा है लेकर
सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास,
और डूबती हुई अमा में
आज शाम है बहुत उदास ।
 
Tooooo Gud! :):)
Very touchin poem indeed!!


जाने क्यूँ...???

आज शाम है बहुत उदास
केवल मैं हूँ अपने पास ।

दूर कहीं पर हास-विलास
दूर कहीं उत्सव-उल्लास
दूर छिटक कर कहीं खो गया
मेरा चिर-संचित विश्वास ।


कुछ भूला सा और भ्रमा सा
केवल मैं हूँ अपने पास
एक धुंध में कुछ सहमी सी
आज शाम है बहुत उदास ।


एकाकीपन का एकांत
कितना निष्प्रभ, कितना क्लांत ।

 
Last edited:
One more for the Day - really a Superb one !

नामांकन - रामधारी सिंह दिनकर

------ class love poem by Dinker.

सिंधुतट की बालुका पर जब लिखा मैंने तुम्हारा नाम
याद है, तुम हंस पड़ी थी 'क्या तमाशा है !
लिख रहे हो इस तरह तन्मय
की जैसे लिख रहे होओ शिला पर |
मानती हूँ, यह मधुर अंकन अमरता पा सकेगा |
वायु की क्या बात ? इसको सिंधु भी न मिटा सकेगा |'


और तबसे नाम मैंने है लिखा ऐसे
कि, सचमुच, सिंधु कि लहरें न उसको पाएंगी,
फूल में सौरभ, तुम्हारा नाम मेरे गीत में है |
विश्व में यह गीत फैलेगा
अजन्मी पीढियाँ सुख से
तुम्हारे नाम को दुहराएंगी |
 
One classy Inspiring writing by Great Dr. Harivansh Ray Bachan !! :)

नीड का निर्माण फिर फिर - डा. हरिवंश राय बच्चन

नीड का निर्माण फिर फिर,
नेह का आह्वान फिर फिर!

वह उठी आँधी कि नभ में, छा गया सहसा अंधेरा,
धूलि धूसर बादलों नें, भूमि को इस भाँति घेरा,
रात सा दिन हो गया, फिर रात आयी और काली
लग रहा था अब न होगा इस निशा का फिर सवेरा

रात के उत्पात भय से भीत जन-जन, भीत कण कण,
किंतु प्राची से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर फिर
नीड का निर्माण फिर फिर,
नेह का आह्वान फिर फिर!



Rock on
Jit
 
One classy Inspiring writing by Great Dr. Harivansh Ray Bachan !! :)

नीड का निर्माण फिर फिर - डा. हरिवंश राय बच्चन


लग रहा था अब न होगा इस निशा का फिर सवेरा

रात के उत्पात भय से भीत जन-जन, भीत कण कण,
किंतु प्राची से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर फिर
नीड का निर्माण फिर फिर,



Rock on
Jit

good one ! :)
 
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Not open for further replies.
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