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Found another Gem of a Poem from the Treasure of Great Bachhan Sir!
Life is all about Moving Ahead ... So keep walking no matter how hard the way is.. :)


तू क्यों बैठ गया है पथ पर? - हरिवंशराय बच्चन

ध्येय न हो, पर है मग आगे,
बस धरता चल तू पग आगे,
बैठ न चलनेवालों के दल में तू आज तमाशा बनकर!

तू क्यों बैठ गया है पथ पर?

मानव का इतिहास रहेगा
कहीं, पुकार पुकार कहेगा-
निश्चय था गिर मर जाएगा चलता किंतु रहा जीवन भर!

तू क्यों बैठ गया है पथ पर?

जीवित भी तू आज मरा-सा,
पर मेरी तो यह अभिलाषा-
चिता-निकट भी पहुँच सकूँ मैं अपने पैरों-पैरों चलकर!

तू क्यों बैठ गया है पथ पर? ..


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Jit
 
पाबंदियाँ- बालकृष्ण मिश्रा​

होंठ पर पाबन्दियाँ हैं
गुनगुनाने की।

निर्जनों में जब पपीहा
पी बुलाता है।
तब तुम्हारा स्वर अचानक
उभर आता है।
अधर पर पाबन्दियाँ हैं
गीत गाने की।

चाँदनी का पर्वतों पर
खेलना रुकना
शीश सागर में झुका कर
रूप को लखना।
दर्पणों को मनाही
छबियाँ सजाने की।

ओस में भीगी नहाई
दूब सी पलकें,
श्रृंग से श्यामल मचलती
धार सी अलकें।
शिल्प पर पाबन्दियाँ
आकार पाने की।

केतकी सँग पवन के
ठहरे हुए वे क्षण,
देखते आकाश को
भुजपाश में, लोचन।
बिजलियों को है मनाही
मुस्कुराने की।

हवन करता मंत्र सा
पढ़ता बदन चन्दन,
यज्ञ की उठती शिखा सा
दग्ध पावन मन।
प्राण पर पाबन्दियाँ
समिधा चढाने की।
 
छत के किसी कोने में
अटकी वह बूंद
टीन पर ‘टप्प’ गिरी
समय के अंतराल पर
गिरना जारी है उसका
लय-सीमा बंधी वह
गिरने के बीच
प्रतीक्षा दहला देती है
कि अब गिरी…अब गिरी.

वर्षा थम चुकी है
छत से बहती तेज धार
एकदम चुप है
पर यह धीरे-धीरे संवरती
शक्ति अर्जित कर
गिरती है ‘टप्प’ से
 
Read this simple yet elegant positive poem in newspaper, found it worth posting, njoy! :)


जिंदगी - अश्विनी बग्गा

जिंदगी की उलझनों से यूँ
ना तौबा कीजिये
दिन गुजर जाते हैं,
कोई शौक पैदा कीजिये |

कैद रखी हसरतें अब
साँस लेने दीजिये
गुल हैं तितली के लिए,
काँटों को रोंदा कीजिये |

चंद लम्हा बैठ कर ख्वाहिश
ये पुरी कीजिये
जख्म क्या है, दर्द क्या है,
ये ना सोचा कीजिये |

बागबां से पूछिये, इस
गुलिस्तां की बहार,
शब में खिलता है चमन
शबनम से सींचा कीजिये |

देखिये होता है कैसा
दरिया के पानी का
उजास
आंसुओं के संग ख़ुद को,
बहने से रोका कीजिये | ..


Rock on
Jit
 
Read this simple yet elegant positive poem in newspaper, found it worth posting, njoy! :)


जिंदगी - अश्विनी बग्गा

जिंदगी की उलझनों से यूँ
ना तौबा कीजिये
दिन गुजर जाते हैं,
कोई शौक पैदा कीजिये |

कैद रखी हसरतें अब
साँस लेने दीजिये
गुल हैं तितली के लिए,
काँटों को रोंदा कीजिये |

चंद लम्हा बैठ कर ख्वाहिश
ये पुरी कीजिये
जख्म क्या है, दर्द क्या है,
ये ना सोचा कीजिये |

बागबां से पूछिये, इस
गुलिस्तां की बहार,
शब में खिलता है चमन
शबनम से सींचा कीजिये |

देखिये होता है कैसा
दरिया के पानी का
उजास
आंसुओं के संग ख़ुद को,
बहने से रोका कीजिये | ..


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Jit
Very nice poem Mr. Jeet.
:)
 
Solitude! ... word itself is self-explanatory; sometimes its ur friend n sometimes u just run away from it!! This wonderful deep poem by Ritu describes mystic behaviour of Solitude very well.. :)


अकेलापन - ऋतु पल्लवी

एक दिन जब बहुत अलसाने के बाद आँखे खोली,
खिड़की से झरते हल्के प्रकाश को बुझ जाते देखा
एक छोटे बच्चे से नन्हें सूरज को आते-जाते देखा
नीचे झाँककर देखा हँसते-खिलखिलाते,
लड़ते-झगड़ते पड़ोस के बच्चे
प्रातः के बोझ को ढ़ोते पाँवों की भीड़
पर स्वर एक भी सुनाई नहीं पड़ा
या यों कहूँ कि सुन नहीं सका।
कमरे में बिखरी चीज़ों को समेटने में लग गया
चादर, पलंग, तस्वीरें, किताबें
सब अपनी-अपनी जगह ठीक करके, सुने हुए रिकॉर्ड को पुनः सुना
मन को न भटकने देने के लिए
रैक से एक-एक किताब को चुना
इस साथी के साथ कुछ समय बिताकर
पहली बार निस्संगता का भाव जगा
ध्यान रहे-सबसे विश्वसनीय साथी ही,
साथ न होने का अहसास जगाते हैं।
दिन गुज़रता रहा और अपना अस्तित्व फैलाता रहा
पाखियों के शोर में भी शाम नीरव लगी
मन जागकर कुछ खोजता था -
ढलती शाम में सुबह का नयापन!
आस तो कभी टूटती नहीं है
सब डूब जाता है तब भी नहीं।
मन में आशा थी उससे दूर जाने की
उस एकाकीपन के साम्राज्य से स्वयं को बचाने की
में निस्संग था, पर एकाकी नहीं
मेरा अकेलापन मेरे साथ था!
दिन के हर उस क्षण में, जब मैं
प्रकृति में,लोगों में, किताबों में
अपनी, केवल अपनी इयत्ता खोजता था।
और उसने कहा-
तुम चाहकर भी मुझसे अलग नहीं हो सकते,
मत होओ-क्योंकि तुम्हारा वास्तविक स्वरूप
केवल मैं ही पहचानता हूँ।
यहाँ सब भटकते हैं स्वयं को खोजने के लिए,
अपने अस्तित्व की अर्थवत्ता जानने के लिए,
और मैं तुम्हारी उसी अर्थवत्ता की पहचान हूँ।
संसार की भीड़ में तुम मुझे ही भूल जाते हो
इसलिए अपना प्रभाव जताने के लिए,
मुझे आना पड़ता है,
मानव को उसके मूल तक ले जाना पड़ता है।
...और अब मेरे आस-पास घर,बच्चे, किताबें
लोग, दिन, समय कुछ भी नहीं था
केवल दूर-दूर तक फैला अकेलापन था।...

Rock on
Jit
 
Story of a Solitary person,...Perfectly presented by this wonderful deep touching creation by Great Gulzar!! :)


ज़िन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा - गुलज़ार


ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफिला साथ और सफर तन्हा

अपने साये से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस कदर तन्हा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर न जाने गए किधर तन्हा ...



Rock on
Jit
 
यात्रा और यात्री

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
चल रहा है तारकों का
दल गगन में गीत गाता
चल रहा आकाश भी है
शून्य में भ्रमता-भ्रमाता
पाँव के नीचे पड़ी
अचला नहीं, यह चंचला है
एक कण भी, एक क्षण भी
एक थल पर टिक न पाता
शक्तियाँ गति की तुझे
सब ओर से घेरे हुए है
स्थान से अपने तुझे
टलना पड़ेगा ही, मुसाफिर!
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
थे जहाँ पर गर्त पैरों
को ज़माना ही पड़ा था
पत्थरों से पाँव के
छाले छिलाना ही पड़ा था
घास मखमल-सी जहाँ थी
मन गया था लोट सहसा
थी घनी छाया जहाँ पर
तन जुड़ाना ही पड़ा था
पग परीक्षा, पग प्रलोभन
ज़ोर-कमज़ोरी भरा तू
इस तरफ डटना उधर
ढलना पड़ेगा ही, मुसाफिर
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
शूल कुछ ऐसे, पगो में
चेतना की स्फूर्ति भरते
तेज़ चलने को विवश
करते, हमेशा जबकि गड़ते
शुक्रिया उनका कि वे
पथ को रहे प्रेरक बनाए
किन्तु कुछ ऐसे कि रुकने
के लिए मजबूर करते
और जो उत्साह का
देते कलेजा चीर, ऐसे
कंटकों का दल तुझे
दलना पड़ेगा ही, मुसाफिर
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
सूर्य ने हँसना भुलाया,
चंद्रमा ने मुस्कुराना
और भूली यामिनी भी
तारिकाओं को जगाना
एक झोंके ने बुझाया
हाथ का भी दीप लेकिन
मत बना इसको पथिक तू
बैठ जाने का बहाना
एक कोने में हृदय के
आग तेरे जग रही है,
देखने को मग तुझे
जलना पड़ेगा ही, मुसाफिर
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
वह कठिन पथ और कब
उसकी मुसीबत भूलती है
साँस उसकी याद करके
भी अभी तक फूलती है
यह मनुज की वीरता है
या कि उसकी बेहयाई
साथ ही आशा सुखों का
स्वप्न लेकर झूलती है
सत्य सुधियाँ, झूठ शायद
स्वप्न, पर चलना अगर है
झूठ से सच को तुझे
छलना पड़ेगा ही, मुसाफिर
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!



- हरिवंश राय बच्चन
 
मकान

आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी ।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी ।

ये जमीन तब भी निगल लेने पे आमादा थी
पाँव जब टूटी शाखों से उतारे हम ने ।
इन मकानों को खबर है ना मकीनों को खबर
उन दिनों की जो गुफाओ मे गुजारे हम ने ।

हाथ ढलते गये सांचे में तो थकते कैसे
नक्श के बाद नये नक्श निखारे हम ने ।
कि ये दीवार बुलंद, और बुलंद, और बुलंद,
बाम-ओ-दर और जरा, और सँवारा हम ने ।

आँधियाँ तोड़ लिया करती थी शामों की लौं
जड़ दिये इस लिये बिजली के सितारे हम ने ।
बन गया कसर तो पहरे पे कोई बैठ गया
सो रहे खाक पे हम शोरिश-ऐ-तामिर लिये ।

अपनी नस-नस में लिये मेहनत-ऐ-पेयाम की थकान
बंद आंखों में इसी कसर की तसवीर लिये ।
दिन पिघलाता है इसी तरह सारों पर अब तक
रात आंखों में खटकतीं है स्याह तीर लिये ।

आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी ।
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी ।



- कैफी आजमी
 
और भी दूँ



मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ

मॉं तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजाकर भाल में जब भी
कर दया स्वीकार लेना यह समर्पण

गान अर्पित, प्राण अर्पित
रक्त का कण-कण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ

मॉंज दो तलवार को, लाओ न देरी
बॉंध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी
शीश पर आशीष की छाया धनेरी

स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ

तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो
गॉंव मेरी, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो
और बाऍं हाथ में ध्*वज को थमा दो

सुमन अर्पित, चमन अर्पित
नीड़ का तृण-तृण समर्पित
चहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ



- रामावतार त्यागी
 
Hi Anjali, I posted this poem already, see post no #337 :)

Btw, rest are gud findings ... keep contributing..

Rock on
Jit



साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
.

.

- हरिवंश राय बच्चन
 
कवि: माखनलाल चतुर्वेदी
~*~*~*~*~*~*~*~
कैसी है पहिचान तुम्हारी
राह भूलने पर मिलते हो !


पथरा चलीं पुतलियाँ, मैंने
विविध धुनों में कितना गाया
दायें-बायें, ऊपर-नीचे
दूर-पास तुमको कब पाया


धन्य-कुसुम ! पाषाणों पर ही
तुम खिलते हो तो खिलते हो।

कैसी है पहिचान तुम्हारी
राह भूलने पर मिलते हो!!


किरणों प्रकट हुए, सूरज के
सौ रहस्य तुम खोल उठे से
किन्तु अँतड़ियों में गरीब की
कुम्हलाये स्वर बोल उठे से !


काँच-कलेजे में भी कस्र्णा-
के डोरे ही से खिलते हो।
कैसी है पहिचान तुम्हारी
राह भूलने पर मिलते हो।।

प्रणय और पुस्र्षार्थ तुम्हारा
मनमोहिनी धरा के बल हैं
दिवस-रात्रि, बीहड़-बस्ती सब
तेरी ही छाया के छल हैं।


प्राण, कौन से स्वप्न दिख गये
जो बलि के फूलों खिलते हो।
कैसी है पहिचान तुम्हारी
राह भूलने पर मिलते हो।।
 
Too Sweet

प्रतीक्षा -- बच्चन ​
मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?

मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीण पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आने वाले,
पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले,
साँसें घूमघूम फिरफिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं,
मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता?

उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले,
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपने होश सम्हाले,
तारों की महफिल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से,
मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता?

बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती,
रगरग में चेतनता घुलकर, आँसू के कणसी झर जाती,
नमक डलीसा गल अपनापन, सागर में घुलमिलसा जाता,
अपनी बाँहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता?

​
 
one more from Bachhan

कहते हैं तारे गाते हैं - बच्चन​
कहते हैं तारे गाते हैं!
सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं!
कहते हैं तारे गाते हैं!

स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथिवी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैं!
कहते हैं तारे गाते हैं!

ऊपर देव तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं।
कहते हैं तारे गाते हैं!

​
 
Keep Walkin' ... This should always be mantra of Life; this wonderful inspirin poem by Great Poet Shivmangal Singh Suman describes it beautifully !! .. :) One of my all time fav!!..


चलना हमारा काम है - शिवमंगल सिंह सुमन

गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर दर खडा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पडा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है ।

कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ, तुम मिल गई
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ,
राही हमारा नाम है,
चलना हमारा काम है ।

जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी
आशा निराशा से घिरा,
हँसता कभी रोता कभी
गति-मति न हो अवरूद्ध,
इसका ध्यान आठो याम है,
चलना हमारा काम है ।

इस विशद विश्व-प्रहार में
किसको नहीं बहना पडा
सुख-दुख हमारी ही तरह,
किसको नहीं सहना पडा
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ,
मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है ।

मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोडा अटकता ही रहा
निराशा क्यों मुझे?
जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है ।

साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
गति न जीवन की रूकी
जो गिर गए सो गिर गए
रहे हर दम,
उसी की सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है ।

फकत यह जानता
जो मिट गया वह जी गया
मूंदकर पलकें सहज
दो घूँट हँसकर पी गया
सुधा-मिक्ष्रित गरल,
वह साकिया का जाम है,
चलना हमारा काम है ।

Rock on
Jit
 
Last edited:
Very nice poem, Ms Rama ji !! :)

कवि: माखनलाल चतुर्वेदी[/COLOR][/URL]
~*~*~*~*~*~*~*~
कैसी है पहिचान तुम्हारी
राह भूलने पर मिलते हो !


पथरा चलीं पुतलियाँ, मैंने
विविध धुनों में कितना गाया
दायें-बायें, ऊपर-नीचे
दूर-पास तुमको कब पाया
.
.
.
प्राण, कौन से स्वप्न दिख गये
जो बलि के फूलों खिलते हो।
कैसी है पहिचान तुम्हारी
राह भूलने पर मिलते हो।।
 
Retrosepction of Life!, that what we often do when we site idle, alone and talk to ourselves ... This classy deep touchin' poem by Shivmangal Singh Suman depicts in a really beautiful way, Awesome !! :)


बात की बात - शिवमंगल सिंह सुमन

इस जीवन में बैठे ठाले
ऐसे भी क्षण आ जाते हैं
जब हम अपने से ही अपनी-
बीती कहने लग जाते हैं।

तन खोया-खोया-सा लगता
मन उर्वर-सा हो जाता है
कुछ खोया-सा मिल जाता है
कुछ मिला हुआ खो जाता है।

लगता; सुख-दुख की स्मृतियों के
कुछ बिखरे तार बुना डालूँ
यों ही सूने में अंतर के
कुछ भाव-अभाव सुना डालूँ

कवि की अपनी सीमाऍं है
कहता जितना कह पाता है
कितना भी कह डाले, लेकिन-
अनकहा अधिक रह जाता है

यों ही चलते-फिरते मन में
बेचैनी सी क्यों उठती है?
बसती बस्ती के बीच सदा
सपनों की दुनिया लुटती है

जो भी आया था जीवन में
यदि चला गया तो रोना क्या?
ढलती दुनिया के दानों में
सुधियों के तार पिरोना क्या?

जीवन में काम हजारों हैं
मन रम जाए तो क्या कहना!
दौड़-धूप के बीच एक-
क्षण, थम जाए तो क्या कहना!

कुछ खाली खाली होगा ही
जिसमें निश्वास समाया था
उससे ही सारा झगड़ा है
जिसने विश्वास चुराया था

फिर भी सूनापन साथ रहा
तो गति दूनी करनी होगी
साँचे के तीव्र-विवर्त्तन से
मन की पूनी भरनी होगी

जो भी अभाव भरना होगा
चलते-चलते भर जाएगा
पथ में गुनने बैठूँगा तो
जीना दूभर हो जाएगा।


Rock on
Jit
 
Last edited:
Kisan is no doubt the biggest never-say-die Warrior & Karam-Yogi on earth cuz he always keep on fighting with Nature and after keep on loosing and loosing but still he refuse to give up!

Jats always excel in basically 2 fileds: Agriculture & Army! :cool:

Nyways, this beautiful poem by Mathilicharan Gupt describes greatness of a Farmer in a touching way ... indeed an awesome poem! :)

किसान - मैथिलीशरण गुप्त

हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है
हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे कहाँ
आता महाजन के यहाँ वहा अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है कांपना हेमंत में

बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा
है चल रहा सन सन पवन, तन से पसीना बह रहा
देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस अर्चि में, वे निज शरीर जला रहे

घनघोर वर्षा हो रही, गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा
तो भी कृषक मैदान में निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्राम हैं

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है
और शीत कैसा पड़ रहा, थरथराता गात है
तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते

सम्प्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है
है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है
मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
शशी सूर्य है फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है !..


Rock on
Jit
 
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