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kaise keh dun k mera ram-rahmaan hai alag

Logone diya hai tumhe bahut nam alag,
Sab kahte hai mera hai bhagwan alag,
Wo kahte hai mera hai RAHMAAN alag,
Ye kahte hai mera hai RAM alag…!!!!!


Ek ne sazda kiya , ek ne jhukaya sar alag
Unka kahna hai unka hai darbaar alag,
Dono ka hai rasta ek, par bandgi hai alag
Ek hi hai bhagwan wo hi khuda na koi alag..!!!!

RAM ke bina kaise ho RAMZAAN alag,
ALI se na ho kabhi Diw- Ali alag
Log kaise kahte hai ki mera hai bhagwan alag
Mera hai kahna wahi RAM, wahi RAHMAN
Ek hi hai wo sirf hai uske nam alag..!!!!!!
 
A beautiful poem that describes Mechanized Life in today's arena, thought provoking indeed ! :) ..


थक गया हर शब्द - डॉ. तारादत्त निर्विरोध

थक गया हर शब्द
अपनी यात्रा में,
आँकड़ों को जोड़ता दिन
दफ़्तरों तक रह गया।

मन किसी अंधे कुएँ में
खोजने को जल
काग़ज़ों में फिर गया दब,
कलम का सूरज
जला दिन भर
मगर है डूबने को अब।
एक क्षण कोई अबोली साँझ के
कान में यह बात आकर कह गया,
एक पूरा दिन, दफ़्तरों तक रह गया।

सुख नहीं लौटा
अभी तक काम से,
त्रासदी की देख गतिविधियाँ
बहुत चिढ़ है आदमी को
आदमी के नाम से।
एक उजली आस्था का भ्रम
फिर किसी दीवार जैसा ढह गया,
एक लंबी देह वाला दिन
दफ़्तरों तक रह गया।


Rock on
Jit
 
One nice poem that describes paradox of today's choked Life very well ! :)

बहुत घुटन है - राधेश्याम बंधु

बहुत घुटन है, बन्द घरों में,
खुली हवा तो आने दो,
संशय की खिड़कियाँ खोल दो,
किरनों को मुस्काने दो!

ऊँचे-ऊँचे भवन उठ रहे,
पर आँगन का नाम नहीं,
चमक-दमक, आपा-धापी है,
पर जीवन का नाम नहीं!
लौट न जाए सूर्य द्वार से,
नया संदेशा लाने दो!
बहुत घुटन है...

हर माँ अपना राम जोहती,
कटता क्यों बनवास नहीं?
मेहनत की सीता भी भूखी,
रुकता क्यों उपवास नहीं?
बाबा की सूनी आँखों में
चुभता तिमिर भगाने दो,
बहुत घुटन है...

हर उदास राखी गुहारती,
भाई का वह प्यार कहाँ?
डरे-डरे रिश्ते भी कहते
अपनों का संसार कहाँ?
गुमसुम गलियों में मिलनों की,
खुशबू तो बिखराने दो,
बहुत घुटन है, बन्द घरों में,
खुली हवा तो आने दो!


Rock on
Jit
 
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Laughter they say is the best medicine. After all life is so temporary and brooding on perceived losses serves no particular purpose. Fortunate are those of us who retain their ability to laugh off the adversities. Here is a description of such a heartfelt laughter by Kusum Sinha. I especially like the last three lines. Rajiv Krishna Saxena


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Kousish Karne Walon Ki Haar Nahi Hoti

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वाश रगों मे साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिन्धु मे गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोंती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में.
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है , इसे स्वीकार करो ,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो .

जब तक ना सफल हो , नींद चैन को त्यागो तुम ,
संघर्ष का मैदान छोड़कर मत भागो तुम.
कुछ किए बिना ही जय जयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती


-----By Harivansh Rai Bachchan
 
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Mahadevi Verma

Mai neer bhari dukh ki badli

Spandan mey chir nispand basa,

Krandan mey aahat vishva hansa,

Nayno mey deepak se jalte,

Palko mey nirjharini machli

Mai neer bhari dukhi ki badli............

 
माँ अपने बच्चे से ....

उठो लाल अब आँखें खोलो
पानी लायी हूँ, मुँह धोलो


बीती रात कमल -दल फूले
उनके ऊपर भँवरे झूले


चिडिया चहक उठी पेडो पर
बहने लगी हवा अति सुन्दर


भोर हुई सूरज उग आया
नभ में हुई सुनहरी काया


आसमान में छाई लाली
हवा बही सुख देने वाली


नन्ही -नन्ही किरणें आएँ
फूल हँसे कलियाँ मुस्काएँ


इतना सुन्दर समय ना खोओं
मेरे प्यारे अब मत सोओं



अयोध्या सिंह 'उपद्याय'
 
नीधि जी आपके लिए पूरी कविता ...

mai neer bhari dukh ki badli


मैं नीर भरी दुःख की बदली !
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनो में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झनी मचली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !


मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वांसों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !


मैं क्षितिज भृकुटी पर घिर धूमिल,
चिंता का भर बनी अविरल,
रज कण पर जल कण हो बरसी,
नव जीवन अंकुर बन निकली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !


पथ न मलिन करते आना
पद चिन्ह न दे जाते आना
सुधि मेरे आगम की जग में
सुख की सिहरन हो अंत खिली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !


विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
परिचय इतना इतिहास यही
उमटी कल थी मिट आज चली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

कवियत्री : सुश्री महादेवी वर्मा
 
Amma ne khat likha chaav se.....

Amma ne khat likha chaav se,

Putra marey, na dhoodh lajaana !

Ek inch peechey mat hatna,

chahe inch inch kat jana !!
 
तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या

तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या
तारक में छवि, प्राणों में स्मृति
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संसृति
भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या!
तेरा मुख सहास अरुणोदय
परछाई रजनी विषादमय
वह जागृति वह नींद स्वप्नमय
खेलखेल थकथक सोने दे
मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या!
तेरा अधर विचुंबित प्याला
तेरी ही स्मित मिश्रित हाला,
तेरा ही मानस मधुशाला
फिर पूछूँ क्या मेरे साकी
देते हो मधुमय विषमय क्या!
रोमरोम में नंदन पुलकित
साँससाँस में जीवन शतशत
स्वप्न स्वप्न में विश्व अपरिचित
मुझमें नित बनते मिटते प्रिय
स्वर्ग मुझे क्या निष्क्रिय लय क्या!
हारूँ तो खोऊँ अपनापन
पाऊँ प्रियतम में निर्वासन
जीत बनूँ तेरा ही बंधन
भर लाऊँ सीपी में सागर
प्रिय मेरी अब हार विजय क्या!
चित्रित तू मैं हूँ रेखाक्रम
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम
काया छाया में रहस्यमय
प्रेयसि प्रियतम का अभिनय क्या!
तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या
 
Star-Gazing is one mystic activity that is associated with many moods & feelings like sometimes it makes u wonder about infinite space, sometimes leaves nostaligic, sometimes its only way to pass time in a lonely sleepless night!

Well, a beautiful deep touching poem that describes beauty of star-gazing with moving train, one deep philosophical msg about life to ponder upon ... :)


रेलगाड़ी में - पूर्णिमा वर्मन

साथ-साथ
चलते थे तारे
गाँव छूटते जाते थे पीछे

अगल– बगल सब
साथ तो थे पर
सोते ढीले

टिकी रहीं आँखें तारों पर
पैरों तले
ज़मीन निकलती रही
अजाने. . .


Rock on
Jit
 
Enough of Lip Service, Its time for Action, Revolution what that required..!!
This poem full of zeal gives the message !! .. :)


भाषणों से युग बदलने का नहीं - अनुराग रंजन

कुछ नई हिम्मत से रचना कर दिखाओ,
भाषणों से युग बदलने का नहीं|
बेबसी का पाश है जब तक नियंता,
पश्चना का दैत्य टलने का नहीं|
भाषणों से युग बदलने का नहीं|


जब तलक हम बातें करते जा रहें,
कर्म के हित स्वांग भरते जा रहें|
हो सकी कुछ भी नहीं तब्दीलियाँ,
बेकसों के नयन झरते जा रहें|
नव-सुबह की रौशनी जब तक न निकले,
दीप से अब काम चलने का नहीं|
भाषणों से युग बदलने का नहीं|


व्याप्त अंतर्दाह है नैराश्य का,
लुट गये निज रहबरों के छद्म से|
क्षुब्ध हैं! हैवानियत से क्या करें?
बुझ चुके! नियत चल रहे प्रपंच से|
अनय को कुचले बिना कुछ भी न होगा,
सांत्वना से मन बहलने का नहीं|
भाषणों से युग बदलने का नहीं|


कागजों पर चल चुकी गाडी बहुत,
योजनाएं लग चुकीं खारी बहुत|
क्या पता कब तक चलेगा ढोंग यह,
हो चुकी है मौत से यारी बहुत|
है जहाँ पड़ती ज़रूरत ढेर की,
बूंद से जीवन संभलने का नहीं|
भाषणों से युग बदलने का नहीं|


नाच-रंग, नाटक-तमाशे हो चुके,
वायदों के गर्त में सब सो चुके|
मानवी इज्ज़त लगी है दाँव पर,
जिंदगी के ख्वाब धूमिल हो चुके|
ठोस धरती पर कदम रखे बिना,
कल्पना से हल निकलने का नहीं|
भाषणों से युग बदलने का नहीं|


Rock on
Jit
 
One more for the day from same Poet, with same josh, zeal that inspires to the core!! ...remind me of Swami Vivekanand... Youth must be filled with Josh n energy that what this poem wants to give the message!! .. :)

अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का - अनुराग रंजन

अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का,
चलो आसुओं को कफ़न से सजाने
जमी को उठाकर गगन पर बिठाने

सितारों की दूरी न दूरी रहेगी,
नहीं यह आज़ादी अधूरी रहेगी,
नये दीप को आंधिओं में जलाओ,
अंधेरा डगर है, अंधेरे शहर का
अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का

अडे हैं पहाडों के पत्थर पुराने,
लहू से नहाये हैं इनके घराने,
मगर जिन्दगी जोखिमों की कहानी,
विन्धी-कंटकों में ही खिलती जवानी,
मसल पत्थरों को सृजन रह का कर,
बदलता नहीं ऐसे रुतबा कहर का
अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का

सुलगती जवानी न चाहे जमाना,
धधकती जवानी से बदले जमाना,
जवानी तूफानों से झुकती नहीं है,
अगर बढ़ गई, तो फिर रूकती नहीं है,
चलो! देश रौशन बनाने चलो फिर,
बचे कोई सोया न प्राणी नगर का
अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का

वतन में वतन की नीलामी नहीं हो,
किसी को किसी की गुलामी नहीं हो,
नहीं पेट की आग अस्मत उधारे,
नहीं दर्द का राग कोई पुकारे,
बहो! ऐ हवाओं! फिजा मुस्कुराए,
नहीं कोई मौसम बुलाये ज़हर का
अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का ! ..


Rock on
Jit
 
अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का - अनुराग रंजन


सितारों की दूरी न दूरी रहेगी,
नहीं यह आज़ादी अधूरी रहेगी,
नये दीप को आंधिओं में जलाओ,
अंधेरा डगर है, अंधेरे शहर का
अभी है सवेरा तुम्हारे सफ़र का

Very nice Jit.
 
Well, Sometimes you can't just express the very feelings in the words & language, You just fall short of the right words to convey; this excellent poem describes it really well. Just feel the poem it touches deep inside n will leave u breathless !! :)

जो शाब्दिक भी नहीं, भाषिक भी नहीं - अनुराग रंजन

अनायास एक बंधन की सीमा,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

ह्रदय अधरों के उर्ध्वाधर संबोधन से,
संबोधित करती,
कहीं दूर, बहुत दूर,
जाते हुए राही को|
दूर-दूर तक सन्नाटा-विराना,
सिमटती सासों में खामोशी,
खामोशिओं को चीरती बंधन की सीमा,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

स्थिरता भंग करती तरंगें,
किनारों तक जाते-जाते,
ख़त्म हो जातीं,
तरंगों से न जाने कब-कैसे,
कटते चले जाते, मिटते चले जाते,
पता ही नहीं चलता,
किनारों का विस्मय,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

यादों की चंद लड़ियों में,
उलझा अतीत|
यादें जो साथ होती हैं,
जब तुम साथ नहीं होती|
लटों में छुपा,
खिलखिलाता चेहरा,
करता अंधेरे का श्रृंगार|
आखों में तैरती तुम्हारी छाया,
दीवारों से बातों का सिलसिला,
एक कहानी जो आसमां की तरह,
तुम्हारे बीच का फासला जीवंत करता,
टूटने से पहले,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

न जाने कितने रहस्यों का आयाम,
पलकों को भिगोतीं,
फिर भी होठों पर सूखी लकीर,
क्षितिज में डूबता सूरज,
कहने को बहुत कुछ,
पर वक़्त उतना ही कम|
आँखों ने जब देखा,
सरकती सी धुप,
उढ़ता आँचल,
बिखरते गेसूं,
गुजरता मंज़र,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

दरख्त की टहनियां,
उदास सी हुई,
पत्तों ने भी पतझड़ में,
उनका साथ न दिया|
हालतें ही ऐसी रहीं,
उन्होंने सब कुछ लौटा दिया,
जो मुझसे लिया था|
पर शायद वो भूल गये,
क्या-कुछ हमने उन्हें दिया था|
इंतजार की हद,
आज भी मेरी जहन में,
जीने के इशारों पर,
क़यामत के किनारों पर|
नजरें आज भी ढूढ़ती हैं,
तुम्हारे हर पहलु को,
जिसमें महसूस करता हूँ,
अपने आपको,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

Rock on
Jit
 
cooljat said:
अनायास एक बंधन की सीमा,
जो शाब्दिक भी नहीं!
भाषिक भी नहीं!

यादों की चंद लड़ियों में,
उलझा अतीत|
यादें जो साथ होती हैं,
जब तुम साथ नहीं होती|

दरख्त की टहनियां,
उदास सी हुई,
पत्तों ने भी पतझड़ में,
उनका साथ न दिया
cooljat said:


Very nice poem..n these lines are superb.. very meaningful.
 
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