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New Year

छेड़ ऐसी ग़ज़ल इस नए साल में
झूमे मन का कंवल इस नए साल में

कोई ग़मगीन माहौल क्यों हो भला
हर तरफ़ हो चहल इस नए साल में

गिर न पाए कभी है यही आरज़ू
हसरतों का महल इस नए साल में

याद आए सदा कारनामा तेरा
मुश्किलें कर सहल इस नए साल में

नेकियों की तेरी यूँ कमी तो नहीं
हर बदी से निकल इस नए साल में

पहले खुद को बदल कर दिखा हमसफ़र
फिर जग को बदल इस नए साल में

रोज इतना ही काफ़ी है तेरे लिए
मुस्करा पल दो पल इस नए साल में
 
Best Wishes on New Year

As the year 2008 is about to over and again a brand new year is approaching with brand new hopes, dreams, aspirations etc ... just wanna wish all of the JL members a very Happy and Prosperous 2009 with this beautiful poem ! :)


फिर आया है नया साल - मानोशी चैटर्जी

सर्द रातों की एक हवा जागी
और बर्फ़ की चादर ओढ़
सुबह के दरवाज़े पर दस्तक दी उसने
उनींदी आँखों से सुबह की अंगड़ाई में भीगी ज़मीन से ज्यों फूटा
एक नया कोपल
नए जीवन और नई उमंग
नई खुशियों के संग
दफ़ना कर कई काली रातों को
झिलमिलाते किरनों में भीगता
नई आशाओं की छाँव में
नए सपनों का संसार बसाने
बर्फ़ीली रात की अंगड़ाई के साथ
बसंत के आने की उम्मीद लिए
आज सब पीछे छोड़
चला वो अपनाने नए आकाश को
नए सुबह की नई धूप में
नई आशाओं की नई किरन के संग
आज फिर आया है नया साल
पीछे छोड़ जाने को परछाइयाँ .


'नववर्ष के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनायें !!'


Rock on
Jit
 
Last edited:
नए साल की हार्दिक शुभकामनायों के साथ



naya_saal.gif
 
ek aanshu bhi na kar bekar...

एक भी आँसू न कर बेकार
जाने कब समंदर मांगने आ जाए!

पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है
यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है
और जिस के पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है

कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार
जाने देवता को कौनसा भा जाय!

चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण
किन्तु आकृतियाँ कभी टूटी नहीं हैं
आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ
पर समस्यायें कभी रूठी नहीं हैं

हर छलकते अश्रु को कर प्यार
जाने आत्मा को कौन सा नहला जाय!

व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की
काम अपने पाँव ही आते सफर में
वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा
जो स्वयं गिर जाय अपनी ही नज़र में

हर लहर का कर प्रणय स्वीकार
जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए!
 
moko kaha dhoondhe re re bande

मोको कहां ढूढे रे बन्दे
मैं तो तेरे पास में

ना तीर्थ मे ना मूर्त में
ना एकान्त निवास में
ना मंदिर में ना मस्जिद में
ना काबे कैलास में

मैं तो तेरे पास में बन्दे
मैं तो तेरे पास में

ना मैं जप में ना मैं तप में
ना मैं बरत उपास में
ना मैं किर्या कर्म में रहता
नहिं जोग सन्यास में
नहिं प्राण में नहिं पिंड में
ना ब्रह्याण्ड आकाश में
ना मैं प्रकति प्रवार गुफा में
नहिं स्वांसों की स्वांस में

खोजि होए तुरत मिल जाउं
इक पल की तालाश में
कहत कबीर सुनो भई साधो
मैं तो हूँ विश्वास में
 
Gulzar special----Mujhko bhi tarkeeb sikha de yaar julahe....

मुझको भी तरकीब सिखा यार जुलाहे
अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोइ तागा टुट गया या खत्म हुआ
फिर से बांध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमे
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गांठ गिराह बुन्तर की
देख नहीं सकता कोई

मैनें तो ईक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिराहे
साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे
मुझको भी तरकीब सिखा यार जुलाहे
 
मेरे घर भी कभी आओ अल्लाह मियां ....!!!!!!!!!!!!!

नीले गगन पर बैठे कब तक चाँद सितारों से झांकोगे
पर्वत की ऊंची चोटी से कब तक दुनिया को देखोगे
कब तक दुनिया और आदर्शों के ग्रंथों में आराम करोगे
मेरा छापर टपक रहा है बन कर सूरज इसे सूखाओ
खली है आटे का कनस्टर, बन कर गेंहू इसमे आओ
और टूट गया है माँ का चश्मा, बन कर शीशा इसे बनाओ
गुमसुम है आँगन में बच्चे, बन कर गेंद इन्हे बहलाओ
शाम हुई,चाँद उग आया..हवा चलाओ...हाथ बटाओ अल्लाह मियां
मेरे घर भी कभी आओ अल्लाह मियां ....!!!!!!!!!!!!!
 
लीक तोड़ी तो चल नहीं पाए,
लोग, रस्ते बदल नहीं पाए।

उसने रातों में जुगनुओं की तरह,
भय से उन्मुक्त पल नहीं पाए।

सोच में थी कहीं कमी कोई,
दुःख से बाहर निकल नहीं पाए।

तुम समझते रहे जिन्हें उर्वर,
फूल के बाद, फल नहीं पाए।

हमने सत्ता के साथ मिल कर भी,
हर समस्या के हल नहीं पाए।

एक बच्चे को शक्ल मिल जाती,
भ्रूण साँचे में ढल नहीं पाए।

सूर्य की कोशिशें हुईं नाकाम,
हिम के पर्वत पिघल नहीं पाए।
 
क्या पता था कि किस्सा बदल जाएगा,
घर के लोगों से रिश्ता बदल जाएगा।

हाथ से मुँह के अंदर पहुँचने के बाद,
एक पल में बताशा बदल जाएगा।

दो दशक बाद अपने ही घर लौट कर,
कुछ न कुछ घर का नक्शा बदल जाएगा।

वो बदलता है अपना नज़रिया अगर,
सोचने का तरीका बदल जाएगा।

चश्मदीदों की निर्भय गवाही के बाद।
खुद-ब-खुद ये मुकदमा बदल जाएगा।

लौट आया जो पिंजरे में थक-हार कर,
अब वो बागी परिंदा बदल जाएगा।

घर के अंदर दिया बालते साथ ही,
घुप अंधेरे का चेहरा बदल जाएगा।
 
सबकी आँखों में नीर छोड़ गए।
जाने वाले शरीर छोड़ गए।

राह भी याद रख नहीं पाई
क्या... कहाँ राहगीर छोड़ गए?

लग रहे हैं सही निशाने पर,
वो जो व्यंगों के तीर छोड़ गए।

एक रुपया दिया था दाता ने,
सौ दुआएँ फकीर छोड़ गए।

उस पे कब्ज़ा है काले नागों का,
दान जो दान-वीर छोड़ गए।

हम विरासत न रख सके कायम,
जो विरासत 'कबीर' छोड़ गए।
 
'Hope' is a big word and very Imp too, a nice n easy poem to ponder upon. :)


कोई आशा - रवींद्र स्वप्निल प्रजापति

मैं रात का मुसाफिर हूँ
मेरा सफ़र रात का सफ़र
तू आती है बनती है किरण

गुज़रती है आधी रात
तू सितारे की चमक बन कर
वक्त के चेहरे में नज़र आती है

मेरे सफ़र में उतरती है
जैसे उतरती है धरती पर सुबह की धूप
दिन तू तारे के पास से गुज़ारती है
जैसे ज़िंदगी स्वर्ग जाती है फिर जन्म लेने

संसार का शोर भरा दिन गुज़रता है
तू सूरज की किरणों में छुप कर देखती है
मेरे दुखों को, मेरे सुखों को

मैं सफ़र शुरू करता हूँ
तू फिर आती है फिर बनती है किरण


Rock on
Jit

 
आभार

if there is any poem suitable to retirement party, please share.​


यह कविता उन सब के प्रति आभार की अभिव्यक्ति है , जिन लोगो ने जीवन की राह पर उनका साथ बड़े ही स्नेह और आदर के साथ दिया है. इस विदाई की घड़ी पर उन सब से दूर होने का गम भी छुपा हुआ है. .


जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।



जीवन अस्थिर अनजाने ही
हो जाता पथ पर मेल कहीं
सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल
तय कर लेना कुछ खेल नहीं



दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते
सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।



साँसों पर अवलम्बित काया
जब चलते-चलते चूर हुई
दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली
नव स्फूर्ति थकावट दूर हुई



पथ के पहचाने छूट गए
पर साथ-साथ चल रही याद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।



जो साथ न मेरा दे पाए
उनसे कब सूनी हुई डगर
मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या
राही मर लेकिन राह अमर



इस पथ पर वे ही चलते हैं
जो चलने का पा गए स्वाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।



कैसे चल पाता यदि न मिला
होता मुझको आकुल-अन्तर
कैसे चल पाता यदि मिलते
चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर



आभारी हूँ मैं उन सबका
दे गए व्यथा का जो प्रसाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।



"शिवमंगल सिंह 'सुमन'
 
Thank you !

Yogendra Singh Ji thank you very much. It is realy a nice poem.
यह कविता उन सब के प्रति आभार की अभिव्यक्ति है , जिन लोगो ने जीवन की राह पर उनका साथ बड़े ही स्नेह और आदर के साथ दिया है. इस विदाई की घड़ी पर उन सब से दूर होने का गम भी छुपा हुआ है. .


जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।



जीवन अस्थिर अनजाने ही
हो जाता पथ पर मेल कहीं
सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल
तय कर लेना कुछ खेल नहीं



दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते
सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।



साँसों पर अवलम्बित काया
जब चलते-चलते चूर हुई
दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली
नव स्फूर्ति थकावट दूर हुई



पथ के पहचाने छूट गए
पर साथ-साथ चल रही याद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।



जो साथ न मेरा दे पाए
उनसे कब सूनी हुई डगर
मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या
राही मर लेकिन राह अमर



इस पथ पर वे ही चलते हैं
जो चलने का पा गए स्वाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।



कैसे चल पाता यदि न मिला
होता मुझको आकुल-अन्तर
कैसे चल पाता यदि मिलते
चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर



आभारी हूँ मैं उन सबका
दे गए व्यथा का जो प्रसाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद ।



"शिवमंगल सिंह 'सुमन'
 
दिल में राज़ दफ़न रखता है
उँगली में धड़कन रखता है।
पूछो मत तासीर जुनूँ की
सिर पर बाँध कफ़न रखता है।
वह मड़ई का राजकुँवर हैं
धारदार उसके सपने भी
देवदारु-सा पौरुष उसका
जलते हैं उससे अपने भी

दिखता भले शिला-सा शीतल
उर में तेज़ अगन रखता है।

वह खंडहर की मूरत, जलता
आँधी में दीप सरीखा
कंगन-कुंकुम बनकर उसने
शमशानों में पलना सीखा

पग में नृत्य प्रलय का, कर में
नूतन विश्व-सृजन रखता है।

वह उठता धरती से जैसे
अंकुर फूटा हो भूतल से
वह गिरता भी तो जैसे
आशीष बरसता गगनांचल से

सूरज-चाँद उसी के, मुट्ठी में
उनचास पवन रखता है।
 
तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है
सचमुच आज काट दी हमने
जंजीरें स्वदेश के तन की
बदल दिया इतिहास बदल दी
चाल समय की चाल पवन की

देख रहा है राम राज्य का
स्वप्न आज साकेत हमारा
खूनी कफन ओढ़ लेती है
लाश मगर दशरथ के प्रण की

मानव तो हो गया आज
आज़ाद दासता बंधन से पर
मज़हब के पोथों से ईश्वर का जीवन आज़ाद नहीं है।
तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है।

हम शोणित से सींच देश के
पतझर में बहार ले आए
खाद बना अपने तन की-
हमने नवयुग के फूल खिलाए

डाल डाल में हमने ही तो
अपनी बाहों का बल डाला
पात-पात पर हमने ही तो
श्रम जल के मोती बिखराए

कैद कफस सय्याद सभी से
बुलबुल आज स्वतंत्र हमारी
ऋतुओं के बंधन से लेकिन अभी चमन आज़ाद नहीं है।
तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है।

यद्यपि कर निर्माण रहे हम
एक नई नगरी तारों में
सीमित किन्तु हमारी पूजा
मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारों में

यद्यपि कहते आज कि हम सब
एक हमारा एक देश है
गूँज रहा है किन्तु घृणा का
तार बीन की झंकारों में

गंगा जमना के पानी में
घुली मिली ज़िन्दगी हमारी
मासूमों के गरम लहू से पर दामन आज़ाद नहीं है।
तन तो आज स्वतंत्र हमारा लेकिन मन आज़ाद नहीं है।
 
One fine deep touching melancholic poem that'll for sure penetrate the core of your soul, Classic ! :)


एक सूनी नाव - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

एक सूनी नाव
तट पर लौट आई।
रोशनी राख-सी
जल में घुली, बह गई,
बन्द अधरों से कथा
सिमटी नदी कह गई,
रेत प्यासी
नयन भर लाई।
भींगते अवसाद से
हवा श्लथ हो गईं
हथेली की रेख काँपी
लहर-सी खो गई
मौन छाया
कहीं उतराई।
स्वर नहीं,
चित्र भी बहकर
गए लग कहीं,
स्याह पड़ते हुए जल में
रात खोयी-सी
उभर आई।
एक सूनी नाव
तट पर लौट आई।


Rock on
Jit
 
असिवन्त हिन्द कितना प्रचण्ड होता है !

प्रस्तुत कविता श्री रामधारी सिंह जी की तेजस्वी कलम से निकली हुई एक बहुत ही ओजस्वी कविता है.
यह कविता आज के सन्दर्भ में दुश्मनों को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए शूरवीरों को ललकार देती है.


किरिचों पर कोई नया स्वप्न ढोते हो ?
किस नयी फसल के बीज वीर ! बोते हो ?

दुर्दान्त दस्यु को सेल हूलते हैं हम;
यम की दंष्ट्रा से खेल झूलते हैं हम।
वैसे तो कोई बात नहीं कहने को,
हम टूट रहे केवल स्वतंत्र रहने को।

सामने देश माता का भव्य चरण है,
जिह्वा पर जलता हुआ एक, बस प्रण है,
काटेंगे अरि का मुण्ड कि स्वयं कटेंगे,
पीछे, परन्तु, सीमा से नहीं हटेंगे।

फूटेंगी खर निर्झरी तप्त कुण्डों से,
भर जायेगा नागराज रुण्ड-मुण्डों से।
माँगेगी जो रणचण्डी भेंट, चढ़ेगी।
लाशों पर चढ़ कर आगे फौज बढ़ेगी।

पहली आहुति है अभी, यज्ञ चलने दो,
दो हवा, देश की आज जरा जलने दो।
जब हृदय-हृदय पावक से भर जायेगा,
भारत का पूरा पाप उतर जायेगा;

देखोगे, कैसा प्रलय चण्ड होता है !
असिवन्त हिन्द कितना प्रचण्ड होता है !

बाँहों से हम अम्बुधि अगाध थाहेंगे,
धँस जायेगी यह धरा, अगर चाहेंगे।
तूफान हमारे इंगित पर ठहरेंगे,
हम जहाँ कहेंगे, मेघ वहीं घहरेंगे।

जो असुर, हमें सुर समझ, आज हँसते हैं,
वंचक श्रृगाल भूँकते, साँप डँसते हैं,
कल यही कृपा के लिए हाथ जोडेंगे,
भृकुटी विलोक दुष्टता-द्वन्द्व छोड़ेंगे।

गरजो, अम्बर की भरो रणोच्चारों से,
क्रोधान्ध रोर, हाँकों से, हुंकारों से।
यह आग मात्र सीमा की नहीं लपट है,
मूढ़ो ! स्वतंत्रता पर ही यह संकट है।

जातीय गर्व पर क्रूर प्रहार हुआ है,
माँ के किरीट पर ही यह वार हुआ है।
अब जो सिर पर आ पड़े, नहीं डरना है,
जनमे हैं तो दो बार नहीं मरना है।

कुत्सित कलंक का बोध नहीं छोड़ेंगे,
हम बिना लिये प्रतिशोध नहीं छोड़ेंगे,
अरि का विरोध-अवरोध नहीं छोड़ेंगे,
जब तक जीवित है, क्रोध नहीं छोड़ेंगे।

गरजो हिमाद्रि के शिखर, तुंग पाटों पर,
गुलमार्ग, विन्ध्य, पश्चिमी, पूर्व घाटों पर,
भारत-समुद्र की लहर, ज्वार-भाटों पर,
गरजो, गरजो मीनार और लाटों पर।

खँडहरों, भग्न कोटों में, प्राचीरों में,
जाह्नवी, नर्मदा, यमुना के तीरों में,
कृष्णा-कछार में, कावेरी-कूलों में,
चित्तौड़-सिंहगढ़ के समीप धूलों में—

सोये हैं जो रणबली, उन्हें टेरो रे !
नूतन पर अपनी शिखा प्रत्न फेरो रे !

झकझोरो, झकझोरो महान् सुप्तों को,
टेरो, टेरो चाणक्य-चन्द्रगुप्तों को;
विक्रमी तेज, असि की उद्दाम प्रभा को,
राणा प्रताप, गोविन्द, शिवा, सरजा को;

वैराग्यवीर, बन्दा फकीर भाई को,
टेरो, टेरो माता लक्ष्मीबाई को।

आजन्मा सहा जिसने न व्यंग्य थोड़ा था,
आजिज आ कर जिसने स्वदेश को छोड़ा था,
हम हाय, आज तक, जिसको गुहराते हैं,
‘नेताजी अब आते हैं, अब आते हैं;

साहसी, शूर-रस के उस मतवाले को,
टेरो, टेरो आज़ाद हिन्दवाले को।

खोजो, टीपू सुलतान कहाँ सोये हैं ?
अशफ़ाक़ और उसमान कहाँ सोये हैं ?
बमवाले वीर जवान कहाँ सोये हैं ?
वे भगतसिंह बलवान कहाँ सोये हैं ?

जा कहो, करें अब कृपा, नहीं रूठें वे,
बम उठा बाज़ के सदृश व्यग्र टूटें वे।

हम मान गये, जब क्रान्तिकाल होता है,
सारी लपटों का रंग लाल होता है।
जाग्रत पौरुष प्रज्वलित ज्वाल होता हैं,
शूरत्व नहीं कोमल, कराल होता है।
 
One more gem of a poem from poet Saxena ji, that speaks volumes itself and touches deep inside; soulful and classy indeed ! :)


सब कुछ कह लेने के बाद - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

सब कुछ कह लेने के बाद,
कुछ ऐसा है जो रह जाता है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,
वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की,
यह सारी रचना का क्रम है,
बस इतना ही मैं हूँ,
बस उतना ही मेरा आश्रय है,
तुम उसको मत वाणी देना।

यह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है,
सच्चाई है - अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,
यहा गति है - हर गति को नया जन्म देती है,
आस्था है - रेती में भी नौका खेती है,
वह टूटे मन का सामर्थ है,
यह भटकी आत्मा का अर्थ है,
तुम उनको मत वाणी देना।

वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,
वह आदी मानव की भाति है भू पर है,
बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,
इसीलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,

अन्तराल है वह - नया सूर्य उगा देती है,
नए लोक, नई सृष्टि, नए स्वप्न देती है,
वह मेरी कृति है,
पर मैं उसकी अनुकृति हूँ,
तुम उसको मत वाणी देना।


Rock on
Jit
 
समय कोई कुत्ता नहीं

फ्रंटियर न सही, ट्रिब्यून पढ़ें
कलकत्ता नहीं ढ़ाका की बात करें
आर्गेनेइजर और पंजाब केसरी की कतरने लाएँ
मुझे बताएँ
ये चीलें किधर जा रहीं हैं?
समय कोई कुत्ता नहीं
जंजीर में बाँध जहाँ चाहे खींच लें
आप कहते हैं
माओ यह कहता है, वह कहता है
मैं कहता हूँ कि माओ कौन होता है कहने वाला?
शब्द बंधक नहीं हैं
समय खुद बात करता है
पल गूंगे नहीं हैं

आप बैठें रैबल में, या
रेहड़ी से चाय पियें
सच बोलें या झूठ
कोई फरक नहीं पड़ता है
चाहे चुप की लाश भी फलाँग लें

हे हुकूमत!
अपनी पुलीस से पूछ कर बता
सींकचों के भीतर मैं कैद हूँ
या फिर सींकचों के बाहर यह सिपाही?
सच ए॰ आई॰ आर॰ की रखैल नहीं
समय कोई कुत्ता नहीं
 
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