राष्ट्र कवि श्री रामधारी सिंह दिनकर जी की पुण्य तिथि पर
देश-प्रेम और राष्ट्रीय भावना भारत में सदैव से किसी न किसी रूप में विद्यमान रही है। राष्ट्रीय या राष्ट्रवाद से केवल तात्पर्य मात्र हिन्दू राष्ट्र की कल्पना नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक स्थिति से है। राष्ट्रीय भावना का यह स्वरूप हिन्दी साहित्य के इतिहास के विभिन्न कालों में भिन्न-भिन्न रूप में प्रस्फुटित होता रहा है। इसी विचारधारा से प्रभावित हो कवियों ने राष्ट्रीय स्वर प्रदान किये, जिनमें माखनलाल चतुर्वेदी, सोहन लाल द्वविेदी एवं रामधारी सिंह दिनकर के नाम महत्वपूर्ण हैं। इन कवियों ने सम्पूर्ण भारत के प्रति आस्था, संस्कृति के प्रति निष्ठा, मानवता के प्रति आग्रह, सामन्तवाद के प्रति आक्रोश, स्वतंत्रता के लिये संकल्प, निर्माण एवं सृजन के लिये प्रेरणा तथा शोषकों के प्रति क्रांति को जन्म देकर साहित्य को एक नयी दिशा दी - जो प्रगतिवाद के सहारे अधिक विकसित हो सकी, राष्ट्रीय भावना एवं विचारधारा के प्रमुख कवियों में दिनकर का विशिष्ट स्थान रहा है।
जन्म: 30 सितंबर 1908
निधन: 24 अप्रैल 1974
सूखे विटप की सारिके !
उजड़ी-कटीली डार से
मैं देखता किस प्यार से
पहना नवल पुष्पाभरण
तृण, तरु, लता, वनराजि को
हैं जो रहे विहसित वदन
ऋतुराज मेरे द्वार से।
मुझ में जलन है प्यास है,
रस का नहीं आभास है,
यह देख हँसती वल्लरी
हँसता निखिल आकाश है।
जग तो समझता है यही,
पाषाण में कुछ रस नहीं,
पर, गिरि-हृदय में क्या न
व्याकुल निर्झरों का वास है ?
बाकी अभी रसनाद हो,
पिछली कथा कुछ याद हो,
तो कूक पंचम तान में,
संजीवनी भर गान में,
सूखे विटप की डार को
कर दे हरी करुणामयी
पढ़ दे ऋचा पीयूष की,
उग जाय फिर कोंपल नयी;
जीवन-गगन के दाह में
उड़ चल सजल नीहारिके।
सूखे विटप की सारिके !
____________________________________________________________
वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है,
वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है।
तलवार पुण्य की सखी, धर्मपालक है,
लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है।
असि छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है,
पातक प्रचण्डतम वहीं प्रकट होता है।
तलवारें सोतीं जहाँ बन्द म्यानों में,
किस्मतें वहाँ सड़ती है तहखानों में।
बलिवेदी पर बालियाँ-नथें चढ़ती हैं,
सोने की ईंटें, मगर, नहीं कढ़ती हैं।
पूछो कुबेर से, कब सुवर्ण वे देंगे ?
यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे ?
तूफान उठेगा, प्रलय-वाण छूटेगा,
है जहाँ स्वर्ण, बम वहीं, स्यात्, फूटेगा।
जो करें, किन्तु, कंचन यह नहीं बचेगा,
शायद, सुवर्ण पर ही संहार मचेगा।
हम पर अपने पापों का बोझ न डालें,
कह दो सब से, अपना दायित्व सँभालें।
कह दो प्रपंचकारी, कपटी, जाली से,
आलसी, अकर्मठ, काहिल, हड़ताली से,
सी लें जबान, चुपचाप काम पर जायें,
हम यहाँ रक्त, वे घर में स्वेद बहायें।
हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो,
दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,
है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?
हो जहाँ कहीं भी अनय, उसे रोको रे !
जो करें पाप शशि-सूर्य, उन्हें टोको रे !
जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में,
या आग सुलगती रही प्रजा के मन में;
तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को,
निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,
रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा,
अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।