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One deep thought provoking poem that epitomizes the eternal questions about dreams, failure, hard work and ofcourse, success. Indeed a masterpiece by young poet Vikas Kumar.


जीना - विकास कुमार

यहीं खड़ा था ना?
और उम्मीद भी कुछ ज्यादा नहीं थी.
तो क्या हुआ यदि मेरे झोले में एक मजबूरी और आ गयी.
खाली झोले की बोरियत से अच्छा
तो इस बोझ का पसीना है.
बिन संघर्ष जीना भी कोई जीना है?

चेहरे की लाली को
तपिश बनते देखने के अनुभव का अनुभव
दुःखद सा प्रतीत होते हुए भी
अज्ञान के सुख से तो बेहतर ही होगा.
ज्ञानाभाव में तो हर मैदान, मदीना है.
बिन संघर्ष जीना भी कोई जीना है?

झुके हुए कंधे, तुम्हें ना भाएँ, मुझे तो प्यारे है.
जमीन दिखती रहे, के लिये झुकने की ताकत जरूरी है.
और पैर सीधे पड़ें, के लिये
धरती का दिखना आवश्यक है.
माथे पे बूँदें तुम्हारी होंगी, मेरी नगीना है.
बिन संघर्ष जीना भी कोई जीना है?

टूटे हुए सपनों का चुभन
क्या केवल दुःख देता है? अनुभव क्या है फिर?
टूटने के बाद आँखें क्या आँसू देती हैं? आशा क्या है फिर?
मैं तो दुआ करता हूँ, उनके लिये
जिन्होंने मुझसे सपनों को छीना है.
बिन संघर्ष जीना भी कोई जीना है?


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Jit
 
Time changes, changes everything! But does it change for sure? A deep touching and thought provoking poem that describes it, indeed a fine poem that makes you ponder ..



समय से अनुरोध - अशोक वाजपेयी


समय, मुझे सिखाओ
कैसे भर जाता है घाव? -पर
एक अदृश्य फांस दुखती रहती है
जीवन-भर।

समय, मुझे बताओ
कैसे जब सब भूल चुके होंगे
रोज़मर्रा के जीवन-व्यापार में
मैं याद रख सकूँ
और दूसरों से बेहतर न महसूस करूँ।

समय, मुझे सुझाओ
कैसे मैं अपनी रोशनी बचाए रखूँ
तेल चुक जाने के बाद भी
ताकि वह लड़का
उधार लाई महँगी किताब एक रात में ही पूरी पढ़ सके।

समय, मुझे सुनाओ वह कहानी
जब व्यर्थ पड़ चुके हों शब्द,
अस्वीकार किया जा चुका हो सच
और बाकी न बची हो जूझने की शक्ति
तब भी किसी ने छोड़ा न हो प्रेम,
तजी न हो आसक्ति,
झुठलाया न हो अपना मोह।

समय सुनाओ उसकी गाथा
जो अंत तक बिना झुके
बिना गिड़गिड़ाए या लड़खड़ाए,
बिना थके और हारे, बिना संगी-साथी,
बिना अपनी यातना को सबके लिए गाए,
अपने अंत की ओर चला गया।

समय, अंधेरे में हाथ थामने,
सुनसान में गुनगुनाहट भरने,
सहारा देने, धीरज बँधाने,
अडिग रहने, साथ चलने और लड़ने का
कोई भूला-बिसरा पुराना गीत तुम्हें याद हो
तो समय, गाओ
ताकि यह समय,
यह अंधेरा,
यह भारी
यह असह्य समय कटे!...


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Jit

 
A b'ful and serene poem that depicts the restlessness of heart with the hint of nature's beauty and also carves imaginary picture of some beloved one you longing for. Deep touching and lil romantic indeed, one more precious gem from collection of young talented poet Vikas Kumar. :)

गोधूलि - विकास कुमार

गोधूलि में,
जब कभी यह एकाकी मन -
नीड़ों की ओर लौटते पंछियों के उल्लास में भी,
देखता है थकन.

जब शाम का सूरज बूढ़ा नजर आता है
और पवन के झोंकों से मन,
बोझिल सा हो जाता है.

बाहर होता है कुछ और,
और अंदर? अंदर कुछ और ही सूरत होती है,
ठीक उसी अंधियारे में मुझे तेरी जरूरत होती है.

और फिर मेरी नजरें जाती हैं उस छत पर
जहाँ मैंने तुम्हें खेलते देखा था.
हँसते, मुस्कुराते
काँधे से जुल्फ़ों को पीछे धकेलते देखा था.

बसंत के खिलते गुलाब में -
गुलाब जब नश्वर नजर आता है
अस्थायी सुंदरता से मन जब उद्विग्न सा हो जाता है.

कांटों की शाश्वत चुभन ही
जब दिल को लगे लुभाने.
फीके लगने लगे जब सारे सपने सुहाने.

जिंदगी में मौत, और मौत में..?
मौत में जिंदगी का पुट नजर आता है
ठीक उसी वक्त दिल में तेरा चेहरा उभर आता है.

और तेरे चेहरे की हर अदा,
ऐसी खूबसूरत होती है -
कि हर तन्हाई में मुझे तेरी जरूरत होती है.

और फिर मेरी नजरें जाती हैं उसी छत पर
जहाँ मैंने तुम्हें खेलते देखा था.
हँसते, मुस्कुराते
काँधे से जुल्फ़ों को पीछे धकेलते देखा था.


Rock on
Jit
 
काले मेघ कब आओगे ?

बारिश के आसार दिखाई नहीं दे रहे हैं, किसान परेशां हैं,
इसी सन्दर्भ में '
किरण सिन्धु ' की यथार्थ वादी कविता :




तपती धरती खोज रही है
सीने में दरार लिए,
बाट देख रहे सभी किसान
आँखों में इक आस लिए;
कहाँ गए तुम काले मेघ?

सूखी खेती देख - देख कर
नयनों में जल भरने लगा है,
कैसे जलेगा घर का चूल्हा
सोंच - सोंच मन डरने लगा है;
कब आओगे काले मेघ?

नदी - नहर सब थम से गए हैं
वृक्ष सभी कुम्हलाये हुए,
कैसे चैन पड़े प्राणी को
बिना तुम्हारे आये हुए;
तरस भी खाओ काले मेघ!

अब जो देर हुई आने में
यम के दूत डराने लगेंगे,
पशुओं के बाडों के ऊपर
गिद्ध चील मंडराने लगेंगे
सुनो गुहार हे काले मेघ!





 
सावन की पहली बारिश

भरी गर्मी में जहाँ सावन का, रिमझिम फुहारों का इंतजार हो रहा है,



कितने दिन के बाद सखी तुम दी फिर दिखलाई,
जब सावन की पहली बारिश मेरे घर आयी।
बदली से सुधियाँ घिर-घिर जब उमडी़ आँगन में,
दो छन को ज्यों दौलत मैंने, दो जग की पायी।
नयनों की सुधियों में रच-बस, जब तुम आती हो,
अधरों की रेशमी छुअन सी क्यों छिप जाती हो?
साँसों की,दिल की घबराहट, आँखों से खेता हूँ।
प्रीत, गीत में गूंथ, हृदय में तुमको रख लेता हूँ।
गर्म हवाऔं ने भी देखो क्या पलटी खाई,
जब सावन की पहली बारिश मेरे घर आयी।

जा बदली जा जा कुछ बूँदें उस पर भी बरसा,
मैं तो कब से तरस रहा, कुछ उस को भी तरसा।
हमने सब कुछ जीत लिया, पर तुमको हार गये।
सपने,सपने रहे न हम सपनों के पार गये।
दो प्यारे से सपने आखिर रह गये परछाई,
जब सावन की पहली बारिश मेरे घर आयी।

जख्मी दिल के छाले अब हम किसको दिखलायें?
तन्हाई में अपने हाथों खुद ही घुट जायें।
ऐ बादल मत बरस अभी तू मेरे आँगन में,
कुछ नाजुक लम्हे बंजर हैं अब तक सावन में।
प्राकथ्थन पर रुकी कहानी पूर्ण न हो पाई,
जब सावन की पहली बारिश मेरे घर आयी।
 
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कोए कॉपीराईट का रोल्ला कोणी होता के न्यू दूसरे कविया की कविता जाटलैंड पे चैप्पन में .........?

Just curious to know so that I can also post........Some IPR specialist around?



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Last edited:
Ocean, always been mysterious deep and salty but keeps alluring poets n artists for long; A wonderful philosophical poem in which a young talented poet tries to relate himself with ocean. Indeed a touching poem that leaves you pondering ..


मैं अब समंदर हूँ - गौरव

रोज रोज चले आते हैं जो तूफां मुझ तक,
तो क्या कुसूर उनका,
गुनहगार तो मैं ... समंदर हूँ,

शौक क्या, और क्या मजबूरी,
गहराइयों में तो उतरना ही था,
तो अब मैं ... समंदर हूँ,

लहरें भी दिखें और, जुम्बिश भी न हो,
तो गहरा हूँ अब ... मैं समंदर हूँ,

एक कतरे तक की जगह न थी,
अब सूरज भी बुझते हैं मुझमे,
मैं अब समंदर हूँ,

कोई तो कश्ती साहिल पे आएगी,
कुछ तो मोती उगेंगे,
तो बस मैं ... समंदर हूँ,

ज़माने भर के और अपने,
अश्क पी कर,
कड़वा हूँ, खारा हूँ ... अब समंदर हूँ,

गहरा हूँ, दर्द हूँ,
पर अपने ही अन्दर हूँ,
मैं समंदर हूँ ! ..


Rock on
Jit
 
Last edited:
A really nice poem that carves the feelings and restless, you generally feel in Summers. B'ful ! :)


गर्मी के दिन - शशि पाधा

कुछ अलसाये
कुछ कुम्हलाये
आम्रगन्ध भीजे, बौराये
काटे ना
कटते ये पल छिन
निठुर बड़े हैं गर्मी के दिन

धूप-छाँव
अँगना में खेलें
कोमल कलियाँ पावक झेलें
उन्नींदी
अँखियां विहगों की
पात-पात में झपकी ले लें
रात बिताई
घड़ियाँ गिन-गिन
बीतें ना कुन्दन से ये दिन

मुर्झाया
धरती का आनन
झुलस गये वन उपवन कानन
क्षीण हुई
नदिया की धारा
लहर- लहर
में उठता क्रन्दन
कब लौटेगा बैरी सावन
अगन लगायें गर्मी के दिन।

सुलग- सुलग
अधरों से झरतीं
विरहन के गीतों की कड़ियाँ
तारों से पूछें दो नयना
रूठ गई
क्यों नींद की परियाँ
भरी दोपहरी
सिहरे तन-मन
विरहन की पीड़ा से ये दिन !..


Rock on
Jit



 

मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ!

मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा है उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!

मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;
है यह अपूर्ण संसार ने मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!

मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,
सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ;
जग भव -सागर तरने को नाव बनाए,
मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ!

मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,
उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!

कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादन वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भूलना!

मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!

मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिसपर भूपों के प्रसाद निछावर,
मैं उस खंडर का भाग लिए फिरता हूँ!

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!

मैं दीवानों का एक वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ;
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ!




हरिवंश राय बच्चन

 
Last edited:
आओ मंदिर मस्जिद खेलें

आओ मंदिर मस्जिद खेलें खूब पदायें मस्जिद को

कल्पित जन्मभूमि को जीतें और हरायें मस्जिद को




सिया-राममय सब जग जानी सारे जग में राम रमा

फिर भी यह मस्जिद, क्यों मस्जिद चलो हटायें मस्जिद को




तोड़ें दिल के हर मंदिर को पत्थर का मंदिर गढ़ लें

मानवता पैरों की जूती यह जतलायें मस्जिद को




बाबर बर्बर होगा लेकिन हम भी उससे घाट नहीं

वह खाता था कसम खुदा की हम खा जायें मस्जिद को




मध्यकाल की खूँ रेज़ी से वर्तमान को रंगें चलो

अपनी-अपनी कुर्सी का भवितव्य बनायें मस्जिद को




राम-नाम की लूट मची है मर्यादा को क्यों छोड़ें

लूटपाट करते अब सरहद पार करायें मस्जिद को




देश हमारा है तोंदों तक नस्लवाद तक आज़ादी

इसी मुख्य धारा में आने को धमकायें मस्जिद को




धर्म बहुत कमजोर हुआ है लकवे का डर सता रहा

अपने डर से डरे हुए हम चलो डरायें मस्जिद को




गंगाजली उठायें झूठी सरयू को गंदा कर दें

संग राम को फिर ले डूबें और डूबायें मस्जिद को
 
निर्लज्ज युवा हैं

शान बघारें, शोर मचायें
चिल्ल-पों, चीखें चिल्लायें
तोडें फोडें, आग लगायें
हमसे आजादी का मतलब
पूछ समंदर डूब गया था
आशाओं का बरगद सूखा
हम पानी के वही बुलबुले
उगते हैं, फट फट जाते हैं
हम खजूर के गाछ सरीखे
गूंगे की आवाज सरीखे
बेमकसद बेगैरत बादल
अंधे की आँखों का काजल
सूरज को ढाँप रहा,
काला धुवां हैं
निर्लज्ज युवा हैं....

हमें ढूंढो, मिलेंगे हम
कोनों में, किनारों में
अगर कुछ शर्म होगी तो
तुम्हें मुँह फेरना होगा
नयी पीढी हैं, बेची है
यही एक चीज तो हमनें
वही हम्माम के भीतर
वही हम्माम के बाहर
जो नंगापन हकीकत है
हमारी सीरत है....

बहुत ताकत है बाहों में
बदन कसरत से गांठा है
बाँहों पर उभरते माँस के गोले
मगर बस ठंडे ओले हैं
वो कमसिन बाँह में आये
यही बाहों का मक्सद है
नयन दो चार हो जायें,
निगाहों का मक्सद है
वही डिगरी है, जिसमें
तोड कुर्सी लूट खाना है
मकसद ज़िन्दगी का
एक आसां घर बसाना है
न पूछो, चुल्लुओं पानी है
फिर भी जी रहे क्यों हैं....

मगर तुम पाओगे हमको
जहाँ भी आग पाओगे
कभी दूकान लूटोगे अगर
या बस जलाओगे
हम ही तो भीड हैं
जो भेड हो कर बहती जाती है
हम ईमान के चौकीदार हैं
धर्म के सिक्युरिटी गार्ड हैं हम....

लेकिन उम्मीद न रखना
वृद्ध, तिरस्कृत से देश मेरे
तुम्हारी आवाज हम सुन नहीं पाते
नमक हराम, अहसान फरोश,
नपुंसक हैं हम
तुम चीख चीख कर यह कहोगे
तो क्या हम जाग जायेंगे?
तुम डूबता जहाज हो
हम अमरीका भाग जायेंगे...


'राजीव रंजन प्रसाद'
 
आओ मंदिर मस्जिद खेलें खूब पदायें मस्जिद को

कल्पित जन्मभूमि को जीतें और हरायें मस्जिद को


अति सुंदर !!!!
 
ocean, always been mysterious deep and salty but keeps alluring poets n artists for long; a wonderful philosophical poem in which a young talented poet tries to relate himself with ocean. Indeed a touching poem that leaves you pondering ..


मैं अब समंदर हूँ - गौरव

रोज रोज चले आते हैं जो तूफां मुझ तक,
तो क्या कुसूर उनका,
गुनहगार तो मैं ... समंदर हूँ,


rock on
jit


कितनी सुन्दर अभिव्यक्ति है !!!
बहुत उम्दा रचना है
 
सब जीवन बीता जाता है----जयशंकर प्रसाद

सब जीवन बीता जाता है
धूप छाँह के खेल सदॄश
सब जीवन बीता जाता है



समय भागता है प्रतिक्षण में,
नव-अतीत के तुषार-कण में,
हमें लगा कर भविष्य-रण में,
आप कहाँ छिप जाता है
सब जीवन बीता जाता है



बुल्ले, नहर, हवा के झोंके,
मेघ और बिजली के टोंके,
किसका साहस है कुछ रोके,
जीवन का वह नाता है
सब जीवन बीता जाता है



वंशी को बस बज जाने दो,
मीठी मीड़ों को आने दो,
आँख बंद करके गाने दो
जो कुछ हमको आता है



सब जीवन बीता जाता है.
 
शान बघारें, शोर मचायें
चिल्ल-पों, चीखें चिल्लायें
तोडें फोडें, आग लगायें
हमसे आजादी का मतलब
पूछ समंदर डूब गया था
आशाओं का बरगद सूखा
हम पानी के वही बुलबुले
उगते हैं, फट फट जाते हैं
हम खजूर के गाछ सरीखे
गूंगे की आवाज सरीखे
बेमकसद बेगैरत बादल
अंधे की आँखों का काजल
सूरज को ढाँप रहा,
काला धुवां हैं
निर्लज्ज युवा हैं....

हमें ढूंढो, मिलेंगे हम
कोनों में, किनारों में
अगर कुछ शर्म होगी तो
तुम्हें मुँह फेरना होगा
नयी पीढी हैं, बेची है
यही एक चीज तो हमनें
वही हम्माम के भीतर
वही हम्माम के बाहर
जो नंगापन हकीकत है
हमारी सीरत है....

बहुत ताकत है बाहों में
बदन कसरत से गांठा है
बाँहों पर उभरते माँस के गोले
मगर बस ठंडे ओले हैं
वो कमसिन बाँह में आये
यही बाहों का मक्सद है
नयन दो चार हो जायें
,
निगाहों का मक्सद है
वही डिगरी है, जिसमें
तोड कुर्सी लूट खाना है
मकसद ज़िन्दगी का
एक आसां घर बसाना है
न पूछो, चुल्लुओं पानी है
फिर भी जी रहे क्यों हैं....

मगर तुम पाओगे हमको
जहाँ भी आग पाओगे
कभी दूकान लूटोगे अगर
या बस जलाओगे
हम ही तो भीड हैं
जो भेड हो कर बहती जाती है
हम ईमान के चौकीदार हैं
धर्म के सिक्युरिटी गार्ड हैं हम....

लेकिन उम्मीद न रखना
वृद्ध, तिरस्कृत से देश मेरे
तुम्हारी आवाज हम सुन नहीं पाते
नमक हराम, अहसान फरोश,
नपुंसक हैं हम
तुम चीख चीख कर यह कहोगे
तो क्या हम जाग जायेंगे?
तुम डूबता जहाज हो
हम अमरीका भाग जायेंगे...


'राजीव रंजन प्रसाद'

Sama analogy is found in the Song by Piyush Mishra.

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है .
देखना है जोर कित्तना बाजुवे कातिल में है
वक़्त आने पे बतादेंगे तुझे इ आस्मां
हम अभी से क्या बताये क्या हमारे दिल में है

ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दुस्तान
देखते की मुल्क सारा क्या टशन क्या चिल्ल में है
आज का लौंडा यह कहता हम तो बिस्मिल थक गए
अपनी आजादी तो भैया लौंडिया के दिल में है .

आज के जलसों में बिस्मिल एक घुंगा गा रहा.
और बहरों का वो रेला नाचता महफिल में है
हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया
आज तो चड्डी भी सिलती एन्ग्लिशो की मिल में है
 
sama analogy is found in the song by piyush mishra.

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है .
देखना है जोर कित्तना बाजुवे कातिल में है
वक़्त आने पे बतादेंगे तुझे इ आस्मां
हम अभी से क्या बताये क्या हमारे दिल में है

ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दुस्तान
देखते की मुल्क सारा क्या टशन क्या चिल्ल में है
आज का लौंडा यह कहता हम तो बिस्मिल थक गए
अपनी आजादी तो भैया लौंडिया के दिल में है .

आज के जलसों में बिस्मिल एक घुंगा गा रहा.
और बहरों का वो रेला नाचता महफिल में है
हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया
आज तो चड्डी भी सिलती एन्ग्लिशो की मिल में है

समरसिंह जी
कल 'आजाद' जी का जन्मदिवस था. बड़े ही अफ़सोस की बात है की किसी ने उनका जिक्र तक नहीं किया . ना ही किसी समाचार के चेनलों ने कुछ जुर्रत की ( उन्हें और महतवपूर्ण मसलों से फुर्सत मिले तो ???)
सिर्फ आस्था चॅनल पर डॉ हरी ॐ पवार जी की कविता सुनने को मिली , क्या ओजस्वी वाणी है उनकी
कोई कमज़ोर भी खडा हो के तलवार तान ले दुश्मन के सीने पर .

उनकी एक कविता यहाँ पर आप सुन सकते हैं ;

http://www.youtube.com/watch?v=RiAP35Fgvdw&feature=related

 
Last edited:
Anjaliji,

Indeed a matter for shame for all Indians. We keep forgetting our real Heros nowadays. That's really bad. Even not on tv, news nowhere it is mentioned about the great son of soil's Bday, paying tribute is a far cry! :mad:

No excuses, even I forgot the same. :(

Anyways, Thanks a lot Anjaliji to remind and let us know about this Great Personality.

Chander Shekhar Azad sada amar rehe !!



समरसिंह जी
कल 'आजाद' जी का जन्मदिवस था. बड़े ही अफ़सोस की बात है की किसी ने उनका जिक्र तक नहीं किया . ना ही किसी समाचार के चेनलों ने कुछ जुर्रत की ( उन्हें और महतवपूर्ण मसलों से फुर्सत मिले तो ???)
सिर्फ आस्था चॅनल पर डॉ हरी ॐ पवार जी की कविता सुनने को मिली , क्या ओजस्वी वाणी है उनकी
कोई कमज़ोर भी खडा हो के तलवार तान ले दुश्मन के सीने पर .

उनकी एक कविता यहाँ पर आप सुन सकते हैं ;

http://www.youtube.com/watch?v=RiAP35Fgvdw&feature=related

 
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