Hindi Kavita

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अमेरिका की पतझड़
कितनी सुहानी है,
गिरते पत्तों की भी
एक कहानी है.

हर पत्ता,
राजनीति की तरह,
कई रंग बदलता है.
रंग- बिरंगे सूखे पत्ते
गिरते -गिरते
धरती भर जाते हैं,
नेता जाते -जाते
देश को खाली कर जाते हैं.

दूर -दूर तक लोग ड्राईव कर
पत्तों के रंगों को देखने जाते हैं.
पतझड़ की उदासी छोड़
ढेर सी खुशियाँ साथ लाते हैं.
काश! मानव प्रकृति से
कुछ सीख पाता
अपनी ज़िन्दगी के थोड़े से रंग
दूसरों की ज़िन्दगी में भर पाता.
 

मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!

यह जो रात चुरा बैठी है चांद सितारों की तरुणाई,
बस तब तक कर ले मनमानी जब तक कोई किरन न आई,
खुलते ही पलकें फूलों की, बजते ही भ्रमरों की वंशी
छिन्न-भिन्न होगी यह स्याही जैसे तेज धार से काई,
तम के पांव नहीं होते, वह चलता थाम ज्योति का अंचल
मेरे प्यार निराश न हो, फिर फूल खिलेगा, सूर्य मिलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!

सिर्फ भूमिका है बहार की यह आंधी-पतझारों वाली,
किसी सुबह की ही मंजिल है रजनी बुझे सितारों वाली,
उजड़े घर ये सूने आंगन, रोते नयन, सिसकते सावन,
केवल वे हैं बीज कि जिनसे उगनी है गेहूं की बाली,
मूक शान्ति खुद एक क्रान्ति है, मूक दृष्टि खुद एक सृष्टि है
मेरे सृजन हताश न हो, फिर दनुज थकेगा, मनुज चलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!


व्यर्थ नहीं यह मिट्टी का तप, व्यर्थ नहीं बलिदान हमारा,
व्यर्थ नहीं ये गीले आंचल, व्यर्थ नहीं यह आंसू धारा,
है मेरा विश्वास अटल, तुम डांड़ हटा दो, पाल गिरा दो,
बीच समुन्दर एक दिवस मिलने आयेगा स्वयं किनारा,
मन की गति पग-गति बन जाये तो फिर मंजिल कौन कठिन है?
मेरे लक्ष्य निराश न हो, फिर जग बदलेगा, मग बदलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!


जीवन क्या?-तम भरे नगर में किसी रोशनी की पुकार है,
ध्वनि जिसकी इस पार और प्रतिध्वनि जिसकी दूसरे पार है,
सौ सौ बार मरण ने सीकर होंठ इसे चाहा चुप करना,
पर देखा हर बार बजाती यह बैठी कोई सितार है,
स्वर मिटता है नहीं, सिर्फ उसकी आवाज बदल जाती है।
मेरे गीत उदास न हो, हर तार बजेगा, कंठ खुलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!


गोपाल दास नीरज
 
A deep touching poem by Pratap Narayan Singh, which actually reflects n' describes his own Book of life, as the title says.
Very simple but full of emotions that penetrates deep into the soul.


जीवन की किताब - प्रताप नारायण सिंह

मेरे जीवन की किताब से जाने कब
प्यार का पन्ना फट कर निकल गया था
जब से होश सँभाला
उसे तलाशता रहा यहाँ वहाँ
भटकता रहा उसकी खोज में गलियों और कूचों में
ढूँढ़ता रहा उसे विभिन्न आकृतियों में
बौराया फिरता रहा हर पल
पर वह नही मिला
मैं हार बैठा
समझा लिया मन को
फिर एक दिन
कुछ जानी पहचानी शक्लों वाले
शब्दों ने आवाज़ दी
पास गया तो पाया कि
ये मेरे ही गुम हुए पन्ने के शब्द हैं
मैं एक पल खुश हुआ, बहुत खुश
दूसरे पल उदास हो गया
वह पन्ना अब एक किताब बन चुका था
कैसे जोड़ पाऊँगा उसे फिर
अपने जीवन की किताब से?


Rock on
Jit
 
Last edited:
Ppl keep expectations n' they feel satisfied after fulfilling of one or few, but sometimes after givin' in too much efforts still you don't receive the due in return, n' it is when the frustration creeps in. But that's life anyways .. all the great expectations, few hope against hope don't actually fullfill. The poet here describes his frustration n' the irritation in very deep touching way thro' this b'ful creation! :)


कोई फाँस चुभी हैं मन में - गौरव

शब्दों का एक अविरल प्रवाह,
अवचेतन में,
एक फाँस चुभी है, तर्जनी में,
और एक मन में ...

विचित्र हैं पर सत्य यही,
कल सुख देती थी, आज पीड़ा,
कदापि यही भाग्य,
यही प्रारब्ध की क्रीडा …

समय बीता तो बन गई,
अंश अस्तित्व का
आधा भाग जीवन का,
आधा व्यक्तित्व का …

साथी बनी थी, आकुलता बन कर,
आज शत्रु सद्रश, व्याकुलता बन कर ...

प्रेम, ईर्ष्या, मोह के आवेगों में बहता,
नवरूप को खोजता …

वर्षों की पीड़ा मन में,
और मन की पीड़ा वर्तनी में,
एक फाँस चुभी हैं, तर्जनी में …

शीश अब भी झुके, समक्ष ईश के,
थोडी वितृष्णा ह्रदय में,
पूरी श्रृद्धा नमन में,
पर कोई फाँस चुभी हैं, मन में ! ...


Rock on
Jit
 
wah jeet, kya sundar rachna hai kavi ki. koi bhi vyakti is uttam rachna ko sun kar bhawvibhoor ho jaye.

aisa laga ki koi subah oos ka tapka phool se tapak hai ik pyase ke muh me tapak kar uski pyas bhuja rah ho.

ati uttam . sarwashresth kavita
 
Encouraging

very encouraging poem writen by you, please keep on writting on social side also which can reflect our current status in society.
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!

यह जो रात चुरा बैठी है चांद सितारों की तरुणाई,
बस तब तक कर ले मनमानी जब तक कोई किरन न आई,
खुलते ही पलकें फूलों की, बजते ही भ्रमरों की वंशी
छिन्न-भिन्न होगी यह स्याही जैसे तेज धार से काई,
तम के पांव नहीं होते, वह चलता थाम ज्योति का अंचल
मेरे प्यार निराश न हो, फिर फूल खिलेगा, सूर्य मिलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!

सिर्फ भूमिका है बहार की यह आंधी-पतझारों वाली,
किसी सुबह की ही मंजिल है रजनी बुझे सितारों वाली,
उजड़े घर ये सूने आंगन, रोते नयन, सिसकते सावन,
केवल वे हैं बीज कि जिनसे उगनी है गेहूं की बाली,
मूक शान्ति खुद एक क्रान्ति है, मूक दृष्टि खुद एक सृष्टि है
मेरे सृजन हताश न हो, फिर दनुज थकेगा, मनुज चलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!


व्यर्थ नहीं यह मिट्टी का तप, व्यर्थ नहीं बलिदान हमारा,
व्यर्थ नहीं ये गीले आंचल, व्यर्थ नहीं यह आंसू धारा,
है मेरा विश्वास अटल, तुम डांड़ हटा दो, पाल गिरा दो,
बीच समुन्दर एक दिवस मिलने आयेगा स्वयं किनारा,
मन की गति पग-गति बन जाये तो फिर मंजिल कौन कठिन है?
मेरे लक्ष्य निराश न हो, फिर जग बदलेगा, मग बदलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!


जीवन क्या?-तम भरे नगर में किसी रोशनी की पुकार है,
ध्वनि जिसकी इस पार और प्रतिध्वनि जिसकी दूसरे पार है,
सौ सौ बार मरण ने सीकर होंठ इसे चाहा चुप करना,
पर देखा हर बार बजाती यह बैठी कोई सितार है,
स्वर मिटता है नहीं, सिर्फ उसकी आवाज बदल जाती है।
मेरे गीत उदास न हो, हर तार बजेगा, कंठ खुलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!

गोपाल दास नीरज
 
वह मूर्ख फिर नाच रहा है


देखो आज फिर वह मूर्ख
दमभर नाच रहा है,
दीवाली तो हाल ही में बीती है
फिर भी पटाखे छोड़ रहा है,
होली आने में देर है
पर गुलाल उड़ा रहा है,
ईद भी आसपास नहीं
फिर भी गले मिल रहा है।
नाचता है हर साल
चुनाव परिणाम घोषित होने पर
खुश होता है इसी तरह
अपने नेता के जीतने पर।


पीढ़ियों से वह नाच रहा है
परंपरा को निभा रहा है,
पिता से मिली विरासत को
अपने बेटे को सिखा रहा है।
आंखों का पानी सूख चुका है
पर फाड़कर होंठ मुस्का रहा है
भूखे पेट, चिथड़ों में लिपटा हुआ
देखो वह मूर्ख फिर नाच रहा है।



 


God's Masterpiece Is Mother

God took the fragrance of a flower...
The majesty of a tree...
The gentleness of morning dew...
The calm of a quiet sea...
The beauty of the twilight hour...
The soul of a starry night...
The laughter of a rippling brook...
The grace of a bird in flight...
Then God fashioned from these things
A creation like no other,
And when his masterpiece was through
He called it simply - Mother.
 
इश्क़ की बूटी
डाल के लूटी,
ओ री झूठी,
सच कह -
तूने पाई कहाँ से
प्यार-मोहब्बत की यह घुट्टी,
खुद तो हुई बावरी फिरती,
मेरी भी कर दी है छुट्टी।
अब जो तेरे जाल में हूँ तो
नैनन से हीं घायल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।

बोल रसीले,

छैल-छबीले,
थोड़े ढीले,
बह कर-
मेरी ओर जुबाँ से
बने बनाए बाँध को छीले,
खुद तो मुझमें प्यास जगाए,
फिर मेरी चुप्पी को पी ले।
अब जो तेरी झील में हूँ तो
सावन का हीं बादल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।

रूप की गठरी,
रंग की मिसरी,
लेके ठहरी,
मुझ तक-
तेरी आन पड़ी है
जान-जिया की माँग ये दुहरी,
खुद तो चाल चले है सारी,
फिर मुझसे पूछे क्या बहरी।
अब जो तेरे साथ में हूँ तो
जोबन का हीं कायल कर दे,
सुन री...मोहे पागल कर दे।



विश्वदीपक ' तनहा'
 
Last edited:
क्या वह भी अरमान तुम्हारा ?

क्या वह भी अरमान तुम्हारा ?

जो मेरे नयनों के सपने,
जो मेरे प्राणों के अपने ,
दे-दे कर अभिशाप चले सब-
क्या यह भी वरदान तुम्हारा ?


खुली हवा में पर फैलाता,
मुक्त विहग नभ चढ़ कर गाता
पर जो जकड़ा द्वंद्व-बन्ध में,-
क्या वह भी निर्माण तुम्हारा ?


बादल देख हृदय भर आया
'दो दो-बूँद' कहा, दुलराया ;
पर पपीहरे ने जो पाया, -
क्या वह भी पाषाण तुम्हारा ?


नीरव तम, निशीथ की बेला,
मरु पथ पर मैं खड़ा अकेला
सिसक-सिसक कर रोता है, जो -
क्या वह भी प्रिय गान तुम्हारा ?


जानकीवल्लभ शास्त्री
 
अगर रख सको तो एक निशानी हूँ मैं,
खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं ,
रोक पाए न जिसको ये सारी दुनिया,
वोह एक बूँद आँख का पानी हूँ मैं…..

सबको प्यार देने की आदत है हमें,
अपनी अलग पहचान बनाने की आदत है हमे,
कितना भी गहरा जख्म दे कोई,
उतना ही ज्यादा मुस्कराने की आदत है हमें…


इस अजनबी दुनिया में अकेला ख्वाब हूँ मैं,
सवालो से खफा छोटा सा जवाब हूँ मैं,
जो समझ न सके मुझे, उनके लिए “कौन”
जो समझ गए उनके लिए खुली किताब हूँ मैं,

आँख से देखोगे तो खुश पाओगे,
दिल से पूछोगे तो दर्द का सैलाब हूँ मैं,,,,,
अगर रख सको तो निशानी,

खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं.....


 
आस्मां के तारे अक्सर पूछते हैं हमसे
क्या तुम्हे आज भी इंतज़ार है उसके लौट आने का
और ये दिल मुस्कुरा के कहता है
मुझे तो अब तक यकीन नही उसके चल जाने का
 
लोड करके राईफल, जब जीप पे सवार होते... बाऩध साफा जब गाबरू तयार होते..... देखती है दुनिया छत पर चढके..... और कहते "काश हम भी जाट होते"..... He he
 
jo bhara nahin hai bhawon se , behti jisme rasdhar nahin.....
hardya nahin wo pathhar hai, jisme swadesh ka pyar nahin................:thappad:thappad


Jai hind, Jai Bharat...........................
 
Last edited:

नाम - रूप के भेद पर कभी किया है ग़ौर ?

नाम मिला कुछ और तो शक्ल - अक्ल कुछ और

शक्ल - अक्ल कुछ और नयनसुख देखे काने

बाबू सुंदरलाल बनाये ऐंचकताने

कहँ ‘ काका ‘ कवि , दयाराम जी मारें मच्छर

विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर



मुंशी चंदालाल का तारकोल सा रूप

श्यामलाल का रंग है जैसे खिलती धूप

जैसे खिलती धूप , सजे बुश्शर्ट पैंट में -

ज्ञानचंद छै बार फ़ेल हो गये टैंथ में

कहँ ‘ काका ‘ ज्वालाप्रसाद जी बिल्कुल ठंडे

पंडित शांतिस्वरूप चलाते देखे डंडे



देख अशर्फ़ीलाल के घर में टूटी खाट

सेठ भिखारीदास के मील चल रहे आठ

मील चल रहे आठ , करम के मिटें न लेखे

धनीराम जी हमने प्रायः निर्धन देखे

कहँ ‘ काका ‘ कवि , दूल्हेराम मर गये कुँवारे

बिना प्रियतमा तड़पें प्रीतमसिंह बेचारे



पेट न अपना भर सके जीवन भर जगपाल

बिना सूँ ड़ के सैकड़ों मिलें गणेशीलाल

मिलें गणेशीलाल , पैंट की क्रीज़ सम्हारी

बैग कुली को दिया , चले मिस्टर गिरधारी

कहँ ‘ काका ‘ कविराय , करें लाखों का सट्टा

नाम हवेलीराम किराये का है अट्टा



चतुरसेन बुद्धू मिले , बुद्धसेन निर्बुद्ध

श्री आनंदीलाल जी रहें सर्वदा क्रुद्ध

रहें सर्वदा क्रुद्ध , मास्टर चक्कर खाते

इंसानों को मुंशी तोताराम पढ़ाते

कहँ ‘ काका ‘, बलवीर सिंह जी लटे हुये हैं

थानसिंह के सारे कपड़े फटे हुये हैं



 
पगली लड़की

अमावस की काली रातों में, दिल का दरवाज़ा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में, गम आँसू के संग घुलता है,
जब पिछवाड़े के कमरे में, हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक टिक चलती हैं, सब सोते हैं हम रोते हैं,
जब बार बार दोहराने से, सारी यादें चुभ जाती हैं,
जब ऊँच नीच समझाने में, माथे की नस दुख जाती है,
तब इक पगली लड़की के बिन, जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है।



जब पोथे खाली होते हैं, जब हर्फ़ सवाली होते हैं,

जब गज़लें रास नहीं आतीं, अफ़साने गाली होते हैं,
जब बासी फीकी धूप समेटे, दिन जल्दी ढल जाता है,
जब सूरज का लश्कर छत से, गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा, मन ही मन घुट जाती है,
जब कालेज से घर लाने वाली, पहली बस छुट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ, गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मना करने पर भी, पारो पढ़ने आ जाती है,
जब अपना मनचाहा हर काम, कोई लाचारी लगता है,
तब इक पगली लड़की के बिन, जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है।



जब कमरे में सन्नाटे की, आवाज़ सुनाई देती है,

जब दर्पण में आँखों के नीचे, झांई दिखाई देती है,
जब बड़की भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो लल्ला दिन भर, कुछ सपनों का सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में, कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते हैं, हम जाते में घबराते हैं,
जब साड़ी पहने लड़की का, एक फ़ोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मनाती हैं, फ़ोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का समझाना, हम को फ़नकारी लगता है,
तब इक पगली लड़की के बिन, जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है।



दीदी कहती हैं कि, उस पगली लड़की की कुछ औकात नहीं,

उसके दिल में भैय्या, तेरे जैसे प्यारे जस्बात नहीं,
वो पगली लड़की मेरे खातिर, नौ दिन भूखी रहती है,
चुप चुप सारे व्रत करती है, पर मुझ से कभी न कहती है,
जो पगली लड़की कहती है, मैं प्यार तुम्हीं से करती हूँ,
लेकिन मैं हूँ मजबूर बहुत, अम्मा बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना, कुछ भी अधिकार नहीं बाबा,
ये कथा कहानी किस्से हैं, कुछ भी तो सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लड़की के संग, जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन, मरना भी भारी लगता है।



--------------------डा० कुमार विश्वास--------------------
 
मेरी यह पहली पोस्ट है इस फोरम में. मैं आप सभीका बहुत बहुत धन्यवाद करता हूँ इतना अच्छा संकलन बनाया. मैंने आज यहाँ कम से कम ४ घंटे बिताए.

मेरा एक ब्लॉग है जहाँ मैंने सबसे पसंदीदा कवितायेँ संकलित करना शुरू किया है, लेकिन उनमें से कुछ अज्ञात हैं क्यूंकि लेखक / लेखिका का नाम नहीं पता. अगर आप में से किसी को ऐसी कविता दिखे तो कृपया वहाँ कमेन्ट करके मेरी मदद करें. अगर आप इच्छुक हैं तो मुझे ईमेल कीजिये मैं ब्लॉग का पता बता दूंगा.

धन्यवाद!
 
माँ कह एक कहानी
"माँ कह एक कहानी।"
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?"
"कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी?
माँ कह एक कहानी।"


"तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी।"
"जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।"

वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।"
"लहराता था पानी, हाँ हाँ यही कहानी।"

"गाते थे खग कल कल स्वर से, सहसा एक हँस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खर शर से, हुई पक्षी की हानी।"
"हुई पक्षी की हानी? करुणा भरी कहानी!"

चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया,
इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी।"
"लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।"

"माँगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी,
तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।"
"हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।"

हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,
गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सब ने जानी।"
"सुनी सब ने जानी! व्यापक हुई कहानी।"

राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?"
"माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।
कोई निरपराध को मारे तो क्यों न उसे उबारे?
रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।"

"न्याय दया का दानी! तूने गुणी कहानी।"


- मैथिलीशरण गुप्त
 
Ek BooNd

jyoN nikal kar baadloN ki god se
thii abhii ek booNd kuchh aage baDi
sochne phir-phir yahii jii meiN lagii
aah! kyoN ghar chhoD kar maiN yooN kaDii


dev! mere bhagya meiN kayaa badaa
maiN bachooNgii ya milooNgii dhool meiN
ya jalooNgii gir aNgaare par kisii
choo paDoogiiN ya kamal ke phool meiN

bah gayii us kaal ek aisii hawaa
veh samunder oar aayii anmanii
ek sunder siip ka moohN thaa khulaa
vah usii meiN jaa paDii moti banii

log yooN hii haiN jhijhakte, sochte
jab ki unko chhoDnaa paDta hai ghar
kintoo ghar ko chhoDnaa aksar unheN
booNd loN kucch aur hii detaa hai kar
 
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