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माँ बनकर ये जाना मैनें,
माँ की ममता क्या होती है,
सारे जग में सबसे सुंदर,
माँ की मूरत क्यूँ होती है॥


सुनीता


Very beautiful poem Sunita ji, Thank you so much for sharing.
few lines from my side-

माँ तो माँ क्या दूं उपमा,
हर उपमा उप रह जाती है.
माँ तुझको उपमा देने में,
मेरी वाणी चुप रह जाती है.
 
Very beautiful poem Sunita ji, Thank you so much for sharing.
few lines from my side-

माँ तो माँ क्या दूं उपमा,
हर उपमा उप रह जाती है.
माँ तुझको उपमा देने में,
मेरी वाणी चुप रह जाती है.

Bahut umda bhai...

Anjali Ji thanks for bringing out one of the best poems!!!!
 
वैसे तो एक शरीफ इंसान हूँ,
आप ही की तरह श्रीमान हूँ,
मगर अपनी आँख से,
बहुत परेशान हूँ।

अपने आप चलती है,

लोग समझते हैं -चलाई गई है,
जान-बूझ कर चलाई गई है,
एक बार बचपन में,
शायद सन पचपन में,
क्लास में ,
एक लड़की बैठी थी पास में,
नाम था सुरेखा,
उसने हमें देखा,
और बाईं चल गई,
लड़की हाय-हाय कहकर,
क्लास छोड़ बाहर निकल गई,
थोड़ी देर बाद
प्रिंसिपल ने बुलाया,
लम्बा-चौड़ा
लेक्चर पिलाया,
हमने कहा कि जी भूल हो गई,
वो बोले-ऐसा भी होता है,
भूल में,
शर्म नहीं आती ऐसी गन्दी हरकतें करते हो,
स्कूल में?

और इससे पहले कि,

हकीकत बयां करते,
कि फिर चल गई,
प्रिंसिपल को खल गई,
हुआ यह परिणाम,
कट गया नाम,
बमुश्किल तमाम,
मिला एक काम,
इंटरव्यू में खड़े थे क्यू में,
एक लडकी थी सामने अड़ी,
अचानक मुड़ी,
नज़र उसकी हम पर पड़ी,
और हमारी आँख चल गई,
लड़की उछल गई,
दूसरे उम्मीदवार चौंके,
फिर क्या था,
मार मार जूते-चप्पल
फोड़ दिया बक्कल,
सिर पर पाँव रखकर भागे,
लोगबाग पीछे हम आगे।

घबराहट में,
घुस गये एक घर में,
बुरी तरह हाँफ रहे थे,
मारे डर के काँप रहे थे,
तभी पूछा उस गृहणी ने-
कौन?
हम खड़े रहे मौन
वो बोली
बताते हो या किसी को बुलाऊँ ?
और उससे पहले,
कि जबान हिलाऊँ,
आँख चल गई,
वह मारे गुस्से के,जल गई,
साक्षात् दुर्गा- सी दीखी,
बुरी तरह चीखी,
बात कि बात में जुड़ गये अड़ोसी-पडौसी,
मौसा-मौसी, भतीजे-मामा
मच गया हंगामा,
चड्डी बना दिया हमारा पजामा,
बनियान बन गया कुर्ता,
मार मार बना दिया भुरता,
हम चीखते रहे,
और पीटने वाले, हमे पीटते रहे।

भगवान जाने कब तक,

निकालते रहे रोष,
और जब हमें आया होश,
तो देखा अस्पताल में पड़े थे,
डाक्टर और नर्स घेरे खड़े थे,
हमने अपनी एक आँख खोली,
तो एक नर्स बोली,
दर्द कहाँ है?
हम कहाँ कहाँ बताते,
और उससे पहले कि कुछ,कह पाते,
आँख चल गई,
नर्स कुछ न बोली,
बाई गाड ! (चल गई) ,
मगर डाक्टर को खल गई,
बोला इतने सिरियस हो,
फिर भी ऐसी हरकत कर लेते हो,
इस हाल में शर्म नहीं आती,
मोहब्बत करते हुए,
अस्पताल में,
उन सबके जाते ही आया वार्ड बॉय,
देने लगा आपनी राय,
भाग जाएँ चुपचाप नहीं जानते आप,
बढ़ गई है बात,
डाक्टर को गड़ गई है,
केस आपका बिगाड़ देगा,
न हुआ तो मरा बताकर,
जिंदा ही गड़वा देगा.
तब अँधेरे में आँखें मूंदकर,
खिड़की के कूदकर भाग आए,
जान बची तो लाखों पाए।

एक दिन सकारे,

बापूजी हमारे,
बोले हमसे-
अब क्या कहें तुमसे?
कुछ नहीं कर सकते,
तो शादी कर लो ,
लडकी देख लो।
मैंने देख ली है,
जरा हैल्थ की कच्ची है,
बच्ची है फिर भी अच्छी है,

जैसी भी, आखिर लड़की है

बड़े घर की है, फिर बेटा
यहाँ भी तो कड़की है
हमने कहा-
जी अभी क्या जल्दी है?
वे बोले- गधे हो
ढाई मन के हो गये
मगर बाप के सीने पर लदे हो
वह घर फँस गया तो सम्भल जाओगे।

तब एक दिन भगवान से मिलके

धडकते दिल से
पहुँच गये रुड़की, देखने लड़की
शायद हमारी होने वाली सास
बैठी थी हमारे पास
बोली-
यात्रा में तकलीफ़ तो नहीं हुई
और आँख मुई चल गई
वे समझी कि मचल गई

बोली-

लड़की तो अंदर है,
मैं लड़की की माँ हूँ ,
लड़की को बुलाऊँ?
और इससे पहले कि मैं जुबान हिलाऊँ,
आँख चल गई दुबारा ,
उन्हों ने किसी का नाम ले पुकारा,
झटके से खड़ी हो गईं।

हम जैसे गए थे लौट आए,

घर पहुँचे मुँह लटकाए,
पिताजी बोले-
अब क्या फ़ायदा ,
मुँह लटकाने से ,
आग लगे ऐसी जवानी में,
डूब मरो चुल्लू भर पानी में
नहीं डूब सकते तो आँखें फोड़ लो,
नहीं फोड़ सकते हमसे नाता ही तोड़ लो।

जब भी कहीं आते हो,

पिटकर ही आते हो ,
भगवान जाने कैसे चलते हो?
अब आप ही बताइए,
क्या करूँ, कहाँ जाऊँ?
कहाँ तक गुण आऊँ अपनी इस आँख के,
कमबख़्त जूते खिलवाएगी,
लाख दो लाख के,
अब आप ही संभालिये,
मेरा मतलब है कि कोई रास्ता निकालिए।

जवान हो या वृद्धा, पूरी हो या अद्धा
केवल एक लड़की जिसकी आँख चलती हो,
पता लगाइए और मिल जाये तो,
हमारे आदरणीय काका जी को बताइए।



शैल चतुर्वेदी
 
very nice....shareef logo ko aesi automatic aankhe paresan jaroor karti he...........jaroori bhi he verna har kisi ki chalne lagegi........very nice poem..
 
how are you anjalis

bhut lumbi kavita likh di


but isme me kuch or jood deta hu

Khubsoorat hain woh lub
Jo pyari batein kartey hain
Khubsoorat hai woh muskurahat
Jo doosron ke chehron per bhi muskan saja de
Khubsoorat hai woh dil
Jo kisi ke dard ko samjhey
Jo kisi ke dard mein tadpey
Khubsoorat hain woh jazbat
Jo kisi ka ehsaas karein
Khubsoorat hai woh ehsaas
Jo kisi ke dard ke me dawa baney
Khubsoorat hain woh batein
Jo kisi ka dil na dukhaein
Khubsoorat hain woh ansoo
Jo kisi ke dard ko mehsoos kerke beh jae
Khubsoorat hain woh hath
Jo kisi ko mushkil waqat mein tham lein
Khubsoorat hain woh kadam
Jo kisi ki madad ke liye aagey badhein !!!!!
Khubsoorat hai woh soch
Jo kisi ke liye acha sochey
Khubsoorat hai woh insan
Jis ko khuda ne ye
Khubsoorati ada ki.
Or woh khusnaseeb hai,
Jinhe aap jaise khubsoorat DOST milein
jaise aap

Rajeev tomar
 
Last edited by a moderator:
Dosto Maa ko kuch iss trah samjh lo na

Maa to Maa hoti haaaaaaaa

M-O-T-H-E-R
M is for the million things she gave me,
O means only that she’s growing old,
T is for the tears she shed to save me,
H is for her heart of purest gold;
E is for her eyes, with love-light shining,
R means right, and right she’ll always be,
Put them all together, they spell “MOTHER,”
A word that means the world to me.

samjh sako to samjh lo
Rajeev tomar
 
अजनबी अपना ही साया हो गया है
खून अपना ही पराया हो गया है

मांगता है फूल डाली से हिसाब

मुझपे क्या तेरा बकाया हो गया है

बीज बरगद में हुआ तब्दील तो

सेर भी बढ़कर सवाया हो गया है

बूँद ने सागर को शर्मिंदा किया

फिर धरा का सृजन जाया हो गया है

बात घर की घर में थी अब तक 'किरण'

राज़ अब जग पर नुमायाँ हो गया है



कविता किरण
 
बैखोफ हू , इस ज़माने से मैं क्यों डरु |
इरादे हो जिनके मजबूत वो रुकते नहीं |
लड़ जाते हैं वो हर चीज से डरते नहीं |
बैखोफ हू , इस ज़माने से मैं क्यों डरु||

कर देते हैं हर चीज को वो आसान |
इरादों के साथ जो चलते रहें |
बैखोफ हू , इस ज़माने से मैं क्यों डरु ||

डर-डर के जीने का मैं आदि नहीं |
लड़ लड़ के बढ़ने का आदि हू मैं |
बैखोफ हू , इस ज़माने से मैं क्यों डरु ||

पूछता हू आज तुमसे मैं एक बात |
डर-डर के जीने का क्या है राज |
बैखोफ हू , इस ज़माने से मैं क्यों डरु |
बैखोफ हू , इस ज़माने से मैं क्यों डरु ||

Manish Rana ...
 
Came across few lines , would like to share----

Gita ki kasam tumhe, tumhe kasam Quran ki,
Bible ki hai kasam, tumhe kasam imaan ki.

Desh ki pukaar hai, pukaar hai samaaj ki.
Rashtra dharam ban gayi hai ekta hi aaj ki
Desh ki samridhi mein lagaa do baaji jaan ki.

Desh, bhasha, jatiyon ke beech na vivaad ho,
Har hridya vishaal ho ek samvidhan ho,
Aa gayi kathin ghadi parakh tere imaan ki.

Daav, pecho ne hamare dharam ko jakad liya,
Mook dharam, ho vivash tadap raha bilakh raha
Hato nahi svadharam se kasam tere jabaan ki.

- Sadashiv Pandey
 
Din dhalne ko haan, suraj aanthim chand lamho ki roshni liye, adhkhule se darwajo se jhakhtha hua, shyad yehi kehna chahtha haan,

E- mushafir, na rahein khatem honi haan, na manzilo ki talash, na saahil khatam hone haan, na hi pyaas, pjir jaane kyon tu udhaas haan, h sagar pass tere phir kis chiz ki tujhe pyas haan, lahre pe sawar yeh zindagi ka safar kisi ke liye nahi rukhtha, waqt ka tham daman tu chala chal, milen lakh dukh raho main, tu badha chal, ki manzil na sahi rahi toh milenge, na mile moti e kamyabi toh kya,tu badha chal.


Kya hua jo chand sapne tuth bhi jayenge, kya hua jo kuch rahi chut jayenge, safar e zindagi issi ka naam haan, haan hum sab rahi iske, bas chalne ka kaam haan.
 
 
जीवन में आ रही अब देरी जल्दी,
क्या खोना क्या ही कुछ पाना है,
आँखों से तेरी है जग सुन्दर सा,
अब है जाना और पहचाना भी,
विकल हो रही लहर मिल जाने को,
नहीं अकेली वो इस सागर में,
है वह जी रही सागर के संग,
पवन संग है प्रीत वो रखती,
सरसराती आती पवन,
गीत प्रेम के गाती पवन,
कैसे रहती चुप लहर भी,
आने लगी ध्वनी कल-कल,
अद्भुत नज़ारा इस प्रेम क्रीडा का,
मचलते रहे वे सारी रात,
अरमान दिलों से निकलते रहे,
हो रही अठखेलियाँ,
क्या जानते थे वे..
अब आनी है सुबह भी,
देख हकीकत लहर अपनी,
आ बैठी सकते से में,
कैसे भूली वह है जीना सागर के संग,
फिर चाहे हो अपना या ना भी हो,
टपक पड़ीं कुछ बूंदें नमकीन,
जो ढूँढा तो एक ना मिली,
खो बैठीं सागर तन में,
नहीं बस.. यूँ ही...!!
सोच रही थी,
आज या फिर कल,
कम से कम एक बार,
बात कर लेती पवन से,
पर कोई बात नहीं,
उसे पता है.. अच्छी तरह,
कि मेरे और उसके बीच,
कहीं कुछ ठीक नहीं होना,
फिर भी हो कब तक इंतजार,
हैं चुप ख़यालात अब उसके,
क्या कहती वह... बस "अलविदा"
हाँ अलविदा मेरे दोस्त मेरे हमदम......


THIS IS WRITTEN BY A JAT N I've COPIED IT.........
 
Last edited:
भले किसी और की हो जाएं​
ये गहरी काली आंखें​
वे सितारे मेरी स्मृति के अलाव में​
रह-रह कर चमकते रहेंगे जो ​
उस छोटी-सी मुलाकात में​
चमके थे तुम्हारी आंखों में​
भटकाव के बीहड़ वन में​
वे ही होंगे पथ-संकेतक​
गहन अंधियारे में​
दिशासूचक ध्रुवतारा​
तुम मेरे मन का कुतुबनुमा हो​
अभौतिक अक्षांसों के ​
अलौकिक फेरे​
संभव नहीं हैं तुम्हारे बिना​
जीवन लालसा के तट पर​
हांफ़ते रहने का नाम नहीं ​
किंतु अब निर्वाण भी ​
प्राथमिकता में नहीं है​
मोक्ष के बदले​
रहना चाहता हूं​
तुम्हारी स्मृति के अक्षयवट में​
पर्णहरित की तरह​
स्नेह की वह सुनहरी लौ​
नहीं चाहता – नहीं चाहता​
वह बेहिसाब उजाला​
अब तुम्हें पाने की​
कोई आकांक्षा शेष नहीं​
जगत-जीवन के ​
कार्य-व्यापार में​
प्रेम का तुलनपत्र​
अब कौन देखे !​
अपने अधूरे प्रेम के ​
जलयान में शांत मन​
चला जाना चाहता हूं​
विश्वास के उस अपूर्व द्वीप की ओर​
जहां मेरी और तुम्हारी कामनाओं​
के जीवाश्म विश्राम कर रहे हैं ।


​
 
किस तरह से और कैसे-कैसे
कितना प्यार करता हूं तुझसे
काश कि कह पाता मैं ये तुझको
या काश कि जानती तू बिना कहे


कहने को तो सारी पीड़ाएं
यूं तुझ से हम कह जाते
इस पागलपन का हाल सारा
और दीवानगी की सारी बातें


कहते-कहते लेकिन रुक जाऊं
मन ये जाने क्या-क्या सोचे
स्वीकार नहीं है इस दिल को
कि मैं कहूं और तु परेशान रहे


तू तो पूरी जिन्दगी है मेरी
नहीं महज एक हिस्सा है
जान न पाये तू कभी जो
वो मेरे रोने का किस्सा है


सुनते न वो ’हां’ जो तेरी तो
शायद अभी हम कुछ और होते
फ़र्क तुझे क्या पड़ता है लेकिन
आंसू ये बहते हैं तो बहे


रुला-रुला जाये उदासीनता तेरी
बेरुखी तेरी कर दे विकल
इतनी मुहब्बत किसी पर्वत से करुँ
वो भी अब तक जाता पिघल


इस अथाह पीड़ा से ऊबकर
जी चाहे अब जीना छोड़ दे
कब तक करें यूँ ही प्रतीक्षा
दर्द ये कब तक और सहें
 
Last edited:
Anokha manzar

Anokha manzar

Zindgee kaa anokha manzar
Marney ko tayaar liye khanzar
Zameen ho rahee bilkul banzar
Insaan banta jaa raha kanzar

Insaaniyat ko ho raha eikdum Danger
Ped Bech rahe khulam khula Ranger
Agey kya hoga mein karu wonder
Jhooti shaan agey karoon surrender
 
कब खामोश कर दे दिल को ये हिचकियाँ, पता
कब लगे भिनभिनाने, मक्खियाँ क्या पता

हादसों का शहर है, हादसों से भरी है जिंदगी

कब चीखकर माँग उठे बैसाखियाँ, क्या पता

उड़ जा रे पक्षी शाख छोड़कर, बेदर्द जमाना

कब आ जाये पर कतरने लेकर कैंचियाँ,क्या पता

जीवन है एक नदिया, तुम सीख ले उसमें तैरना

कब तक मिलेगी माँ की थपकियाँ,क्या पता

मत देर कर,लगा ले उससे नेह,दुखों के सैलाब में

कब बह जाये कागज की ये किश्तियाँ, क्या पता

 
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