Hindi Kavita

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कब खामोश कर दे दिल को ये हिचकियाँ, पता
कब लगे भिनभिनाने, मक्खियाँ क्या पता

हादसों का शहर है, हादसों से भरी है जिंदगी

कब चीखकर माँग उठे बैसाखियाँ, क्या पता

उड़ जा रे पक्षी शाख छोड़कर, बेदर्द जमाना

कब आ जाये पर कतरने लेकर कैंचियाँ,क्या पता

जीवन है एक नदिया, तुम सीख ले उसमें तैरना

कब तक मिलेगी माँ की थपकियाँ,क्या पता

मत देर कर,लगा ले उससे नेह,दुखों के सैलाब में

कब बह जाये कागज की ये किश्तियाँ, क्या पता



Bahut khub Zanaab
 
तुम्हें देखकर मुझे यूँ लग रहा है,
समर्पण में कोई कमी रह गयी है,


मधुर प्यारे के उन सुगन्धित क्षणों में,
तुम्हें मुझसे कोई शिकायत नहीं थी,
न कोई गिला था तुम्हारे हृदय में,
परस्पर कहीं कुछ अदावत नहीं थी,
बिना बात माथे की इन सलवटों में ,
उदासी की जो बेबसी दीखती है ,
सशंकित मेरा मन है, या बेरुख़ी है ,
या अर्पण में कोई कमी रह गयी है,


अगर दिल में कोई भी नाराज़गी थी,
तो खुल कर कभी बात करते तो क्या था,
दिखावे की ख़ातिर न यूँ मुस्कुराते,
मुझे देखकर न सँवरते तो क्या था,
मैं खोया रहा मंद मुस्कानों में ही,
न उलझन भरी भावना पढ़ सका मैं,
मेरी आँख ने कुछ ग़लत पढ़ लिया था,
या दर्पण में कोई कमी रह गयी है,


विगत में जो तारीकियों के सहारे,
उजालो की सद्कल्पना हमने की थी,
वचन कुछ लिए कुछ दिए थे परस्पर,
सवालों की शुभकामना हमने की थी,
उन्हीं वायदों में की शपथ के भरोसे,
मैं ख़ुशियों की बरात ले आ गया हूँ,
भटकती हैं यादों की प्रेतात्माएं,
या तर्पण में कोई कमी रह गयी है. 
 
तुम्हें देखकर मुझे यूँ लग रहा है,
समर्पण में कोई कमी रह गयी है,





मधुर प्यारे के उन सुगन्धित क्षणों में,
तुम्हें मुझसे कोई शिकायत नहीं थी,
न कोई गिला था तुम्हारे हृदय में,
परस्पर कहीं कुछ अदावत नहीं थी,
बिना बात माथे की इन सलवटों में ,
उदासी की जो बेबसी दीखती है ,
सशंकित मेरा मन है, या बेरुख़ी है ,
या अर्पण में कोई कमी रह गयी है,


अगर दिल में कोई भी नाराज़गी थी,
तो खुल कर कभी बात करते तो क्या था,
दिखावे की ख़ातिर न यूँ मुस्कुराते,
मुझे देखकर न सँवरते तो क्या था,
मैं खोया रहा मंद मुस्कानों में ही,
न उलझन भरी भावना पढ़ सका मैं,
मेरी आँख ने कुछ ग़लत पढ़ लिया था,
या दर्पण में कोई कमी रह गयी है,


विगत में जो तारीकियों के सहारे,
उजालो की सद्कल्पना हमने की थी,
वचन कुछ लिए कुछ दिए थे परस्पर,
सवालों की शुभकामना हमने की थी,
उन्हीं वायदों में की शपथ के भरोसे,
मैं ख़ुशियों की बरात ले आ गया हूँ,
भटकती हैं यादों की प्रेतात्माएं,



या तर्पण में कोई कमी रह गयी है. 
Bahut umdaa zannab.


Mere paas Hindi ki kavitaun kee dhaang laag rahi hai.The problem to transliterate here.
 
रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है
जाने कब से रूहों का ये ज़िस्म बदलना जारी है

तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए

सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है

जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा

फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है

बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था

एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है

तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से

वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है
 
A very nice and simple poem about placidity with an hint of melancholy. It penetrates deep into the soul and you can easily feel the emptiness.


ख़ामोशी - वर्तिका

बरसों से ख़ामोशी खानाबदोश हुआ करती थी
मेरी कठोर हंसी उसे घर बनाने ही कहाँ देती.
जब भी उतरती फिज़ा में,
एक छनाके के साथ उतरती
और एक ही झटके में
चकनाचूर कर डालती,
चुप्पी की
आखिरी ईंट तक!
पर देखो,
अब कैसे इत्मीनान से पसरी बैठी है
यह हमारे दरमयां ..
यकीं जो है इसे भी,
के अब जो तुम चले गए हो
कभी ना लौटने की खातिर,
तो रुख न करेगी इधर का
यह कमबख्त हंसी भी
दुबारा कभी,

ख़ामोशी को है घर मिल गया
और मेरी हंसी
खानाबदोश सी फिरा करती हैं अब ..



Cheers
Jit
 
very nice..
A very nice and simple poem about placidity with an hint of melancholy. It penetrates deep into the soul and you can easily feel the emptiness.


ख़ामोशी - वर्तिका

बरसों से ख़ामोशी खानाबदोश हुआ करती थी
मेरी कठोर हंसी उसे घर बनाने ही कहाँ देती.
जब भी उतरती फिज़ा में,
एक छनाके के साथ उतरती
और एक ही झटके में
चकनाचूर कर डालती,
चुप्पी की
आखिरी ईंट तक!
पर देखो,
अब कैसे इत्मीनान से पसरी बैठी है
यह हमारे दरमयां ..
यकीं जो है इसे भी,
के अब जो तुम चले गए हो
कभी ना लौटने की खातिर,
तो रुख न करेगी इधर का
यह कमबख्त हंसी भी
दुबारा कभी,

ख़ामोशी को है घर मिल गया
और मेरी हंसी
खानाबदोश सी फिरा करती हैं अब ..



Cheers
Jit
 
A very nice and simple poem about placidity with an hint of melancholy. It penetrates deep into the soul and you can easily feel the emptiness.


ख़ामोशी - वर्तिका

बरसों से ख़ामोशी खानाबदोश हुआ करती थी
मेरी कठोर हंसी उसे घर बनाने ही कहाँ देती.
जब भी उतरती फिज़ा में,
एक छनाके के साथ उतरती
और एक ही झटके में
चकनाचूर कर डालती,
चुप्पी की
आखिरी ईंट तक!
पर देखो,
अब कैसे इत्मीनान से पसरी बैठी है
यह हमारे दरमयां ..
यकीं जो है इसे भी,
के अब जो तुम चले गए हो
कभी ना लौटने की खातिर,
तो रुख न करेगी इधर का
यह कमबख्त हंसी भी
दुबारा कभी,

ख़ामोशी को है घर मिल गया
और मेरी हंसी
खानाबदोश सी फिरा करती हैं अब ..



Cheers
Jit

excellent very nice attempt.
 
रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है
जाने कब से रूहों का ये ज़िस्म बदलना जारी है

तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए

सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है

जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा

फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है

बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था

एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है

तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से

वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है

@tomar sahab bahut hi behatreen
 
Kabhi, Sochta Hu Ki, Kash Vo Saath Hote Mere!
Jo Na Pass Hokar bhi, Hai Pass Itne Mere!!
Unko Bhula Kar Jeena Mukaddash-E-Tanhai Hoga!
Akhir, Vo Hai To, To Vo Hai, To, Apne Mere!!
 
अखिल विश्व शुभ मंगलकारी आशा के प्रतिदर्श
शुभागमन से संभव हो संभवतः चहुदिश हर्ष
स्वागत हे नव वर्ष !

ज्ञान ध्यान विज्ञान विशारद मानवता कहती है
विषय भोग भौतिकता में कब कहाँ शान्ति रहती है
मूल्यों और आदर्शों से वंचित नस्लें थोथी हैं
अर्थ प्रधान जगत में भारती भारत को रोती है
तुम आओ तो मिट जायेगा शायद ये संघर्ष
स्वागत हे नव वर्ष !

संगणक संजाल का कैसा महाजाल विस्तृत है
मायावी कृत्रिम रिश्तों में कहाँ व्यक्ति रससिक्त है
घोर बुनावट महा बनावट का श्रृंगार शोभित है
हे शुभांक तेरे आगम पर कर प्रणाम अर्चित है
तुम आओ तो आये शायद सच्चा सा उत्कर्ष
स्वागत हे नव वर्ष !

दादी माँ की किस्सागोई सासू का उपदेश
बाबा नाना बुआ फूफा रिश्ते हुए विदेह
एकल और अधूरे संबंधों की सुलग अजब सी
डार से बिखरी रात की रानी दिखती बे रौनक सी
तुम आओ तो साथ ले आना थोडा संदल खस
स्वागत हे नव वर्ष !

सृष्टि से ही उपजे हैं हम पर दूर हुए स्रष्टा से
राम कृष्ण गौतम ईसा और गांधी सम द्रष्टा से
रामायण बाइबल अब केवल धर्मस्थल की शोभा
इस तटस्थता से विकास संस्कृति का कैसे होगा
तुम आओ तो संग संग आये स्वर्णिम भारत वर्ष
स्वागत हे नव वर्ष !

आगे आगे बढ़ने का आकर्षक विभ्रम फैला
ज्ञान चक्षु से देखो दीखता सबकुछ धुंधला मैला
अन्तःकरण की उन्नति का संकल्प हमें करना है
नाम हमारे मानवता का ऋण हमें भरना है
तुम आओ संग साथी लाओ धर्म मूल्य आदर्श
स्वागत हे नव वर्ष !
 
.

Perfect start for A New Year with this nice and inspiring poem by Nirmla Joshi.


नया वर्ष - निर्मला जोशी

वर्ष!
हर्ष, उत्कर्ष
नव जीवन दो।
घुटन भरी
सांसों को
स्पन्दन दो।

बीत गईं यूँ ही
कितनी सदियाँ
विषभार वहन
करती हैं नदियाँ,
दूर दूर तक
यह मौन उदासी
इस पानी की
हर मछली प्यासी।
अब नूतन रस
पावन
सावन दो।

चिपके-चिपके
अंधियारे छूटें
विकल विषमता के
बंधन टूटें,
गीत नया
परिभाषित हो निखरे
छन्दों के घर
इन्द्र धनुष उतरे।
इतिहास
नया हो
संवेदन दो।



Happy New Year to All ..



Cheers
Jit
 
अजनबी लड़की के लिए

मैं पिछले कुछ दिनों से
सुन रहा हूँ ,
तुम्हारी सरगोशी,
और अब
सच ये है के
तुम ही को सोचता हूँ .मैं
खिंच गयी हो तुम
मन में
एक लकीर
कच्चे कोलतार की सड़क पे
पड़े पहिये के न मिट्ने वाले निशान के जैसी
हाँ-हाँ मुझे स्वीकार है
मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
और मुझे ये भी स्वीकार है
के तुम्हें पाने और ना पाने के बीच
बहुत सी दूरियां हैं,और कारण हैं
मसलन ,
तुम्हें जानता भी नहीं
तुमसे मिला भी नहीं
देखा भी कहाँ है तुमको
अलावा
उस एक धुंधली सी तस्वीर के
जो है मेरे ख्यालों में
और वैसे भी
तुम्हारे मेरे दर्मियां फ़ासला भी है
मीलों का,
प्रेम करना और उसे पाना
दो भिन्न-भिन्न बातें हैं
इस जनम में तो तुम्हें शायद पा ना सकूँ
और कई जनम लेने होंगे तुम्हें पाने को ...........
जनम तो शायद दुबारा हो भी जाएं
मगर प्रेम …
क्या
दुबारा हो सकेगा
तो क्या ये ख्वाब ये संकल्प अधूरा ही रहेगा
जनमों जनमों तक..???
 
अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना ,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन ,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत ,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं ,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना ।

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना ,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना ।

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना ।

मरना जीना बस में कहाँ है अपने ,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना ।

दर्द कभी आखरी नहीं होता ,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।

मंज़िल को पाना जरुरी भी नहीं ,
मंज़िलो से सदा फासला रखना ।

सूरज तो रोज ही आता है मगर ,
अपने दिलो में ' दीप ' को जला कर रखना
 
.

A B'ful n' thought rendering creation that touches deep inside the soul, you can easily feel Poet's conflict with-in and the introspection.


अर्थहीन - विकास कुमार

नहीं! मेरी भावनाएँ बंधन नहीं मानती.
शर्तें एवं वर्जनाएँ किसी और के लिये होंगी.
इन क्षुद्र सांसारिक नियमों पर
ना ही मेरी कोई आस्था है
और ना ही इनके प्रति कोई दायित्व.
व्यर्थ के भय मुझे भयभीत नहीं करते.
मैं डरता हूँ सिर्फ़ उस इंसान से
जो मेरे अंदर बैठता है, नित.
तुम्हारे कानून तुम्हारे लिये होंगे
मेरे विश्व में बस उसका कानून चलता है.
वादी, प्रतिवादी और न्यायाधीश -
सब यहाँ अर्थ खो देते हैं.
स्वत्व के आगे यदि कोई है – तो ब्रह्म.
और मेरा अंत:करण ’अहं ब्रह्मास्मि’ के राग गाता
सभी चुनौतियों को चुनौती देता है.
अभिमान एवं स्वाभिमान के मध्य की सूक्ष्म रेखा
सूक्ष्म होते-होते विलीन हो गयी है.




Cheers
Jit
 
Realy wonderful lines Jit sahab...
.

A B'ful n' thought rendering creation that touches deep inside the soul, you can easily feel Poet's conflict with-in and the introspection.


अर्थहीन - विकास कुमार

नहीं! मेरी भावनाएँ बंधन नहीं मानती.
शर्तें एवं वर्जनाएँ किसी और के लिये होंगी.
इन क्षुद्र सांसारिक नियमों पर
ना ही मेरी कोई आस्था है
और ना ही इनके प्रति कोई दायित्व.
व्यर्थ के भय मुझे भयभीत नहीं करते.
मैं डरता हूँ सिर्फ़ उस इंसान से
जो मेरे अंदर बैठता है, नित.
तुम्हारे कानून तुम्हारे लिये होंगे
मेरे विश्व में बस उसका कानून चलता है.
वादी, प्रतिवादी और न्यायाधीश -
सब यहाँ अर्थ खो देते हैं.
स्वत्व के आगे यदि कोई है – तो ब्रह्म.
और मेरा अंत:करण ’अहं ब्रह्मास्मि’ के राग गाता
सभी चुनौतियों को चुनौती देता है.
अभिमान एवं स्वाभिमान के मध्य की सूक्ष्म रेखा
सूक्ष्म होते-होते विलीन हो गयी है.




Cheers
Jit
 
पतझड़ का जब मौसम बीता
तुमको याद किया मैंने,
दिन गज़रा जब रीता-रीता,
तुमको याद किया मैंने।

जब दिल पर दस्तक होती थी,

ऐसा लगता था तुम आए,
फिर दिल को समझा देते थे,
धुंधली सी यादों के साए।

तन्हाई से जब की बातें,

तुमको याद किया मैंने,
और कटी जब तनहा रातें,
तुमको याद किया मैंने।

और कहें अब कैसे तुमसे,

अपने पागल दिल की हालत।
जिसने इसको कभी न समझा,
बस उसकी करता है चाहत।

जब दिल के अन्दर कुछ टूटा,

तुमको याद किया मैंने।
अपनों से जब अपना छूटा ,
तुमको याद किया मैंने।

आने वाला हर एक मौसम,

जाने वाला हर एक मौसम,
जाने क्या लेकर आएगा,
देकर जाएगा कितने ग़म।

फूलों को जब देखा गुमसुम,

तुमको याद किया मैंने।
याद आए मुझको हर लम्हा तुम,
तुमको याद किया मैंने।
 
एक रहस्य




मन की सौ परतों के भीतर
है एक रहस्य छिपा मुझमें


वह किरनों-सा तीखा,पैना,
वह हिरनों-सा चचल, आतुर,
वह सपनों-सा मोहक, मादक,
वह अपनों-सा अपना, प्रियतर
मुझमें है एक रहस्य छिपा
मन की सौ परतों के भीतर ।

वह मुझे मूक कर देता है,
वह मुझमें अनगिन स्वर भरता,
निश्चल, निस्पन्द बनाता है,
जीवन भर की जड़ता हरता है,
मुझमें एक रहस्य छिपा
मन की सौ परतों के भीतर ।

कितना ही उसे दबाता हूँ
वह उभरा-उघरा आता है,
कितना ही उसे बताता हूँ
वह व्यक्त नहीं हो पाता है,
है छिपा हुआ मन के भीतर
सौ परतों में कोई रहस्य ।

फिर कभी-कभी ऐसा होता-
मन है ? परतें हैं ? या रहस्य ?:
यह जान नहीं मैं पाता हूं;
पर मुझे ज्ञात इतना अवश्य-
उसके ही कारण है मेरी
अनुरक्ति जगत में, जीवन में ।
है एक रहस्य छिपा मुझमें
सौ परतों के भीतर मन में ।
----अजित कुमार
 
Last edited:
.

An eye-opening thought-provoking deep poem that depicts the Real picture of Shining India.



इस्टेशन पर भीख मांगते भूखे बेबस बच्चे -
सिद्ध नाथ सिंह

इस्टेशन पर भीख मांगते भूखे बेबस बच्चे.
आप फख्र से फरमाते हैं हाल शहर के अच्छे.

बोते बोते बीज बिदेसी देखें सपन सुनहले.
कीड़ामार दावा क्यूँ पीते कृषक फसल से पहले.

खेती गयी सड़क के नीचे भूमिहीन हो भटके
शूटर बने मुम्बई छानें छोरे गंगा तट के.

सूख गया पानी धरती का अंधे हुए इनारे.
बसे शहर आ होरी धनिया नाले गंद किनारे.

खींची खूब गरीबी की है किसने ऐसी रेखा.
अच्छे खाते पीतों को ही इसके नीचे देखा.

जो खानाबदोश हो घूमें हैं रिकार्ड से बाहर
और सब्सिडी भोग रहे हैं एक से एक धुरंधर.

सत्ता की साडी में लिपटी कपट नीति इठलाती
दल दल के दलदल में डूबी न्याय नियम की थाती.

गली गली में ड्रग मिलती है केवल दवा निठोहर,
पांच साल में फिर पूछेंगे कहाँ लगेगी मोहर.

सड़के सब फूटपाथ खा गयीं,हैराँ चलनेवारे.
बादशाह कारों में चलते पल पल प्यादे मारे.

लूट अपराध अपहरण बनते क्यों सत्ता की सीढी
क्यों ऐसे हालात बनी है मुलजिम सारी पीढी.

जनता का धन मिलीभगत से आये सारे खाने.
स्वयंसेवकों की सेवा से जनता लगी ठिकाने.

जन्म जयंती में शादी में करते खर्च करोड़ों.
दूर रहो ,जूठन पर आना भूखे निपट निगोड़ों.

गोरी चिट्टी चमड़ी लेकर करते धंधे काले.
ले शहीद का नाम बिल्डिंगें चढ़ें सैकड़ों माले.

बाप बिचारा लाता बेटा मरा हुआ रिक्शे पर.
हेलिकोप्टेरों में उड़ते हैं सत्ता के सौदागर.

क्या वसंत क्या पतझर प्यारे क्या सावन क्या भादों
हंसी ख़ुशी जी रहे जहां सब जाओ आग लगा दो.

तांडव के सारे अनुयायी तडपे त्यक्त तपस्या.
धनलक्ष्मी रहती तिजोरिओं में असूर्यम्पश्या .

अमन चैन का करते रहते इत उत रेज़ा रेज़ा.
चीत्कार चहुँ ओर सुनें तो इनका बढे कलेजा.

हाल हुआ बेहाल मुल्क का अब भगवान् बचाएं.
अंधे पीस रहे बेचारे केवल कुत्ते खाएं.




Cheers
Jit
 
मेरा परिचय​

हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

मै शंकर का वह क्रोधानल, कर सकता जगती क्षार-क्षार
डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं, जिसमें नाचता भीषण संहार
रणचंडी की अतृप्त प्यास, मैं दुर्गा का उन्मत्त हास
मै यम की प्रलयंकर पुकार, जलते मरघट का धुंआधार
फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती में आग लगा दूं मैं
यदि धधक उठे जल थल अंबर, जड चेतन तो कैसा विस्मय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

मै आज पुरुष निर्भयता का वरदान लिए आया भू पर
पय पीकर सब मरते आए, मैं अमर हुआ लो विष पीकर
अधरों की प्यास बुझाई है, मैंने पीकर वह आग प्रखर
हो जाती दुनिया भस्मसात, जिसको पल भर में ही छूकर
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन
मै नर नारायण नीलकण्ठ बन गया, न इसमें कुछ संशय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

मै अखिल विश्व का गुरु महान, देता विद्या का अमर दान
मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग, मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान
मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर
मेरा स्वर्णाभा में गहरा-गहरा, सागर के जल में चेहरा-चेहरा
इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मैं
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

मैं तेजःपुन्ज तम लीन जगत में फैलाया मैंने प्रकाश
जगती का रच करके विनाश, कब चाहा है निज का विकास
शरणागत की रक्षा की है, मैंने अपना जीवन देकर
विश्वास नहीं यदि आता तो साक्षी है इतिहास अमर
यदि आज देहलि के खण्डहर सदियों की निद्रा से जगकर
गुंजार उठे उनके स्वर से हिंदू की जय तो क्या विस्मय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

दुनिया के वीराने पथ पर, जब जब नर ने खाई ठोकर
दो आँसू शेष बचा पाया जब जब मानव सब कुछ खोकर
मैं आया तभी द्रवित होकर, मैं आया ज्ञान दीप लेकर
भूला-भटका मानव पथ पर चल निकला सोते से जगकर
पथ के आवर्तों से थककर, जो बैठ गया आधे पथ पर
उस नर को राह दिखाना ही मेरा सदैव का दृढनिश्चय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥


मैने छाती का लहू पिला, पाले विदेश के सुजित लाल
मुझको मानव में भेद नहीं, मेरा अन्तःस्थल वर विशाल
जग से ठुकराए लोगों को लो मेरे घर का खुला द्वार
अपना सब कुछ हूं लुटा चुका, पर अक्षय है धनागार
मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयों का वह राजमुकुट
यदि इन चरणों पर झुक जाए कल वह किरिट तो क्या विस्मय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

मैं वीरपुत्र मेरी जननी के जगती में जौहर अपार
अकबर के पुत्रों से पूछो क्या याद उन्हें मीना बझार
क्या याद उन्हें चित्तौड़ दुर्ग मे जलने वाली आग प्रखर
जब हाय सहस्त्रो माताएं तिल-तिल कर जलकर हो गईं अमर
वह बुझने वाली आग नहीं, रग-रग में उसे समाए हूं
यदि कभी अचानक फूट पड़े विप्लव लेकर तो क्या विस्मय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है, कर लूं सब को गुलाम
मैंने तो सदा सिखाया है, करना अपने मन को गुलाम
गोपाल राम के नामों पर, कब मैंने अत्याचार किया
कब दुनिया को हिंदू करने, घर-घर मे नरसंहार किया
कोई बतलाए काबुल में जाकर कितनी मस्जिद तोड़ी
भूभाग नहीं शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

मै एक बिंदु परिपूर्ण सिंधु है यह मेरा हिंदू समाज
मेरा इसका संबंध अमर मैं व्यक्ति और यह है समाज
इससे मैंने पाया तन-मन, इससे मैंने पाया जीवन
मेरा तो बस कर्त्तव्य यही, कर दूं सब कुछ इसके अर्पण
मैं तो समाज की थाति हूं, मैं तो समाज का हूं सेवक
मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय
हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय॥

-अटल बिहारी वाजपेयी
 
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