Hindi Kavita

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अधूरा सुन्दर --बलदेव वंशी



It may be my poem.isse pahle Dinkar ji ki @ line likhna chahunga.


जब साहित्य पढ़ो तब पहले पढ़ो ग्रन्थ प्राचीन,
पढ़ना हो विज्ञान अगर तो पोथी पढ़ो नवीन।
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अधूरा है!
इसीलिए सुन्दर है!
दुधिया दांतों तोतला बोल
बुनाई हाथों के स्पर्श का अहसास!
ऊनी धागों में लगी अनजानी गांठें, उचटने
सिलाई के टूटे-छूटे धागे
चित्र में उभरी, बे-तरतीब रंगतें-रेखाएं

शायद इसीलिए

अभावों में भाव अधिक खिलते हैं,
चुभते आलते और खलते हैं

एक टीस की अबूझ स्मृति

जीवनभर सालने वाली
आकाश को ड़ो फांक करती तड़ित रेखा
और ऐसा ही और भी बहुत कुछ
जिसे लोग अधूरा या अबूझ मानते आए हैं
उसे ही सयाने लोग
पूरा और सुन्दर बखानते गए हैं

चाहे हुए रास्ते, जीवन और पूरे व्यक्ति

कहाँ मिलते हैं!
नियति के हाथों
औचक मिले
मानसिक घाव
पूरे कहाँ सिलते हैं!...
 
मेला

घर वापस जाने की सुध-बुध बिसराता है मेले में
लोगों की रौनक में जो भी रम जाता है मेले में

किसको याद आते हैं घर के दुखड़े, झंझट और झगडे

हर कोई खुशियों में खोया मदमाता है मेले में

नीले-पीले, लाल-गुलाबी पहनावे हैं लोगों के

इन्द्र धनुष का सागर जैसे लहराता है मेले में

सजी सजाई हाट-दुकानें खेल - तमाशे और झूले

कैसा- कैसा रंग सभी का भरमाता है मेले में

जेबें खाली कर जाते हैं क्या बच्चे और क्या बूढे

शायद ही कोई कंजूसी दिखलाता है मेले में

तन तो क्या मन भी मस्ती में झूम उठता है हर इक का

जब बचपन का दोस्त अचानक मिल जाता है मेले में

जाने अनजाने लोगों में फर्क नहीं दिखता कोई

जिस से बोलो वो अपनापन दिखलाता है मेले में

डरकर हाथ पकड़ लेती है हर माँ अपने बच्चे का

ज्यों ही कोई बिछुड़ा बच्चा चिल्लाता है मेले में

ये दुनिया और दुनियादारी एक तमाशा है भाई

हर बंजारा भेद जगत के समझाता है मेले में

रब ना करे कोई बेचारा मुहँ लटकाए घर लौटे

जेब अपनी कटवाने वाला पछताता है मेले में

राम करे हर गाँव - नगर में मेला हर दिन लगता हो

निर्धन और धनी का अन्तर मिट जाता है मेले में
 
hum sab to ranmanch ke actor hai.jo is world mai apna-2 part nibha kar chale jaate hai.
koi achi acting kar leta hai and taaliya pata hai.koi buri acting karke gaaliya.
hai to sab kuchh usi Supreme Power ka.is poem mai iasa hi kuchh likha hai.
hope karta hu ki pasand aayengi.



मुझमे जो कुछ अच्छा है, सब उसका है
मेरा जितना भी चर्चा है, सब उसका है

उसका मेरा रिश्ता बड़ा पुराना है
मैंने जो कुछ सोचा है, सब उसका है

मेरी आँखे उसके नूर से रोशन है
मैंने जो कुछ देखा है, सब उसका है

मैंने जो कुछ खोया है, सब उसका था
मैंने जो कुछ पाया है, सब उसका है

जितनी बार मै टूटा हू , वो टूटा था
इधर उधर जो बिखरा है, वो उसका है

 
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The earliest Hindi Kavita - by Amir Khusro !!​

मुकरियाँ
( अमीर खुसरो )

रात समय वह मेरे आवे। भोर भये वह घर उठि जावे॥
यह अचरज है सबसे न्यारा। ऐ सखि साजन? ना सखि तारा॥

बिन आये सबहीं सुख भूले। आये ते अँग-अँग सब फूले॥
सीरी भई लगावत छाती। क्यों सखि साजन? ना सखि पाति॥


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​


तोड़ पाड दिए ... धन्यवाद दयानंद जी
इसकी तो एक ऑडियो भी अपलोड कर दो अपनी आवाज में
 
जीणा – किते किसा, किते किसा
जीणा
किते किसा, किते किसा
जिसा देखा सै, वो उसा
जीणा
जीणा जोहड़ के म्हां नंगे बालक की ऊहद-सा
थण पकड़ कै धार लेते नाक मैं लागै दूध-सा
जेठ के महीने मैं ठण्डे पाणी की औक-सा
नई बोड़िया के हाथां तैं लीपे साफ़-सुथरे चौके-सा
टेशण के लोहे के बैंच पै सोणा, किसे फकीर का
तख़्त की जड़ मैं बैठ कै देखणा सांग रांझे-हीर का
परस की बुर्जी पै साबण तैं नहाणा किसे जनेती का
सुःख-चैन तैं धन का आणा बोई फसल पछेती का
या फेर छः भाईयाँ की बहाण का
थके-हारे का ताते पाणी तैं नहाण का
सजनी का मिलणा रोज़ का
चाहे किसे साधू की मौज़ का
नाम जीणा तो सै
शहद का पीणा तो सै
हंसी के गेल्या छोह भी तो सै
एक जीणा वो भी तो सै


जीणा
पाणी के बार पै, लड़ै सांप के ज़हर-सा
घुप्प अन्धेरा, पौ का पॉला रात के आखरी पहर-सा
पायाँ मैं चुभती सूल-सा
बोदे डाहले की झूल-सा
याणे बालक की टोक-सा
घा कै चिपटी जोंक-सा
कुत्ते आले हाड्ड-सा
बांगर मैं आई बाढ़-सा
फसल उजड़ण की सोच-सा
घायल साँप की लोच-सा
थाम जग मैं टोहवोगे जिसा, पाओगे उसा
किते किसा, किते किसा
जिसा देखो सै, वो उसा
जीणा
किते किसा, किते किसा



भाई जगबीर रही की मर्मस्पर्शी कविता ... अगर आछी लगी हो to बतइयो और भी hain घनी सारी
 
जिंदगी तेरे शिकवे सुनता हूँ,
हर रोज तेरे अधूरे सपने बुनता हूँ.
तूने कभी पुकारा ही नहीं,
इस भागदौड़ से उबारा ही नहीं.
हर किसी की उम्मीद थी मुझसे,
मौका ही नहीं दिया मिलनेका तुझसे.
इस भगदड़ में वक्त कटता ही गया,
दुनिया और तेरे बीच मैं बंटता ही गया.
फिर भी अधूरे रह ही गए हैं सपने,
छोड़ गए बीच में ही मुझको अपने.
अब सोचता हूँ थोडा सा ठहर जाऊं,
जिंदगी तुझको गले से लगाऊं.
बहुत हो गया था जो दूर तुझसे,
अब पास थोडा सा पास आ जाऊं.
हां तेरा अपराधी हूँ मैं, जो चाहे सजा दे,
चाहे तो रोक ले या फिर जाने दे.
पर इस बार आया हूँ तो एक दफा मिलने दे.
यादों के कमल फिर से खिलने दे....
 
really nice lines bro.
Zindagi tujhe har lamha main yaad kartha hu, tujhe milne ki fariyaad kartha hu, tu milthi nahi mujhse3 phir bhi milne ki aas kartha hu, is ghathi hui zindgani main bas itna hi mera fasana h, kal tak tu tarasthi thi ,aaj mujhe aanshu bahana h, jab waqt tha tujhse mile nahi, teri bewafai ka gila nahi, jab tune pukara main kahin or tha, kaise kahun wo shama jawani ki rawani ka kuch or tha, ab maut ki saaiya pe tujhe yaad kartha hu, aakhir baar tujhse milne ki fariyaad kartha hu, aaj sab kuch haan pass mere bas tu nahi h, sach h ,jo jeeve zindagi ko wo log ab kam hi haan, wo log ab kam hi h.
जिंदगी तेरे शिकवे सुनता हूँ,
हर रोज तेरे अधूरे सपने बुनता हूँ.
तूने कभी पुकारा ही नहीं,
इस भागदौड़ से उबारा ही नहीं.
हर किसी की उम्मीद थी मुझसे,
मौका ही नहीं दिया मिलनेका तुझसे.
इस भगदड़ में वक्त कटता ही गया,
दुनिया और तेरे बीच मैं बंटता ही गया.
फिर भी अधूरे रह ही गए हैं सपने,
छोड़ गए बीच में ही मुझको अपने.
अब सोचता हूँ थोडा सा ठहर जाऊं,
जिंदगी तुझको गले से लगाऊं.
बहुत हो गया था जो दूर तुझसे,
अब पास थोडा सा पास आ जाऊं.
हां तेरा अपराधी हूँ मैं, जो चाहे सजा दे,
चाहे तो रोक ले या फिर जाने दे.
पर इस बार आया हूँ तो एक दफा मिलने दे.
यादों के कमल फिर से खिलने दे....
 
हाँ, उन्हें हक है कि मांग ले वो हमारी ख़ुशी का वरदान,
वो भी तो तिल तिल हुए हैं हमारे लिए बलिदान.
सारी जिंदगी जो जिए हैं बस हमारे ही वास्ते,
ताकि खुशियों से जगमगायें हमारे रास्ते.

खुद को जिन्होंने झोक दिया मेहनत की भट्टी में,
ताकि ये सुकोमल पौधे पनप सके उस मट्टी में.
जिन्होंने ना कभी गर्मी और सर्दी की परवाह की,
और ना कभी किसी सुख की ही चाह की.

जन्म से ही शुरू हुआ जो स्नेह का अटूट बंधन,
सिंचित करता ही गया वो मेरा बचपन और जीवन.
जिन्होंने पुष्पित किया ये मेरा जीवन रुपी सुमन,
उनको करता रहूँ मैं जीवन भर नमन,

अगर पूछोगे कि कौन है वो, लो बतलाता हूँ मैं,
राज ये भी खोलके दिखलाता हूँ मैं,
नहीं वो नहीं कोई देवपुरुष थे,
ना ही जन साधारण के लिए महापुरुष थे.

वो तो थे मेरे माता पिता,
परन्तु मेरे लिए थे विधाता....


 
अग्नि देश से आता हूँ मैं!

झुलस गया तन, झुलस गया मन,
झुलस गया कवि-कोमल जीवन,
किंतु अग्नि-वीणा पर अपने दग्*ध कंठ से गाता हूँ मैं!
अग्नि देश से आता हूँ मैं!

स्*वर्ण शुद्ध कर लाया जग में,
उसे लुटाता आया मग में,
दीनों का मैं वेश किए, पर दीन नहीं हूँ, दाता हूँ मैं!
अग्नि देश से आता हूँ मैं!

तुमने अपने कर फैलाए,
लेकिन देर बड़ी कर आए,
कंचन तो लुट चुका, पथिक, अब लूटो राख लुटाता हूँ मैं!
अग्नि देश से आता हूँ मैं!



----हरिवंशराय बच्चन
 
अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
साजन आए, सावन आया।

धरती की जलती साँसों ने
मेरी साँसों में ताप भरा,
सरसी की छाती दरकी तो
कर घाव मुझपर गहरा,
है नियति-प्रकृति की ऋतुयों में
संबंध कहीं कुछ अनजाना,
अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
साजन आए, सावन आया।

तूफान उठा जब अंबर में
अंतर किसने झकझोर दिया,
मन के सौ बंद कपाटों को
क्षण भर के अंदर खोल दिया,
झोंका जब आया मधुवन में
प्रिय का संदेश लिए आया-
ऐसी निकली हो धूप नहीं
जो साथ नहीं लाई छाया।
अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
साजन आए, सावन आया।

घन के आँगन से बिजली ने
जब नयनों से संकेत किया,
मेरी बे-होश-हवास पड़ी
आशा ने फिर से चेत किया,
मुरझाती लतिका पर कोई
जैसे पानी के छींटे दे,
औ' फिर जीवन की साँसें ले
उसकी म्रियामाण-जली काया।
अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
साजन आए, सावन आया।


रोमांच हुआ अवनी का
रोमांचित मेरे अंग हुए,
जैसे जादू के लकड़ी से
कोई दोनों को संग छुए,
सिंचित-सा कंठ पपिहे का
कोयल की बोली भीगी-सी,
रस-डूबा, स्*वर में उतराया
यह गीत नया मैंने गाया।
अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
साजन आए, सावन आया।



---------- हरिवंशराय बच्चन
 
रामनरेश त्रिपाठी

मैं ढूँढता तुझे था, जब कुंज और वन में
तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में

तू 'आह' बन किसी की, मुझको पुकारता था

मैं था तुझे बुलाता, संगीत में भजन में

मेरे लिए खड़ा था, दुखियों के द्वार पर तू

मैं बाट जोहता था, तेरी किसी चमन में

बनकर किसी के आँसू, मेरे लिए बहा तू

आँखे लगी थी मेरी, तब मान और धन में

बाजे बजाबजा कर, मैं था तुझे रिझाता

तब तू लगा हुआ था, पतितों के संगठन में

मैं था विरक्त तुझसे, जग की अनित्यता पर

उत्थान भर रहा था, तब तू किसी पतन में

बेबस गिरे हुओं के, तू बीच में खड़ा था

मैं स्वर्ग देखता था, झुकता कहाँ चरन में

तूने दिया अनेकों अवसर न मिल सका मैं

तू कर्म में मगन था, मैं व्यस्त था कथन में

तेरा पता सिकंदर को, मैं समझ रहा था

पर तू बसा हुआ था, फरहाद कोहकन में

क्रीसस की 'हाय' में था, करता विनोद तू ही

तू अंत में हँसा था, महमूद के रुदन में

प्रहलाद जानता था, तेरा सही ठिकाना

तू ही मचल रहा था, मंसूर की रटन में

आखिर चमक पड़ा तू गाँधी की हड्डियों में

मैं था तुझे समझता, सुहराब पीले तन में

कैसे तुझे मिलूँगा, जब भेद इस कदर है

हैरान होके भगवन, आया हूँ मैं सरन में

तू रूप कै किरन में सौंदर्य है सुमन में

तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में

तू ज्ञान हिन्दुओं में, ईमान मुस्लिमों में

तू प्रेम क्रिश्चियन में, तू सत्य है सुजन में

हे दीनबंधु ऐसी, प्रतिभा प्रदान कर तू

देखूँ तुझे दृगों में, मन में तथा वचन में

कठिनाइयों दुखों का, इतिहास ही सुयश है

मुझको समर्थ कर तू, बस कष्ट के सहन में

दुख में न हार मानूँ, सुख में तुझे न भूलूँ

ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में
 
2 kavita

Posting two poem.first one is a Najam rather than poem.Second poem is written by my all time favourite poet Ramdhari Singh Dinkar............

1.
क्यूँ ज़माने पे ऐतबार करूँ
अपनी आँखों को अश्कबार करूँ
सिर्फ़ ख्वाबों पे ऐतबार करूँ
दिल ये कहता है तुझसे प्यार करूँ

मेरी रग-रग में है महक तेरी

मेरे चेहरे पे है चमक तेरी
मेरी आवाज़ में खनक तेरी
ज़र्रे - ज़र्रे में है धनक तेरी

क्यूँ न मैं तुझपे दिल निसार करूँ

दिल ये कहता है तुझसे प्यार करूँ

तुझपे कुरबां करूँ हयात मेरी

तुझसे रोशन है कायनात मेरी
बिन तेरे क्या है फिर बिसात मेरी
जाने कब होगी तुझसे बात मेरी

कब तलक दिल को बेक़रार करूँ

दिल ये कहता है तुझसे प्यार करूँ

मेरी आँखों की रोशनी तू है

मेरी साँसों की ताजगी तू है
मेरी रातों की चांदनी तू है
मेरी जां तू है, ज़िन्दगी तू है

हर घड़ी तेरा इन्तिज़ार करूँ

दिल ये कहता है तुझसे प्यार करूं

तू ही उल्फ़त है, तू ही चाहत है

अब फ़क़त तेरी ही ज़रूरत है
हसरतों की ये एक हसरत है
इश्क़ से बढ़के भी इबादत है?

तुझको ख्वाबों से क्यूँ फरार करूँ

दिल ये कहता है तुझसे प्यार करूँ




2.
सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं
बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं





समाना चाहता है, जो बीन उर में
विकल उस शुन्य की झनंकार हूँ मैं
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं





जिसे निशि खोजती तारे जलाकर
उसीका कर रहा अभिसार हूँ मैं
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं



कली की पंखडीं पर ओस-कण में
रंगीले स्वपन का संसार हूँ मैं
मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं





मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं
रुंदन अनमोल धन कवि का, इसी से
पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं





मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी
समा जिस्में चुका सौ बार हूँ मैं





न देंखे विश्व, पर मुझको घृणा से
मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं
पुजारिन, धुलि से मुझको उठा ले
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं





सुनुँ क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं





दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा का
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं
सजग संसार, तू निज को सम्हाले
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं





बंधा तुफान हूँ, चलना मना है
बँधी उद्याम निर्झर-धार हूँ मैं
कहूँ क्या कौन हूँ, क्या आग मेरी
बँधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं
 
दीप्ति नवल

1.
अजनबी रास्तों पर
पैदल चलें
कुछ न कहें

अपनी-अपनी तन्हाइयाँ लिए
सवालों के दायरों से निकलकर
रिवाज़ों की सरहदों के परे
हम यूँ ही साथ चलते रहें
कुछ न कहें
चलो दूर तक

तुम अपने माजी का
कोई ज़िक्र न छेड़ो
मैं भूली हुई
कोई नज़्म न दोहराऊँ
तुम कौन हो
मैं क्या हूँ
इन सब बातों को
बस, रहने दें

चलो दूर तक
अजनबी रास्तों पर पैदल चलें।

2.
वो नहीं मेरा मगर उससे मुहब्बत है तो है
ये अगर रस्मों, रिवाज़ों से बग़ावत है तो है

सच को मैंने सच कहा, जब कह दिया तो कह दिया
अब ज़माने की नज़र में ये हिमाकत है तो है

कब कहा मैंने कि वो मिल जाये मुझको, मैं उसे
गर न हो जाये वो बस इतनी हसरत है तो है

जल गया परवाना तो शम्मा की इसमें क्या ख़ता
रात भर जलना-जलाना उसकी किस्मत है तो है

दोस्त बन कर दुश्मनों- सा वो सताता है मुझे
फिर भी उस ज़ालिम पे मरना अपनी फ़ितरत है तो है

दूर थे और दूर हैं हरदम ज़मीनों-आसमाँ
दूरियों के बाद भी दोनों में क़ुर्बत(सामीप्य) है तो है
 
A nice deep touching poem that depicts emptiness of the April month. Truly makes you feel Nostalgic !


एहसास - शीतल श्रीवस्तव

फिर वही महीना,
फिर वही मौसम
आँखों में उतरने लगा
यादों की दिल्लगी,
एहसासों का समुन्दर
हौले से साँसों में मचलने लगा
वे सूखे पत्ते,
वह पीपल की छाँव
दुपहरिया मे सुस्ताता ओसारे में गाँव
वह इमली,
वह बरगद वह बगीचे का पड़ाव
वह दादी की कहानी,
वह दुपहरिया मे सियार का विवाह
वह गेहूँ का कटना
वह रात का खलिहान
वह मन्दिर की घण्टी
वह मस्जिद का अजान
फिर वही उलझन,
फिर वही सवाल
एक बारगी फिर घाव करने लगा
फिर वही महीना,
फिर वही मौसम
आँखों में उतरने लगा।



Cheers
Jit
 
Last edited:
भगवतीचरण वर्मा
बस इतना,अब चलना होगा
फिर अपनी-अपनी राह हमें ।

कल ले आई थी खींच, आज
ले चली खींचकर चाह हमें
तुम जान न पाईं मुझे, और
तुम मेरे लिए पहेली थीं;
पर इसका दुख क्या? मिल न सकी
प्रिय जब अपनी ही थाह हमें ।

तुम मुझे भिखारी समझें थीं,
मैंने समझा अधिकार मुझे
तुम आत्म-समर्पण से सिहरीं,
था बना वही तो प्यार मुझे ।
तुम लोक-लाज की चेरी थीं,
मैं अपना ही दीवाना था
ले चलीं पराजय तुम हँसकर,
दे चलीं विजय का भार मुझे ।

सुख से वंचित कर गया सुमुखि,
वह अपना ही अभिमान तुम्हें
अभिशाप बन गया अपना ही
अपनी ममता का ज्ञान तुम्हें
तुम बुरा न मानो, सच कह दूँ,
तुम समझ न पाईं जीवन को
जन-रव के स्वर में भूल गया
अपने प्राणों का गान तुम्हें ।

था प्रेम किया हमने-तुमने
इतना कर लेना याद प्रिये,
बस फिर कर देना वहीं क्षमा
यह पल-भर का उन्माद प्रिये।
फिर मिलना होगा या कि नहीं
हँसकर तो दे लो आज विदा
तुम जहाँ रहो, आबाद रहो,
यह मेरा आशीर्वाद प्रिये ।
 
ज़िन्दगी क्यों अजब इक पहेली सी है
क्षण में अंजान ,क्षण में सहेली सी है ।

है उल्लास थोडा, भय भी कुछ है मिला
काँपती नव-वधू की हथेली सी है ।

कोहरे मे रात के, भोर की ये किरण
तप्त मरु में जो खिलती चमेली सी है ।

नगर की धुंध में, स्वप्न बन रह गयी
गाँव की उस पुरानी हवेली सी है ।

मत्त श्रॄंगार में, प्रौढ से बेखबर
नार इतरा के चलती नवेली सी है ।

नीम की शाख के रस में लिपटी हुई
खट्टी ईमली, कभी गुड की भेली सी है ।

सूखे हैं पात सारे, रंग सबके उडे
लगती क्यों 'मन' को फिर भी रंगोली सी है ।
 
श्यामनन्दन किशोर

चमड़ी मिली खुदा के घर से
दमड़ी नहीं समाज दे सका
गजभर भी न वसन ढँकने को
निर्दय उभरी लाज दे सका

मुखड़ा सटक गया घुटनों में
अटक कंठ में प्राण रह गये
सिकुड़ गया तन जैसे मन में
सिकुड़े सब अरमान रह गये

मिली आग लेकिन न भाग्य-सा
जलने को जुट पाया इन्जन
दाँतों के मिस प्रकट हो गया
मेरा कठिन शिशिर का क्रन्दन

किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया

श्वेत माँग-सी विधवा की,
चदरी कोई इन्सान दे गया
और दूसरा बिन माँगे ही
ढेर लकड़ियाँ दान दे गया

वस्त्र मिल गया, ठंड मिट गयी,
धन्य हुआ मानव का चोला
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।

कहते मरे रहीम न लेकिन,
पेट-पीठ मिल एक हो सके
नहीं अश्रु से आज तलक हम,
अमिट क्षुधा का दाग धो सके

खाने को कुछ मिला नहीं सो,
खाने को ग़म मिले हज़ारों
श्री-सम्पन्न नगर ग्रामों में
भूखे-बेदम मिले हज़ारों

दाने-दाने पर पाने वाले
का सुनता नाम लिखा है
किन्तु देखता हूँ इन पर,
ऊँचा से ऊँचा दाम लिखा है

दास मलूका से पूछो क्या,
'सबके दाता राम' लिखा है?
या कि गरीबों की खातिर,
भूखों मरना अन्जाम लिखा है?

किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया ।

जुटा-जुटा कर रेजगारियाँ,
भोज मनाने बन्धु चल पड़े
जहाँ न कल थी बूँद दीखती,
वहाँ उमड़ते सिन्धु चल पड़े

निर्धन के घर हाथ सुखाते,
नहीं किसी का अन्तर डोला
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।

घरवालों से, आस-पास से,
मैंने केवल दो कण माँगा
किन्तु मिला कुछ नहीं और
मैं बे-पानी ही मरा अभागा

जीते-जी तो नल के जल से,
भी अभिषेक किया न किसी ने
रहा अपेक्षित, सदा निरादृत
कुछ भी ध्यान दिया न किसी ने

बाप तरसता रहा कि बेटा,
श्रद्धा से दो घूँट पिला दे
स्नेह-लता जो सूख रही है
ज़रा प्यार से उसे जिला दे

कहाँ श्रवण? युग के दशरथ ने,
एक-एक को मार गिराया
मन-मृग भोला रहा भटकता,
निकली सब कुछ लू की माया

किन्तु अचानक लगा कि यह,
घर-बार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी,
मरने पर उपकार हो गया

आश्चर्य वे बेटे देते,
पूर्व-पुरूष को नियमित तर्पण
नमक-तेल रोटी क्या देना,
कर न सके जो आत्म-समर्पण !

जाऊँ कहाँ, न जगह नरक में,
और स्वर्ग के द्वार न खोला !
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।
 
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