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महादेवी वर्मा


दीप मेरे जल अकम्पित,
घुल अचंचल!
सिन्धु का उच्छवास घन है,
तड़ित, तम का विकल मन है,
भीति क्या नभ है व्यथा का
आंसुओं से सिक्त अंचल!
स्वर-प्रकम्पित कर दिशायें,
मीड़, सब भू की शिरायें,
गा रहे आंधी-प्रलय
तेरे लिये ही आज मंगल

मोह क्या निशि के वरों का,
शलभ के झुलसे परों का
साथ अक्षय ज्वाल का
तू ले चला अनमोल सम्बल!

पथ न भूले, एक पग भी,
घर न खोये, लघु विहग भी,
स्निग्ध लौ की तूलिका से
आंक सबकी छांह उज्ज्वल

हो लिये सब साथ अपने,
मृदुल आहटहीन सपने,
तू इन्हें पाथेय बिन, चिर
प्यास के मरु में न खो, चल!

धूम में अब बोलना क्या,
क्षार में अब तोलना क्या!
प्रात हंस रोकर गिनेगा,
स्वर्ण कितने हो चुके पल!
दीप रे तू गल अकम्पित,
चल अंचल!
 
आरसी प्रसाद सिंह


मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
चकाचौंध से भरी चमक का जादू तड़ित-समान दे दिया।
मेरे नयन सहेंगे कैसे यह अमिताभा, ऐसी ज्वाला?
मरुमाया की यह मरीचिका? तुहिनपर्व की यह वरमाला?
हुई यामिनी शेष न मधु की, तूने नया विहान दे दिया।
मैंने एक किरण मांगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।

अपने मन के दर्पण में मैं किस सुन्दर का रूप निहारूँ?
नव-नव गीतों की यह रचना किसके इंगित पर बलिहारूँ?
मानस का मोती लेगी वह कौन अगोचर राजमराली?
किस वनमाली के चरणों में अर्पित होगी पूजा-थाली?
एक पुष्प के लोभी मधुकर को वसन्त-उद्यान दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।

मलयानिल होता, तो मेरे प्राण सुमन-से फूले होते।
पल्लव-पल्लव की डालों पर हौले-हौले झूले होते।
एक चाँद होता, तो सारी रात चकोर बना रह जाता।
किन्तु, निबाहे कैसे कोई लाख-लाख तारों से नाता?
लघु प्रतिमा के एक पुजारी को अतुलित पाषाण दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।

ओ अनन्त करुणा के सागर, ओ निर्बन्ध मुक्ति के दानी।
तेरी अपराजिता शक्ति का हो न सकूँगा मैं अभिमानी।
कैसे घट में सिन्धु समाए? कैसे रज से मिले धराधर।
एक बूँद के प्यासे चातक के अधरों पर उमड़ा सागर।
देवालय की ज्योति बनाकर दीपक को निर्वाण दे दिया।
मैंने एक किरण माँगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।

मुँहमांगा वर देकर तूने मेरा मंगल चाहा होगा।
शायद मैंने भी याचक बन अपना भाग्य सराहा होगा।
इसीलिए, तूने गुलाब को क्या काँटों की सेज सुलाया?
रत्नाकर के अन्तस्तल में दारुण बड़वानल सुलगाया?
अपनी अन्ध वन्दना को क्यों मेरा मर्मस्थान दे दिया?
मैंने एक किरण मांगी थी, तूने तो दिनमान दे दिया।
 
A fine touching poem by famous Punjabi poet Amrita Pritam that reflects emptiness, you get a haunting sinking feeling after reading it.


धूप का टुकड़ा - अमृता प्रीतम


मुझे वह समय याद है—
जब धूप का एक टुकड़ा सूरज की उंगली थाम कर
अंधेरे का मेला देखता उस भीड़ में खो गया।
सोचती हूँ : सहम का और सूनेपन का एक नाता है
मैं इसकी कुछ नहीं लगती
पर इस खोए बच्चे ने मेरा हाथ थाम लिया
तुम कहीं नहीं मिलते
हाथ को छू रहा है एक नन्हा सा गर्म श्वास
न हाथ से बहलता है न हाथ को छोड़ता है
अंधेरे का कोई पार नहीं
मेले के शोर में भी ख़ामोशी का आलम है
और तुम्हारी याद इस तरह जैसे धूप का एक टुकड़ा...






RIP Amrita Ji ..
 
पथ जीवन का पथरीला भी, सुरभित भी और सुरीला भी।
गड्ढे, काँटे और ठोकर भी, है दृष्य कहीं चमकीला भी।


पथ के अवरोध हटाने में, कुछ हार गये कुछ जीत गये,
चलते - चलते दिन माह वर्ष सदियाँ बीतीं युग बीत गये,
फिर भी यह अगम पहेली सा रोमांचक और नशीला भी।
पथ जीवन का पथरीला भी, सुरभित भी और सुरीला भी।

चलना उसको भी पड़ता है चाहे वह निपट अनाड़ी हो,
चक्कर वह भी खा जाता है चाहे वह कुशल खिलाड़ी हो,
संकरी हैं गलियाँ, मोड़ तीव्र, है पंथ कहीं रपटीला भी।
पथ जीवन का पथरीला भी, सुरभित भी और सुरीला भी।

जादूगर, जादूगरी भूल जाते हैं इसके घेरे में
बनते मिटते हैं विम्ब कई इस व्यापक घने अंधेरे में,
रंगों का अद्*भुत मेल, कि कोई खेल, लगे सपनीला भी।
पथ जीवन का पथरीला भी, सुरभित भी और सुरीला भी।

कौतूहल हैं मन में अनेक, उठते हैं संशय एक एक,
हम एक गाँठ खोलते कहीं, गुत्थियाँ उलझ जातीं अनेक,
निर्माता इसका कुशल बहुत, पर उतना ही शर्मीला भी।
पथ जीवन का पथरीला भी, सुरभित भी और सुरीला भी।
 
पथ जीवन का पथरीला भी, सुरभित भी और सुरीला भी।
गड्ढे, काँटे और ठोकर भी, है दृष्य कहीं चमकीला भी।


पथ के अवरोध हटाने में, कुछ हार गये कुछ जीत गये,
चलते - चलते दिन माह वर्ष सदियाँ बीतीं युग बीत गये,
फिर भी यह अगम पहेली सा रोमांचक और नशीला भी।
पथ जीवन का पथरीला भी, सुरभित भी और सुरीला भी।


Awesome poem bhai, thanks for sharing!
 
क्यूंकि
मैं ग़रीब का बेटा हूँ ...



ज़िन्दगी को सितम मैं कहता हूँ
मजबूरियों में भी खुश रहता हूँ .
चंद बूंदों से पेट भर लेता हूँ.

क्यूंकि
मैं ग़रीब का बेटा हूँ ...

ठंडी में ठिठुर लेता हूँ ,
बरसात में भीग लेता हूँ,
गर्मी पाँव जलाती है
तो पत्थरो पे मैं सो लेता हूँ .

क्यूंकि
मैं ग़रीब का बेटा हूँ ...

कभी सब्जी , तो कभी कुछ न मिले,
नमक , रोटी पे मैं जी लेता हूँ,
ज़ख़्म चाहे जैसा भी हो,
थोड़ी हल्दी मैं लगा लेता हूँ ,

क्यूंकि
मैं ग़रीब का बेटा हूँ ...

एक कमीज़ , एक पतलून ,
रोज़ बिना साबुन मैं धोता हूँ ,
भरी दुकानों की रोनक देख ,
अक्सर खुश मैं हो लेता हूँ ,

क्यूंकि
मैं ग़रीब का बेटा हूँ ...

ग़म भी बहुत हैं .. दर्द भी हैं.
दिल में सब दबा लेता हूँ ,
कभी अकेले , तो कभी सब के सामने ,
आँखों से अंगूठा भिगो लेता हूँ ,

क्यूंकि
मैं ग़रीब का बेटा हूँ ...
 
Last edited:

ठंडी में ठिठुर लेता हूँ ,
बरसात में भीग लेता हूँ,
गर्मी पाँव जलाती है
तो पत्थरो पे मैं सो लेता हूँ .


Bahut achi poem hai.intzaar ka fal meetha hi mila.thnx dear.
 
यादों को धूप दिखाओ कि
सर्द तन्हाई का मौसम है।
धीरे-धीरे
एक-एक याद की पर्त खोलो,
गर्द झाड़ो,
कोई याद बिसर न जाए ध्यान रहे,
कोई याद बिखर न जाए भान रहे,
कोई याद टूट न जाए कहीं,
कोई याद फूट न जाए कहीं,
कोई याद रूठ न जाए कहीं,
कोई याद छूट न जाए कहीं।

हर याद हथेली पर रखो
वह छोटी हो या बड़ी,
मीठी हो या कड़वी ,
उजली हो या काली,
उसकी वज़ह से
ख़ुशी कि कोई रात मिली हो,
या बिना वज़ह मात मिली हो,
वह कोई भयावह सपना हो
या कि डर अपना हो

जिसकी याद इतनी पुरानी कि
जैसे पिछले जनम से
साथ चली आ रही हो
और अब यह डर कि
मर कर भी साथ रहेगी जैसे।

वे अब जैसी भी हैं सारी यादें
ज़रा सूरज तो दिखाओ उन्हें कि
सर्द तन्हाई का मौसम है।
 
एक भारतीय सियाचिन सैनिक का अपनी मरी हुई
माँ को लिखा हुआ खत-
प्रणाम माँ,
माँ बचपन में मैं जब भी रोते रोते
सो जाया करता था तो तू चुपके से मेरे
सिरहाने खिलोने रख दिया करती थी और
कहती थी की ऊपर से एक परी ने आके रखा
है और कह गई है की अगर मैं फिर कभी रोया तो और
खिलोने नहीं देगी ! लेकिन
इस मरते हुए देश का सैनिक बनके रो तो मैं आज
भी रहा हूँ पर अब ना तू आती
है और ना तेरी परी ! परी क्या .. यहाँ ढाई हजार
मीटर ऊपर तो परिंदा भी नहीं मिलता !
मात्र कुछ हज़ार रुपए के लिए मुझे कड़े अनुशासन में
रखा जाता है, लेकिन वो
अनुशासन ना इन भ्रष्ट नेताओं के लिए है और ना इन
मनमौजी देशवासियों के लिए !
रात भर जगते तो हम भी हैं लेकिन अपनी देश के
सुरक्षा के लिए लेकिन वो
जगते हैं लेट नाईट पार्टी के लिए !
हम इस -12 डिग्री में आग जला के अपने आप
को गरम करते हैं . लेकिन हमारे
देश के नेता हमारे ही पोशाकों, कवच, बन्दूकों,
गोलियों और जहाजों में
घोटाले करके अपनी जेबे गरम करते हैं !
आतंकियों से मुठभेड़ में मरे हुए
सैनिकों की संख्या को न्यूज़ चैनल नहीं
दिखाया जाता लेकिन सचिन के शतक से पहले आउट
हो जाने को देश के राष्टीय
शोक की तरह दिखाया जाता है !
हर चार-पांच सालों ने हमें एक जगह से दुसरे जगह
उठा के फेंक दिया जाता है
लेकिन यह नेता लाख चोरी करलें बार बार
उसी विधानसभा - संसद में पहुंचा दिए जाते हैं !
मैं किसी आतंकी को मार दूँ तो पूरी राजनितिक
पार्टियां वोट के लिए उसे बेकसूर बना के मुझे कसूरवार बनाने में लग जाती हैं
लेकिन वो आये दिन अपने अपने भ्रष्टाचारो से देश को आये दिन मारते हैं,
कितने ही लोग भूखे मरते हैं, कितने ही किसान आत्महत्या करते हैं, कितने ही बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं.
लेकिन उसके लिए इन नेताओं को जिम्मेवार नहीं ठहराया जाता.
निचे अल्पसंख्यको के नाम पर आरक्षण
बाटा जा रहा है लेकिन आज तक मरे हुए
शहीद सैनिकों की संख्या के आधार पर
कभी किसी वर्ग को आरक्षण नहीं दिया गया.
मैं दुखी हूँ इस मरे हुए संवेदनहीन देश का सैनिक
बनके ! यह हमें केवल याद करते हैं 26 जनवरी को और 15 अगस्त को !
बाकी दिन तो इनको शाहरुख़, सलमान,
सचिन, युवराज की फ़िक्र रहती है !
हमारी हालत ठीक वैसे ही उस पागल किसान
की तरह है जो अपने मरे हुए बेल पर
भी कम्बल डाल के खुद ठंड में ठिठुरता रहता है !
मैंने गलती की इस देश का रक्षक बनके !
तू भगवान् के ज्यादा करीब है तो उनसे कह
देना की अगले जन्म में मुझे अगर
इस देश में पैदा करे तो सेनिक ना बनाए और अगर
सैनिक बनाए तो इस देश में
पैदा ना करे !
यहाँ केवल परिवार वाद चलता है,
अभिनेता का बेटा जबरदस्ती अभिनेता बनता है
और नेता का बेटा जबरदस्ती नेता!
प्रणाम-
xxx सिंह (मरे हुए देश का जिन्दा सेनिक) !
भारतीय सैनिक सियाचिन .
​
 
Tale of a lonely life with hint of melancholy .. feels a bit low but portray by poet is placidly B'ful n' deep touching!


अपनी कहानी - विकास कुमार


देखते देखते बीत जाता है दिन -
हो जाती है शाम.
अख़बार के पन्ने बे पलटे रह जाते हैं.
फिर से नहीं धुल पाती परसों रात की थाली.
कपडे मुड़े चुमड़े बेतरतीब पड़े ही रह जाते हैं.
सब कुछ कर लेने की कोशिश में
रह जाती है कई चीजें अधूरी.


आकाश के एक कोने को पकड़ कर
तारों की गिनती करने की जिद -
जिद से आदत में तब्दील हो जाती है.


बारिश की बूंदें शरीर के दायें हिस्से को
धीरे धीरे गीली कर रही हैं -
देखकर भी शरीर अपनी जगह से नहीं हिलता.


बारिश न तो अच्छी लगती है ना ही बुरी.
बुरे और अच्छे के बीच की सीमारेखा का होना
ना होना औचित्यहीन हो जाता है.
कोई भी अच्छी चीज उतनी ही बुरी लगती है
जितनी कोई भी बुरी चीज अच्छी.


सड़क के किनारे पड़े कुत्ते
बड़े विद्वान दार्शनिक से जान पड़ते हैं.
एक के बाद एक यादें आती रहती हैं.
आँखों की नमी महसूसने की इच्छा भी महसूस नहीं होती.


कुछ था कभी जो छूट गया था -
की सोच में वक्त फिसल जाता है -
वैसे ही जैसे थोड़ी देर पहले
कच्ची सड़क पर एक बच्चा फिसला था.


कई चेहरे
खयालों में आ आ कर
गुम हो जाते हैं.


जीवन
एक काली सफ़ेद ईरानी फिल्म की तरह
चलता प्रतीत होता है.
भाव दिखते हैं,
भाषा समझ नहीं आती.
दूर कहीं बाख का संगीत बजता है -
नेपथ्य ध्वनि की तरह.


बिखरे हुए संगीत और सिमटे हुए संसार में
अपना होना -
एक फिल्म में चुपचाप खड़े रहने जैसा लगने लगता है.


अपनी ही कहानी में
आप अजनबियों की तरह पड़े रह जाते हैं.
देखते देखते बीत जाता है दिन
और शाम बहने लगती है.


Cheers,
Jit
 
अंधकार में जीते हैं-------अमित

अपने दोष दूसरों के सिर पर मढ़ कर
रोज घूँट-दो-घूँट दम्भ के पीते हैं।
ज्योति-पुंज के चिह्न टाँगकर दरवाजों पर
अपने-अपने अंधकार में जीते हैं।

प्रायः तन को ढकने में असमर्थ हुई,
कब की जर्जर हुई या कहें व्यर्थ हुई,
किन्तु मोह के आगे हम ऐसे हारे
रोज उसी चादर को बुनते सीते है।
अपने-अपने अन्धकार में जीते है।

जीवन एक पहेली है सबके आगे,
परिभाषाओं मे भी उग आते धागे,
निज मत की अनुशंसा में हैं व्यस्त सभी
सबके अपने साधन और सुभीते है।
अपने-अपने अन्धकार में जीते है।

महाबली भी यहाँ काल से छले गये,
विश्वविजयआकांक्षी कितने चले गये
किन्तु आज भी रक्त रक्त का प्यासा है,
शायद हम अनुभव के फल से रीते हैं
अपने-अपने अन्धकार में जीते है।

प्रवृत्तियाँ शिक्षा देतीं निर्लोभन की
जोंक बताती बात रक्त के अवगुन की.
असमंजस मे निर्विकार हो बैठे ज्यों
गीता के उपदेश हमी पर बीते हैं।
अपने-अपने अन्धकार में जीते है।
 
"ऐ नौजवां जाट तू इक अलग पहचान बन के चल,
जो भर दे जोश मुर्दों में वो जान बन के चल!
हर तरफ दिखने लगी मायावी इमारतें,
ढह जाए इक पल में सब,वो तूफान बन के चल...!!!!!!


दूर कर सदियों बनी ये नफरत की कड़वाहट,
तू खुद कभी 'भाई' , कभी 'सहारा' , बन के चल,
माँ बाप की बेटों से अब ख्वाहिश ही ना रही,
तू हर माँ-बाप के दिल का अरमान बन के चल...!!!!!!!


रूठ जाए तुझसे तेरा मुक़दर भी तो क्या.?
तू खुद ही हर मंज़िल का आह्वान बन के चल,
ना मंदिर, ना मस्ज़िद, ना गिरजाघर कभी बनना,
बनना चाहो गर कभी कुछ, तो खुला आसमान बन के चल...!!!!!!


किताबों में ना सिमट जाए ,
हो ऐसी जिंदगी तेरी,
इतिहास भी ना लिख पाए कभी,
वो दास्तान बन के चल,........!!!!!!!!


हर पलकें बिछी हो राह में आने के तेरे,
तू हर दिल अज़ीज ऐसा मेहमान बन के चल...!!!!!!!


ऐ नौजवां जाट तू इक अलग पहचान बन के चल,
जो भर दे जोश मुर्दों में वो जान बन के चल..."!!!!!!!!


(फेसबुक के नवदीप चौधरी के अकाउंट तें लिया स ,लिखी किः ने स बेरा ना ,पर भोत बढ़िया लागी )​
 
Last edited:
One fine piece of poetry that portrays helplessness, despair and sorrow of the poet due to unrequited love. Penetrates deep into the soul, B'ful.


तुम चले गए
- विकास कुमार


तुम चले गए

अपने साथ सारी संभावनाएं समेटे.
वो पल,
जो कई सुनहरे पलों के बीज हो सकते थे
रह गए अकेले - मेरी तरह.

फिर भी कुछ चीजें बची हैं मेरे पास.

मेरी आजादी -
जो एक बहाना है,
तुमसे कुछ ना कह पाने की कमजोरी के शर्म से बचने का.

यादें -
जो चुभती तो हैं कभी कभी
लेकिन साथ ही तुम्हारा अहसास भी दे जाती हैं, जो दवा है.

और फिर
अब मेरी भावनाएं असुरक्षित नहीं!
दिल को भी टूटने का डर नहीं!

आख़िर जब तुम ही नहीं हो -
तो डरूं भी तो किससे?
किसी और में इतना सामर्थ्य कहाँ?
किसी और को इतना अधिकार ही नही दिया मैंने.

आधी दुनिया दूर बैठे तुम - कहो!
क्या तुम्हारे अन्दर भी भावनाएं थी?
क्या तुम्हारे अन्दर भी वही डर था -
जिसने मुझे चुप बना दिया?

और क्या तुम्हे भी अफ़सोस होता है -
चुप्पी का?

और क्या तुम भी समझाते हो ख़ुद को
कि जो होता है भले के लिए होता है?


Cheers,
Jit
 
बाज़ार मैं घर खटाया ना करते

बेअक्लाँ नै समझाया ना करते
बेप्रीत गेल निभाया ना करते
ज़िन्दगी नै न्यू सताया ना करते
बाज़ार मैं घर खटाया ना करते

चाहे बरसै नैनाँ नीर-नीर
चाहे तन की होज्या लीर-लीर
चित्या-माण्ड्या हर चीर-चीर
चाहे रोवै माँ-बाप, बाहण-बीर
बस आगले-ए घर मैं सै सीर-सीर
बेटी नै घराँ बिठाया ना करते
बाज़ार मैं घर खटाया ना करते

चाहे बिगड़ै सारा हाल-चाल
चाहे बदलै दुनिया चाल-चाल
चाहे बिखा मैं बितैं साल-साल
मन पावै कितणा कॅाल़-कॅाल़
अर तन की उतरै छाल़-छाल़
सत तैं ध्यान हटाया ना करते
बाज़ार मैं घर खटाया ना करते

स्यान ना भूतल मैं सै शान-शान
बड़याँ का कहणा तू माऩ-माऩ
बालकां का राखै ध्यान-ध्यान
तेरी ताक मैं बैठ्या सारा ज़हान
बोल़ बख़त कै पिछाण-पिछाण
रोते नै और रूलाया ना करते
बाज़ार मैं घर खटाया ना करते

बात तेरी जाणो बणी-बणी
कितका बणर्या तू धनी-धनी
कदे बिक ना ज्या तेरी कणी-कणी
पीया कर बस छणी-छणी
नी तो बख़्त की लाठी तणी-तणी
भैंस बेच कै घोड़ी बिसाया ना करते
बाज़ार मैं घर खटाया ना करते


-----by jagbir rathi
​
 
परिवर्तन तो होगा लेकिन , ख़ूनी परिवर्तन होगा
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छीना झपटी , लूट मार , और चारों और तबाही है
चोर ही चोर की अदालत में देता यहाँ गवाही है
चोरी और सीना चोरी, ये सबकुछ सरकारी है
चोर चोर मौसेरे भाई, चोर ही जांच अधिकारी है
हर कुर्सी अंधी बहरी है, हर कुर्सी हत्यारी है
देश की गर्दन के ऊपर सिसायत का खुनी पंजा है
पुलिस और अफसरशाही का बढ़ता रोज शिकंजा है
संसद से ले कर सड़कों का, जंगले के कानून यहाँ
जिसने भी आवाज़ उठाई , होता उसका खून यहाँ
अब तो लगता है भारत में चंडी का नर्तन होगा
परिवर्तन तो होगा लेकिन, ख़ूनी परिवर्तन होगा

कितनी बार हमने तमाशा देखि परिवर्तन की आंधी का
हर कुर्सी पर बैठा देखा , चेहरा एक अपराधी का
इनको देखा, उनको देखा, देखा हर दरबार यहाँ
जिसको भी दिल्ली पहुचाया, निकला वो गद्दार यहाँ
सत्ता के ऊपर पूँजी का नाग देखी पड़ता है
हर मंत्री के चेहरे पर, एक दाग दिखाई पड़ता है
एक रात में ही सत्ता बईमान बना दी जाती है
अरबों खरबों की थैली ऊपर पहुचाई जाती है
महगाई का सच यही है, राज यही बर्बादी का
देश लूट कर खाना, मतलब बना आज़ादी का
रिश्वत खोर दलालों का, अब जूतों से वंदन होगा
परिवतन तो होगा लेकिन , ख़ूनी परिवर्तन होगा ..
By: Vivek Nyol
​
 
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस / गोपालप्रसाद

है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें सब बह जाया करते हैं।
है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं ।।
अक्सर दुनियाँ के लोग समय में चक्कर खाया करते हैं।
लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, इतिहास बनाया करते हैं ।।
यह उसी वीर इतिहास-पुरुष की अनुपम अमर कहानी है।
जो रक्त कणों से लिखी गई,जिसकी जयहिन्द निशानी है।।
प्यारा सुभाष, नेता सुभाष, भारत भू का उजियारा था ।
पैदा होते ही गणिकों ने जिसका भविष्य लिख डाला था।।
यह वीर चक्रवर्ती होगा , या त्यागी होगा सन्यासी।
जिसके गौरव को याद रखेंगे, युग-युग तक भारतवासी।।
सो वही वीर नौकरशाही ने,पकड़ जेल में डाला था ।
पर क्रुद्ध केहरी कभी नहीं फंदे में टिकने वाला था।।
बाँधे जाते इंसान,कभी तूफ़ान न बाँधे जाते हैं।
काया ज़रूर बाँधी जाती,बाँधे न इरादे जाते हैं।।
वह दृढ़-प्रतिज्ञ सेनानी था,जो मौका पाकर निकल गया।
वह पारा था अंग्रेज़ों की मुट्ठी में आकर फिसल गया।।
जिस तरह धूर्त दुर्योधन से,बचकर यदुनन्दन आए थे।
जिस तरह शिवाजी ने मुग़लों के,पहरेदार छकाए थे ।।
बस उसी तरह यह तोड़ पींजरा , तोते-सा बेदाग़ गया।
जनवरी माह सन् इकतालिस,मच गया शोर वह भाग गया।।
वे कहाँ गए, वे कहाँ रहे,ये धूमिल अभी कहानी है।
हमने तो उसकी नयी कथा,आज़ाद फ़ौज से जानी है।।
 
सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है।

करता नहीं क्यूं दूसरा कुछ बात चीत
देखता हूं मैं जिसे वो चुप तिरी मेहफ़िल में है।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है।

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है।

खींच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उम्मीद
आशिक़ों का आज जमघट कूचा-ए-क़ातिल में है।

यूं खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है।

-राम प्रसाद बिस्मिल
 
उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा क्या है?

हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?

दहर से क्यों खफ़ा रहे,
चर्ख का क्यों गिला करें,

सारा जहाँ अदू सही,
आओ मुकाबला करें।

कोई दम का मेहमान हूँ,
ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ,
बुझा चाहता हूँ।

मेरी हवाओं में रहेगी,
ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,
रहे रहे न रहे।-

शहीद ए आज़म
भगतसिंह



 
Maestro at its best, recitation at Jaipur Lit Festival 2010 ..



मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे - गुलज़ार

अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोइ तागा टूट गया या खत्म हुआ
फिर से बाँध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमे
आगे बुनने लगते हो,तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गांठ गिरह बुन्तर की
देख नहीं सकता है कोई
मैनें तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे,
मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे ||


Cheers
Jit
 
Life - an illusion, delusion or a mirage? Poet in hindsight tries to awaken, with the help of this B'ful philosophical creation.


जीवन मूल्य - एस. जे.


कभी यूँ ही राह चलते मैं सोच पड़ा
की कौन है ये, और कौन है वो
ये भीड़ है कैसी, ये झमघट कैसा |

सब चलते अपने भुलावे में
समेटे जीवन को चंद पहलुओं में
मान के खुद को कुछ और
दूसरे को कुछ और ही अनजाने में,
खींच एक छोटी सी गोल रेखा
यूँ करते अपना उसमे जीवन व्यतीत,
पर एक पल भी सोचा है क्या
की बंद जीवन की घुटती साँसे
क्या बादलों को छू पायेंगी ?
ये झूट-मूट की सीना जोरी
प्रतिदिन खुद से लड़ते रहना
भला कब तक ख़ुशी पहुँचाएगी ?

किसका क्या है, किसे पता है
बादल धुएँ का और चंद टुकड़े डोरी के
जिनके सहारे लटकता जीवन
कभी इस टहनी पे, कभी उस टहनी पे,
फिर भी समेटते हैं जीवन भर
वाष्प-बूंदों को स्वर्ण-लोटे में
पर प्यास का क्या है, वो न बुझेगी
भले समेट लो समंदर झोली में

क्या सचमुच फर्क पड़ता है आखिर
इन झूठे नामों और फीके रिश्तों से
ये लोभ नहीं, मन की माया है
क्या कोई भला इसको समझे,
भले जीवन भर आँसूं टपके
खुशियों के भ्रम में फिर भी जीते
ये मेरा है – ये मेरा है,
यही रट-रट पूर्ण जीवन बीते

तो इस निद्रा सी जीवन का क्या
जब बीत रहा सम्मुख असली जीवन
एक पल के लिए भी न पलकें खोली
बेरस सपनो का फिर खालीपन,
क्या मोल लगाएँ फिर इन सब का
कंकड़, मोती या सोने के भाव
जब जीवन का मोती ही न फूटा
मोल लगाने का फिर क्या रहा हिसाब ||


Cheers
Jit
 
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