Hindi Kavita

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My Favorite. Thanks for sharing :) :)
Got the idea of this thread from the movie "Maine Gandhi Ko Nahin Mara" directed by Jahnu Barua, with lead characters played superbly by Anupam Kher and Urmila Matondkar. It is a gripping tail of a family's struggle to treat the delusional dementia of their old father. A poem that runs through the movie is very inspirational and I thought I should share it with the readers. Here is the poem, especially for those who get disheartened by failures. The poem is by the famous Hindi poet Suryakant Tripathi Nirala.

But the idea behind this thread is not to share just this one poem,, rather I feel there are many more very meaningful, good hindi kavita,,, which is treat to read. So I request all the fellow members, who are interested in Hindi Poetry to post any gud "kavita" with poet name n other reference. I ll also keep coming with my fav. poems (n there r many....:)).

So here is Nirala's "Himmat Kerne Walon Ki Kabhi Haar Nahin Hoti"...

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती...


नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ्ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है

मन् का विश्वास रगों में साहस बनता है
चढ़ कर गिरना , गिर कर चढ़ना ना अखरता है
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती....


डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगता है
जा जा कर खाली हाथ लौट आता है
मिलते ना सहज ही मोती पानी में
बहता दूना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती....

असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो
क्या कमी रह गयी देखो और सुधार करो
जब तक ना सफल हो नींद चैन की त्यागो तुम
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती....
 
दिग्विजय के बेटे की व्यथा?

पापा तुम कब मरोगे?

दुनिया के बाप मर रहे हैं, तुम्ही रह गए बस...
चमचई के सर्वोत्तम शिखर पर पहुँच गए हो भला अब क्या चाहिए
पहले ही इतने कुकर्म कर ही चुके हो की आराम से बीस तिस साल तक गालिया सुनते रहोगे !!
फिर ज़िंदा रह के भी क्या उखाड़ लोगे ..

पापा तुम कब मरोगे?

आप मर जाते तो हमें अनाथ होने की सहानुभूति मिलती,
आपकी तेरहवी पर कपडे सपड़े मिलते...
कही और से ना सही मगर ओसामा अंकल और पकिस्तान भी हमें कुछ जकात फितरा मिल जाता ...
आप कब तक हमें इन सुविधाओं से मरहूम रखोगे ?

पापा तुम कब मरोगे

आप को कसाब भैया की कसम आपको मरना पडेगा !
आप शान्ति से मर जाए वरना शहीदों की विधवाओं से इतनी बददुवा मिल रही की अगले साल आपका कुत्ते की मौत मरना तय है
हे पिताजी इन पवित्र बददुवाओं से कैसे बचोगे ?

पापा तुम कब मरोगे

आपको तो पता ही है की आपको लोग कुत्ता कहने लगे हैं ...
पता नहीं क्यों पर मुझे भी आपके कुत्ता होने का यकीन होने लगा है ....
क्या मै कुत्ते की औलाद हूँ ??....
हे पिताजी आप ही बताएये की क्या मै कुत्ते की औलाद हू ???....
आप हमें "कुत्ते के बच्चे" की गालियों से मुक्त कब करोगे?

पापा तुम कब मरोगे
-------------Jay Shree Kant Shreevastava

​
 
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तंग गलियों से होकर
गुज़रता है कोई
आहिस्ता-आहिस्ता

फटा लिबास ओढ़े
कहता है कोई
आहिस्ता-आहिस्ता

पैरों में नहीं चप्पल उसके
काँटों भरी सेज पर
चलता है कोई
आहिस्ता-आहिस्ता

आँखें हो गई हैं अब
उसकी बूढ़ी
धँसी हुई आँखों से
देखता है कोई
आहिस्ता-आहिस्ता

एक रोज़ पूछा मैंने
उससे,
कौन हो तुम
‘तेरे देश का कानून’
बोला आहिस्ता-आहिस्ता !!
 
रावण कंस कहो कब उपदेशो से से माने हैं
सच्चाई को सदा इन्होने मारे ताने हैं
काम सांप का डसना है ,मौके पर डस लेगा..
कुचले बिना काल अपने पंजे में कस लेगा..
मांगे से गरीब को कब मिलती मजदूरी है
दुष्ट नहीं माने तो हिंसा बहुत जरुरी है..........

शांति शांति को जपते जपते,हम जड़ हो बैठे,
कोहिनूर सा दुर्लभ हिरा तक भी खो बैठे
खो बैठे कैलाश कबूतर श्वेत उड़ाने में...
अचकन की जेबों पर लाल गुलाब लगाने में..
पर झंडा ऊँचा है ,यदि डंडे की मंजूरी है...
दुष्ट नहीं माने तो हिंसा बहुत जरुरी है..........

सोमनाथ का मंदिर टूटा,कहा अहिंसा थी..
शक हूणों ने हमको लुटा,कहा अहिंसा थी..
भिछुणियों की छाती काटी,कहा अहिंसा थी...
लाशों से व्यभिचार किया,क्या वहां अहिंसा थी....
हिंसक पशु के लिए अहिंसा हलवा पुड़ी है...
दुष्ट नहीं माने तो हिंसा बहुत जरुरी है..

साधू संत की खातिर हिंसा,भले अधूरी है
दुष्ट नहीं माने तो हिंसा बहुत जरुरी है..

बिना शक्ति के भक्ति भावना पंगु अधूरी है
आज बांसुरी नहीं सुदर्शन चक्र जरुरी है
हरी मंडप में जब तक हाहाकार नहीं होगा
शत्रु पक्ष में जब तक भला पार नहीं होगा
गद्दारों का जब तक खुला शिकार नहीं होगा
तब तक माता का सपना साकार नहीं होगा
कौवों को दी जाती नहीं कभी अंगूरी है
आज बांसुरी नहीं सुदर्शन चक्र जरुरी है

साधू संत की खातिर हिंसा,भले अधूरी है
दुष्ट नहीं माने तो हिंसा बहुत जरुरी है..

.
.
.
"अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तदैव च"....

ये वाक्य लोगों को कायर बनाने के लिये हमेशा अधूरा पढाया जाता है.....

...हाँ अहिंसा पहला धर्म है....लेकिन धर्म की रक्षा के लिये हिंसा उतनी ही जरुरी है
​
 
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

चल रहा है तारकों का
दल गगन में गीत गाता,
चल रहा आकाश भी है
शून्य में भ्रमता-भ्रमाता,
पाँव के नीचे पड़ी
अचला नहीं, यह चंचला है,
एक कण भी, एक क्षण भी
एक थल पर टिक न पाता,
शक्तियाँ गति की तुझे
सब ओर से घेरे हु*ए है;
स्थान से अपने तुझे
टलना पड़ेगा ही, मुसाफिर!
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

थे जहाँ पर गर्त पैरों
को ज़माना ही पड़ा था,
पत्थरों से पाँव के
छाले छिलाना ही पड़ा था,
घास मखमल-सी जहाँ थी
मन गया था लोट सहसा,
थी घनी छाया जहाँ पर
तन जुड़ाना ही पड़ा था,
पग परीक्षा, पग प्रलोभन
ज़ोर-कमज़ोरी भरा तू
इस तरफ डटना उधर
ढलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

शूल कुछ ऐसे, पगो में
चेतना की स्फूर्ति भरते,
तेज़ चलने को विवश
करते, हमेशा जबकि गड़ते,
शुक्रिया उनका कि वे
पथ को रहे प्रेरक बना*ए,
किन्तु कुछ ऐसे कि रुकने
के लि*ए मजबूर करते,
और जो उत्साह का
देते कलेजा चीर, ऐसे
कंटकों का दल तुझे
दलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

सूर्य ने हँसना भुलाया,
चंद्रमा ने मुस्कुराना,
और भूली यामिनी भी
तारिका*ओं को जगाना,
एक झोंके ने बुझाया
हाथ का भी दीप लेकिन
मत बना इसको पथिक तू
बैठ जाने का बहाना,
एक कोने में हृदय के
आग तेरे जग रही है,
देखने को मग तुझे
जलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

वह कठिन पथ और कब
उसकी मुसीबत भूलती है,
साँस उसकी याद करके
भी अभी तक फूलती है;
यह मनुज की वीरता है
या कि उसकी बेहया*ई,
साथ ही आशा सुखों का
स्वप्न लेकर झूलती है
सत्य सुधियाँ, झूठ शायद
स्वप्न, पर चलना अगर है,
झूठ से सच को तुझे
छलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
 
बैचैनी का सबब (विमल कुमार)

मेरे लिए तुम्हारा प्रेम कोई सौदा नहीं था
नहीं था कोई अनुबन्ध, करार, घोषणापत्र
ज़रूरत पड़ने पर सिर्फ़’ काम के काम भी नहीं था
नहीं थी कोई वासना, लिप्सा
था तो सिर्फ़ इतना
तुम थोड़ी देर के लिए यहाँ सीढ़ियों पर बैठ जाती
मैं तुम्हारी छाया के साथ थोड़ी देर
सुस्ता लेना चाहता था
अपना सुख और दुख बताना ही
मेरे लिए प्रेम था
इसलिए मैं कहता हूँ
तुम ज़रा अपनी माँ और पिता और भाई के बारे में बताती
बताती अपने बच्चों के बारे में
कितनी जकड़न है उसके सीने में
कितना कफ़’ जमा है

इसलिए मैं यह भी बार-बार तुमसे कहता हूँ
मैं तुम्हें प्यार नहीं कर रहा था
मैं तो इस दुनिया को जानने का
जीवन को पहचानने का उपक्रम कर रहा था
मैं तो अपनी ज़ि“न्दगी जी रहा था
जो मुझे छोड़कर चली गई थी कहीं
इस शहर में
मेरे पंख नोच लिए गए थे
मेरी इच्छाएँ कुतर दी गई थीं
छीन ली गई थी साँसे मुझसे
नथुनों में आक्सीजन नहीं
ढेर सारा कार्बन-डाइक्साइड भर गया था

सब्ज़ी ख़रीदने निकला था
निकला था दूध लाने
तो रास्ते में ही बेहोश हो चुका था
गिरा पड़ा था सड़क के किनारे
मेरा चेहरा भी मेरी पत्नी नहीं पहचान पा रही थी
मेरी लिखावट भी मेरी बेटी पहचान नहीं पा रही थी
उस अँधेरे में
ऐसे में मैं और कर क्या सकता
इस बुढ़ापे में
एक पुलिया पर बैठा
तेज अँधड़ को आते-जाते देखकर
चाँद को ढलते देखकर
सूरज को रोज़ पसीने से तर-बतर निकलते देखकर
किस तरह चीज़ें ख़रीदी जा रही हैं
किस तरह बेची जा रही हैं
इसलिए मैं कहता हूँ
मेरे लिए प्रेम कोई सौदा नहीं था
वह दिल को बहलाने का
ग़ालिब ख़याल भी नहीं था
वह एक ऐसी पुकार थी
जो किसी पुराने कुएँ के भीतर से
या किसी ढह गए किले के अन्दर से
आती थी और मुझे बेचैन कर जाती थी
मैं तो केवल इस बेचैनी का सबब ढूँढ़ रहा हूँ ।
 
डॉ. हरिओम पंवार

काश्मीर जो खुद सूरज के बेटे की रजधानी था
डमरू वाले शिव शंकर की जो घाटी कल्याणी था
काश्मीर जो इस धरती का स्वर्ग बताया जाता था
जिस मिट्टी को दुनिया भर में अर्ध्य चढ़ाया जाता था
काश्मीर जो भारतमाता की आँखों का तारा था
काश्मीर जो लालबहादुर को प्राणों से प्यारा था
काश्मीर वो डूब गया है अंधी-गहरी खाई में
फूलों की खुशबू रोती है मरघट की तन्हाई में

ये अग्नीगंधा मौसम की बेला है
गंधों के घर बंदूकों का मेला है
मैं भारत की जनता का संबोधन हूँ
आँसू के अधिकारों का उदबोधन हूँ
मैं अभिधा की परम्परा का चारण हूँ
आजादी की पीड़ा का उच्चारण हूँ

इसीलिए दरबारों को दर्पण दिखलाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

बस नारों में गाते रहियेगा कश्मीर हमारा है
छू कर तो देखो हिम छोटी के नीचे अंगारा है
दिल्ली अपना चेहरा देखे धूल हटाकर दर्पण की
दरबारों की तस्वीरें भी हैं बेशर्म समर्पण की

काश्मीर है जहाँ तमंचे हैं केसर की क्यारी में
काश्मीर है जहाँ रुदन है बच्चों की किलकारी में
काश्मीर है जहाँ तिरंगे झण्डे फाड़े जाते हैं
सैंतालिस के बंटवारे के घाव उघाड़े जाते हैं
काश्मीर है जहाँ हौसलों के दिल तोड़े जाते हैं
खुदगर्जी में जेलों से हत्यारे छोड़े जाते हैं

अपहरणों की रोज कहानी होती है
धरती मैया पानी-पानी होती है
झेलम की लहरें भी आँसू लगती हैं
गजलों की बहरें भी आँसू लगती हैं

मैं आँखों के पानी को अंगार बनाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

काश्मीर है जहाँ गर्द में चन्दा-सूरज- तारें हैं
झरनों का पानी रक्तिम है झीलों में अंगारे हैं
काश्मीर है जहाँ फिजाएँ घायल दिखती रहती हैं
जहाँ राशिफल घाटी का संगीने लिखती रहती हैं
काश्मीर है जहाँ विदेशी समीकरण गहराते हैं
गैरों के झण्डे भारत की धरती पर लहरातें हैं

काश्मीर है जहाँ देश के दिल की धड़कन रोती है
संविधान की जहाँ तीन सौ सत्तर अड़चन होती है
काश्मीर है जहाँ दरिंदों की मनमानी चलती है
घर-घर में ए. के. छप्पन की राम कहानी चलती है
काश्मीर है जहाँ हमारा राष्ट्रगान शर्मिंदा है
भारत माँ को गाली देकर भी खलनायक जिन्दा है
काश्मीर है जहाँ देश का शीश झुकाया जाता है
मस्जिद में गद्दारों को खाना भिजवाया जाता है

गूंगा-बहरापन ओढ़े सिंहासन है
लूले - लंगड़े संकल्पों का शासन है
फूलों का आँगन लाशों की मंडी है
अनुशासन का पूरा दौर शिखंडी है

मै इस कोढ़ी कायरता की लाश उठाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

हम दो आँसू नहीं गिरा पाते अनहोनी घटना पर
पल दो पल चर्चा होती है बहुत बड़ी दुर्घटना पर
राजमहल को शर्म नहीं है घायल होती थाती पर
भारत मुर्दाबाद लिखा है श्रीनगर की छाती पर
मन करता है फूल चढ़ा दूं लोकतंत्र की अर्थी पर
भारत के बेटे निर्वासित हैं अपनी ही धरती पर

वे घाटी से खेल रहे हैं गैरों के बलबूते पर
जिनकी नाक टिकी रहती है पाकिस्तानी जूतों पर
काश्मीर को बँटवारे का धंधा बना रहे हैं वो
जुगनू को बैसाखी देकर चन्दा बना रहे हैं वो
फिर भी खून-सने हाथों को न्योता है दरबारों का
जैसे सूरज की किरणों पर कर्जा हो अँधियारों का

कुर्सी भूखी है नोटों के थैलों की
कुलवंती दासी हो गई रखैलों की
घाटी आँगन हो गई ख़ूनी खेलों की
आज जरुरत है सरदार पटेलों की

मैं घाटी के आँसू का संत्रास मिटाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

जब चौराहों पर हत्यारे महिमा-मंडित होते हों
भारत माँ की मर्यादा के मंदिर खंडित होते हों
जब क्रश भारत के नारे हों गुलमर्गा की गलियों में
शिमला-समझौता जलता हो बंदूकों की नालियों में

अब केवल आवश्यकता है हिम्मत की खुद्दारी की
दिल्ली केवल दो दिन की मोहलत दे दे तैय्यारी की
सेना को आदेश थमा दो घाटी ग़ैर नहीं होगी
जहाँ तिरंगा नहीं मिलेगा उनकी खैर नहीं होगी

जिनको भारत की धरती ना भाती हो
भारत के झंडों से बदबू आती हो
जिन लोगों ने माँ का आँचल फाड़ा हो
दूध भरे सीने में चाकू गाड़ा हो

मैं उनको चौराहों पर फाँसी चढ़वाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन गाने निकला हूँ ||

अमरनाथ को गाली दी है भीख मिले हथियारों ने
चाँद-सितारे टांक लिये हैं खून लिपि दीवारों ने
इसीलियें नाकाम रही हैं कोशिश सभी उजालों की
क्योंकि ये सब कठपुतली हैं रावलपिंडी वालों की
अंतिम एक चुनौती दे दो सीमा पर पड़ोसी को
गीदड़ कायरता ना समझे सिंहो की ख़ामोशी को

हमको अपने खट्टे-मीठे बोल बदलना आता है
हमको अब भी दुनिया का भूगोल बदलना आता है
दुनिया के सरपंच हमारे थानेदार नहीं लगते
भारत की प्रभुसत्ता के वो ठेकेदार नहीं लगते
तीर अगर हम तनी कमानों वाले अपने छोड़ेंगे
जैसे ढाका तोड़ दिया लौहार-कराची तोड़ेंगे

आँख मिलाओ दुनिया के दादाओं से
क्या डरना अमरीका के आकाओं से
अपने भारत के बाजू बलवान करो
पाँच नहीं सौ एटम बम निर्माण करो

मै भारत को दुनिया का सिरमौर बनाने निकला हूँ |
मैं घायल घाटी के दिल की धड़कन निकला हूँ ||
 
B'ful poem from the movie Udaan, touches deep into the soul ..


..

जो लहरों से आगे नज़र देख पाती, तो तुम जान लेते मैं क्या सोचता हूँ
वो आवाज़ तुमको भी जो भेद जाती, तो तुम जान लेते मैं क्या सोचता हूँ

जिद का तुम्हारे जो परदा सरकता, खिडकियों से आगे भी तुम देख पाते
आँखों से आदतों की जो पलकें हटाते, तो तुम जान लेते मैं क्या सोचता हूँ

मेरी तरह होता अगर खुद पे जरा भरोसा, तो कुछ दूर तुम भी साथ-साथ आते
रंग मेरी आँखों का बाँटते ज़रा सा, तो कुछ दूर तुम भी साथ-साथ आते

नशा आसमान का जो चूमता तुम्हे, हसरतें तुम्हारी नया जाम पाती
खुद दुसरे जन्म में मेरी उड़ान छूने, तो कुछ दूर तुम भी साथ-साथ आते

..




Cheers
Jit
 
Some of my creations:

1. [h=3]पलकें[/h]
अपनी ही एक भाषा को कहती है पलकें,
प्यार और नाराजगी दोनों को समझती है पलकें,
दूरीयाँ हो दिल की या जुबान की बने न हिम्मत,
सन्देश तब भी दूसरे तक पहुंचाती है पलकें,


जाने कितने समझे और कितने न समझ पाए,
कुछ ने कदम बढ़ाये और कुछ बढने से डर गए
कुछ ने लिखी कहानियां और कुछ आश करते पाए
लेकिन कदम कदम पे साथ रहा, और याद आई पलकें,


प्रेम की शुरुआत, पलक झुकने से कही जाती है,
और जब बंद हो पलकें तो वीरानी छा जाती है,
हर आश के दीप यहाँ जलाये जातें है,
और कुछ पलको के झोंके से बुझ जातें है,


आखों में डूबने को हर दिल की तमन्ना होती है,
हर वो गहरायी तलाशने की जिद सी होती है,
पर जब डूबने लगता है दिल गहरायी में,
तो इन्ही पलकों का साहिल, और किस्तिया होती है,


हर मुस्किल में, जब एक हाँ की जरुरत होती है,
हर मोड़ में, जब एक नयी डगर चुननी होती है,
जब हर आश में जब किसी की आश तलाशी जाती है,
तब राही, हमसफ़र की पलकें ही याद आती है !!
 
[h=3]2. पलकें - '2'[/h]

नाम तो याद नहीं, लेकिन याद आती है पलकें,
बचपन की यादो से, कही चमक जाती है पलकें,
वो फाग में, किसी के रंग में, सराबोर होने की चाह में,
किसी और ही के रंग में, रंग जाती है ये पलकें !!


हर उजाले में भी, दिवाली तलाशती रहती है पलकें,
जब दिल खो जाये तो, चेहरा तलाशती है पलकें,
मजबूरीयाँ कर देती है जब दूर दो चाहतों को,
हर आने वाली राह पे, हमसफ़र तलाशती है पलकें !!


चाह तो बहुत थी हमें भी, की सहारा दे किसी की पलकें,
कभी अपनों ने, कभी परायो ने भिगोई हमारी पलकें,
जाने क्यूँ कुछ ऐसा हो गया है हमें भी ज़माने में,
अनजाने में हम भी, भिगो जातें है किसी की पलकें !!

​
 
जाने क्या खोया क्या पाया मैंने तुमसे दिल लगा के
नींद आँखों की खोयी ,दर्द ज़माने का पाया मैंने तुमसे दिल लगा के

आँखों में नींद का नाम नहीं.
दिल में चैन का काम नहीं ..
... बेदर्द ज़माने में जज्बातों का कोई दाम नहीं ...
जाने कौन सा दर्द जगाया मैंने तुमसे दिल लगा के
जाने क्या खोया क्या पाया मैंने तुमसे दिल लगा के
नींद आँखों की खोयी ,दर्द ज़माने का पाया मैंने तुमसे दिल लगा के

दिल को सुकून मिले ना मिले .
आँखों को चैन मिले न मिले ..
जख्म दिल के सिले न सिले ...
फिर भी जाने क्यू हर वकत जख्मों को सहलाया मैंने तुम से दिल लगाके
जाने क्या खोया क्या पाया मैंने तुमसे दिल लगा के
नींद आँखों की खोयी ,दर्द ज़माने का पाया मैंने तुमसे दिल लगा के

सोचा था उनसे मिलकर थोडा सा चैन मिले.
वो जब भी मिले मुझसे हर वक़्त बेचैन मिले ..
दिल के सारे जख्म ही मुझे उनकी ही देन मिले...
दर्द ज़माने कम पड़ गया जितना पाया मैंने तुझसे दिल लगा के

जाने क्या खोया क्या पाया मैंने तुमसे दिल लगा के
नींद आँखों की खोयी ,दर्द ज़माने का पाया मैंने तुमसे दिल लगा के


 
B'ful poem from the movie Udaan, touches deep into the soul ..


..

जो लहरों से आगे नज़र देख पाती, तो तुम जान लेते मैं क्या सोचता हूँ
वो आवाज़ तुमको भी जो भेद जाती, तो तुम जान लेते मैं क्या सोचता हूँ

जिद का तुम्हारे जो परदा सरकता, खिडकियों से आगे भी तुम देख पाते
आँखों से आदतों की जो पलकें हटाते, तो तुम जान लेते मैं क्या सोचता हूँ

मेरी तरह होता अगर खुद पे जरा भरोसा, तो कुछ दूर तुम भी साथ-साथ आते
रंग मेरी आँखों का बाँटते ज़रा सा, तो कुछ दूर तुम भी साथ-साथ आते

नशा आसमान का जो चूमता तुम्हे, हसरतें तुम्हारी नया जाम पाती
खुद दुसरे जन्म में मेरी उड़ान छूने, तो कुछ दूर तुम भी साथ-साथ आते

..




Cheers
Jit

one of my fav...
 
मधुशाला ~ हरिवंशराय बच्चन

मधुशाला ~ हरिवंशराय बच्चन

हुज़ूर, पढ़िए - मधुशाला.... मधुशाला.... मधुशाला.... मधुशाला....

* http://hindipanna.blogspot.in/2007/04/blog-post_26.html

>>>> "मेरे शव पर वह रोए, हो जिसके आंसू में हाला, आह भरे वह, जो हो सुरभित मदिरा पीकर मतवाला.... दें मुझको कन्धा वे, जिनके पद मद-डगमग होतें हो, और जलूं उस ठौर, जहां पर कभी रही हो मधुशाला |

अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला, अपने युग में सबको अद्भुत ज्ञात हुआ अपना प्याला.... भी वृद्धों से जब पूछा, एक यही उत्तर पाया, अब न रहे वे पीने वाले, अब न रही वह मधुशाला |"

* http://www.hindikunj.com/2010/01/madhushala-lyrics.html

>>>> "मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला, अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला, बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे, रहे ना हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला |"

हुज़ूर, चलिए - मधुशाला.... मधुशाला.... मधुशाला.... मधुशाला....
 
रामधारी सिंह दिनकर

वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो
चट्टानों की छाती से दूध निकालो
है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो

चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे
योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे

जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है
चिनगी बन फूलों का पराग जलता है
सौन्दर्य बोध बन नयी आग जलता है
ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है

अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे
गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे

जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है
भामिनी वही तरुणी नर वही तरुण है
है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है
वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है

उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है
तलवार प्रेम से और तेज होती है

छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये
मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाये
दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है
मरता है जो एक ही बार मरता है

तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे
जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे

स्वातंत्र्य जाति की लगन व्यक्ति की धुन है
बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है

वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे
जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे

जब कभी अहम पर नियति चोट देती है
कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है
नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है
वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है


चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे
धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे

उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है
सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है
विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिंतन है
जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन है

सबसे स्वतंत्र रस जो भी अनघ पियेगा
पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा!
 
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