Hindi Kavita

Status
Not open for further replies.
वक़्त नहीं

हर ख़ुशी है लोगों के दामन में
पर एक हँसी के लिए वक़्त नहीं
दिन रात दौड़ती दुनिया में
ज़िन्दगी के लिए ही वक़्त नहीं

माँ की लोरी का एहसास तो है
पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं

सारे नाम मोबाइल में हैं
पर दोस्ती के लिए वक़्त नहीं
गैरों की क्या बात करें
जब अपनों के लिए ही वक़्त नहीं

आँखों में है नींद बड़ी
पर सोने का वक़्त नहीं
दिल है ग़मों से भरा हुआ
पर रोने का भी वक़्त नहीं

पैसों की दौड़ में ऐसे दौड़े
कि थकने का भी वक़्त नहीं
पराये एहसासों की क्या कद्र करें
जब अपने सपनो के लिए ही वक़्त नहीं

तू ही बता ऐ ज़िन्दगी
इस ज़िन्दगी का क्या होगा
कि हर पल मरने वालों को
जीने के लिए भी वक़्त नहीं .......
 
हर ख़ुशी है लोगों के दामन में
पर एक हँसी के लिए वक़्त नहीं
दिन रात दौड़ती दुनिया में
ज़िन्दगी के लिए ही वक़्त नहीं

माँ की लोरी का एहसास तो है
पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं

सारे नाम मोबाइल में हैं
पर दोस्ती के लिए वक़्त नहीं
गैरों की क्या बात करें
जब अपनों के लिए ही वक़्त नहीं

आँखों में है नींद बड़ी
पर सोने का वक़्त नहीं
दिल है ग़मों से भरा हुआ
पर रोने का भी वक़्त नहीं

पैसों की दौड़ में ऐसे दौड़े
कि थकने का भी वक़्त नहीं
पराये एहसासों की क्या कद्र करें
जब अपने सपनो के लिए ही वक़्त नहीं

तू ही बता ऐ ज़िन्दगी
इस ज़िन्दगी का क्या होगा
कि हर पल मरने वालों को
जीने के लिए भी वक़्त नहीं .......


Quite true .. :):)
 
पापा तुम क्यों तारा बन गए
हमसे दूर ईश्वर का सहारा बन गए
पार्क में बच्चे पापा के साथ खेलते हैं
कभी दौड़ते कभी कंधे पर चढ़ते हैं
मै दूर बैठा उनको देखा करता हूँ
बस तुम को ही सोचा करता हूँ
पहले से जीने के ढंग गए
पापा तुम क्यों तारा बन गए

माँ काम करते करते थक जाती है
कहानी रात को कभी कभी ही सुनती है
ब्रश मे फस्ट आने का कॉम्पटीशन कोई करता नहीं
सच पापा अब तो ब्रश करने का ही मन करता नहीं
मेरे जीवन के तो सारे रंग गए
पापा तुम क्यों तारा बन गए

मै अकेले स्कूल जाता हूँ
आप कि कही बातो को मन मे दोहराता हूँ
किनारे चलो ऊँगली पकडो मत दौडो
पर ऊँगली पकड़ने को जो हाथ बढ़ता हूँ
तुम को वहां नहीं पाता हूँ
मेरे तो सब सहारे गए
पापा तुम क्यों तारा बन गए

रोज मै तुम से बात करता हूँ
तारों मे तुम को खोजा करता हूँ
जब छाते हैं बादल तो बहुत रोता हूँ
तुम को नहीं देख पाउँगा बस यही कहता हूँ
आंसूं अब मेरे साथी बनगए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

शाम आती है पर तुम आते नहीं
कैसे हो बेटे कह के गोद में उठाते नहीं
एक बार कहो
क्या मिला होमवर्क रहा कैसा स्कूल
दो हाई फाई लग रहे हो कितने कूल
मस्ती भरे सारे वो पल गए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

जब कहता हूँ चॉकलेट लाने को
बहला के मुझे दे देती है गुड खाने को
दो वक्त कि रोटी मिलजाए तू स्कूल जा पाए
बस इतना कमा पाती हूँ मै
इसी लिये तेरा कहा नहीं कर पाती हूँ
अब मेरी खाव्हिशों के दिन गए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

मै माँ से माँ मुझ से छुप के रोती है
अक्सर खाने की ३ प्लेट धरती है
मै उसके लिये हसीं कमाना चाहता हूँ
आप जैसा घर का ख्याल रखना चाहता हूँ
मै जल्दी से बड़ा होना चाहता हूँ
मेरे खेलने के दिन गए
पापा तुम क्यों तारा बनगए
 
बहुत ही मार्मिक !!!!

दिल को छू गयी और ये आँखों ने बयाँ कर दिया
भगवान क्यों ऐसा एक बच्चे के साथ कर दिया


पापा तुम क्यों तारा बन गए
हमसे दूर ईश्वर का सहारा बन गए
पार्क में बच्चे पापा के साथ खेलते हैं
कभी दौड़ते कभी कंधे पर चढ़ते हैं
मै दूर बैठा उनको देखा करता हूँ
बस तुम को ही सोचा करता हूँ
पहले से जीने के ढंग गए
पापा तुम क्यों तारा बन गए

माँ काम करते करते थक जाती है
कहानी रात को कभी कभी ही सुनती है
ब्रश मे फस्ट आने का कॉम्पटीशन कोई करता नहीं
सच पापा अब तो ब्रश करने का ही मन करता नहीं
मेरे जीवन के तो सारे रंग गए
पापा तुम क्यों तारा बन गए

मै अकेले स्कूल जाता हूँ
आप कि कही बातो को मन मे दोहराता हूँ
किनारे चलो ऊँगली पकडो मत दौडो
पर ऊँगली पकड़ने को जो हाथ बढ़ता हूँ
तुम को वहां नहीं पाता हूँ
मेरे तो सब सहारे गए
पापा तुम क्यों तारा बन गए

रोज मै तुम से बात करता हूँ
तारों मे तुम को खोजा करता हूँ
जब छाते हैं बादल तो बहुत रोता हूँ
तुम को नहीं देख पाउँगा बस यही कहता हूँ
आंसूं अब मेरे साथी बनगए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

शाम आती है पर तुम आते नहीं
कैसे हो बेटे कह के गोद में उठाते नहीं
एक बार कहो
क्या मिला होमवर्क रहा कैसा स्कूल
दो हाई फाई लग रहे हो कितने कूल
मस्ती भरे सारे वो पल गए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

जब कहता हूँ चॉकलेट लाने को
बहला के मुझे दे देती है गुड खाने को
दो वक्त कि रोटी मिलजाए तू स्कूल जा पाए
बस इतना कमा पाती हूँ मै
इसी लिये तेरा कहा नहीं कर पाती हूँ
अब मेरी खाव्हिशों के दिन गए
पापा तुम क्यों तारा बनगए

मै माँ से माँ मुझ से छुप के रोती है
अक्सर खाने की ३ प्लेट धरती है
मै उसके लिये हसीं कमाना चाहता हूँ
आप जैसा घर का ख्याल रखना चाहता हूँ
मै जल्दी से बड़ा होना चाहता हूँ
मेरे खेलने के दिन गए
पापा तुम क्यों तारा बनगए
 
.

Rage, grief, frustration and many more strong emotions on sorry state of women in India, expressed in B'ful n' strong words. Kudos to you Anirudha Beniwal.



शुरुआत तो सीता ने की थी, मूक बन जाने की,
न छिनने की अपना हक, चुपचाप धरती मैं सामने की।
रही सही कसर पूरी की राधा ने, एक रसीले को भगवान बनाने की,

अरे अब तो ये षड़यंत्र समझ जाओ,
छोड़ पाँव विष्णु के लक्ष्मी, कभी तो तुम भी आराम फरमाओ।
बड़ी चालाकी से गुलाम बनाया गया है स्त्री तुझे,
दे धरम का नाम, गुलामी पाठ पढाया गया तुझे।

बहुत बनी शहनशील, क्षमावान, बलिदानी,
क्या मिला? लुटी आबरू अपने ही बगीचे मैं।
बेच दिया भाई ने, बाप मुछो पे ताव देता खड़ा है,
कोन खरीदेगा तेरी बोली है, बाज़ार मैं झगड़ा है।

माना के गुस्सा बहुत है, खून का रंग अभी तक है लाल,
तो तोड़ ये जेवरों के बेड़िया, गुलामी के सब यंत्र जलाओ।
अरे आवाज़ उठाओ, चिल्लाओ, कुछ तोड़ फोड़ मचाओ,
बहुत कर लिया करवा-चौथ, अब तांडव नाच दिखाओ।

फ़ेंक दो ये सीता, राधा, मीरा अपने मंदिरों से,
अब काली को अपनाओ, अब दुर्गा को ले आओ।


Cheers
Jit
 
चाँदनी को क्या हुआ कि आग बरसाने लगी
झुरमुटों को छोड़कर चिड़िया कहीं जाने लगी

पेड़ अब सहमे हुए हैं देखकर कुल्हाड़ियाँ
आज तो छाया भी उनकी डर से घबराने लगी

जिस नदी के तीर पर बैठा किए थे हम कभी
उस नदी की हर लहर अब तो सितम ढाने लगी

वादियों में जान का ख़तरा बढ़ा जब से बहुत
अब तो वहाँ पुरवाई भी जाने से कतराने लगी

जिस जगह चौपाल सजती थी अंधेरा है वहाँ
इसलिए कि मौत बनकर रात जो आने लगी

जिस जगह कभी किलकारियों का था हुजूम
आज देखो उस जगह भी मुर्दानी छाने लगी
 
जो हुआ सो हुआ

उठ के कपड़े बदल
घर से बाहर निकल
जो हुआ सो हुआ॥

जब तलक साँस है
भूख है प्यास है
ये ही इतिहास है
रख के कांधे पे हल
खेत की ओर चल
जो हुआ सो हुआ॥

खून से तर-ब-तर
कर के हर राहगुज़र
थक चुके जानवर
लकड़ियों की तरह
फिर से चूल्हे में जल
जो हुआ सो हुआ॥

जो मरा क्यों मरा
जो जला क्यों जला
जो लुटा क्यों लुटा
मुद्दतों से हैं गुम
इन सवालों के हल
जो हुआ सो हुआ॥

मंदिरों में भजन
मस्ज़िदों में अज़ाँ
आदमी है कहाँ
आदमी के लिए
एक ताज़ा ग़ज़ल
जो हुआ सो हुआ।।
 
Another gem from Gulzar's treasure -

..

धुप लगे आकाश पे जब
दिन में चाँद नज़र आया था
डाक से आया एक मुहर लगा
एक पुराना सा तेरा, चिट्ठी का लिफाफा याद आया
चिट्ठी ग़ुम हुये तो अरसा बीत चुका
मुहर लगा, बस मटयाला सा
उसका लिफाफा रखा है !

..



Cheers
Jit
 
Last edited:
जिंदगी में जब भी, तुम्हारे "साथ" की जरुरत होती है
हरसूं क्यूँ तुम, मुझसे "अगणित" अनंत दूर होती है

तेरे "कोमल" शब्दों की ध्वनी से,
मन "तनाव" रहित हो जाता है
जब तुम "किलकारियां" लगाती हो
किसी बच्चे की तरह मेरे "होंटों" में
अजब "संतुष्टि" भरा "मुस्कान" स्वतः ही आ जाता है

तेरी "दुरी" मुझे इतना क्यूँ सताता है
मन "अधीर" हो जाता है बहुत तडफाता है
हर "लम्हा" तेरे आने का "ख्वाब" ये सजाता है

फिर भी तुम क्यूँ नही आती
क्यूँ मुझे नही अपनाती

शायद "तुम्हे" भी इन्तिज़ार है मेरी "मैय्यत" का
मैं तो "दफ़न" हो जाऊंगा उम्मीदे मेरी "जिन्दा" रहेगी
जब भी किसी "नादाँ" की बात चलेगी
तेरे "लबों" में मेरी "कहानी" जिन्दा रहेगी
 
ताक पर रख दो चिंताए |
खूंटी पै टांग दो परेशानी ||

कुछ नहीं स्थिर दुनिया में |
हर चीज है आनी जानी ||

व्यर्थ में क्यों रोते हो |
रोने से ना कुछ पाओगे ||

हँस लो है जीवन छोटा सा |
वरना रो रो मर जाओगे ||
 
काजल की कोठरी में मैं
और मेरे साथ मेरा मन |
अनगिनत मछलियां और कुछ मछेरे
चल रहे हैं साथ-साथ साँझ और सबेरे
मछलियों की कोठरी में मैं
और मेरे साथ मेरा मन |
एक ओर पर्वत और एक ओर कूआँ
नजर जिधर जाए उधर धूआँ ही धूआँ
धुएँ के आर-पार मैं
और मेरे साथ मेरा मन |
मूंद लीं आँखें तो नाच उठे कोयल
नाच उठे भौंरे और खिल गए फूल
फूलों की टोकड़ी में मैं
और मेरे साथ मेरा मन |
 
काँटों का फूल से मिलन
है अजीब ये समीकरण |
बादल के नाम पर आँधियां चलीं
सरसों के खेत में बिजलियाँ गिरीं
आंसुओं से है भरा चमन
है अजीब ये समीकरण |
खाली हैं आज साधुओं की झोलियां
निकल रहीं तिजोरियों से मात्र गोलियां
बच्चों के सर पे ये कफन
है अजीब ये समीकरण |
बरगद के पेड़ पर मेढ़क चढे
सूरज की जगह आज काजल उगे
नाव और नदी का ये चयन
है अजीब ये समीकरण |
 
जब नहीं थे राम बुद्ध ईसा मोहम्मद
तब भी थे धरती पर मनुष्य
जंगलों में विचरते आग पानी हवा के आगे झुकते
किसी विश्वास पर ही टिका होता था उनका जीवन

फिर आए अनुयायी
आया एक नया अधिकार युद्ध
घृणा और पाखण्ड के नए रिवाज़ आए
धरती धर्म से बोझिल थी
उसके अगंभीर भार से दबती हुई

सभ्यता के साथ अजीब नाता है बर्बरता का
जैसे फूलों को घूरती हिंसक आंख
हमने रंग से नफ़रत पैदा की
सिर्फ़ उन दो रंगों से जो हमारे पास थे
उन्हें पूरक नहीं बना सके दिन और रात की तरह
सभ्यता की बढ़ती रोशनी में
प्रवेश करती रही अंधेरे की लहर
विज्ञान की चमकती सीढ़ियां
आदमी के रक्त की बनावट
हम मस्तिष्क के बारे में पढ़ते रहे
सोच और विचार को अलग करते रहे

मनुष्य ने संदेह किया मनुष्य पर
उसे बदल डाला एक जंतु में
विश्वास की एक नदी जाती थी मनुष्यता के समुद्र तक
उसी में घोलते रहे अपना अविश्वास
अब गंगा की तरह इसे भी साफ़ करना मुश्किल
कब तक बचे रहेंगे हम इस जल से करते हुए तर्पण
 
मुझे अच्छी लगती है पुरानी कलम
पुरानी कापी पर उल्टी तरफ़ से लिखना
शायद मेरा दिमाग पुराना है या मैं हूं आदिम
मैं खोजती हूं पुरानापन
तुरत आयी एक पुरानी हंसी मुझे हल्का कर देती है
मुझे अच्छे लगते हैं नए बने हुए पुराने संबंध
पुरानी हंसी और दुख और चप्पलों के फ़ीते
नयी परिभाषाओं की भीड़ में
संभाले जाने चाहिए पुराने संबंध
नदी और जंगल के
रेत और आकाश के
प्यार और प्रकाश के।
 
Status
Not open for further replies.
Back
Top