लेकिन विकास, कोए अल्बादी बालक एक आधा ठीक काम करदे तो उसको ठीक बताने में क्या हर्ज़ है i समाज में रहते हुए व्यक्ति को अपनी विक्षिप्त मानसिकता को नियंत्रित करना होगा i इस मानसिकता को यों खुला छोड़ दिया जाये तो यह अपनी हवस की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक गिर सकने में कोई संकोच नहीं करेगी i जब समाज का कोई वर्ग या व्यक्ति सामाजिक मान मर्यादाओं को धता बता कर अपनी जंगली हवस की पूर्ति हेतु घिनौने कृत्य करने को मानवाधिकारों की दुहाई देकर न्यायसंगत ठहराने की कोशिश करता है तो न्यायपालिका का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है i क्या आपको लगता है कि समलैंगिक सम्बन्धों जैसे अप्राकृतिक और शर्मनाक क्रियाओं में लिप्त होने वाले विक्षिप्त व्यक्ति मेरी, आपकी, या समाज की सुनेंगे ? कदापि नहीं i इसलिए ऐसे तत्वों के लिए न्यापालिका का डर आवश्यक है i अगर हमारे इस प्रकार कुकृत्य में लिप्त होने के नापाक इरादे नहीं है तो फिर हमें और आप को किसी न्यायिक दंड के प्रावधान से डरने की क्या आवश्यकता है ? इसे घटिया काम करे बिना के आदमी मरै सै i