भोग की वस्तु तो वो पुरुषो के लिए ही है न,,,क्यों न पूरुष उन्हे भोग करना छोड़ दें तो ये ट्रेंड खत्म हो जाएगा(मैं उपभोग की वस्तु बनाने की पक्षधर नही हूँ )
राष्ट्रिय अध्यक्षा आवश्यक नही है कि जो कह रही हैं वह सब महिलाओ की ही आवाज है (खैर उन्हे बोलने से पहले सोचना चाहिए )
सननी लियोन के दर्शक भी पूरुष ही है, शायद ही किसी महिला को उसमे इंटेर्स्ट हो
दर्ती पिक्चर मे भी सच्चाई है की महिलाएं किन व्यवस्थाओं के बीच रहती है और अगर वो सफल होना चाहती है तो समझोते करर्ने पड़ते है
और जब ऐसी कोई घटना होती है तो वो पूराने गड़े मुर्दे उठाए जाते है॥ महिलाओं पे ही और बंदिशे लगती है,,,उन्हे ही सावधानी बरतने को कहा जाता है...और हिदायतें मिलती हैं...
महिला सुरक्षा महिलाओ कि अपनी ज़िम्मेदारी क्यू मानी जाती है...किन हम ऐसा वातावरण तैयार नही कर पा रहे हैं कि महिलाए सुरक्शित नही है , उन लोगों को के लिए लिए एक और बात बताना चहुंगी कि बलात्कार/छेद्खानी की बहुत सारी घटनाए दिन दहाड़े और सुरक्शित समझे जाने वाले स्थानो पे ही होती है।
हमे मानना पड़ेगा की समाज बदल रहा है, पर इसका भुगतान महिलाओ को चुकाना पड़े ये बात भी स्वीकार्य नही है।
चाहे वो मीडिया का प्रभाव हो, लड़के लड़कियों की दोस्ती हो, पश्चिम का प्रभाव हो , ये सब तो अब आ गया है, अब महिलाओं बाहर भी निकालना है, पूरुषों से उनका सामना होगा ही होगा ,सवाल ये है की इन सब के साथ वातावरण महिलाओ के लिए सुरक्शित कैसे बनाया जाए,, दोनो जेंडेर्स के बीच संघर्ष को कम कैसे किया जाए...और हाँ ये सोचना की हमारी संस्कृति पहले जो थी वो बहुत ग्रेट थी,,अब सब सत्या नाश हो गया है ये सोच भी ठीक नही है,,,सब समाजो मे परिवर्तन आता है वो किस दिशा मे मोड़ना है ये ध्यान मे रखने लायक बात है॥हम पलट कर कभी पूराने समाज मे नही जा पाएंगे...
इस पोस्ट को पढने से पहले मैं स्पष्ट कर
देना चाहता हूँ की हमारी बहन जो दिल्ली में
जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है हमारी और
पूरे भारत की दुआएं उसकी रक्षा करे!!
शायद
आज से ज्यादा सही समय इस पोस्ट के लिए
नहीं होगा इसलिए मैं ये पोस्ट डाल रहा हूँ
किसी को इस पोस्ट से दुःख हो तो अग्रिम
क्षमा प्रार्थी हूँ!!
मित्रों आज हमारी बहनों और भाइयों द्वारा हर
राज्य और हर शहर में
जो दिल्ली की घटना को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं
वो तारीफ़ के काबिल हैं और उनका मैं भी समर्थन
करता हूँ !!
पर मेरा एक सवाल ये है की ऐसे प्रदर्शन तब
क्यों नहीं होते जब फिल्मों और विज्ञापनों में
महिलाओं को व्यावसायिक लाभ की प्राप्ति के
लिए भोग की वस्तु के रूप में
दिखाया जाता है ???
ऐसे प्रदर्शन तब क्यों नहीं होते हैं जब राष्ट्रीय
महिला आयोग की अध्यक्षा कहती है
की महिलाओं को सेक्सी कहे जाने
का बुरा नहीं मानना चाहिए ???
ऐसे प्रदर्शन तब क्यों नहीं होते जब इमरान
हाश्मी की चुम्मा-चाटी वाली फिल्मो की कमाई से
अधिभूत होकर भट्ट कैंप सनी लेओने को भारत में
लाकर महिलाओं के सम्मान में वृद्धि करता है ???
ऐसे प्रदर्शन तब क्यों नहीं होते जब
डर्टी पिक्चर जैसी फिल्मो को राष्ट्रीय
पुरस्कार दिया जाता है ???
प्रदर्शन तो दूर कहीं विरोध भी नज़र
नहीं आता है तो क्या ये हमारी मौन
सहमती नहीं कहलाएगी???
मुझे तो ये प्रदर्शन देख कर ऐसा लग रहा है
की हड्डी टूटी हुई है और हम पैन किलर(दर्द
निवारक औषधि) से काम चला रहे हैं !!