Is “Tuition” Necessary for Junior Classes?

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dndeswal

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'ट्यूशन' का गोरखधंधा

आजकल एक चर्चा सुनी जा रही है - नर्सरी स्कूलों में दाखिले की । बड़े शहरों में तो यह हाल है कि जो बच्चा अभी मां के पेट में ही है, उसके दाखिले के फार्म भी भरे जा रहे हैं ताकि कुछ साल बाद की सीट 'रिजर्व' हो जाये ।

अजीब देश है हमारा भी - एक जमाने में शिक्षा के क्षेत्र में जगतगुरु था, और सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी नालन्दा और तक्षशिला हमारे ही यहां थीं जहां सारे संसार से बच्चे उच्च-शिक्षा ग्रहण करने आते थे । अंग्रेजों ने आकर सब कचरा कर डाला । हमारी शिक्षा-प्रणाली को इतना नुकसान मुसलमानों ने नहीं पहुंचाया जितना अंग्रेजों ने । और आज हम उन्हीं गोरे बादशाहों के गीत गा रहे हैं, उन्हीं की जुबान जबर्दस्ती अपने बच्चों को पढ़ा कर खुश भी हो रहे हैं । गली-मुहल्ले में 'कान्वेन्ट स्कूल' खुल गए हैं जहां तीन-चार साल के बच्चों को रटाया जा रहा है - "Ba-ba black sheep", "Twinkle-twinkle little stars" वगैरा-वगैरा । वैसे "प्रार्थना" भी कराई जाती है हिन्दी-अंग्रेजी की खिचड़ी में - जिसका मतलब बच्चों को हमारे धर्म से दूर करना भी एक मकसद लगता है : "Mary मेरी यशोमती मैया, Jesus मेरा कृष्ण-कन्हैया" !

इन स्कूलों में सस्ते 'मास्टर' और मास्टरणियां रखे हुए होते हैं । एक मास्टरणी बच्चों को हिन्दी पढ़ा रही थी, कुछ इस तरह "बोलो बच्चो, छोटा अ - बड़ा अ, छोटी इ - बड़ी ई, छोटा उ - बड़ा ऊ ! हे भगवान, बचाओ ऐसी मास्टरणियों से !!

इन स्कूलों की शिक्षिकाओं ने 'पॉकेट मनी' का इंतजाम करना शुरू कर दिया है - मां-बाप को कह दिया जाता है कि आपका बच्चा 'कमजोर' है, 'ट्यूशन' तो लगवाना ही पड़ेगा । पहले सर्दी के मौसम में स्कूलों का टाइम बदल दिया जाता था, स्कूल नौ बजे के बाद शुरू होते थे ताकि सुबह-सुबह छोटे बच्चों को सर्दी में टिठुरते हुए स्कूल न जाना पड़े । पर आजकल तो सर्दी के मौसम में भी सुबह सात बजे ही बच्चे स्कूल के लिए निकल पड़ते हैं । ऐसा करने का एक खास मकसद भी है - मास्टर और मास्टरणियों को शाम का वक्त मिल जाता है जिसमें वे अपना 'ट्यूशन' करते हैं । अपने आप में बड़ा सवाल है कि आखिर बच्चों की खेलने की उम्र कौन सी है ? जब इतनी छोटी उम्र में ही दर्जनों किताबें लाद दी जायें और ऊपर से कई घण्टे 'ट्यूशन' भी बच्चों पर लादा जाये तो उनका विकास क्या खाक होगा ?

यह बीमारी कितना गंभीर रूप ले चुकी है, इसे देश में गहरी जड़ें जमा चुकी ट्यूशन-कोचिंग संस्कृति से समझा जा सकता है । अगर कक्षा एक से लेकर आठ तक के बच्चों को भी ट्यूशन का सहारा लेना पड़ रहा है तो इसका मतलब है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद सड़-गल गई है और शिक्षा के ऐसे ढांचे से किसी बेहतरी की उम्मीद करना खुद को धोखे में रखना है । छोटी कक्षाओं और यहां तक कि हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट के स्तर पर भी छात्रों के लिए ट्यूशन-कोचिंग का कोई प्रावधान नहीं होना चाहिए। ट्यूशन की जरूरत शिक्षा के मौलिक सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है । यह एक प्रकार से शिक्षा व्यवस्था का मजाक है । आखिर हमारे देश में पहले ट्यूशन विहीन शिक्षा ही प्रचलन में थी और विकसित देशों में आज भी ऐसा ही है । वहां तो ट्यूशन-कोचिंग के बारे में सोचना भी एक तरह का गुनाह है ।

मजे की बात तो यह है कि जहां एक तरफ स्कूली छात्रों को ट्यूशन का सहारा लेना पड़ रहा है वहीं यूनिवर्सिटी में छात्रों को अपनी क्लास में जाना जरूरी नहीं लगता । ज्यादातर विश्वविद्यालय बिना ज्ञान-हुनर दिए ऐसी डिग्रियां बांटने में लगे हैं जो कागज का टुकड़ा साबित हो रही हैं । यह स्थिति देश की भावी पीढ़ी के साथ खिलवाड़ है और ऐसा करके हम खुद ही अपना भविष्य अंधकारमय बना रहे हैं ।
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Last edited:
Yeh Desh Hi Barbaad hai !!!!

Bandhu aisa nahin hai. Teachers ke tutions ke liye student ko kyon jaaney diya jata ha...iska reason pata hai? Bhai..aaj kal dono maa-baap to naukri karte hai. Bachhon ko padhaney ka time nahin hai unke paas..shaam ko ghar aaney ke baad. Aur yadi wife job nahin karti...usko ghar par aur bahut kaam karne ho hain(the reality u don't know). 2-2 ghantey phone kar gappein ladati rehti hain..lekin yeh nahin ki apne bachhon ko homework karwa dein. Aur rahi baat Baap ke role ki...shaam ko ghar par aaney ke baad aur weekend par bachhon ki class to lee hee sakta hai. His role is not only to check his report card. Mere hisaab se problem teachers ki nahin hai...problem hamare ghar mein hai. Apne bachhon ko apne aap padhao...aur usko independent padhne ki aadat dalo...he'll have more confidence. Aur jab woh badi class mein phunch jaye...+1 types. Get him admitted to a coaching center...for specialized coaching for competitions. Mere hisaab se aisa hona chahiye.
 
Not at all !

Bandhu aisa nahin hai. Teachers ke tutions ke liye student ko kyon jaaney diya jata ha...iska reason pata hai? Bhai..aaj kal dono maa-baap to naukri karte hai. Bachhon ko padhaney ka time nahin hai unke paas..shaam ko ghar aaney ke baad. Aur yadi wife job nahin karti...usko ghar par aur bahut kaam karne ho hain(the reality u don't know). 2-2 ghantey phone kar gappein ladati rehti hain..lekin yeh nahin ki apne bachhon ko homework karwa dein. Aur rahi baat Baap ke role ki...shaam ko ghar par aaney ke baad aur weekend par bachhon ki class to lee hee sakta hai. His role is not only to check his report card. Mere hisaab se problem teachers ki nahin hai...problem hamare ghar mein hai. Apne bachhon ko apne aap padhao...aur usko independent padhne ki aadat dalo...he'll have more confidence. Aur jab woh badi class mein phunch jaye...+1 types. Get him admitted to a coaching center...for specialized coaching for competitions. Mere hisaab se aisa hona chahiye.

Truly said !

Problem does not lies just with the education system, parents have a very crucial role to play.

One most important thing what I am observing these days is that parents nowadays are developing a tendency to pamper their children more than required ! Ek saas aur ek bahu poore din ghar pe rehti hai to unse ek baccha nahi sambhalta aajkal :rolleyes: ...... ye bahut pareshan karta hai....... ye kuch khaati hi nahi..... ye mujhse padhta hi nahi.......... ye meri koi baat nahi maanti .... Such are the normal sentences which can be heard. If the parents allow their child to eat chocolates in place of fruits, allow chips in place of chapattis by just getting flown away seeing their children crying for the same, then even a small child is quick enough to get the key to persuade his parents to fulfill his wishes which may not be in long term interest of that child.

So is the case when it comes to teaching a child. There has to be a fair exercise of judgement on the part of the parents so as to make it a never-miss task to attend to the child while he studies.

The fundamental thing is that discipline and balanced behaviour is a very crucial virtue when it comes to raising a child in true spirit ! Parents must understand that in the changing scenario and with the time constraints, they must plan everything and take parenting a bit seriously, unnecessarily pampering a child or leaving him aside to be guided by the outside world, both situations are equally disastrous.

Learning and making someone learn something depends on the spirit that works behind that. Imagine with what spirit a tutor teaches? Money to be the first of course ! And learning requires a heart, a helping hand, an understanding wit, a patient listener and a loving soul around when it comes to primary learning ! So, depending on a tutor is just like letting a child be fed on machines !

As far as I think, starting 3-4 years of education of a child makes a solid background and then the child gets the basic skills like reasoning, comparing, applying his own mind, matching the theories with his practical observations and the like, and this is the time to put the clay in the hands of a loving potter, who else then parents?
 
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'ट्यूशन' का गोरखधंधा

आजकल एक चर्चा सुनी जा रही है - नर्सरी स्कूलों में दाखिले की । बड़े शहरों में तो यह हाल है कि जो बच्चा अभी मां के पेट में ही है, उसके दाखिले के फार्म भी भरे जा रहे हैं ताकि कुछ साल बाद की सीट 'रिजर्व' हो जाये ।

अजीब देश है हमारा भी - एक जमाने में शिक्षा के क्षेत्र में जगतगुरु था, और सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी नालन्दा और तक्षशिला हमारे ही यहां थीं जहां सारे संसार से बच्चे उच्च-शिक्षा ग्रहण करने आते थे । अंग्रेजों ने आकर सब कचरा कर डाला । हमारी शिक्षा-प्रणाली को इतना नुकसान मुसलमानों ने नहीं पहुंचाया जितना अंग्रेजों ने । और आज हम उन्हीं गोरे बादशाहों के गीत गा रहे हैं, उन्हीं की जुबान जबर्दस्ती अपने बच्चों को पढ़ा कर खुश भी हो रहे हैं । गली-मुहल्ले में 'कान्वेन्ट स्कूल' खुल गए हैं जहां तीन-चार साल के बच्चों को रटाया जा रहा है - "Ba-ba black sheep", "Twinkle-twinkle little stars" वगैरा-वगैरा । वैसे "प्रार्थना" भी कराई जाती है हिन्दी-अंग्रेजी की खिचड़ी में - जिसका मतलब बच्चों को हमारे धर्म से दूर करना भी एक मकसद लगता है : "Mary मेरी यशोमती मैया, Jesus मेरा कृष्ण-कन्हैया" !

इन स्कूलों में सस्ते 'मास्टर' और मास्टरणियां रखे हुए होते हैं । एक मास्टरणी बच्चों को हिन्दी पढ़ा रही थी, कुछ इस तरह "बोलो बच्चो, छोटा अ - बड़ा अ, छोटी इ - बड़ी ई, छोटा उ - बड़ा ऊ ! हे भगवान, बचाओ ऐसी मास्टरणियों से !!

इन स्कूलों की शिक्षिकाओं ने 'पॉकेट मनी' का इंतजाम करना शुरू कर दिया है - मां-बाप को कह दिया जाता है कि आपका बच्चा 'कमजोर' है, 'ट्यूशन' तो लगवाना ही पड़ेगा । पहले सर्दी के मौसम में स्कूलों का टाइम बदल दिया जाता था, स्कूल नौ बजे के बाद शुरू होते थे ताकि सुबह-सुबह छोटे बच्चों को सर्दी में टिठुरते हुए स्कूल न जाना पड़े । पर आजकल तो सर्दी के मौसम में भी सुबह सात बजे ही बच्चे स्कूल के लिए निकल पड़ते हैं । ऐसा करने का एक खास मकसद भी है - मास्टर और मास्टरणियों को शाम का वक्त मिल जाता है जिसमें वे अपना 'ट्यूशन' करते हैं । अपने आप में बड़ा सवाल है कि आखिर बच्चों की खेलने की उम्र कौन सी है ? जब इतनी छोटी उम्र में ही दर्जनों किताबें लाद दी जायें और ऊपर से कई घण्टे 'ट्यूशन' भी बच्चों पर लादा जाये तो उनका विकास क्या खाक होगा ?

यह बीमारी कितना गंभीर रूप ले चुकी है, इसे देश में गहरी जड़ें जमा चुकी ट्यूशन-कोचिंग संस्कृति से समझा जा सकता है । अगर कक्षा एक से लेकर आठ तक के बच्चों को भी ट्यूशन का सहारा लेना पड़ रहा है तो इसका मतलब है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद सड़-गल गई है और शिक्षा के ऐसे ढांचे से किसी बेहतरी की उम्मीद करना खुद को धोखे में रखना है । छोटी कक्षाओं और यहां तक कि हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट के स्तर पर भी छात्रों के लिए ट्यूशन-कोचिंग का कोई प्रावधान नहीं होना चाहिए। ट्यूशन की जरूरत शिक्षा के मौलिक सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है । यह एक प्रकार से शिक्षा व्यवस्था का मजाक है । आखिर हमारे देश में पहले ट्यूशन विहीन शिक्षा ही प्रचलन में थी और विकसित देशों में आज भी ऐसा ही है । वहां तो ट्यूशन-कोचिंग के बारे में सोचना भी एक तरह का गुनाह है ।

मजे की बात तो यह है कि जहां एक तरफ स्कूली छात्रों को ट्यूशन का सहारा लेना पड़ रहा है वहीं यूनिवर्सिटी में छात्रों को अपनी क्लास में जाना जरूरी नहीं लगता । ज्यादातर विश्वविद्यालय बिना ज्ञान-हुनर दिए ऐसी डिग्रियां बांटने में लगे हैं जो कागज का टुकड़ा साबित हो रही हैं । यह स्थिति देश की भावी पीढ़ी के साथ खिलवाड़ है और ऐसा करके हम खुद ही अपना भविष्य अंधकारमय बना रहे हैं ।
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बहुत अच्छा और सच लिखा है देसवाल जी | आज कल ये हालत हो गई है कि बच्चे ने पढ़ाई शुरू करी नही की टुशन पहले लग जाते है |
पहली, दूसरी, तीसरी के बच्चो को मोटे मोटे पॉवर लेंस | हद है ये तो | जिन्होंने अभी ठीक से देखना भी शुरू नही किया उनको वो बुढापे वाले चश्मे | खेल भी होंगे तोह विडो गेम और ऐसे ही | पैदा बाद में होते है माँ बाप कंप्यूटर ले कर पहले खड़े होते है की जैसे ही वहा से यहा गिर्रे तो हाथ में कंप्यूटर थमा दे |
 
Truly said !

Problem does not lies just with the education system, parents have a very crucial role to play.

One most important thing what I am observing these days is that parents nowadays are developing a tendency to pamper their children more than required ! Ek saas aur ek bahu poore din ghar pe rehti hai to unse ek baccha nahi sambhalta aajkal :rolleyes: ...... ye bahut pareshan karta hai....... ye kuch khaati hi nahi..... ye mujhse padhta hi nahi.......... ye meri koi baat nahi maanti .... Such are the normal sentences which can be heard. If the parents allow their child to eat chocolates in place of fruits, allow chips in place of chapattis by just getting flown away seeing their children crying for the same, then even a small child is quick enough to get the key to persuade his parents to fulfill his wishes which may not be in long term interest of that child.


कान पकड़ के नै अपने सिर कि ऊँचाई ताहि ठा दे अर्र फेर ३-४ गधाक दे बालक कि औकात के हिसाब तै | फेर देखो वो तै बोल चपाला बैठा रेह्गा सारे दिन अर्र कति भाज भाज टेम पी सब्क्यम जीम जा गा
 
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यह बीमारी कितना गंभीर रूप ले चुकी है, इसे देश में गहरी जड़ें जमा चुकी ट्यूशन-कोचिंग संस्कृति से समझा जा सकता है । अगर कक्षा एक से लेकर आठ तक के बच्चों को भी ट्यूशन का सहारा लेना पड़ रहा है तो इसका मतलब है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद सड़-गल गई है और शिक्षा के ऐसे ढांचे से किसी बेहतरी की उम्मीद करना खुद को धोखे में रखना है । छोटी कक्षाओं और यहां तक कि हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट के स्तर पर भी छात्रों के लिए ट्यूशन-कोचिंग का कोई प्रावधान नहीं होना चाहिए। ट्यूशन की जरूरत शिक्षा के मौलिक सिद्धांतों के सर्वथा विपरीत है । यह एक प्रकार से शिक्षा व्यवस्था का मजाक है । आखिर हमारे देश में पहले ट्यूशन विहीन शिक्षा ही प्रचलन में थी और विकसित देशों में आज भी ऐसा ही है । वहां तो ट्यूशन-कोचिंग के बारे में सोचना भी एक तरह का गुनाह है ।
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ऐसा बकवास शिक्षा सिस्टम बना रखा है की गरीब और लो मिडिल क्लास परिवार के बच्चो के लिए तो पढ़ लिख कर कुछ बनना दिन मे सपने देखना जैसा हो गया ! एक तो अच्छी स्कूल की फीस इतनी ज्यादा होती है की उसको चुकाना ही भरी पड़ता है, और अगर सरकारी स्कूल मे पड़े तो वहा पर शिक्षक महोदय राजनिती से ही फुर्सुत नही मिलती ! क्लास टाइम मे भी स्टाफ रूम मे बैठ बैठ गप्पे मरते रहते है ! सारे के सारे नेतावो की जी हजूरी करने मे व्यस्त रहते है ताकि उनका तबादला गाम के किसी नजदीक स्कूल मे हो जाए फिर आराम से गाम
मे राजनीती करे और घर का काम करे, बच्चो की पढाई गई भाड़ मे ! अब ऐसे मे उन बच्चो का तो करियर तो बरबाद ही है ! गाम वाले भी ऐसे मास्टरों का कुछ नही करते ! उल्टा उनको मास्टरजी मास्टरजी कर कर के सर पर चदाये रखते है !

सरकारी स्कूल्स मे टीचर साफ साफ बच्चो से कह देते है की 'ट्यूशन' करो नही तो प्रक्टिकल परीक्षा मे नम्बर कम भेज दिए जायेंगे अब कोई या तो 'ट्यूशन' करो या फिर कम नम्बर सवीकार करो ! अब कम नम्बर आना और भी ज्यादा घाटे का मामला हो जाता है क्योकि कोई कितना बुदिमान है इसकी परख यहा ग्रेड और पेर्सन्टेज से ही होती है !

अब आगे अगर कोई पर्तियोगी परीक्षा की तयारी करो तो वहा यह कोचिंग वाले लूटना शुरू कर देते है ! अब कई तो बिचारे यह तक दुखी होकर पढाई छोड़ कर रोजी रोटी का जुगाड़ देखने लग जाते है ! अगर यह सब ऐसे ही चलता रहा तो बेडा गर्क होने मे टाइम ने लगेगा !
 
कान पकड़ के नै अपने सिर कि ऊँचाई ताहि ठा दे अर्र फेर ३-४ गधाक दे बालक कि औकात के हिसाब तै | फेर देखो वो तै बोल चपाला बैठा रेह्गा सारे दिन अर्र कति भाज भाज टेम पी सब्क्यम जीम जा गा

Ye philosophy jab dobaara sunenge jab aapke baalkaan ki baat aavegi :p:o
 
Ye philosophy jab dobaara sunenge jab aapke baalkaan ki baat aavegi :p:o


अपने बालका की तोह गारंटी लेता नही पर आपके बालका नै कती अड्डे हाथा ले कै नै कती गज कर दूंगा ... हा हा हा हा
 
ऐसा बकवास शिक्षा सिस्टम बना रखा है की गरीब और लो मिडिल क्लास परिवार के बच्चो के लिए तो पढ़ लिख कर कुछ बनना दिन मे सपने देखना जैसा हो गया ! एक तो अच्छी स्कूल की फीस इतनी ज्यादा होती है की उसको चुकाना ही भरी पड़ता है, और अगर सरकारी स्कूल मे पड़े तो वहा पर शिक्षक महोदय राजनिती से ही फुर्सुत नही मिलती ! क्लास टाइम मे भी स्टाफ रूम मे बैठ बैठ गप्पे मरते रहते है ! सारे के सारे नेतावो की जी हजूरी करने मे व्यस्त रहते है ताकि उनका तबादला गाम के किसी नजदीक स्कूल मे हो जाए फिर आराम से गाम
मे राजनीती करे और घर का काम करे, बच्चो की पढाई गई भाड़ मे ! अब ऐसे मे उन बच्चो का तो करियर तो बरबाद ही है ! गाम वाले भी ऐसे मास्टरों का कुछ नही करते ! उल्टा उनको मास्टरजी मास्टरजी कर कर के सर पर चदाये रखते है !

सरकारी स्कूल्स मे टीचर साफ साफ बच्चो से कह देते है की 'ट्यूशन' करो नही तो प्रक्टिकल परीक्षा मे नम्बर कम भेज दिए जायेंगे अब कोई या तो 'ट्यूशन' करो या फिर कम नम्बर सवीकार करो ! अब कम नम्बर आना और भी ज्यादा घाटे का मामला हो जाता है क्योकि कोई कितना बुदिमान है इसकी परख यहा ग्रेड और पेर्सन्टेज से ही होती है !

अब आगे अगर कोई पर्तियोगी परीक्षा की तयारी करो तो वहा यह कोचिंग वाले लूटना शुरू कर देते है ! अब कई तो बिचारे यह तक दुखी होकर पढाई छोड़ कर रोजी रोटी का जुगाड़ देखने लग जाते है ! अगर यह सब ऐसे ही चलता रहा तो बेडा गर्क होने मे टाइम ने लगेगा !

Sahi kaha Mukesh ! The real irony !

Kya kiya jaaye bhai...... kya solution hai?
 
अपने बालका की तोह गारंटी लेता नही पर आपके बालका नै कती अड्डे हाथा ले कै नै कती गज कर दूंगा ... हा हा हा हा

Acha ji !!!!!

Chinta konyaa....... mere to ballakaa hi bhatere honge thaare aadde haathho ko tirchaa karan ne....... uski chinta konyi maanee ..... :D:p;)
 
Acha ji !!!!!

Chinta konyaa....... mere to ballakaa hi bhatere honge thaare aadde haathho ko tirchaa karan ne....... uski chinta konyi maanee ..... :D:p;)


बहुतेरे मतलब 'बहुत सारे' या फ़िर 'सक्षम' ???
ढिबसर लिखा करो जी, कंफुजन हो जा सै
 
बहुतेरे मतलब 'बहुत सारे' या फ़िर 'सक्षम' ???
ढिबसर लिखा करो जी, कंफुजन हो जा सै

दोनों :p

waise maine 'भतेरे' likha tha !
 
Sahi kaha Mukesh ! The real irony !

Kya kiya jaaye bhai...... kya solution hai?

solutions to Di, bhot hai.. lakin kya kaam aye.. itne plan banate hai itni policies banti hai lakin ek bi dang se lagu nai hoti.. koi bi plan dang se implement nai hota kyoki is desh maie upar se lekar niche tak pura system hi ganda ho gaya hai, chahe public ho ya politician sare ke sare apna ullu sidha karne maie lage huwe.. kuch nai hone wala!!

now in this country, only a disaster can set the things on right track !!
 
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