anilsangwan
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गौरव भाई राम राम !
यहाँ जाटलैंड पे बहुत से मुद्दे शुरू तो होते हैं किसी और मकसद से लेकिन वक़्त क साथ साथ लोग उनको अपने हिसाब से मोड़ देते हैं. काफी बार ये सिर्फ अनजाने में होता है लेकिन बहुत बार लोग अपने स्वार्थ के लिए ऐसा करते हैं.
इस थ्रेड में भी वही हुआ. शुरात हुई थी प्रोफ साहाब के ब्यान से जिसमें उन्होने इनेलो के "आत्म-मंथन" की बात की थी. और बात बिलकुल सही थी .... जब तक पार्टी को अपनी कमियों का पता नहीं होगा... उसमें सुधार कैसे होगा... लेकिन आखिर में कुछ लोगो ने इसे अपने रिश्तेदारों की "डिग्री" और "ओहदे" प्रर्दशित करने के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. अपने आप को और अपने रिश्तेदारों को "बड़ा" और "स्वच्छ छवि" का आदमी सिद्ध करने के लिए लोग आधारहीन आरोप लगा देते हैं .......दूसरों को छोटा दिखा कर अपने आप को बड़ा बनाना शायद इनको सब से आसान तरीका लगता है|. आलोचना करना बहुत आसान है लेकिन आलोचकों को यह भी सोचना चाहिए की जिसकी आलोचना कर रहे हो उसके लिए आप के पास तथ्य हैं भी या नहीं | फिर बाद में "नकली मेम्बेर्स" बन कर लिखते हैं...
हर अच्छे इंसान को विरोध का सामना करना पड़ता ही है ... यहाँ भी वही हो रहा है..... हम समझ सकते हैं की अनर्गल बातों और दुष्प्रचार का कितना दुःख होता है लेकिन आप को ऐसे लोगों की बातों से दुखी नहीं होना है | बहुत से ऐसे मनघडंत आरोप होंगे जो आपको अपने पथ से भटकने को मजबूर करेंगे...
आप के सामने बहुत बड़ी "चुनौती" और "अवसर" दोनों हैं. चुनौती है अपने आप को ऐसे आरोपों के बीच संतुलित रखना और अपने कर्तव्य की तरफ बिना विचलित हुए बढ़ते जाना. और "अवसर" है आप के पास उस "धरोहर" को आगे बढ़ाना जिसकी हमेशा ... हमेशा से तारीफ होती है है...यहाँ तक की राजनितिक विरोधी भी जिन नीतियों और कार्येशैली की प्रशंशा करते रहे हैं.. वो धरोहर जो अनमोल है... जो दुर्लभ्प्राय: और जिसको जीवित रखने के लिए प्रोफ साब ने साहसिक निर्णय लिया है ... हमारी शुभकामनाएं हमेशा आपके साथ हैं और हमेशा रहेंगी |
यहाँ जाटलैंड पे बहुत से मुद्दे शुरू तो होते हैं किसी और मकसद से लेकिन वक़्त क साथ साथ लोग उनको अपने हिसाब से मोड़ देते हैं. काफी बार ये सिर्फ अनजाने में होता है लेकिन बहुत बार लोग अपने स्वार्थ के लिए ऐसा करते हैं.
इस थ्रेड में भी वही हुआ. शुरात हुई थी प्रोफ साहाब के ब्यान से जिसमें उन्होने इनेलो के "आत्म-मंथन" की बात की थी. और बात बिलकुल सही थी .... जब तक पार्टी को अपनी कमियों का पता नहीं होगा... उसमें सुधार कैसे होगा... लेकिन आखिर में कुछ लोगो ने इसे अपने रिश्तेदारों की "डिग्री" और "ओहदे" प्रर्दशित करने के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. अपने आप को और अपने रिश्तेदारों को "बड़ा" और "स्वच्छ छवि" का आदमी सिद्ध करने के लिए लोग आधारहीन आरोप लगा देते हैं .......दूसरों को छोटा दिखा कर अपने आप को बड़ा बनाना शायद इनको सब से आसान तरीका लगता है|. आलोचना करना बहुत आसान है लेकिन आलोचकों को यह भी सोचना चाहिए की जिसकी आलोचना कर रहे हो उसके लिए आप के पास तथ्य हैं भी या नहीं | फिर बाद में "नकली मेम्बेर्स" बन कर लिखते हैं...
हर अच्छे इंसान को विरोध का सामना करना पड़ता ही है ... यहाँ भी वही हो रहा है..... हम समझ सकते हैं की अनर्गल बातों और दुष्प्रचार का कितना दुःख होता है लेकिन आप को ऐसे लोगों की बातों से दुखी नहीं होना है | बहुत से ऐसे मनघडंत आरोप होंगे जो आपको अपने पथ से भटकने को मजबूर करेंगे...
आप के सामने बहुत बड़ी "चुनौती" और "अवसर" दोनों हैं. चुनौती है अपने आप को ऐसे आरोपों के बीच संतुलित रखना और अपने कर्तव्य की तरफ बिना विचलित हुए बढ़ते जाना. और "अवसर" है आप के पास उस "धरोहर" को आगे बढ़ाना जिसकी हमेशा ... हमेशा से तारीफ होती है है...यहाँ तक की राजनितिक विरोधी भी जिन नीतियों और कार्येशैली की प्रशंशा करते रहे हैं.. वो धरोहर जो अनमोल है... जो दुर्लभ्प्राय: और जिसको जीवित रखने के लिए प्रोफ साब ने साहसिक निर्णय लिया है ... हमारी शुभकामनाएं हमेशा आपके साथ हैं और हमेशा रहेंगी |
there have been a lot of talks and discussions about my father on jatland. Truly, it wasn’t easy to quit inld, founded by ch. Devi lalji and flourished by my father in every possible way. Some said that we left inld for self-interests, and some spoke about “cheap personal gain”. Definitely criticism hurts, but it hurts more when people talk without facts.
A respectable member said that once ch. Devi lalji called my father "sampati singh". With the highest of respect, i ask the member to please produce or highlight the fact when and where ch. Devi lalji said that. It’s a public forum, therefore, a healthy but a criticism accompanied with a fact must be mandatory, not as a compulsion but with self-conscious. Ch. Devi lalji remains “dadaji” for me and would always be one, as he was the one responsible for making my father enter public life, and for what we are today.
We didn’t leave because congress is expected to come to power. We could have done that in 1982, 1991, 1996, or 2005. There were many many occasions if we wanted to go for “cheap personal interest”. We didn’t leave the party as we pledged our life to ch. Devi lalji, and we might not have ever if he was alive. After a number of humiliations, we had to leave the party. Reasons are endless; both public, and personal.
Today, chautlas say “sampat singh ko hum vidhaan sabha mein nahin, samsham mein bhejenge”. You might be able to imagine what it feels to me when they say such words. After such a loyalty we are getting such a criticism.
My father is of the view that he has achieved more than he dreamt. Upcoming vidhaan sabha election would be his last.
Since chautalas and bhajan lal would compromise against my father, and would put up a united show in the election, therefore our family is going through the worse.
I will make sure that my father goes to vidhan sabha and not “samshan”.
I, kindly request all the member that before you put up anything on a community forum, please verify the facts with the dates and press reporting.
Kindest regards!!
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