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"इश्क, इश्क इश्क" नाम की एक हिन्दी फिल्म बनी थी जिसमें देवानन्द और जीनत अमान थे ।
गालिब का एक शेर है -
इश्क पर जोर नहीं, है ये ऐसी आतिश गालिब ।
जो लगाये न लगे और बुझाये ना बने ।
"इश्क पर जोर नहीं" नाम की भी एक फिल्म थी (धर्मेन्द्र और साधना) ।
कुछ दिन पहले ही एक धागा चला था एक मजेदार किस्से पर -
Haryana dy -cm taj mahomad missing
बहुत कामेंट आये - यह भी लिखा गया कि मीयां-बीबी राजी तो क्या करेगा काजी ! बाद में किसी कारणवश उस धागे पर ताला लग गया । खैर !
हरयाणा के पूर्व उपमुख्यमंत्री चन्द्रमोहन एक महिला (अनुराधा) पर दिल दे बैठे । पर कानूनन शादी नहीं हो सकती थी । सो, एक आसान राह खोज ली - मुसलमान बन जाओ (वे तो चार बीबी रख सकते हैं) । अपना (चांद मोहम्मद) और अपनी नई बीबी का नाम (फिजां मोहम्मद) भी बदल लिया । बमुश्किल दो महीने बाद ही उनकी नई बीबी ने अपने इस आशिक के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है कि उसने उसे चोट पहुंचाई, दुष्कर्म किया और धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ किया :
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/crime/5_18_5243854.html
बेचारा "चांद मोहम्मद" गया काम से - उसके चांद पर ग्रहण लगा हुआ है, 'फिजां' की जगह वीराना छाया हुआ है । कुर्सी छिन गई, उसके बाप ने उसको जायदाद से बेदखल कर दिया, उसका राजनैतिक जीवन चोपट हो गया, और उसकी माशूका भी शायद उसको छोड़ कर चली जाये । मजनूं को तो लैला मिली ही न थी पर इनकी तो मिलकर भी साथ छोड़ने को है !
आंध्रप्रदेश के नेता एन.टी. रामाराव को बुढ़ापे में आशिकी का भूत सवार हुआ था - लक्ष्मी पार्वती से ब्याह कर लिया । चौ. देवीलाल से उनकी दोस्ती थी उन दिनों । चौ. साहब ने उनको समझाया कि क्यूं बुढ़ापे में अपनी मिट्टी खराब कर रहे हो - अब तो आप राजनीति से भी गए । रामाराव ने कहा कि मैं लक्ष्मी-पार्वती के बिना नहीं रह सकता, इससे भला राजनीति का क्या वास्ता ? चौ. साहब की बात सच निकली । रामाराव के दामाद चन्द्रबाबू नायडू ने उसकी पार्टी पर कब्जा कर लिया और चुनाव होते ही खुद CM बन बैठा । रामाराव इसी गम में भगवान को प्यारे हो गये ।
हिन्दी साहित्य जिन्होंने पढ़ा है वे जानते हैं कि सूफी कवि "आलम" की क्या कहानी है । आलम पहले हिन्दू ही था । वह अपने कपड़े को धोने के लिए एक मुस्लिम धोबिन लड़की (जिसका नाम ’शेख’ था) के यहां भेजता था । एक दिन जब शेख कपड़ों को धोने लगी तो आलम के कुर्ते की जेब में एक कागज का टुकड़ा मिला जिस पर एक अधूरा शेर लिखा था ।
कनक कटि सी कामिनी, काहे को कटि क्षीण ?
(सोने जैसी कमर वाली सुन्दरी, तेरी कमर इतनी पतली क्यों है)
उसी कागज के टुकड़े पर शेख ने उस अधूरे शेर के आगे एक और लाइन लिखकर उसे पूरा कर दिया -
कटि का कंचन काटि के, कुच माहीं भर दीन ।
[मैंने अपनी कमर का सोना काट कर अपने कुचों (छातियों) में भर दिया]
और उस कमीज को धोने के बाद वह कागज फिर उसी जेब में रख दिया ।
जब कमीज वापिस पहुंची तो आलम ने उसको पहना और जेब में हाथ डाला । कवि ने देखा कि यह धोबिन तो उससे भी बड़े कवयित्री है । बस, वह तो उसका दीवाना हो गया, खुद अपना धर्म बदल कर अपना नाम "आलम" रख लिया और कवयित्री शेख विवाह कर लिया । दोनों ने खूब शायरी लिखी और जिन्दगी आराम से गुजारी ।
पर ऐसी सफल जिन्दगी हरेक के भाग्य में नहीं होती ।
गालिब का एक और शेर है -
इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया, वर्ना हम भी आदमी थे काम के !
मनोवैज्ञानिक Sigmund Freud ने लिखा है कि 'काम' मानव की एक छुपी हुई भावना है जो किसी न किसी रूप में प्रकट होती रहती है । यहां "वेलेंटाइन डे" जैसे धागों में जो धड़ाधड़ कामेंट लिखे जा रहे हैं, मनोवैज्ञानिक रूप से वे जाटलैंडर लड़के-लड़कियों की इसी भावना को प्रकट करते हैं । वैसे यह संत वेलेन्टाइन कौन था, इसके बारे में जानने या पढ़ने की फुर्सत किसी को नहीं । कंपनियों को तो इसी की फिक्र पड़ी है कि कैसे इस दिन का प्रचार करके अपना माल बेच कर मुनाफा कमाया जाये । St. Valentine पर अलग से धागा लिखूंगा बाद में । फिलहाल इतना ही ।
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"इश्क, इश्क इश्क" नाम की एक हिन्दी फिल्म बनी थी जिसमें देवानन्द और जीनत अमान थे ।
गालिब का एक शेर है -
इश्क पर जोर नहीं, है ये ऐसी आतिश गालिब ।
जो लगाये न लगे और बुझाये ना बने ।
"इश्क पर जोर नहीं" नाम की भी एक फिल्म थी (धर्मेन्द्र और साधना) ।
कुछ दिन पहले ही एक धागा चला था एक मजेदार किस्से पर -
Haryana dy -cm taj mahomad missing
बहुत कामेंट आये - यह भी लिखा गया कि मीयां-बीबी राजी तो क्या करेगा काजी ! बाद में किसी कारणवश उस धागे पर ताला लग गया । खैर !
हरयाणा के पूर्व उपमुख्यमंत्री चन्द्रमोहन एक महिला (अनुराधा) पर दिल दे बैठे । पर कानूनन शादी नहीं हो सकती थी । सो, एक आसान राह खोज ली - मुसलमान बन जाओ (वे तो चार बीबी रख सकते हैं) । अपना (चांद मोहम्मद) और अपनी नई बीबी का नाम (फिजां मोहम्मद) भी बदल लिया । बमुश्किल दो महीने बाद ही उनकी नई बीबी ने अपने इस आशिक के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है कि उसने उसे चोट पहुंचाई, दुष्कर्म किया और धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ किया :
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/crime/5_18_5243854.html
बेचारा "चांद मोहम्मद" गया काम से - उसके चांद पर ग्रहण लगा हुआ है, 'फिजां' की जगह वीराना छाया हुआ है । कुर्सी छिन गई, उसके बाप ने उसको जायदाद से बेदखल कर दिया, उसका राजनैतिक जीवन चोपट हो गया, और उसकी माशूका भी शायद उसको छोड़ कर चली जाये । मजनूं को तो लैला मिली ही न थी पर इनकी तो मिलकर भी साथ छोड़ने को है !
आंध्रप्रदेश के नेता एन.टी. रामाराव को बुढ़ापे में आशिकी का भूत सवार हुआ था - लक्ष्मी पार्वती से ब्याह कर लिया । चौ. देवीलाल से उनकी दोस्ती थी उन दिनों । चौ. साहब ने उनको समझाया कि क्यूं बुढ़ापे में अपनी मिट्टी खराब कर रहे हो - अब तो आप राजनीति से भी गए । रामाराव ने कहा कि मैं लक्ष्मी-पार्वती के बिना नहीं रह सकता, इससे भला राजनीति का क्या वास्ता ? चौ. साहब की बात सच निकली । रामाराव के दामाद चन्द्रबाबू नायडू ने उसकी पार्टी पर कब्जा कर लिया और चुनाव होते ही खुद CM बन बैठा । रामाराव इसी गम में भगवान को प्यारे हो गये ।
हिन्दी साहित्य जिन्होंने पढ़ा है वे जानते हैं कि सूफी कवि "आलम" की क्या कहानी है । आलम पहले हिन्दू ही था । वह अपने कपड़े को धोने के लिए एक मुस्लिम धोबिन लड़की (जिसका नाम ’शेख’ था) के यहां भेजता था । एक दिन जब शेख कपड़ों को धोने लगी तो आलम के कुर्ते की जेब में एक कागज का टुकड़ा मिला जिस पर एक अधूरा शेर लिखा था ।
कनक कटि सी कामिनी, काहे को कटि क्षीण ?
(सोने जैसी कमर वाली सुन्दरी, तेरी कमर इतनी पतली क्यों है)
उसी कागज के टुकड़े पर शेख ने उस अधूरे शेर के आगे एक और लाइन लिखकर उसे पूरा कर दिया -
कटि का कंचन काटि के, कुच माहीं भर दीन ।
[मैंने अपनी कमर का सोना काट कर अपने कुचों (छातियों) में भर दिया]
और उस कमीज को धोने के बाद वह कागज फिर उसी जेब में रख दिया ।
जब कमीज वापिस पहुंची तो आलम ने उसको पहना और जेब में हाथ डाला । कवि ने देखा कि यह धोबिन तो उससे भी बड़े कवयित्री है । बस, वह तो उसका दीवाना हो गया, खुद अपना धर्म बदल कर अपना नाम "आलम" रख लिया और कवयित्री शेख विवाह कर लिया । दोनों ने खूब शायरी लिखी और जिन्दगी आराम से गुजारी ।
पर ऐसी सफल जिन्दगी हरेक के भाग्य में नहीं होती ।
गालिब का एक और शेर है -
इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया, वर्ना हम भी आदमी थे काम के !
मनोवैज्ञानिक Sigmund Freud ने लिखा है कि 'काम' मानव की एक छुपी हुई भावना है जो किसी न किसी रूप में प्रकट होती रहती है । यहां "वेलेंटाइन डे" जैसे धागों में जो धड़ाधड़ कामेंट लिखे जा रहे हैं, मनोवैज्ञानिक रूप से वे जाटलैंडर लड़के-लड़कियों की इसी भावना को प्रकट करते हैं । वैसे यह संत वेलेन्टाइन कौन था, इसके बारे में जानने या पढ़ने की फुर्सत किसी को नहीं । कंपनियों को तो इसी की फिक्र पड़ी है कि कैसे इस दिन का प्रचार करके अपना माल बेच कर मुनाफा कमाया जाये । St. Valentine पर अलग से धागा लिखूंगा बाद में । फिलहाल इतना ही ।
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